10 जुलाई 2026
कुछ अरसा पहले देश के सबसे बड़े हिन्दू मंदिर, तिरुपति में लड्डुओं के लिए घी सप्लाई करने वाली कंपनियां चर्बी वाला नकली घी सप्लाई करते हुए पकड़ाई थीं। कुछ कंपनियां तो ऐसी भी थीं जिनकी कोई डेयरी नहीं थी, एक गाय भी जिनके पास नहीं थी, फिर भी वे ट्रकों से घी सप्लाई कर रही थीं। अब किस जानवर की चर्बी थी, किसकी नहीं, उससे किनकी धार्मिक भावना को चोट लगी, कौन से लोग चोट से बच गए, इसे धार्मिक लोग अधिक जानते होंगे। हम तो यह देख रहे हैं कि धर्म के नाम पर जितने कारोबार चलते हैं, उनमें किसी तरह के जुर्म से लोगों को परहेज नहीं है। अब छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में जो विख्यात महामाया मंदिर है, वहां परिसर में ही प्रसाद बेचने वाली दुकानों के सैम्पलों की अभी जांच हुई, तो पता लगा कि शक्कर की जगह एक ऐसे खतरनाक मीठे रसायन, एस्पार्टेम का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे आगे जाकर कैंसर का खतरा रहता है। इसके साथ-साथ पीले और केसरिये रंग के लिए एक रसायन का इतना अधिक इस्तेमाल हो रहा है कि उससे भी कैंसर या दूसरे बड़े नुकसान का खतरा रहता है। नमूनों की जांच की सरकारी रफ्तार ऐसी है कि सारा स्टॉक बिक जाने के महीनों बाद जाकर मिलावट की रिपोर्ट आती है। सरकार का जांच वाला अमला त्यौहारों के आसपास किस नीयत से बड़े पैमाने पर सैम्पल जब्त करता है, यह बात सबको अच्छी तरह मालूम रहती है। पूरी त्यौहारी बिक्री जब निपट चुकी रहती है, तब हफ्तों या महीनों बाद जांच रिपोर्ट आती है।
अब छोटे-छोटे दुकानदार जब धड़ल्ले से प्रतिबंधित रसायनों का इस्तेमाल करते हैं, तो फिर उनकी जांच भी आखिर कितनी हो सकती है? और यहां तो विख्यात राष्ट्रवादी रामदेव की कंपनी के भी बहुत सारे सामान मिलावटी या घटिया साबित होते रहते हैं, तो फिर महज छोटे लोगों पर तोहमत क्यों लगाई जाए? अभी कुछ साल पहले तो एक प्रयोगशाला रिपोर्ट ऐसी आई थी जिसमें भारत की बड़ी-बड़ी कंपनियों के शहद को मिलावटी पाया गया था, और शायद एक भी शहद खरा नहीं उतरा था। आज जब कभी गांव-गांव में, कुटीर उद्योग, महिला स्वसहायता समूहों में बने हुए सामानों को बढ़ावा देने की बात होती है, तो यह बात भी उठती है कि उनकी क्वालिटी की क्या गारंटी है? फिर आजकल तो जड़ी-बूटी, और प्राकृतिक चीजों से कई तरह की दवाएं, और दूसरी चीजें बनाकर भी बेचना बढ़ गया है। बड़ी कंपनियों से तो प्रयोगशाला रिपोर्ट वगैरह की उम्मीद एक बार की जा सकती है, लेकिन छोटे-छोटे समूह जो बनाते हैं, उनमें उत्कृष्टता के पैमाने कैसे लागू किए जाएं? इसका एक बड़ा नुकसान यह है कि घर में मिठाई-नमकीन बनाकर बेचने वाली महिलाएं हों, या कि अचार, पापड़, बड़ी जैसी चीजें बनाने वाली महिलाएं हों, उनके पास क्वालिटी कंट्रोल का कोई सर्टिफिकेट तो रहता नहीं है, और मिलावट के हर मामले के बाद ऐसे हर छोटे उद्योग, या उद्यमी की साख पर चोट लगती है। गलती, या गलत काम किसी एक जगह होने पर भी बाकी जगहों को भी लोग शक से देखते हैं। आज हालत यह है कि कर्नाटक सरकार को अपने राज्य में पान-मसाला या गुटखा बनाने वाली कंपनियों को चेतावनी देनी पड़ रही है कि उनके सामानों में अगर लत डालने वाले कोई रसायन मिले होंगे, तो उनका धंधा बंद करवा दिया जाएगा। आज तो बड़ी कंपनियों के खानपान में मिले हुए रसायन ऐसे रहते हैं, जो उनका जायका बढ़ाते हैं, और लोगों में उसे खाने की आदत बढ़ती जाती है। बहुत सी बड़ी कंपनियां अपने खानपान में जितना अधिक शक्कर, नमक, और फैट हिन्दुस्तानी बाजार के लिए रखती हैं, अपने किसी पश्चिमी बाजार में वैसी हरकत नहीं कर पातीं। इसलिए भारत में सरकार की निगरानी से जब बड़े-बड़े मगरमच्छ बचकर निकल जाते हैं, तो फिर छोटे-छोटे हलवाई या कुटीर उद्योग को ही क्यों कोसना?
अब हम एक बार फिर धर्मस्थलों, और वहां मुफ्त बंटने, या बिकने वाले प्रसाद या दूसरे खानपान पर लौटें, तो आस्था के चलते भी बहुत से लोग वहां जो मिलता है, उसे खा लेना तीर्थयात्रा या उपासना का एक हिस्सा ही मानते हैं। अब आज जब धर्म से जुड़े हुए बड़े-बड़े लोग चढ़ावा-चोरी में लगे हैं, महिलाओं और बच्चों के शोषण के बलात्कार जैसे जुर्म कर रहे हैं, तो फिर उन लोगों से, या उनके आसपास प्रसाद या दूसरे खानपान बेचने वाले लोगों से ईमानदारी और जिम्मेदारी की उम्मीद कैसे की जा सकती है? मंदिर परिसर में बिकने वाले प्रसाद में अगर जानलेवा रसायन मिले हुए हैं, तो लोगों को नारियल, फल, या इसी तरह के गैरमिलावटी सामानों के प्रसाद पर भरोसा करना चाहिए। कहीं चर्बी वाला प्रसाद, कहीं कैंसर पैदा करने वाला प्रसाद, ऐसी भी क्या आस्था? इसलिए लोगों को चाहिए कि अपनी आस्था को उपासना, पूजापाठ, प्रार्थना जैसी निरापद चीजों तक सीमित रखें, और खानपान को शक की नजर से ही देखें। दूसरी तरफ धर्मस्थानों को चाहिए कि वे अपने आसपास के नियमित कारोबारियों की नियमित जांच की व्यवस्था करें, और भरोसेमंद प्रयोगशाला की रिपोर्ट हासिल करें। जहां कहीं ऐसा खतरनाक काम होते मिलता है, उस पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, क्योंकि जिन्हें जानलेवा रसायन दूसरों को देने से परहेज नहीं है, उनके साथ कोई रियायत क्यों की जाए?
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