22 जुलाई 2026
दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का शुरू किया हुआ, सामाजिक कार्यकर्ता, और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक का आगे बढ़ाया हुआ, और अब नौजवान और छात्र पीढ़ी की भारी मौजूदगी वाला आंदोलन किसी भी सरकार के लिए एक बड़ी असुविधा हो सकता है। अगर केन्द्र की मोदी सरकार इसे असुविधा मान ले, और बिना अधिक देर किए हुए आंदोलन के लोगों से बातचीत का सिलसिला शुरू करे, तो यह सरकार के लिए ही असुविधा के अंतहीन विस्तार से बचने का जरिया हो सकता है। आमतौर पर किसी भी लोकतंत्र में आम लोगों तक पहुंच चुका कोई आंदोलन सत्ता के लिए असुविधा रहता ही है। फिर उसमें असंगठित आम लोग जितने अधिक जुड़ते हैं, असुविधा उसी अनुपात में बढ़ती चलती है। जंतर-मंतर पर कोई संगठन अब आंदोलन का इंचार्ज नहीं रह गया, उसका कोई नेता भी नहीं रह गया, कॉकरोच जनता पार्टी कोई पार्टी भी नहीं है, लेकिन जंतर-मंतर पर अगर कुछ है, तो वह बेचेहरा आंदोलनकारियों के हाथ एक जायज मुद्दा है, इम्तिहानों में गड़बड़ी का। इसके अलावा वहां पर एक ऐसी भीड़ है जो लाठियों से डर नहीं रही है। अनजाने लोग इस धरनास्थल पर खाना पहुंचा रहे हैं, पानी पहुंचा रहे हैं। खाना डिलीवर करने वाले बहुत से लोगों को भुगतान के साथ ऑर्डर मिल रहा है कि जंतर-मंतर पर किसी को भी डिलीवर कर दो। लोग गाडिय़ों में भर-भरकर पानी की बोतलें ला रहे हैं। बिना किसी भी संगठन के, और नेता के इस तरह का आंदोलन जनता से जैसा स्वस्फूर्त समर्थन पाते दिख रहा है, वह सरकार के लिए दिक्कत की बात होनी चाहिए, अगर सरकार को ऐसी दिक्कत का अहसास हो तो।
हमने बीते हफ्ते में एक-दो बार और भी लिखा था कि सरकार को किसी भी शांतिपूर्ण-लोकतांत्रिक आंदोलन से उनकी जायज मांगों पर जरूर ही बात करनी चाहिए। लोकतंत्र में तो शांतिविहीन और अलोकतांत्रिक आंदोलनों से भी उनकी नाजायज मांगों पर भी बात करने की परंपरा दुनिया के तमाम लोकतंत्रों में है। हमने छत्तीसगढ़ के बस्तर की मिसाल भी दी थी कि वहां किस तरह नक्सलियों से स्थानीय पत्रकारों के माध्यम से सरकार ने बात की ही थी, और वह सफल भी रही। भारत का इतिहास बताता है कि पंजाब में राज्यपाल बनाए गए अर्जुन सिंह ने एक शांति समझौता करने में कामयाबी पाई थी। उत्तर-पूर्व में बहुत सारे उग्रवादी समूहों से भारत सरकार ने समय-समय पर बात की ही है। और ये तो इस देश के शांतिपूर्ण छात्र और नौजवान हैं जो कि दाखिला इम्तिहानों के भ्रष्टाचार से सदमे में आए हुए निराश हैं, और उनकी निराशा पर इस देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने नमक रगडऩे का काम किया, जब उन्होंने बिना किसी प्रसंग के अदालत में एक निहायत गैरजरूरी, और नाजायज जुबानी टिप्पणी की, और इस पीढ़ी को कॉकरोच कहा। वैसे तो कॉकरोच को हम बहुत अपमान के लायक नहीं पाते, क्योंकि कॉकरोच गरीब जनता के पैसों पर अमीरों के अंदाज में राजशाही के सुख नहीं भोगते, कॉकरोच जहां जाते हैं, वहां पर स्थानीय शासन-प्रशासन को एक वीवीआईपी-दहशत में नहीं डालते, किसी प्रोटोकॉल की मांग नहीं करते। फिर भी दुनिया भर में तिलचट्टों को गैरजरूरी माना जाता है, और उन्हें मार डालना इंसान के घरों की साफ-सफाई और सेहत के लिए जरूरी माना जाता है। अब सवाल यह है कि बेरोजगारों से भरे हुए इस देश में मुख्य न्यायाधीश बिना किसी उकसावे और भडक़ावे के अगर किसी पीढ़ी को, करोड़ों नौजवानों को तिलचट्टा कह रहा है, तो उसका मतलब तो यही है कि वे तिलचट्टों जितने ही गैरजरूरी हैं। आज ऐसे दसियों हजार तिलचट्टों ने जंतर-मंतर पर लाठियां खाते हुए यह साबित किया है कि उन्हें बाजार से कोई स्प्रे खरीदकर नहीं मारा जा सकता, उन्हें बिना नाम और बिना वर्दी वाले लठैत तैनात करके भी नहीं मारा जा सकता। वे वीडियो हिला देते हैं जिनमें पुलिसवालों को और लाठियां मारने की चुनौती देते हुए एक नौजवान खुली सडक़ के बीच निहत्थे खड़ा हुआ है, और लाठियों के वार से किसी भी इंसान के, जानवर के बदन में पैदा होने वाले दर्द के अहसास से भी मानो वह ऊपर हो गया है। जब किसी नौजवान पीढ़ी को लाठियों की मार का अहसास भी न हो, तो उसे डराना, दबाना, कुचलना नामुमकिन सा रहता है।
हम कल दिल्ली में जो कुछ हुआ, उसे लेकर कोई भविष्यवाणी करना नहीं चाहते। हो सकता है कि यह आंदोलन खुद होकर एक धीमी मौत हासिल कर ले, और यह भी हो सकता है कि यह किसान आंदोलन की तरह महीनों तक चले, और बढ़ते चले जाए। कुछ खबरें विचलित करती हैं कि किस तरह सिक्ख समाज जंतर-मंतर के हजारों, दसियों हजार आंदोलनकारियों को खाना-पानी पहुंचाने में जुट गया है, एक खबर यह भी कहती है कि घायलों के लिए गुरुद्वारा खोल दिया गया है। ये दोनों ही काम किसी भी जिम्मेदार जात या धरम के संगठन के लिए लोकतांत्रिक जिम्मेदारी के हैं। ये आंदोलनकारी देशविरोधी नहीं हैं कि उन्हें खिलाना देश के खिलाफ हो। ये छात्र और नौजवान अपने आंदोलन को बिना किसी राजनीतिक समर्थन के खुद चला रहे हैं, इसलिए कोई सत्तारूढ़ पार्टी भी, सरकार भी इन पर राजनीति करने की तोहमत नहीं लगा सकतीं। कांग्रेस अपना आंदोलन इसी मुद्दे को लेकर अलग चला रही है। आम आदमी पार्टी तिलचट्टे को देखकर उसी तरह दहशत में दिख रही है, जिस तरह कई घरों में कुछ लोगों को तिलचट्टों से दहशत रहती है, और वे उन्हें देखते ही कूदकर पलंग या टेबिल पर चढ़ जाते हैं। आम आदमी पार्टी के आमतौर पर समझदारी की बातें करने वाले सांसद संजय सिंह ने एक भयानक ही गैरजिम्मेदारी का, और अपनी ही खिल्ली उड़ाता बयान दिया है। संजय सिंह का कहना है कि कॉकरोच-धरना कमजोर करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल गांधी को अपने निवास पर धरने पर बिठा दिया है। उन्होंने कांग्रेस पर यह आरोप भी लगाया है कि वह कॉकरोच-आंदोलन को कमजोर करना चाहती है। आम आदमी पार्टी अभी यह समझ नहीं पा रही है कि वह दिल्ली की सडक़ों पर बढ़ते हुए कॉकरोचों के बीच किस तरफ पांव धरे, किस तरफ जाए। लेकिन इस दहशत और असमंजस में वह मोदी और राहुल पर किसी मिलीजुली साजिश की तोहमत लगाकर अपनी रही-सही साख और खत्म कर रही है। लेकिन आम आदमी पार्टी हमारी आज की बातचीत का मुद्दा नहीं है। कांग्रेस या राहुल गांधी भी कल की गिरफ्तारी के बावजूद हमारा मुद्दा नहीं हैं। हमारा मुद्दा जंतर-मंतर पर चल रहा एक ऐसा आंदोलन है जो अब तिलचट्टों का भी नहीं रह गया, उसमें अब देश के मक्खी, मच्छर, छिपकली, मकड़ी, सभी शामिल हो गए हैं। यह नौबत किसी भी जिम्मेदार लोकतंत्र के लिए फिक्र खड़ी करती है, अब इस नौबत को कौन गंभीर मानते हैं, और कौन नहीं, हम इस पर नहीं जा सकते।
जंतर-मंतर का यह आंदोलन जब तक भी चले, तब तक वह शांतिपूर्ण बना रहे, यह हमारी सबसे बड़ी हसरत है, और यही इस आंदोलन की लाईफलाईन है। आम लोग, न सिर्फ छात्र और नौजवान पीढ़ी, बल्कि बाकी लोग भी जिस तरह इस आंदोलन के साथ शांतिपूर्ण तरीके से जुड़े हैं, वह असाधारण और अभूतपूर्व है। देश में छात्रों से जुड़े हुए मुद्दे सचमुच ही बहुत गंभीर हैं। हम सिर्फ नीट इम्तिहान की बात नहीं कर रहे, छत्तीसगढ़ में तो कांग्रेस सरकार के नियुक्त किए गए लोगों ने पीएससी में जो घोटाला किया था, वह नीट से भी और भयानक था, यह एक अलग बात है कि कांग्रेस के खिलाफ छत्तीसगढ़ में प्रदर्शन कर रही भाजपा को भी आज यह मुद्दा याद नहीं पड़ रहा है। देश के कई राज्यों में दाखिला, और नौकरी के इम्तिहानों में जिस तरह के संगठित भ्रष्टाचार के मामले पकड़ाए हैं, उनसे देश की नौजवान, छात्र, बेरोजगार पीढ़ी में आत्मघाती निराशा हो जाना स्वाभाविक है। मध्यप्रदेश में व्यापमं का ऐतिहासिक-बेमिसाल घोटाला, राजस्थान के कई इम्तिहानों में लगातार ऐसे घोटाले कि इम्तिहान के दिन पूरे-पूरे शहरों के इंटरनेट बंद कर दिए जाते हैं। ऐसी निराशा से घिरी हुई नौजवान पीढ़ी से बात करने में अगर देश-प्रदेश की सरकारें देर करेंगी, परहेज करेंगी, तो वे अपना ही बड़ा नुकसान करेंगी। जंतर-मंतर के आंदोलन को बेनाम और बेचेहरा जनता की तरफ से प्रचार की किसी हसरत के बिना जो समर्थन दिया जा रहा है, उस खतरे की घंटी को जो सरकार न सुने, वह पानी सिर तक पहुंच जाने पर जरूर ही खतरे का घंटा सुनेगी। लोकतंत्र में बातचीत सबसे सस्ता रास्ता रहता है, जिनके साथ किसी किनारे पहुंचने की कोई भी उम्मीद न हों, उनसे भी बातचीत करनी ही चाहिए, लेकिन जब तक कोई सरकार में नहीं पहुंच जाते, तब तक वे हमारी इस बात से सहमत रहते हैं, वहां पहुंचने के बाद उन्हें बातचीत गैरजरूरी लगने लगती है।
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