मिलावटी पेट्रोल का यह प्रयोग जनता और गडकरी दोनों पर बहुत भारी पड़ रहा

08 जुलाई 2026  

 

भारत में अभी लोगों का डीजल-पेट्रोल महंगाई का दर्द गया नहीं है कि ई-20 नाम का एक पिशाच और मंडराने लगा है। पेट्रोल में अब 20 फीसदी एथेनॉल मिलाकर दिया जा रहा है, जिससे बहुत से लोगों ने कई तरह की दिक्कतें होने की शिकायत की है। बहुत से जाने-पहचाने पत्रकारों ने, और दूसरे प्रमुख लोगों ने यह लिखा है कि उनकी कारों का एवरेज किस तरह, किस बुरी तरह गिर गया है। कुछ लोगों ने परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के नाम से सोशल मीडिया पर लिखा भी है कि इस तरह का काम न करें। एथेनॉल बनाने वाले कारखानों से नितिन गडकरी के परिवार का भी संबंध गिनाते हुए लोग उनकी व्यक्तिगत आलोचना भी कर रहे हैं। और कुछ बड़े, और गंभीर अखबारों में कुछ जानकार यह विश्लेषण भी कर रहे हैं कि प्रति लीटर गाड़ी का चलना ही अगर इतना कम हो जाएगा, तो पेट्रोल की खपत कम होने के बजाय शायद बढ़ जाएगी। आज सरकार पेट्रोलियम आयात को घटाने, और जाने किन किसानों की उपज का बाजार बढ़ाने के लिए एथेनॉल को बढ़ावा दे रही है। आज सरकार ने पेट्रोलियम कंपनियों, और ऑटोमोबाइल कंपनियों के प्रमुख लोगों को साथ में बिठाकर मीडिया के सामने यह तस्वीर पेश की है कि एथनॉल मिले पेट्रोल से कोई नुकसान नहीं होने वाला है। जबकि इन्हीं में से कुछ विशेषज्ञ पहले कैमरों पर यह बात कह चुके थे कि इससे ईंधन की खपत बढ़ रही है, गाड़ी कम दूरी चल रही है, और इसके कुछ किस्म के पुर्जों को नुकसान हो रहा है। 

बीते लंबे बरसों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम के सबसे कम दामों के रहते हुए भी भारत में लोगों को जितना महंगा डीजल-पेट्रोल दिया गया है, उससे भी लोग तकलीफ पाते ही रहे हैं। अब ई-20 का यह नया बवाल लोगों के सरकार पर भरोसे को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। बीते महीनों में देश में जितने पुल गिरे हैं, जितनी सडक़ें धंसी हैं, उन सबको लेकर वैसे भी परिवहन मंत्री गडकरी पर से लोगों का विश्वास उठते चले जा रहा था। अब जो पेट्रोल लोगों को बिना किसी विकल्प के, जो पेट्रोल पंप पर मिले, वही लेने की मजबूरी है, ऐसे में लोग सरकार को कुछ अधिक बागी तेवरों से देख रहे हैं, हिकारत से देख रहे हैं। जिस बाजार पर सरकार का एकाधिकार है, उस बाजार में लोगों से पसंद को छीन लेना, और देश की गाडिय़ों की टेक्नॉलॉजी की परवाह किए बिना नई-पुरानी सभी गाडिय़ों पर ई-20 वाला ईंधन थोप देना अलोकतांत्रिक भी है, और शायद अवैज्ञानिक भी है। 

दूसरी तरफ यह एथेनॉल पैदा करने के लिए जिस चावल या मक्के का इस्तेमाल होता है, गन्ने का इस्तेमाल होता है, उन्हें उगाने में भयानक मात्रा में पानी लगता है। बहुत से पर्यावरणवादियों का यह मानना है कि पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से भारत का विदेशी मुद्रा का भंडार चाहे थोड़ा सा बच जाए, लेकिन भारत के जल भंडार खाली हो जाएगा। जिस तरह से सरकार किसानों से महंगे दाम पर खरीदे गए धान से बनवाए गए चावल को करीब आधे दाम पर एथेनॉल कारखानों को दे रही है, वह एक किस्म से एथेनॉल को दी जाने वाली सब्सिडी है। एथेनॉल की लागत का हिसाब शायद अभी ठीक से नहीं लग रहा है क्योंकि सरकार धान के अपने अतिरिक्त भंडार को जिस रेट पर इन कारखानों को दे रही है, उसका हजारों करोड़ का नुकसान एथेनॉल के नाम पर नहीं लिखा रहा है। फिर पर्यावरण को होने वाला नुकसान अलग है, क्योंकि किसान अगर अधिक पानी झोंककर ऐसी फसलें लेंगे, तो इसका नुकसान साल-दो साल में समझ नहीं आएगा, लेकिन जब धरती सूखने लगेगी, तब पेट्रोल पंप लोगों का, मवेशियों का, और फसलों का गला तर नहीं कर पाएंगे। 

भारत के लोग आज सरकार की तरह-तरह की नीतियों को लेकर वैसे भी परेशान हैं। हर काम के डिजिटलीकरण को लेकर, हर कार्रवाई ऑनलाईन करने को लेकर आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से को असुविधा हो रही है। आज हवा, पानी, खाने, और बिजली के बाद पेट्रोल का ही नंबर आता है, जिसके बिना लोगों का जीना, काम करना नामुमकिन हो गया है। उसे लेकर इस तरह का प्रयोग जायज नहीं है। सरकार अपने काबू की पेट्रोलियम और ऑटमोबाइल कंपनियों से मनचाही बात कहला तो रही है, लेकिन सरकारें अपने बहुत से फैसलों को लेकर इस तरह की जुबानी सर्टिफिकेट आसानी से, या दबाव से हासिल कर लेती हैं। नितिन गडकरी, जिन्हें बेहतर कामकाज करने वाला मंत्री माना जाता था, वे आज देश की तकरीबन पूरी आबादी को खलनायक की तरह लग रहे हैं। लोगों के सामने कोई ऐसे भरोसेमंद सुबूत नहीं हैं कि गाडिय़ों का माइलेज, या एवरेज कितना घट रहा है। यह भी साफ नहीं है कि कितनी नई, या कितनी पुरानी गाडिय़ों को ऐसे मिलावटी ईंधन से कितना नुकसान हो रहा है। अगर सरकार जनता पर अपना ऐसा कोई फैसला लादना भी चाहती थी, तो उसे सरकारी काबू के बाहर की किसी स्वतंत्र, और भरोसेमंद विशेषज्ञ, प्रयोगशाला या संस्था से एक पारदर्शी प्रयोग करवाना था, और उसके बाद ही जनता पर रोजाना तनाव खड़ा करने वाला ऐसा कोई फैसला लागू करना था। कल ही गडकरी ने यह चुनौती दी है कि कोई एक व्यक्ति भी आकर बताए कि उसकी गाड़ी को नुकसान पहुंचा है, या माइलेज कम मिला है। सोशल मीडिया को तो सरकार अच्छी तरह देखती ही है, बहुत से नामी-गिरामी लोगों ने भी मिलावटी ईंधन को लेकर अपने निजी तजुर्बे लिखे हैं, जो कि बहुत भयानक हैं। गडकरी के विभाग को चाहिए कि सोशल मीडिया पर ऐसे चर्चित लोगों से संपर्क करके उनसे शिकायत हासिल करे, उनकी गाड़ी उधार लेकर उस पर उनकी निगरानी में प्रयोग करके देखे, और उन्हें संतुष्ट करे। जनता की जिंदगी से इतनी गहराई तक जुड़े हुए, और रोजाना की जरूरत के इस फैसले को जनता को विश्वास में लेकर ही लागू करना चाहिए था। जब कभी सरकारें ये तय कर लेती हैं कि वे जो चाहे कर सकती हैं, तो वैसे फैसले कई बार उल्टे पड़ते हैं, बहुत नुकसानदेह भी हो सकते हैं। इस देश ने नोटबंदी को भी इसी तरीके से झेला था, उसका नुकसान उठाया था, और उसका हासिल शून्य था। नोटबंदी से कालेधन के खत्म होने की उम्मीद की जा रही थी, अभी तो एक-एक अफसर के यहां छापे में दसियों करोड़ की नगदी मिल रही है, नोटबंदी के बाद इतना कालाधन आ कहां से रहा है? बैंकों में तो ईमानदार खातेदारों को भी नगद जमा करने पर, या नगद निकालने पर हर बार सवाल झेलने पड़ते हैं, फिर ये लोग इतनी नगदी पाते कैसे हैं? 

मिलावटी पेट्रोल के सरकारी फैसले से और कुछ हुआ हो या न हुआ हो, इतना तो जरूर ही हो गया है कि देश की लीडरशिप के लिए जो लोग गडकरी में कुछ संभावनाएं देखते थे, वे अब जनभावनाओं में तो पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं। ई-20 वाले एथेनॉल मिले पेट्रोल को छिडक़कर उन संभावनाओं को तो जला ही दिया गया है। पता नहीं गडकरी खुद इस बात को कितना समझ पा रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

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