बेबी सिटर की हिंसा के वीडियो, और इस काम के शिक्षण-प्रशिक्षण की जरूरत

02 जुलाई 2026  

 

हाल ही में भारत के अलग-अलग शहरों से ऐसे वीडियो सामने आए जिनमें घरों में पति-पत्नी के कामकाजी होने की वजह से छोटे बच्चों की देखरेख के लिए किसी आधुनिक आया का इंतजाम किया गया था, और घर में लगे हुए सीसीटीवी कैमरों से यह दिखते रहा कि किस तरह बेबी सिटर उन्हें पीटती रहीं, या उन पर जुल्म करती रहीं। बेंगलुरू की ताजा खबर के मुताबिक एक बड़ी कंपनी के डे केयर सेंटर में महिला कर्मचारियों ने दो-तीन साल के बच्चों को वाशिंग मशीन में डाल दिया, टॉयलेट के पानी की धार उनके मुंह पर डाली, उन्हें बाथरूम में बंद कर दिया। अब ऐसी पांच महिलाओं पर वीडियो रिकॉर्डिंग के आधार पर जुर्म दर्ज किया गया है। घरों में बच्चों से परे, बीमार या बूढ़े लोगों की देखरेख के लिए रखी जाने वाली आया का भी कई मामलों में ऐसा ही रवैया सामने आया है, और अगर कैमरे न लगे होते, तो उनका न पता चलता, न उन पर कोई कार्रवाई हो पाती। 

शहरीकरण और छोटे परिवारों के चलन के साथ-साथ कहीं बच्चों की देखरेख, तो कहीं बूढ़ों की, यह जरूरत बन चुकी है। बड़े शहरों में अब ऐसी एजेंसियां भी काम कर रही हैं जो ऐसे कर्मचारी मुहैया कराती हैं। लेकिन ये कर्मचारी आमतौर पर घरेलू कामकाज, या सफाई करने के लायक महिलाएं ही रहती हैं, उन्हें देखरेख कर्मचारी के रूप में पेश कर दिया जाता है। न तो उनका रूख और रवैया देखा जाता कि वे बच्चों, बीमारों, या बूढ़ों के प्रति कैसी सोच रखती हैं। देखरेख की जरूरत वाले सारे ही तबके एक बहुत ही संवेदनशील बर्ताव के लायक रहते हैं। किसी-किसी परिवार में गंभीर विकलांगता के शिकार बच्चे या बड़े ऐसे रहते हैं जो कि देखरेख-कर्मचारी पर आश्रित रहते हैं। ये सब काम कुछ तकलीफ, कुछ तनाव, और कुछ मेहनत वाले रहते हैं, और अगर इन्हें करने वाले लोग इन लोगों से हमदर्दी नहीं रखते, तो कभी भी देखरेख अच्छी तरह नहीं कर सकते। 

आज जब किसी भी सरकारी या निजी स्कूल में किसी भी क्लास के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षकों का बीएड जैसा कोर्स करना अनिवार्य कर दिया गया है, जो बाकी पढ़ाई के बाद का कोर्स है, और इससे पढ़ाने की तकनीक, शिक्षकों के बर्ताव, उनकी सोच के बारे में चीजें पढ़ाई और सिखाई जाती हैं। बच्चों, बूढ़ों, बीमारों, या विकलांगों की देखरेख एक बहुत खास किस्म के प्रशिक्षण की मांग करती है। आज इस तरह के किसी शिक्षण-प्रशिक्षण की बात भी कहीं सुनाई नहीं देती। समाज में ठीकठाक भुगतान करने की क्षमता वाले लोगों की भी कमी नहीं है। जो लोग अपने घरों में सीसीटीवी कैमरे लगाते हैं, जो बेबी सिटर, नर्स, या आया की सेवाओं का भुगतान करते हैं, वे लोग बेहतर शिक्षित-प्रशिक्षित लोगों के लिए कुछ अधिक भुगतान भी कर सकते हैं, और उत्साह से करेंगे। अभी हमने कुछ हफ्ते पहले ही इसी जगह लिखा था कि किस तरह इजराइल में जिन कर्मचारियों की मांग सामने आई है, और जिसके लिए भारत से भी लोगों को आवेदन भेजने का मौका मिला है, उसमें घरेलू देखरेख, या केयर-गिवर की ट्रेनिंग पाए हुए लोगों के लिए भी कुछ काम है जिनमें तनख्वाह दो-दो लाख रूपए तक है। यह भी हम बार-बार लिखते आए हैं कि दुनिया के संपन्न देशों में बूढ़ी आबादी का अनुपात बढ़ते चल रहा है, और वैसे में उनकी देखरेख के लिए कर्मचारियों के रोजगार भी बढ़ते चले जाएंगे। ऐसे बहुत से विकसित देशों में उनकी अपनी आबादी गिरती चल रही है, और वहां की शिक्षित-प्रशिक्षित आबादी आमतौर पर घरेलू देखरेख, या केयर-गिविंग जैसे काम करना भी नहीं चाहती है। इन कामों में वहां पर गरीब देशों से आए हुए लोग ही अधिक लगे हुए हैं। अब जैसे-जैसे ऐसे गरीब देशों के लोगों को रोजगार मिलने लगेगा, इन देशों के हित में भी यही होगा कि अपने इन कर्मचारियों को अधिक से अधिक शिक्षित-प्रशिक्षित करके उन्हें बहुत संवेदनशील, और काबिल कर्मी बनाएं। बच्चों की देखरेख सिर्फ उनके गीले या गंदे हो गए कपड़ों को बदल देना, भूख लगने पर, या वक्त आने पर उन्हें कुछ खिला देने तक सीमित नहीं है। सच तो यह है कि संपन्न परिवार ऐसी बेबी सिटर को अधिक भुगतान करना चाहेंगे जिसने बाल मनोविज्ञान भी पढ़ा हो, जिसे बच्चों को खिलाना भी आता हो, कहानियां सुनानी भी आती हो, जिसकी भाषा नर्म हो, बोलचाल मधुर हो, व्यक्तित्व अच्छा हो। बेबी सिटर के काम को स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों से कम नहीं आंका जा सकता, और जिस तरह स्कूल शिक्षक को तीन बरस की बीएड की पढ़ाई करने के बाद ही यह नौकरी मिलती है, उसी तरह एक-दो बरस का घरेलू देखरेख का ऐसा कोर्स होना चाहिए जो बच्चों, बड़ों, बीमारों, विकलांगों, और ऐसे परिवार के पालतू पशु-पक्षियों की देखरेख के लिए नौजवान बेरोजगारों को खूब अच्छी तरह तैयार कर सके। संपन्न दुनिया में तनख्वाह गरीब देशों के मुकाबले आसमान छूती हुई होती हैं। अगर विकसित देशों के लायक इन कर्मचारियों को अच्छी तरह तैयार किया जाए, इन देशों की अलग-अलग भाषाओं में से किसी एक भाषा को सिखाया जाए, वहां के खानपान, वहां की संस्कृति को सिखाया जाए, तो ऐसे लोगों की अंतरराष्ट्रीय मांग बहुत बड़ी हो सकती है। लेकिन इससे परे भी भारत के शहरों में ऐसे पर्याप्त संपन्न लोगों की पर्याप्त बड़ी आबादी है जो कि किसी प्रतिष्ठित शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान से निकले हुए ऐसे रखरखाव-कामगारों को अच्छी तनख्वाह पर रखना चाहें।  

आज जब भारत में भी दो तनख्वाह वाले परिवार बढ़ते जा रहे हैं, या पति-पत्नी दोनों ही कारोबार या किसी सरोकार में व्यस्त रहते हैं, तो उन्हें घर पर ऐसे कर्मचारियों की जरूरत के साथ-साथ एक दिमागी शांति भी लगती है। कैमरे निगरानी तो कर सकते हैं, उन पर कुछ गलत होते दिखने पर कार्रवाई भी की जा सकती है, लेकिन वह सही देखरेख का विकल्प नहीं हो सकते। इसलिए घरेलू, या संस्थागत देखरेख के औपचारिक कोर्स स्कूली पढ़ाई के तुरंत बाद करवाए जा सकते हैं, और ये नर्सों के काम से परे के कोर्स रहेंगे, जिनकी रोजगार की संभावनाएं बहुत अच्छी रहेंगी। आज गरीब परिवारों से आने वाले, और पढ़ाई में साधारण रहने वाले दसियों लाख बच्चे हर बरस हिन्दुस्तान में बेरोजगार ग्रेजुएट बन जाते हैं। दूसरी तरफ देश में लाखों परिवार अपने कुछ सदस्यों के लिए देखरेख करने वाले चौबीस घंटों के कर्मचारी ढूंढते रह जाते हैं। प्लेसमेंट एजेंसियां बिना किसी प्रशिक्षण वाले कर्मचारी सप्लाई कर देती हैं, और उनसे शिकायत होने पर उन्हें बदल देती हैं। लेकिन इस क्षेत्र में बहुत ही विश्वसनीय काम करने वाले काबिल कामगार तैयार करने की जरूरत है, और स्कूली पढ़ाई के बाद के दो बरस की ऐसी तैयारी से लोगों को एक ठीक-ठाक तनख्वाह वाला रोजगार मिल सकता है, और ऐसे संपन्न परिवारों में हो सकता है कि उन्हें बेहतर रहन-सहन की सहूलियत भी मिल सके। राज्य सरकारों को ऐसी औपचारिक पढ़ाई और ट्रेनिंग देने वाले संस्थान शुरू करने चाहिए, या अपने राज्य में काम करने वाले बड़े उद्योगों, और कारोबारियों को जोडऩा चाहिए कि वे ऐसे संस्थान शुरू करें, और चलाएं। आने वाला वक्त बढ़ते हुए शहरीकरण का रहेगा, छोटे परिवारों का चलन और बढ़ते चले जाएगा, भारत के साथ-साथ दुनिया के दूसरे कई देशों में भी ऐसे घरेलू देखभाल के रोजगार बढऩे की भविष्यवाणी चारों तरफ से हो ही रही है। हर देश-प्रदेश को चाहिए कि उसके बेरोजगार लोगों, या उसकी युवा पीढ़ी के पास अगर इससे बेहतर संभावनाएं नहीं हैं, तो कम से कम इनके लायक तो लोगों को तैयार किया ही जाए। लोग मनरेगा की मजदूरी करने को मजबूर रहते हैं, उन्हें अगर ऐसे स्थाई, या अस्थाई रोजगार मिल सकें, तो उनका भी भला होगा, और उनकी सेवाएं लेने वाले परिवारों को भी एक जरूरी मदद मिलेगी। 

(Daily Chhattisgarh)   

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