राम मंदिर से चोरी का हिसाब देते हुए राम के स्थापित नैतिक पैमाने भी याद रखना चाहिए

 01 जुलाई 2026  

 

अयोध्या का राम मंदिर जिसे देश में हिन्दुओं की आस्था, और गौरव का सबसे बड़ा केन्द्र बताते हुए दशकों तक इसका आंदोलन चला, आज भारत में किसी भी धर्म के उपासना स्थल की सबसे बड़ी चोरी की खबर बना हुआ है। जिस राम मंदिर को सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले से बनाया जा रहा है, जिसमें भारत सरकार ने भी शायद एक रूपए देकर उस ट्रस्ट की शुरूआत की थी, जिसके ट्रस्टी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खुद के छांटे हुए थे, उस ट्रस्ट के भीतर अगर इतनी संगठित चोरी चल रही थी, लंबे समय से चल रही थी, तो यह कई तरह के जवाब मांगने वाली नौबत है। यह न तो किसी आस्था पर सवाल है, न ही यह कोई विधर्मी हमला है, बल्कि यह इस मंदिर, और मंदिर ट्रस्ट को एक मौका देता है कि अपना घर सुधारे। अब जो सार्वजनिक जगहें हैं, जो टैक्स से मुक्त ट्रस्ट होते हैं, जहां सरकारें बहुत बड़ा सुरक्षा इंतजाम करती हैं, जहां पर केन्द्र और राज्य सरकारें बहुत सारे साधन और सुविधाएँ जुटाती हैं, वह जगह किसी एक धार्मिक आस्था के लोगों के ही प्रति जवाबदेह नहीं रहती, लोकतंत्र में ऐसी जगह पूरे देश के लिए जवाबदेह रहती है। और ऐसी जवाबदेही खुद ऐसे ट्रस्ट के लिए अच्छी रहती है, क्योंकि कोई धार्मिक केन्द्र हो, कोई राजनीतिक पार्टी हो, कोई समाजसेवी संस्था या ट्रस्ट हो, उसे जवाबदेही से परे रखने का मतलब उसमें घपले-घोटाले, भ्रष्टाचार-चोरी के खतरे को घुसने देना होता है। इसीलिए भारत में सभी तरह के ट्रस्टों के रजिस्ट्रेशन का कानून है, और जो भी ट्रस्ट, या संगठन ऐसे रजिस्ट्रेशन से परे रहते हैं, वे लोकतंत्र में सार्वजनिक जवाबदेही से बचते हैं, और उनके भीतर गड़बड़ी का एक खतरा हमेशा बने रहता है।

आज जो सार्वजनिक बहस चल रही है, उसमें बहुत से लोग यह तर्क ले रहे हैं कि यह हिन्दू आस्था का केन्द्र है, यहां पर अमूमन हिन्दू ही आते हैं, अमूमन इसमें हिन्दुओं से ही दान आया है, ऐसे में अगर यहां कुछ गड़बड़ हुई है, तो यह तो घर के भीतर की बात है, इस पर बाकी लोगों को सवाल खड़े क्यों करने चाहिए? अब बाकी लोग कौन होते हैं? बाहरी लोग कौन होते हैं? लोकतंत्र में हर सार्वजनिक संस्था पूरे देश के प्रति जवाबदेह रहती है, और इसीलिए आज देश में जितने सवाल राम मंदिर में राम के नाम पर मिले दान या चढ़ावे की चोरी को लेकर उठ रहे हैं, उनमें से तकरीबन पूरे ही हिन्दुओं की तरफ से ही उठ रहे हैं, कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने इस मंदिर के लिए एक लाख से अधिक का चेक प्रधानमंत्री को भेजा था, वे भी सवाल उठा रहे हैं। लेकिन जिन्होंने दान नहीं दिया है, क्या जानकारी उनका हक नहीं है?

सार्वजनिक जीवन में गंदले पानी की धुंध अच्छी नहीं होती। जहां सब कुछ सार्वजनिक है, वहां पर सब कुछ पारदर्शी होना चाहिए। जिस मंदिर के लिए चले आंदोलन से दशकों से नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के पहले से जुड़े हुए हैं, जहां मंदिर निर्माण को लेकर तमाम बड़े फैसलों से वे जुड़े रहे हैं, वहां पर चोरी का हिसाब-किताब मांगना प्रधानमंत्री पर कोई शक नहीं है, लेकिन ऐसे ट्रस्ट में संगठित चोरी का हौसला जिन लोगों का हुआ है, उन्होंने तो प्रधानमंत्री के महत्व को भी अनदेखा करके यह जुर्म किया है। इसलिए कानून की अदालत में चाहे यह जुर्म दूसरी किसी चोरी के बराबर का ही हो, सार्वजनिक जीवन की अदालत में तो यह जुर्म किसी भी दूसरी चोरी से बहुत अधिक बड़ा है। इस चोरी की गंभीरता को खत्म करना, भगवान राम के प्रति आस्था को अनदेखा करना होगा, और इस मंदिर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भागीदारी को भी कम करना होगा, कम आंकना होगा। क्या हिन्दू आस्थावान लोग, और मोदी के समर्थक इस तरह की नौबत चाहेंगे?

इस देश में कई लोग बात-बात पर चाणक्य का हवाला देते हैं। कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि यह एक काल्पनिक चरित्र था, और इतिहास में इसका कोई सुबूत नहीं है। फिर भी हमारा यह मानना है कि बहुत सारी दूसरी पौराणिक बातों की तरह, चाणक्य की कहानी भी अगर सिर्फ कहानी है, तो भी उसकी कुछ मिसालों पर गौर करने में कोई बुराई नहीं है। चाणक्य की एक कहानी लंबे समय से चर्चा में रहते आई है कि वे काम की अपनी जगह पर दो दीये रखते थे, जब तक वे सरकारी काम करते थे, तभी तक सरकारी दीया जलाते थे, और जब निजी काम करते थे, तो निजी दीया जला लेते थे, ताकि सरकारी तेल खर्च न हो। अब जो लोग, और जो देश इस तरह की मिसालों की कहानियां गर्व के साथ बताते हैं, उन्हें सरकारी और सार्वजनिक पैसों की जवाबदेही के कुछ तो ऊंचे पैमाने रखने चाहिए। यह अलग बात है कि आज देश में गायों के नाम पर, अनाथ बच्चों के नाम पर, बेघर गरीबों, बूढ़ों, बीमारों, विचलित, और विकलांगों के नाम पर जितने तरह के ट्रस्ट चलते हैं, उनमें से बहुतों में बेईमानी होती है। और ऐसे ट्रस्टों से जुड़े अधिकतर लोग आस्थावान रहते हैं। शायद उन्हें इस बात का पूरा भरोसा रहता है कि न तो ऊपर कोई हिसाब-किताब होता है, न ही यहां के किए हुए कामों के आधार पर ऊपर स्वर्ग या नर्क अलॉट होगा। ऐसे देश में भी हमारी तो यही उम्मीद रहेगी कि सार्वजनिक पैसों को लेकर जवाबदेही किसी एक ट्रस्ट, या धर्म का घरेलू मामला नहीं है, यह कोई साम्प्रदायिक मामला भी नहीं है। यह एक बिल्कुल साफ-साफ जवाबदेही का मामला है, और इससे किसी को भी क्यों बचना चाहिए?

लोकतंत्र में जांच, अदालती कार्रवाई, और सजा की जो सामान्य प्रक्रिया रहती है, उसका पालन राम मंदिर की चढ़ावा चोरी में भी होना चाहिए। वहां जांच के लिए जो खास दल बनाया गया था, उसमें कौन अफसर थे, उन्होंने रिपोर्ट किस अफसर को दी, क्या वह अफसर राम मंदिर के इंतजाम में पहले से किसी तरह शामिल था, ऐसे सवाल अगर उठ रहे हैं, तो सरकार को भी चाहिए कि वह हर संदेह को खत्म करते चले। ट्रस्ट से लोगों के सवाल हैं, कोई एक चम्पत राय नाम के व्यक्ति, उनके करीबी लोगों के नाम इसमें आ रहे हैं, तो सरकार को और ट्रस्ट को ऐसे आरोपों और सवालों का बुरा नहीं मानना चाहिए, और हर सार्वजनिक संदेह पर जवाब देना चाहिए। देश में और किसी आस्था केन्द्र पर कड़े और बड़े पैमाने माने जाएं, या न माने जाएं, कम से कम राम मंदिर को लेकर तो हमारा यह मानना है कि यहां नैतिकता के पैमाने खूब ऊंचे रहने चाहिए। रामकथा ही यह बताती है कि उन्होंने अपनी प्रजा में से किसी एक की कही हुई ओछी बात के आधार पर अपनी पत्नी सीता को घर से निकाल दिया था। हम तो एक प्रचलित कहानी का यहां जिक्र कर रहे हैं, लेकिन मर्यादा पुरूषोत्तम कहे जाने वाले राम की पेश की गई यह मिसाल अगर उन्हीं के नाम पर बने मंदिर में खारिज कर दी जाएगी, तो क्या राम के प्रति अनास्था नहीं होगी? हो सकता है कई लोगों को यह चोरी बड़ी न लग रही हो, लेकिन हमारा तो यह मानना है कि जहां राम का नाम जुड़ा है, जिस नाम को लेकर देश में रामराज शब्द का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होता है, जहां बात-बात में राम का नाम आता है, जहां अभिवादन से लेकर अंतिम संस्कार तक कुछ भी राम के नाम के बिना नहीं होता, उस राम के नाम पर भक्तों से, दर्शनार्थियों से, और हो सकता है कि दूसरे धर्म के लोगों से भी जो दान मिला हो, चढ़ावा या चंदा मिला हो, उसका हिसाब-किताब पारदर्शी न रखा जाए, यह तो ठीक नहीं होगा। राम का नाम पूरी तरह से विवादहीन होना चाहिए, उनका तो रामकथा में चरित्र शुरू से अंत तक वैसा ही रहा, लेकिन उनके इस सबसे बड़े आस्था केन्द्र में अगर पारदर्शिता की कमी रहेगी, तो फिर वह तो राम की पेश की गई मिसालों का अपमान ही होगा। रामकथा के इस आखिरी हिस्से में उन्होंने जिस तरह प्रजा के एक ओछे व्यक्ति की उठाई गई बात का भी सम्मान किया था, और राजा की जिम्मेदारी को एक बहुत ही अन्यायपूर्ण और कड़वी सीमा तक जाकर निभाया था, उसे याद करते हुए लोगों को राम मंदिर का हिसाब-किताब जनता से साझा करना चाहिए। उसे राम मंदिर का ट्रस्ट करे, सरकार, या उसकी पुलिस करे, या इस मंदिर से जुड़े हुए दूसरे लोग करें, हमारा तो यही मानना है कि हर प्रासंगिक, और न्यायपूर्ण सवाल का खुलासे से जवाब देना चाहिए, मांगने की नौबत न आए, उसके पहले ही तथ्य जनता के सामने रखने चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

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