14 जुलाई 2026
हिन्दुस्तान में हर दिन कहीं न कहीं सडक़ पर नाबालिग की दौड़ाई जा रही गाडिय़ों से कुचलकर मौतें होती हैं। इस छोटे से राज्य छत्तीसगढ़ में हर महीने ही ऐसी कोई घटना सामने आती है। कुछ मामलों में तो एक-एक नाबालिग लडक़े या लडक़ी ने कई-कई लोगों को कुचल मारा। ऐसे में कानून में मां-बाप को भी सजा का इंतजाम है, जाने कितने मामलों में यह कार्रवाई हो पाती है। अभी दो दिन पहले ही बिलासपुर में शहर के बीच नाबालिग लडक़ों से भरी हुई अंधाधुंध रफ्तार की एक बड़ी गाड़ी में दिनदहाड़े सडक़ पर एक दुपहिए को इस बुरी तरह कुचला कि दुपहिया सवार की मौत हो गई। चारों तरफ लोग थे, सीसीटीवी कैमरे थे, इसलिए टक्कर मारने वाले लडक़े भाग भी नहीं पाए। इधर राजधानी रायपुर में ट्रैफिक का जिम्मा संभालने वाली एक महिला अफसर ने दुपहिया चलाने वाले नाबालिगों के बारे में बयान दिया है कि पहले उन्हें, या उनके पालकों को समझाया जाएगा, और फिर भी अगर वे नहीं मानेंगे, तो कार्रवाई की जाएगी।
हम छत्तीसगढ़ की तो एक मिसाल ले रहे हैं, बाकी तो पूरे देश में बहुत से राज्यों का ऐसा ही हाल है। हो सकता है कि दक्षिण के कुछ राज्य, महाराष्ट्र, और दिल्ली में अराजकता कुछ कम हो क्योंकि वहां पुलिस की कार्रवाई अधिक कड़ाई से होती है। जिस राज्य में सडक़ हादसों में प्रति लाख आबादी पर जितनी मौतें होती हैं, वे पुलिस कार्रवाई के विपरीत अनुपात में ही होती हैं, कार्रवाई जितनी अधिक या कड़ी, मौतें उतनी ही कम। लेकिन जिन राज्यों में सरकारें लोगों में अनुशासन लाने का हौसला नहीं रखतीं, वहां बड़ी दिक्कत होती है। जब सडक़ों पर बहुत से नाबालिग गाडिय़ां दौड़ाते दिखते हैं, तो बाकी मां-बाप पर भी उनके बच्चों का दबाव पड़ता है कि वे भी उन्हें गाडिय़ां लेकर दें, चलाने दें। हो सकता है कि कुछ मामलों में बच्चों की स्कूल-कॉलेज, उनकी कोचिंग, उनके खेल-प्रशिक्षण की वजह से दूर-दूर तक दौड़-भाग के लिए उन्हें दुपहिए लेकर देने पड़ते हों, और हो सकता है कि यह समाज की एक ऐसी जरूरत है कि जिसमें कानूनों में कुछ छूट देना एक किस्म से सामाजिक जरूरत और मजबूरी हो, लेकिन ऐसी किसी मजबूरी की वजह से हर तरह की छूट दे देना तो नाजायज है। बड़ी-बड़ी गाडिय़ां नाबालिग बच्चों को देना तो स्कूल या खेल की जरूरत नहीं हो सकती, वह तो अंधाधुंध पैसों की बददिमागी के अलावा कुछ नहीं है। ऐसे मां-बाप दूसरे लोगों की जिंदगी भी खतरे में डालते हैं, और अपने खुद के बच्चों की भी। इन दोनों के लिए वे सजा के हकदार रहते हैं, कैद के भी। और कानून में भी इसके लिए गिरफ्तारी और कैद का इंतजाम है। जहां लोगों को अपनी बिगड़ैल औलाद को गाडिय़ां देने का गैरकानूनी हक है, वहीं आम लोगों को सडक़ों पर हिफाजत के हक के साथ चलने का हक है। दूसरी बात यह कि जो नाबालिग दुपहिया चलाते हैं, उन्हें कम उम्र में पढ़ाई या खेलकूद की दौड़-भाग की ही तो मजबूरी रहती है। उन्हें एक गाड़ी पर तीन-चार सवार होकर चलने की मजबूरी नहीं रहती, बिना हेलमेट चलने की मजबूरी नहीं रहती। अब अगर पुलिस बहुत नरमी और रियायत ही बरतना चाहती है, कानून तोडऩे को अनदेखा करना चाहती है, तो वह दुपहियों पर स्कूल-कॉलेज आते-जाते एक गाड़ी पर एक या दो बच्चों की उम्र को अनदेखा कर सकती है, लेकिन उन्हें हेलमेट से छूट क्यों दी जाए? जब मां-बाप दुपहिया लेकर दे सकते हैं, तो हजार रूपए का हेलमेट देकर उनकी हिफाजत करना भी उन्हीं की जिम्मेदारी है। पुलिस अगर कम उम्र में गाड़ी चलाने के चालान की कड़वी जिम्मेदारी से बचना चाहती है, तो भी वह हेलमेट तो अनिवार्य कर ही सकती है जिससे उन्हीं बच्चों की जिंदगी पर से एक बड़ा खतरा टल सकता है।
छूट का मतलब हर किस्म की अराजकता की छूट नहीं हो सकता, छूट का मतलब कुछ पहलुओं की छूट हो सकता है, और कुछ दूसरे पहलुओं की अनिवार्यता भी हो सकती है। पुलिस इतना तो कर सकती है कि किसी भी स्कूल या कॉलेज में बिना हेलमेट पहुंचने वाले दुपहिया सवार बच्चों, और उनके शिक्षकों का भी चालान करे। जब थोक में ऐसे चालान होने लगेंगे, तो हेलमेट के भीतर आने वाले सिर में अक्ल भी आने लगेगी। इसके अलावा अगर नाबालिग दो से अधिक सवार होकर चल रहे हैं, तो भी पुलिस को चाहिए कि ऐसी गाडिय़ों का हर तरह का चालान करे, उनके मां-बाप, जिसके भी नाम पर दुपहिया हो, उन पर भी कार्रवाई करे। ऐसी गुंडागर्दी की छूट की कोई जरूरत किसी को पढ़ाई या खेल के लिए नहीं रहती, यह सिर्फ आवारागर्दी रहती है, और इसे छूट देकर पुलिस इन बच्चों को और बड़े जुर्म के लायक ही बनाती है। हमारा बड़ा साफ मानना है कि भारत जैसे देश में अधिकतर मुजरिम अपनी जिंदगी का पहला कानून तोडऩा ट्रैफिक के मामले में ही करते हैं। इसलिए अगर लोगों को ट्रैफिक कानून मानना सिखा दिया जाए, तो उनका दूसरा जुर्म करना कम से कम लेट तो हो ही सकता है। नियम तोडऩे से पहला वास्ता पडऩे के साथ ही अगर पुलिस कार्रवाई का पहला वास्ता भी पड़ जाए, तो हो सकता है कि कई बच्चे अधिक गंभीर कानून तोडऩे से बच जाएं। ट्रैफिक के चालान सिर्फ ऐसी गाडिय़ों को चलाने वाले लोगों के लिए जरूरी नहीं है, सडक़ों और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर चलने-फिरने वाले आम लोगों की हिफाजत के लिए भी जरूरी है, और इस पहलू को देखते हुए पुलिस को भला नियम तोडऩे को अनदेखा करने का हक कैसे मिल सकता है?
हम दस-बीस बरस से, कार्रवाई करने से बचने वाली पुलिस को यही समझाइश वाला तर्क देते देखते आए हैं। जो नियम-कानून सांस लेने की तरह हर किसी को अच्छी तरह मालूम हैं, उनमें और क्या समझाइश देना? क्या कल के दिन डरी-सहमी पुलिस चाकू मारने वाले लोगों को भी शुरू के कुछ मामलों में समझाइश देगी, और उसके बाद उन पर कार्रवाई करेगी? नसीहत देने का यह सिलसिला प्रवचनकर्ताओं, समाज सुधारकों, और नेताओं के लिए छोड़ देना चाहिए। पुलिस को सबसे छोटे-छोटे मामलों में कार्रवाई से ही सीख देनी चाहिए। जुर्माना करके, नोटिस भेजकर, कोर्ट में खड़ा करके पुलिस लोगों को ही ऐसी समझाइश दे सकती है कि उनकी जिंदगी बचे। बाकी कोई भी जुबानी समझाइश असल कार्रवाई का विकल्प नहीं बन सकती। लोगों से ऐसी रियायत बरतना जो कि दूसरों के लिए जानलेवा हो, पुलिस के लिए गैरजिम्मेदारी के अलावा और कुछ नहीं है। क्या पुलिस को ऐसा कोई हक मिल सकता है कि वह सडक़ों पर आम, और बेकसूर लोगों की जिंदगी खतरे में डालने की छूट नाबालिगों, और दूसरों को दे सके?
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें