भारत की तरह नागरिकता पर सवाल अमरीका में भी उठे तो भारतवंशी कहां जाएंगे?

 05 जुलाई 2026  

 

असम में एक ऐसे बुजुर्ग मुस्लिम को राज्य सरकार के डिटेंशन कैम्प में रखा गया है जिसके पास अपनी पिछली दो-तीन पीढिय़ों के भारत में रहने के सुबूत हैं। उसके पास भारत के 15 अलग-अलग पहचान पत्र और सरकारी दस्तावेज हैं। इसके बावजूद जब उसका मामला असम हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत ने उसे भारतीय नागरिक नहीं माना। ऐसे मामले पिछले दो-चार बरस में हजारों की संख्या में सामने आ रहे हैं जिनमें देश के अलग-अलग प्रदेशों की सरकारें लोगों को बांग्लादेशी करार देकर भारत से निकाल दे रही हैं। अभी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का कल का ही एक मामला है जिसमें बिलासपुर के एक व्यक्ति को बांग्लादेशी बताकर देश के बाहर भेज दिया गया, और फिर उसकी पत्नी ने अदालत में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका लगाकर बताया कि उसके पति को अगस्त 2025 में पुलिस ने बांग्लादेश भेज दिया, बताया है, लेकिन वे वहां कभी नहीं पहुंचे, तब से उनके बारे में कोई जानकारी भी नहीं मिल सकी है। इस मामले में मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने केन्द्र और राज्य सरकार से इसके पहले भी जवाब मांगा था, और अब केन्द्र को एक हफ्ते के भीतर हलफनामे पर जवाब दाखिल करने का आखिरी मौका दिया है, और राज्य सरकार से भी विस्तृत जवाब मांगा है। इस मामले में भी पति-पत्नी दोनों लंबे समय से भारत में रह रहे हैं, और उनके पास भारतीय नागरिकता से जुड़े वैध दस्तावेज भी मौजूद थे। 

असम के 72 बरस के रहमत अली को संदिग्ध विदेशी करार देकर वहां के एक सरकारी डिटेंशन कैम्प (जिसे अब ट्रांजिट कैम्प भी कहा जाता है) में रखा गया है। रहमत अली का दावा है कि उनका परिवार पिछली तीन पीढिय़ों से असम की इसी जमीन पर रह रहा है, और उनके पूर्वज भारत के मूल निवासी थे। 1965 और 1971 की मतदाता सूची में उनके पिता और दादा के नाम दर्ज हैं। असम में नागरिकता की तारीख 24 मार्च 1971 के पहले से निवास, तय की गई है, लेकिन 1965 की मतदाता सूचियों के नाम भी काम नहीं आए। 1960 के दशक के उनके परिवार के जमीनों के पुश्तैनी कागजात, और लगान की रसीदें भी काम नहीं आईं। अलग-अलग कागजात में नाम के हिज्जे में एक अक्षर इधर-उधर होने से उन दस्तावेजों को खारिज कर दिया। इस पर हाईकोर्ट के जज कल्याण राय सुराना की पीठ ने यह कहा कि विदेशी अधिनियम की धारा 9 के तहत यह साबित करने का दायित्व स्वयं व्यक्ति पर होता है कि वह विदेशी नहीं बल्कि भारतीय नागरिक है। अदालत ने कहा कि प्रस्तुत 15 दस्तावेज यह साबित नहीं कर पा रहे हैं। इसमें 1951 में जनगणना कानून के तहत एनआरसी का दस्तावेज भी है, स्कूल के प्रमाणपत्र भी हैं। अदालत ने यह कहा कि स्कूल के हेडमास्टर, या रिकॉर्ड पेश करने वाले अफसर ने खुद खड़े होकर गवाही नहीं दी है, इसलिए प्रमाणपत्र का पर्याप्त सत्यापन नहीं हो सका। 

यह कैसी भयानक नौबत है कि कोलकाता के एक सबसे प्रमुख अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ के संपादक राजागोपालन ने जब अपने पासपोर्ट नवीनीकरण की अर्जी लगाई, तो पासपोर्ट ऑफिस ने स्थानीय पुलिस से इस पर रिपोर्ट मांगी, और पुलिस ने यह लिखकर दिया कि चुनाव आयोग के एसआईआर अभियान में राजागोपालन का नाम मतदाता सूची से काट दिया गया है। इस आधार पर एक बहुत जाने-माने और वरिष्ठ संपादक का पासपोर्ट नवीनीकरण से मना कर दिया गया। अपने पास अमरीका का वीजा रहने के बावजूद वे अपनी बेटी की शादी में अमरीका नहीं जा पाए। जब एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने यह मामला उठाया, दिल्ली प्रेस क्लब ने इस पर लंबा बयान जारी किया, राजागोपालन के गृहराज्य केरल के मुख्यमंत्री ने बंगाल के मुख्यमंत्री को लिखा, तब जाकर किसी तरह वक्त-जरूरत निकल जाने पर उनका पासपोर्ट नवीनीकरण हो पाया। लेकिन बंगाल में ऐसे शायद 27 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए हैं, और इस तरह की कानूनी दिक्कत अगर इस बात को लेकर होती रहेगी, तो इस वरिष्ठ पत्रकार जैसे और कितने लोग हो सकते हैं जिनके मामले राष्ट्रीय स्तर पर इतनी प्रमुखता से उठाए जाएं, और सरकार को जायज फैसला करने के लिए मजबूर होना पड़े? 

अभी सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि भारत का पासपोर्ट किसी की नागरिकता का सुबूत नहीं है। जबकि पासपोर्ट पर यह साफ-साफ लिखा रहता है कि यह भारत के नागरिक को ही जारी किया जाएगा। अब अगर केन्द्र सरकार अपने सबसे नाजुक और सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज पर लिखी गई एक बुनियादी बात को ही कानूनी महत्व का नहीं मानती है, तो फिर देश में किसी के पास नागरिकता साबित करने के लिए और कोई दस्तावेज नहीं हो सकते। पासपोर्ट के पहले तो लोगों को कई किस्म के दस्तावेज देने पड़ते हैं, पासपोर्ट अधिकारी के सामने इंटरव्यू देना पड़ता है, पुलिस जांच होती है, तब कहीं जाकर यह दस्तावेज जारी होता है। अब अगर सरकार इसे भी नागरिकता का प्रमाण नहीं मानती, तो देश में कोई नागरिकता प्रमाणपत्र नाम की चीज तो है नहीं! 

भारत से जिन लोगों को दो-चार पीढिय़ों से रहते हुए भी विदेशी नागरिक कहकर देश के बाहर निकाला जा रहा है, उन्हीं की तरह का बर्ताव अगर अमरीका में भारतवंशी लोगों के साथ किया जाएगा तो क्या होगा? वहां अभी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने यह फैसला लिया था कि अमरीका में जन्म होने पर अपने आप ही वहां की नागरिकता नहीं मिल जाएगी। उनके इस फैसले को वहां की अदालत ने खारिज कर दिया, और कहा कि अमरीका में जन्म लेने वाले लोगों को नागरिकता देने से मना नहीं किया जा सकता, चाहे उनके मां-बाप वहां किसी भी तरह से क्यों न आए हों। अब अगर अमरीका में पैदा होने के बाद भी वहां की नागरिकता ट्रम्प की बददिमागी से खत्म करना लागू हो जाता, तो लाखों हिन्दुस्तानी बच्चे वहां से बाहर निकाल दिए जाते, जिस तरह आज भारत से लोगों को निकाला जा रहा है। भारत में तो बांग्लादेश से आए हुए लोग गरीब, मजदूर, और कारीगर किस्म के ही हैं। लेकिन अमरीका में तो वहां पैदा होने वाले भारतवंशी लाखों बच्चे ऐसे हैं जिनके मां-बाप को भी वहां की नागरिकता नहीं मिली हुई है, और ये बच्चे वहां पैदा हो गए थे। अगर भारत जैसी ही नागरिकता साबित करने की कार्रवाई अमरीका में चलाई जा सकती, तो भारतवंशी बच्चों का क्या होता? यह तो अमरीकी अदालत की समझदारी है, उसका हौसला है कि उसने ट्रम्प की बददिमागी को कुचलकर रख दिया। आज अगर ट्रम्प की मनमानी चलती, और वहां की नागरिकता पा चुके भारतवंशी बच्चों को विमानों में भर-भरकर भारत भेज दिया जाता, तो कैसा लगता? 

आखिर में यह बात कहना जरूरी होगा कि भारत के संविधान निर्माताओं की मूल भावना बड़ी स्पष्ट थी, कि राज्य का अस्तित्व नागरिकों की रक्षा के लिए है, न कि नागरिकों को लगातार अपनी वैध सिद्ध करने के लिए बाध्य करने हेतु। आपराधिक कानून का पूरी दुनिया में एक मूल सिद्धांत रहता है कि आरोप लगाने वाले पर प्रमाण प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी रहती है, किसी व्यक्ति को अपने को बेकसूर साबित करने के लिए मजबूर नहीं किया जाता। इसलिए लोकतांत्रिक और मानवीय तकाजा तो यही है कि अगर कोई राज्य किसी नागरिक को विदेशी घोषित करना चाहता है, तो उसकी जिम्मेदारी सामान्यत: राज्य पर होना चाहिए। भारत में ऐसे बहुत से प्रदेश हैं जिनमें हर बरस दसियों लाख लोग बाढ़ में बेघर हो जाते हैं, उनके कागजात सहित पूरे घर बह जाते हैं। ऐसे में अनपढ़ और गरीब लोगों से बीती कितनी पीढिय़ों के दस्तावेज और सुबूत की कानूनी उम्मीद रखना लोकतांत्रिक और मानवीय होगा? किसी भी सरकार का यह रूख कि वह अपने देश के सबसे कमजोर और बेबस लोगों के साथ एक अंतहीन टकराव करती ही रहे, यह पूरी तरह से अमानवीय है। इतिहास सब कुछ दर्ज करता है।

(Daily Chhattisgarh)   

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