30 जुलाई 2026
इन दिनों मोबाइल फोन के वीडियो-कैमरों, और सीसीटीवी कैमरों की मेहरबानी से, फिर मोबाइल फोन की कॉल रिकॉर्डिंग से, नेताओं और अफसरों की तरह-तरह की बददिमागी सामने आती है। फिर दूसरी मेहरबानी सोशल मीडिया की है जिसकी वजह से बिना किसी खर्च से ऐसी सनसनीखेज बातें चारों तरफ फैल जाती हैं। इनमें से अधिकतर बातों को देखकर यह लगता है कि अगर यह वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग न होती, तो कोई इन बातों पर भरोसा भी नहीं करते, और सरकार या अदालत को कोई कार्रवाई भी नहीं करनी पड़ती। अब तो मजबूरी में कभी-कभी लोग ऐसी रिकॉर्डिंग में फंस जाते हैं। यह देखकर लगता है कि निजी जिंदगी के मुद्दों को छोडक़र बाकी हर तरह की सार्वजनिक, या सरकारी बातों की रिकॉर्डिंग क्यों नहीं हो जानी चाहिए?
विकसित और लोकतांत्रिक देशों में पुलिस के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे अपनी यूनिफॉर्म के सामने एक कैमरा टांगकर रखें, जो कि उनकी कार्रवाई की रिकॉर्डिंग करता चले। कई जगहों पर ऐसी रिकॉर्डिंग पुलिस कंट्रोलरूम तक लगातार जाती भी रहती है, और अगर पुलिस कोई ज्यादती करती है, तो वह भी तुरंत ही कंट्रोलरूम में दर्ज होती जाती है। भारत के कुछ प्रदेशों में पुलिस के लिए ऐसे कैमरे लिए गए, लेकिन उन्हें इस्तेमाल करने से पुलिस बचती रही, और कई प्रदेशों में ये कैमरे एक बार भी इस्तेमाल हुए बिना खत्म हो गए। लेकिन हम महज जंतर-मंतर के प्रदर्शन और उस पर पुलिस कार्रवाई की बात नहीं कर रहे, जहां कहीं भी पुलिस कार्रवाई होती है, या सरकारी दफ्तर में अफसरों और बाबुओं का जो बर्ताव होता है, वह रिकॉर्ड करने में क्या हर्ज है? सरकारी दफ्तरों, अदालतों, या म्युनिसिपलों और पंचायतों में भी लोगों से बड़ी बदसलूकी होती है, ऐसे में अगर लोगों को यह हक रहे कि वे अपनी बातचीत की रिकॉर्डिंग कर सकें, तो सरकारी व्यवहार सुधर जाएगा। आज बहुत कम लोग ऐसे हैं जो होशियारी से इस तरह की रिकॉर्डिंग कर लेते हैं, अधिकतर लोग तो इतना हौसला नहीं जुटा पाते, क्योंकि सरकारी अधिकारी-कर्मचारी हों, या निर्वाचित नेता हों, वे रिकॉर्डिंग देखते ही हमला करने लगते हैं, बहुत से लोगों के मोबाइल फोन तोड़ दिए जाते हैं, रिकॉर्डिंग मिटा दी जाती है।
हमारा यह मानना है कि निजी जिंदगी की बातों को छोडक़र सरकार से औपचारिक बातचीत के सिलसिले की रिकॉर्डिंग की एक कानूनी छूट रहनी चाहिए। और यह छूट सिर्फ राजा और प्रजा के बीच नहीं रहनी चाहिए, राज्य के अपने ढांचे के भीतर भी अगर कोई सत्तारूढ़ नेता, या अफसर किसी मातहत को कोई निर्देश देते हैं, तो दोनों ही पक्षों को उसकी रिकॉर्डिंग की औपचारिक अनुमति रहनी चाहिए। यह होने से गलत काम के लिए कहना भी बंद हो जाएगा, और किसी जांच की नौबत आने पर ऐसी रिकॉर्डिंग सुबूत के तौर पर काम भी आएगी। आज हालत यह रहती है कि सरकार के ढांचे में ऊपर बैठे लोग अपने मातहत लोगों से जुबानी निर्देश देकर ही अधिकतर काम करवा लेते हैं, और फाइलों पर वैसे आदेश करने से बचते हैं। यह सिलसिला बदलना चाहिए। आज जब टेक्नॉलॉजी ने पारदर्शिता और लोकतंत्र के कुछ नए पैमाने तय करने की सहूलियत दी है, तो फिर उसका इस्तेमाल करना चाहिए। आज इस लोकतंत्र की बड़ी-बड़ी अदालतों की कार्रवाई की रिकॉर्डिंग होती है, संसद या विधानसभाओं की कार्रवाई की पूरी रिकॉर्डिंग होती है, फिर चाहे इन सबमें से कुछ चुनिंदा का प्रसारण होता हो, और बाकी रिकॉर्ड में रहती हो। ऐसा ही पुलिस की कार्रवाई में भी होना चाहिए, और अगर पुलिस कोई ज्यादती नहीं करती है, तो यह उसके अपने बचाव में एक सुबूत की तरह काम आएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने देश के हर थाने में सीसीटीवी कैमरे लगवाने का आदेश दिया था, और कमोबेश हर राज्य उस पर अमल भी कर रहे हैं। अब ऐसे कैमरों की क्षमता और पहुंच को बढ़ाने के लिए भी कहा गया है, और उसके लिए केन्द्र सरकार भी राज्यों की आर्थिक मदद कर रही है। कुल मिलाकर टेक्नॉलॉजी 21वीं सदी की सबसे बड़ी, और सबसे भरोसेमंद गवाह बन रही है, सुबूत बन रही है। सार्वजनिक जगहों पर लगे कैमरों के अलावा थानों के भीतर भी कैमरे लग रहे हैं, और अस्पतालों, या दूसरी सार्वजनिक आवाजाही की जगहों पर भी। इन सबका फायदा समाज को मिल रहा है। अभी मुम्बई में सत्तारूढ़ पार्टी का एक पार्षद एक सरकारी अस्पताल में घुसकर डॉक्टर और महिला कर्मचारियों को पीटता हुआ रिकॉर्ड हुआ, तो उसकी गिरफ्तारी भी हुई, और हाईकोर्ट ने उसे जमानत देने से भी इंकार कर दिया।
टेक्नॉलॉजी अगर निजी जिंदगी की निजता में दखल नहीं दे रही है, तो फिर सार्वजनिक जीवन में एक सुबूत के तौर पर वह एक बड़ा पुख्ता औजार है, और किसी जुर्म के खिलाफ तो वह एक कानूनी हथियार भी है। आज भी लोगों के बीच हो रही हिंसा, कोई सडक़ हादसा, किसी और तरह का जुर्म, इन सबको रिकॉर्ड करने के लिए कैमरों जैसे उपकरण बड़े मददगार हो रहे हैं, और वे अगर नहीं रहते, तो पुलिस न कई तरह के जुर्म सुलझा पाती, और न ही अदालत में किसी को मुजरिम साबित कर पाती। देश के कानून में तो ऐसे उपकरणों का इस्तेमाल जायज है, लेकिन सरकार के भीतर, सरकारे के ढांचे के लोगों के बीच भी इसकी एक औपचारिक इजाजत होनी चाहिए, जिसके बिना इसे अभी भी चोरी-छिपी रिकॉर्डिंग, या स्टिंग ऑपरेशन माना जाएगा, और उसे शासकीय सेवक के आचरण के खिलाफ दर्ज किया जाएगा। इसे पूरी तरह औपचारिक और कानूनी बना देने की जरूरत है।
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