12 जुलाई 2026
विश्वकप फुटबॉल कई दिलचस्प नजारे पेश कर रहा है। हम आंकड़ों में उलझे बिना एक तर्क सामने रखना चाहते हैं। 53 लाख आबादी वाला नॉर्वे अपनी 80 लाख रूपए सालाना औसत प्रति व्यक्ति आय के साथ विश्वकप में धमाचौकड़ी मचाए हुए है। और हिन्दुस्तान को अपने-अपने घरों में टीवी के सामने बैठने की रैकिंग मिली हुई है। आबादी 140 करोड़, फीफा रैंकिंग 138वीं। जब नॉर्वे के मुकाबले हम भारत में उस आय वर्ग वाले हिन्दुस्तानियों का अंदाज लगाते हैं, तो सरकारी रिकॉर्ड में तो वे बहुत कम बैठते हैं। लेकिन भारत में मोटी कमाई करने वाले अधिकतर लोगों की कमाई सरकारी रिकॉर्ड से परे की अधिक रहती है। नेता, अफसर, ठेकेदार सरकारी रिकॉर्ड से परे की कमाई वाले रहते हैं। छोटे-छोटे कारोबारी भी अपनी पूरी कमाई उजागर नहीं करते। इसलिए 80 लाख सालाना कमाने वाले 56 लाख लोग हिन्दुस्तान में होंगे, या नहीं, इसका कोई आंकड़ा तो नहीं है, लेकिन यह अंदाज लगाया जा सकता है कि दो नंबर की कमाई मिलाकर हिन्दुस्तानी नॉर्वे की आबादी के मुकाबले वहां की औसत कमाई वाले होंगे। लेकिन फुटबॉल के मामले में उसके आकार जैसा शून्य ही भारत के हाथ में है।
अब नॉर्वे की तो एक मिसाल हमने दे दी, लेकिन हम कुछ दूसरे देशों को भी देखें, आज 5 लाख आबादी का केप वर्डे विश्वकप में खेल रहा है, वहां की प्रति व्यक्ति आय भारत से दो गुना है। अब भारत में केप वर्डे जैसी औसत आय की आबादी करोड़ों में हैं, लेकिन फुटबॉल के मामले में यह सिर्फ दर्शक बनकर रह गया है। इस छोटे से देश के बारे में जब हमने पढऩे की कोशिश की, तो पता लगा कि यह 10 टापुओं में बंटा हुआ देश है, एक पर तो सिर्फ ज्वालामुखी है, 9 पर आबादी है, हर एक की अलग स्थानीय बोली है, लेकिन यहां की फुटबॉल टीम सबसे ऊपर की 40-50 टीमों में है, और हिन्दुस्तान तो जैसा कि हम ऊपर बता चुके हैं, 138वें नंबर पर है। एक और देश मोरक्को को देखें, तो उसकी आबादी 3 करोड़ 80 लाख है, प्रति व्यक्ति आय भारतीयों से डेढ़ गुना ज्यादा है, लेकिन यह 2022 में विश्वकप सेमीफाइनल में पहुंचा हुआ देश है, और इसकी फीफा रैंकिंग टॉप-15 में है।
अब हिन्दुस्तान के पास इस बात का एक जवाब होना चाहिए कि देश का अधिकांश हिस्सा जब साल में 8 महीने या 10 महीने बिना बर्फ के रहता है, जमीन खेलने लायक रहती है, जगह की कमी नहीं है, फुटबॉल में कोई खर्च नहीं होता है, उसके बाद भी हिन्दुस्तान बंगाल और गोवा की फुटबॉल संस्कृति को संभाल क्यों नहीं पाया? क्या अंग्रेजों के छोड़े हुए क्रिकेट की अकेली दीवानगी ने बाकी खेलों को तिरस्कृत कर दिया, या फिर और कोई वजह है? हम तो फुटबॉल में सबसे कामयाब कुछ गरीब देशों के ही आंकड़े यहां पर दे रहे हैं, जिनकी पूरी आबादी अपनी औसत आय को लेकर भी भारत में उस औसत आय की अनुमानित आबादी से कम है। अब केप वर्डे को देखें तो 9 टापुओं में बंटे हुए देश की संभावनाएं भी भारत जैसे विशाल भूभाग के मुकाबले कुछ कम ही होंगी। देश के कुछ सबसे अच्छे लोग वहां से बाहर निकल चुके हैं, आंकड़े बताते हैं कि केप वर्डे की आबादी से करीब चार गुना नागरिक दुनिया के दूसरे देशों में बस गए हैं। इसका मतलब यह है कि हर तरह की प्रतिभा, जिनमें खेल प्रतिभाएं भी शामिल हैं, केप वर्डे छोडक़र दूसरे देश चली गई हैं, फिर भी वहां की टीम टॉप-40 या टॉप-50 में शामिल रहती है।
हमने कुछ हफ्ते पर इसी जगह इसी विषय पर अपनी फिक्र जाहिर की थी कि क्रिकेट के मुकाबले बहुत ही कम खिलाड़ी जिस खेल को खेल सकते हैं, जिसके लिए कोई पिच नहीं लगती है, मैदान तक नहीं लगता है, जिसे गली में या छत पर भी खेला जा सकता है, ऐसा फुटबॉल भारत में उसी तरह लात खा रहा है जिस तरह मैदान में फुटबॉल को लातें पड़ती हैं। फुटबॉल तो कोई खिलाड़ी अकेले ही प्रैक्टिस करते दिखते हैं, दो लोग हो जाएं तो समझ लें कि दो टीमों की तरह भिड़ सकते हैं, और एक-दूसरे से गेंद छीनने की कोशिश कर सकते हैं। फुटबॉल क्रिकेट जैसा नाजुक खेल नहीं है, जो कि पिच गीली होते ही हाथ डालकर बैठ जाए, आधा-एक दर्जन खिलाडिय़ों बिना खेला न जा सके, जिसके लिए बैट-बल्ला, विकेट-पैड जैसी कई चीजें अनिवार्य हों। भारत की गरीबी, और यहां के अभाव को फुटबॉल से अधिक माकूल और कोई खेल नहीं बैठ सकता, लेकिन इस खेल में 140 करोड़ का यह देश दर्शकदीर्घा तक भी नहीं पहुंच पाता क्योंकि वहां पहुंचकर किस देश की टीम के लिए नारे लगाए। बस अपने घर बैठे फुटबॉल देखना हो तो देख ले।
भारत के बारे में हम यह भी कहना चाहेंगे कि कश्मीर जैसे आतंकग्रस्त, हिंसाग्रस्त राज्य में यह भी देखने मिला है कि वहां गांव-गांव के नौजवानों को जब क्रिकेट खेलने का मौका दिया गया, इसके मैचों को बढ़ावा दिया गया, तो वे नौजवान पत्थरबाजी और आतंकी हिंसा से दूर रहे, और फुटबॉल में व्यस्त रहे। आज इस देश में जगह-जगह बेरोजगार, या अनपढ़ नौजवान जिस तरह सार्वजनिक सामूहिक हिंसा में लगे हुए दिखते हैं, क्या फुटबॉल का इस्तेमाल कश्मीर की तरह देश के दूसरे प्रदेशों में भी नहीं हो सकता? कश्मीर में फुटबॉल से जो सामाजिक अराजकता घटी है, उसकी वजह से फीफा रैंकिंग नहीं बढऩे वाली है, लेकिन खेल ने अराजकता-उन्मूलन में अपना जो असर साबित किया है, क्या उस तजुर्बे का इस्तेमाल दूसरे प्रदेशों में नहीं किया जाना चाहिए? आज नौजवानों की भीड़ का एक बड़ा इस्तेमाल हिन्दुस्तान में धार्मिक उन्माद के झंडे-डंडे थामने में किया जाता है। क्या उनके हाथों में ये ‘हथियार’ थमाने के बजाय उनके पैरों के बीच फुटबॉल देना बेहतर नहीं होगा?
हम खेल से लेकर सामाजिकता तक, जिस नजरिए से भी भारत में फुटबॉल को देखें ऐसा लगता है कि हमने न तो राष्ट्रीय स्वाभिमान इस खेल से जोड़ा, और न ही इसकी सामाजिकता की संभावनाओं को देखा। और फुटबॉल से हमारा कोई रातों-रात प्रेम नहीं उपज गया है, यह तो इन दिनों विश्वकप फुटबॉल चल रहा है, इसलिए हम इस पर चर्चा कर रहे हैं। इस देश की सरकार, प्रदेशों की सरकारें, पब्लिक सेक्टर कंपनियां, और निजी कंपनियों को यह सोचना चाहिए कि अंग्रेजों के लाए हुए क्रिकेट की तरह ही फुटबॉल भी उसी वक्त अंग्रेजों का लाया हुआ था, आज एक खेल में हिन्दुस्तान आसमान पर पहुंच गया है, और दूसरे खेल में यह विशाल देश 5 लाख की आबादी के मुकाबले भी जमीन पर पड़ा हुआ है।
हम खेल की अपनी बहुत ही सीमित समझ के साथ भी सामान्य समझबूझ का इस्तेमाल करते हैं, तो लगता है कि इतने बड़े देश में कई ऐसी ताकतें हो सकती हैं जो कि फुटबॉल को इस देश में आसमान पर पहुंचा सके, और दुनिया में फुटबॉल के आसमान पर इस देश को। आज देश में क्रिकेट की नियंत्रक संस्था बीसीसीआई की कमाई ही इतनी है कि अगर वही फुटबॉल को बढ़ावा देने का जिम्मा ले ले, तो एक खेल की कमाई से दो देश दुनिया में आगे बढ़ सकते हैं, और एक ऐसा वक्त आ सकता है, जब फुटबॉल भी इस देश के लिए कमाई करने वाला खेल हो जाए, सम्मान भी कमाकर दे सके। इस देश के लोगों का स्वाभिमान बड़ी फर्जी बातों को लेकर जाग जाता है, लेकिन जो असली चुनौतियां रहती हैं, उनसे यह देश दूर इसलिए भागता है कि असली चुनौतियों से जूझना मुश्किल रहता है, हवा में काल्पनिक दुश्मन खड़े करके उन पर लकड़ी की तलवार चलाने का आत्मसंतोष लहूलुहान नहीं करता है। देखते हैं कि फुटबॉल को लेकर हमारे इस उकसावे और भडक़ावे से किसी का स्वाभिमान जागता है या नहीं।
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