21 जुलाई 2026
दिल्ली में कल का दिन एक बहुत ही जटिल लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शन का दिन रहा। पिछले कुछ हफ्तों से वहां कॉकरोच जनता पार्टी और लद्दाख के पर्यावरण सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक जंतर-मंतर पर एक अनशन-आंदोलन चला रहे थे। सोनम की हालत लगातार गिरने के बाद उन्हें पुलिस ने अस्पताल ले जाकर भर्ती किया, और दूसरी तरफ पहले की घोषणा के मुताबिक कल सोमवार को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन आंदोलनकारियों ने संसद चलो मार्च का आव्हान किया था, जिसमें दसियों हजार प्रदर्शनकारी जुटे। जैसा कि किसी भी विरोध-प्रदर्शन में होता है, सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को छोटी-बड़ी चोटें आईं, और कई पुलिसवाले भी घायल हुए। कुल मिलाकर लठैती जैसी हिंसा, कुछ पथराव, और कुछ आंसू गैस के साथ कल का दिन किसी तरह निपट गया। कल जिस वक्त सडक़ों पर यह प्रदर्शन चल ही रहा था, कॉकरोच पार्टी के दो नेता सरकार से बातचीत करने के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी.नड्डा के पास पहुंचे थे, और काफी लंबी बातचीत के बाद एक मांग पत्र देकर वे लौटे हैं। यह बात भी कुछ अटपटी थी कि जब प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, और आलोचना के घेरे में घिरे शिक्षामंत्री, ये सभी दिल्ली में थे, तो स्वास्थ्य मंत्री क्यों बात कर रहे थे? इस आंदोलन का कोई भी हिस्सा स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़ा हुआ तो नहीं था। खैर, सरकार किसी भी मोर्चे पर अपने किसी भी चेहरे को सामने कर सकती है, उससे इस बात पर फर्क नहीं पड़ता कि जिस वक्त सडक़ों पर खुद होकर भी पहुंचे हुए हजारों छात्र और नौजवान पुलिस की लाठियां खा रहे थे, लहू गंवा रहे थे, तब आंदोलन के नेता न तो मोर्चे पर मौजूद थे, और न ही उन्होंने प्रदर्शनकारियों को पहले से भरोसे में लिया था कि वे सरकार से बात करने जा रहे हैं।
यह आंदोलन थोड़ा सा अटपटा है। इसकी शुरूआत नीट इम्तिहान के पर्चे आऊट होने से हुई थी, और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की एक लापरवाह जुबानी टिप्पणी के जवाब में सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी बनी। यह कोई राजनीतिक दल न होकर सिर्फ एक मंच है, लेकिन इसने हिन्दुस्तान की इम्तिहानों की गड़बडिय़ों से थके हुए लोगों के साथ-साथ बेरोजगारों को भी अपनी ओर खींच लिया, और कल का दिल्ली का प्रदर्शन देखें तो दुनिया भर में जिस पीढ़ी को जेन (जनरेशन)-जी कहा जाता है, वह पीढ़ी इस आंदोलन में शरीक थी, और लाठियों के जख्मों से बेपरवाह भी थी। पिछले कुछ हफ्तों से जंतर-मंतर पर चल रहे इस आंदोलन का कोई ठोस ढांचा अब तक नहीं बन पाया है। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक, अमरीका में पढ़ रहे भारतवंशी छात्र अभिजीत दीपके के भारत आकर यह आंदोलन शुरू करने पर उससे सोनम वांगचुक जैसे जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता जुड़ गए, और किसी भी दूसरे अनशनकारी के बिना वे अकेले ही बेमुद्दत अनशन पर बैठ गए। बीस दिन में करीब 10 किलो वजन गंवाकर वे कुछ खतरे में दिख रहे थे, और सरकार ने, चाहे बहुत ही अटपटे तरीके से चादरों का घेरा डालकर, उन्हें अस्पताल पहुंचाया। अब अस्पताल से सोनम वांगचुक जो बातें कह रहे हैं, वे अपने आपमें कुछ विरोधाभासी हैं। उनका अनशन जारी है, या उन्होंने तोड़ दिया है, या वे किन शर्तों पर तोड़ेंगे, यह सब धुंध में घिरा है। दूसरी तरफ यह बात अपने आपमें विरोधाभासों से घिरी हुई है कि इतने हफ्तों में न सरकार ने इनसे बातचीत की सोची, न ही कॉकरोचों ने। कल जब संसद शुरू हो रही है, जब प्रदर्शन-जुलूस संसद तक जाने वाला है, उसी दिन सुबह 6 बजे से बातचीत की गहमागहमी शुरू होती है, और संसद के चलते-चलते वह दोपहर को केन्द्रीय मंत्री नड्डा के घर पर चलती रहती है।
जैसा कि लोकतंत्र में किसी भी असंगठित आंदोलन के साथ होता है, इस आंदोलन के साथ भी वही चल रहा है। लेकिन केन्द्र सरकार तो एक बहुत ही संगठित संस्था है, वह तो कुछ महीने पहले सोशल मीडिया पर पैदा होने वाला कोई मंच नहीं है, वह तो दशकों से काम करने वाले नेताओं और अफसरों का एक बड़ा संगठन है। ऐसे में देश की राजधानी दिल्ली में एक अंतरराष्ट्रीय-चर्चित भारतीय सामाजिक आंदोलनकारी को अनशन से मौत के करीब पहुंचने देना भी बड़ी नासमझी की बात थी, और उससे भी अधिक नासमझी की बात थी इतने हफ्तों तक आंदोलनकारियों से कोई भी बात नहीं करना। उनकी मांगें परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की थी, और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की थी। ऐसी कई मांगें बातचीत के कुछ दौर गुजर जाने पर कम हो सकती हैं, किसी भी आंदोलन में कम होती ही हैं। ऐसे में सरकार बात न करने पर अड़ी रहकर अपना खुद का भला नहीं कर रही थी। जिन लोगों को भी यह लगता है कि लोकतंत्र में बातचीत की गुंजाइश रहने पर भी सरकार के लिए बातचीत करना जरूरी नहीं रहता, उनकी लोकतंत्र की समझ बड़ी कमजोर रहती है। हमारा तो यह मानना है कि अगर कोई आंदोलनकारी अहिंसक तरीके से, सार्वजनिक रूप से, व्यापक जनहित के लिए कुछ मांगों को उठा रहे हैं, तो वे नापसंद होने पर भी सरकार को उनसे बात करके एक सहमति तैयार करने की कोशिश करनी चाहिए। दिल्ली का यह सिलसिला बहुत ही अटपटा इसलिए भी रहा कि इस आंदोलन का न कोई चेहरा है, न कोई केन्द्र है, और न इस पर किसी का कोई काबू है। ऐसे में एक जुलूस कब भीड़ में तब्दील हो जाए, कब अहिंसक लोग हिंसा पर उतर आएं, कब भीड़ यह तय कर ले कि किसी बातचीत की जरूरत नहीं है, यह सब सोचना मुश्किल रहता है। यहीं पर आकर एक संगठित राजनीतिक दल, या मजदूर संगठन, या किसी और लोकतांत्रिक संस्था की कमी खलती है जो आंदोलनों के दौर से गुजरे हुए रहते हैं, और जिन्हें किसी मांग को पूरा करवाने के लिए चलने वाले सिलसिले का तजुर्बा रहता है, और मोलभाव, समझौते का अंदाज रहता है। कॉकरोच जनता पार्टी, और सोनम वांगचुक व्यापक जनसमर्थन के बाद भी अपने आंदोलन की मांगों को किसी तर्कसंगत किनारे तक पहुंचाने का अनुभव नहीं रखते।
एक दूसरी बड़ी बात यह कि इस आंदोलन ने अपने आपको गैरराजनीतिक करार दिया, लेकिन आंदोलनकारियों की यह हसरत कभी खत्म नहीं हुई कि राजनीतिक दल, और उनके नेता आकर समर्थन करें। आज सोनम समर्थन और सहानुभूति के केन्द्र में हैं, लेकिन उन्होंने राहुल गांधी से धरनास्थल पर आने की सार्वजनिक उम्मीद जाहिर की, और यह कहा कि अगर वे जंतर-मंतर नहीं आएंगे, तो यह उनका छोटापन होगा। यह बहुत ही अटपटी बात थी क्योंकि अपने को गैरराजनीतिक कहते हुए देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता से इतनी बड़ी उम्मीद करना जायज तो नहीं था। अगर ये आंदोलनकारी देश के विपक्षी नेताओं से समर्थन की उम्मीद करते थे, तो इन्हें तमाम पार्टियों को पत्र लिखकर सहयोग मांगना था, लेकिन यह आंदोलन अपने को गैरराजनीतिक करार देने में लगे रहा। जायज मांगों, नीतियों, और रणनीति के बीच बड़ा फासला होता है। मांगें सही हो सकती हैं, ये ही मांगें देश में कांग्रेस सहित कई विपक्षी पार्टियां कॉकरोच पार्टी के पहले से उठाती आई हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श के बिना उन्हीं मांगों पर एक आंदोलन शुरू करना, और फिर उनके इसमें शामिल न होने पर शिकायत करना कुछ कमअक्ली की बात है। आज भी सोनम वांगचुक का अस्पताल से जो बयान जारी हुआ है, उसमें उन्होंने कहा है कि विभिन्न दलों के सांसद और नेता अस्पताल आकर इस मुद्दे को संसद में उठाने का आश्वासन दें, तो वे अनशन तोड़ेंगे। अब विपक्षी दल तो संसद में इस मुद्दे पर सरकार के साथ पूरी और खुली बहस की मांग लेकर लोकसभा अध्यक्ष से आज ही मिले हैं। संसद में विपक्ष अपनी जिम्मेदारी से अपने काम कर रहा है, उसके लिए उसे किसी आंदोलनकारी को जाकर अस्पताल में जानकारी या जवाब देने की जरूरत तो है नहीं। इस हिसाब से जंतर-मंतर का इस बार का यह आंदोलन, जो कि कल दिल्ली में पिछले 14 बरस का संसद पर सबसे बड़ा प्रदर्शन भी कहा जा रहा है, वह बिखरी हुई तैयारी, और सोच का आंदोलन है। इसे आंदोलनकारी अपने हिसाब से, और अपने से सहमत वहां पहुंचे भारी जनसमूह के साथ चलाने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन देश के विपक्ष के साथ इस आंदोलन का रिश्ता सिर्फ आंदोलनकारियों की शर्तों से तय नहीं हो सकता, चाहे सरकार से बात करनी हो, चाहे विपक्ष से, एक खुली बातचीत से ही चीजें तय होती हैं। कल सुबह ही आंदोलनकारियों की सरकार से पहली बात शुरू हुई है, और विपक्ष से तो उनकी कोई बात शुरू हुई भी नहीं है। इसलिए आज कॉकरोच-वांगचुक, और बाकी आंदोलनकारी जनता अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करने, या सरकार से कोई समझौता करने के लिए स्वतंत्र हैं, और देश के विपक्षी दल संसद में सरकार से बहस करने के लिए स्वतंत्र हैं। एक ही किस्म की मांगों को लेकर कई किस्म के आंदोलन चल सकते हैं, लोकतंत्र में इन सबको एक साथ जगह देने का लचीलापन रहता है, इसलिए इन दोनों ही पक्षों को एक-दूसरे से कोई शिकायत नहीं रहनी चाहिए। कोई भी दो खेमे हों, उनके बीच सहमति के लिए बातचीत लगती ही है। कॉकरोचों को यह सोचना होगा कि उन्हें विपक्ष के साथ की जरूरत है, या नहीं। फिलहाल विपक्ष से किसी बातचीत के पहले तो वे सरकार से बातचीत करने में लगे हैं, और उसमें भी कोई बुराई नहीं है।
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