26 जुलाई 2026
किसी भी देश में वहां का सुप्रीम कोर्ट इस बात का एक सुबूत, संकेत, और नमूना रहता है कि देश में आजादी और इंसानियत का क्या हाल है। अमरीका में तो आम जनता की आजादी एक अलग ऊंचे दर्जे की है, और वहां पर किस राष्ट्रपति ने किस जज को मनोनीत किया है, किस जज ने पहले क्या-क्या फैसले दिए हैं, उन सब पर खुली चर्चा होती है। लोग खुलकर जजों के नाम के साथ यह लिखते हैं कि वे प्रगतिशील हैं, उदारवादी हैं, या संकीर्णतावादी, दकियानूसी हैं। किसी बड़ी बेंच के जजों को लेकर यह गिनती भी लगा ली जाती है कि उसमें दकियानूसियों का अल्पमत है, या बहुमत है। इसे वहां कोई बुरा नहीं मानते। लेकिन हिन्दुस्तान में ऐसा मुमकिन नहीं है। हर जज अपने आपको ईमानदार, निष्पक्ष, तटस्थ बताना चाहते हैं, और उनके इन पहलुओं पर सवाल उठाने का, इन पर चर्चा करने का यहां रिवाज भी नहीं है। ऐसे में जब बहुत से जज मानो आजादी की सालगिरह की परेड में सत्ता के साथ कदमताल करते दिखते हैं, तो भी आम जनता के लिए कुछ कहने का कुछ नहीं रह जाता, कुछ करने का तो बिल्कुल रहता ही नहीं है। ऐसे में कभी-कभी जब कोई जज अदालत में अपनी जुबानी बात से, या अदालत के बाहर किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में, या इंटरव्यू में कोई उदारवादी बात कहते हैं, तो एकदम से लगता है कि अरे, आजादी अभी इतनी बाकी है।
सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जज, उज्जल भुइयां ने अभी एक कार्यक्रम में बोलते हुए इस बात पर बड़ी फिक्र जताई है कि न्यायपालिका आज जमानत देते हुए किसी छात्र-कार्यकर्ता, या प्रदर्शनकारी, आंदोलनकारी को जमानत इस शर्त पर देती है कि वे सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट नहीं करेंगे, सार्वजनिक बैठकों में हिस्सा नहीं लेंगे, या बैठकों में कुछ बोलेंगे नहीं। उन्होंने कहा कि ऐसी शर्तें किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा असर डालती हैं। उन्होंने कहा कि लोगों का यह पूछना पूरी तरह जायज होगा कि क्या अदालतें ऐसी शर्तें लगाकर यह संदेश दे रही हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में बहस, असहमति, और विरोध उसकी आत्मा हैं, लेकिन हाल के बरसों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जहां सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधियों को भी आपराधिक मामलों में बदल दिया गया।
हम अपने अखबार के इस संपादकीय कॉलम को अमूमन अपने ही विचारों के लिए रखते हैं, लेकिन कभी-कभी किसी और की कही हुई बातें हमारे अपने विचारों से तालमेल रखती हुई रहती हैं, तो हम उन्हें यहां ज्यों का त्यों लिखते हैं, और कभी-कभी वे हमारे विचारों से भी बेहतर होती हैं, तो हम उन्हें पूरे खुलासे से यहां लिखते हैं, जो कि उनसे हमारी पूरी सहमति का एक सुबूत रहता है।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि आजकल विश्वविद्यालयों में अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले छात्रों को गिरफ्तार किया जाता है, कई बार उन्हें 30-40 दिन तक जमानत भी नहीं मिलती, विश्वविद्यालय उन्हें निलंबित कर देते हैं, और फिर उन्हें अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि ऐसा माहौल लोकतंत्र के लिए फिक्र का सामान है। उन्होंने ऐसे मामलों का जिक्र किया जिनमें किसी व्यक्ति ने किसी मंत्री की टिप्पणी पर फेसबुक पोस्ट लिखनी, तो उसके खिलाफ एफआईआर हो गई, और जब अदालत से अग्रिम जमानत मिली, तो शर्त रखी गई कि वे फेसबुक पर कुछ पोस्ट नहीं करेंगे। जस्टिस भुइयां ने सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति के भाग जाने की आशंका नहीं है, तो उसका पासपोर्ट जमा कराने जैसी शर्तें, या सोशल मीडिया पर पूर्ण रोक लगाने जैसी शर्तें कितनी न्यायसंगत है? उन्होंने कहा कि ऐसी शर्तें लोगों की मौलिक स्वतंत्रता को गंभीर रूप से सीमित कर देती हैं।
उन्होंने एक ऐसे मामले का भी जिक्र किया जिसमें यूपी में कुछ नौजवानों को गंगा में नाव पर इफ्तार पार्टी आयोजित करने, और चिकन-बिरयानी खाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने कहा- ‘मुझे पूरा विश्वास है कि चिकन-बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं हैं, यदि कोई काम अपराध ही नहीं है, तो लोगों को महीनों तक जेल में कैसे रखा जा सकता है?’
उन्होंने बाम्बे हाईकोर्ट का भी जिक्र किया जहां फिलीस्तीन के समर्थन में प्रस्तावित प्रदर्शन को इजाजत नहीं दी गई थी। उन्होंने कहा कि अदालतों को लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों के अधिकार के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए। इस बार के भाषण के पहले भी जस्टिस भुइयां कुछ दूसरे मौकों पर सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि लोकतंत्र में असहमति को अपराध नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने पहले भी कहा है कि न्यायपालिका को अपने आपको राजा के प्रति, राजा से भी अधिक वफादार बनने से बचना चाहिए।
यहां हम जिक्र करना चाहेंगे कि राजा वाली यह बात फ्रांस के 1789 की क्रांति के बाद बड़े जोर-शोर से उठी थी। जब इसके बाद राजशाही दुबारा कायम हुई, तो राजा ने यह महसूस किया कि वक्त बदल गया है, और कई किस्म के सुधारों की जरूरत है, तो भी राजा के चाटुकारों ने उसे यह समझाने की कोशिश की कि पुरानी राजशाही की सारी सामंती बातें लागू होनी चाहिए, और इसी वक्त से यह बात लिखी जाने लगी कि कुछ लोग राजा के प्रति राजा से भी अधिक वफादार होकर दिखना चाहते हैं, दिखाना चाहते हैं। जस्टिस भुइयां की यह बात सीधे-सीधे न्यायपालिका के संदर्भ में ही कही गई थी, और सरकार की कार्रवाईयों वाले मामलों को लेकर कही गई थी, इसलिए इसमें कोई गलतफहमी नहीं है कि उन्होंने हिन्दुस्तान के जजों को यहां की सरकारों के प्रति, सरकारों से अधिक वफादार बनकर दिखाने से बचने की सलाह दी है।
हमारा यह मानना है कि लोकतंत्र किसी पत्थर की तरह गतिहीन, गतिशून्य व्यवस्था नहीं रहता। वह तो उतरती हुई एक पहाड़ी नदी की तरह लगातार रास्ते तय करते चलता है। वह रास्ते में कहीं चट्टानों को आकार देता है, तो कहीं चट्टानें उसका रूख मोड़ती हैं। लोकतंत्र हमेशा परिवर्तनशील रहता है, वह किसी टंकी में जमा पानी की तरह काई का शिकार नहीं होता, वह बहता पानी रहता है। इसलिए समय-समय पर जब कभी किसी भी व्यक्ति की कही लोकतांत्रिक बातें पढऩे-सुनने मिलें, तो उन पर सोच-विचार भी करना चाहिए, उन्हें आगे भी बढ़ावा चाहिए। कई लोग गुडमॉर्निंग के पोस्टरों को हजारों लोगों को भेजकर दिन शुरू करते हैं, और फिर बाकी दिन में अपनी पसंद के धर्म या आध्यात्म की और कुछ घिसी-पिटी बातों को बढ़ाते रहते हैं। जब लोगों के हाथ में हजारों लोगों तक मुफ्त में कुछ भेजने का औजार है, उन्हें ऐसी बातें आगे बढ़ानी चाहिए जो उनके संपर्क के लोगों में भी लोकतांत्रिक-इंसानियत को बढ़ा सके, इंसाफ की बात कर सके। हम तो जस्टिस भुइयां की कही बातों जैसी बातों को आगे बढ़ाने के लिए अपने इस संपादकीय कॉलम का भी इस्तेमाल करते हैं, लोगों को पाखंड और कट्टरता को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए, जिंदगी के असल मुद्दों, और उदारता से भी अपने परिचितों का परिचय कराना चाहिए।
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