बरसों की किस्त वाले कर्ज के पहले हो जाएं सावधान

11 जुलाई 2026  

 

एआई की वजह से दुनिया में बेरोजगारी अधिक आएगी, या आरामतलवी अधिक बढ़ेगी, अभी कहना कुछ मुश्किल है। लेकिन एक बात तय है कि लोगों के पास काम रहने वाला है, वह चाहे नौकरी जाने की वजह से हो, या उसी नौकरी में काम का बोझ ढोने वाले तकरीबन मुफ्त के एआई नाम के औजार मिल जाने से। जानकार लोग याद करते हैं कि करीब ढाई सौ साल पहले जब भाप के इंजन ने दुनिया बदलनी शुरू की, कारखानों की मशीनें उससे चलने लगी, और रेल इंजन ने बड़े पैमाने पर ट्रांसपोर्ट के काम में दखल दिया, घोड़ों और दूसरे जानवरों से खींची जाने वाली गाडिय़ां भाप ने बेदखल कर दीं, और रेल के बढ़ते हुए काम में बहुत लोगों को बेरोजगार किया था। वहां से लेकर जैसे-जैसे कारखाने बढ़ते चले गए, वैसे-वैसे मेहनतकश मजदूरों का काम घटा, बेरोजगारी कुछ अरसा बढ़ी, लेकिन औद्योगिकीकरण की वजह से जो संपन्नता आई, उसके चलते फिर कारोबार बढ़े, उत्पादन बढ़ा, सामानों की बिक्री बढ़ी, और रोजगार फिर बढ़ निकले। आज भी एआई की वजह से कितने रोजगार कम होने हैं इसका अंदाज लगाने वाले जानकार लोग भी इसे रोजगार के आंकड़ों में देखने के बजाय मौजूदा कामगारों पर बोझ कम होने की शक्ल में अधिक देख रहे हैं। 2023 में एक सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनी गोल्ड मैन सैक्स का अंदाज था कि दुनिया करीब 30 करोड़ नौकरियों पर एआई का असर पड़ सकता है। इसी रिपोर्ट को 2026 में इस कंपनी ने अपडेट किया, और कहा कि अभी तक यह प्रभाव सीमित है, लेकिन वास्तविक भी है। रिपोर्ट कहती है कि जिन नौकरियों में एआई इंसान की जगह ले सकती है, वहां पर भर्ती धीमी हो गई है, और जहां एआई इंसान की क्षमता बढ़ाती है, वहां रोजगार भी बढ़ रहे हैं। 

अब अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, आईएमएफ का अनुमान है कि विकसित देशों में करीब 60 फीसदी नौकरियां, और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में करीब 40 फीसदी नौकरियां एआई से किसी न किसी रूप में प्रभावित होंगी। यह प्रभावित होना नौकरी खत्म होना नहीं होगा, कुछ खत्म होंगी, कुछ में उत्पादकता बढ़ेगी, और कुछ में नौकरी के तौर-तरीके बदल जाएंगे। आज की एक सबसे चर्चित एआई कंपनी एंथ्रापिक का कहना है कि अभी एआई का असर काम के हिस्सों पर है, पूरी की पूरी नौकरी पर नहीं, लेकिन यह रिपोर्ट भी कहती है कि जिन पेशों में, या जिन तरह के कामों में एआई का असर सबसे अधिक है, वहां भर्ती की रफ्तार धीमी पड़ गई है। फिर यह भी है कि अलग-अलग किस्म की कंपनियों के काम में, अलग-अलग देशों में एआई का असर अलग-अलग देखने मिलेगा। अमरीका और विकसित पश्चिमी देशों में मौजूदा कर्मचारियों पर एआई का कैसा असर पड़ेगा, इस आशंका का विश्लेषण हो रहा है। दूसरी तरफ भारत में जिन नौकरियों में हर साल लाखों नए लोगों को रखा जाता था, वहां पर अब भर्ती मंदी होने जा रही है, क्योंकि कंपनियां कम लोगों से वह काम करवा रही हैं, या कई तरह के काम तो चैटबॉट करने लगे हैं, जिनमें इंसानों की कोई जरूरत ही नहीं है। भारत के रोजगार विशेषज्ञ यह कह रहे हैं कि नई नौकरियां पाने की चुनौती बहुत बढ़ गई है, जिसे एंट्री-लेवल भर्ती दबाव कहा जा रहा है। 

एक तरफ तो न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में उद्योग-व्यापार ने कोरोना लॉकडाउन देखा, और विकराल विपरीत परिस्थितियों में किस तरह छंटनी करके, छरहरे होकर जिया जा सकता है, उसका प्रयोग देखा। इसके बाद रूस और यूक्रेन की जंग, अमरीका और ईरान की जंग के असर को देखा, अमरीका के टैरिफ-वॉर को देखा, और आर्थिक प्रतिबंधों को देखा, अमरीका की बाकी दुनिया के लिए जाने वाली मदद खत्म होते देखी, और उसकी वजह से भी नौकरी और कारोबार में छंटनी देखी। यह सब देखने के बाद आज जब इनमें से कुछ बातें चल ही रही हैं, तब एआई का एक असाधारण और अभूतपूर्व दबाव लोगों से लेकर कारोबार तक पड़ा ही हुआ है। ऐसे में दुनिया के शेयर बाजार एआई नाम के बुलबुले के फूट जाने की आशंका को झेल रहे हैं, और सफेदपोश कामगार इस आशंका में हैं कि एआई से उनके रोजगार पर क्या असर पड़ेगा? दूसरी तरफ कारोबार पर यह खतरा तो हमेशा ही रहता है कि कामगारों की छंटनी हो, किसी महामारी की वजह से व्यापार की मंदी हो, या अचानक आयात-निर्यात की तस्वीर बदल जाए, तो क्या होगा? आज दुनिया ऐसी सारी अस्थिरता, और ऐसे सारे असमंजस को झेल रही है। जब कामगारों की छंटनी होती है, या नए लोगों को रोजगार नहीं मिलता है, तो जो कारोबार इन लोगों की आर्थिक स्थिति पर टिके रहते हैं, वे कारोबार भी डूबते हैं, और उनमें लगे हुए लोगों का भी रोजगार जाता है। आर्थिक मंदी पहाड़ से लुढक़ते हुए बर्फ के गोले की तरह रहती है, जो नीचे आते-आते शायद आकार में भी बड़ा होते जाता है। 

अब कुछ दूसरे लोगों का यह भी कहना है कि एआई की वजह से छंटनी जितनी होगी, वह तो होगी, लेकिन बचे हुए लोगों के लिए काम आसान हो जाएगा। अब सवाल यह उठता है कि हफ्ते में पांच दिन में जो काम कामगार करते थे, वे सफेदपोश कामगार अब घटे हुए काम को करके पांच दिन की तनख्वाह या मजदूरी कैसे पा सकेंगे? क्या लोगों के दिन के घंटे घट जाएंगे, और इसी के साथ उनकी तनख्वाह, या उनका मेहनताना घट जाएगा? या फिर काम के दिन ही घट जाएंगे? कोई भी कारोबार अपने कर्मचारियों को घटे हुए काम पर उतनी ही तनख्वाह, या उतनी ही मजदूरी देंगे, यह भी संभव नहीं लगता है। आज दुनिया में कोई भी कंपनी भारी अंतरराष्ट्रीय मुकाबले का सामना करती है। ऐसे में वह कंपनी घटे हुए काम के लिए वही तनख्वाह, या घटे हुए काम के लिए उतने ही कर्मचारी भला क्यों रखेगी? आज भी दुनिया की बड़ी-बड़ी टेक कंपनियां थोक में, एक-एक बार में दसियों हजार कर्मचारियों की छंटनी कर रही हैं। यह तो एक पहलू हुआ, दूसरा पहलू यह है कि बीते दशकों में वे जिस रफ्तार से नए कर्मचारियों की भर्ती करती थीं, वह रफ्तार भी तो अब बुरी तरह घट रही है। 

एआई नाम के औजार की वजह से कम मेहनत और कम समय में अधिक उत्पादकता तो आएगी, लेकिन कोई भी कंपनी इस नफे को कर्मचारियों को क्यों देगी? अगर कोई कर्मचारी ठेका कर्मचारी की तरह काम करते हैं, तो वे कुछ अरसा तो मेहनत की बचत का एक फायदा पा सकते हैं, लेकिन जब कंपनी दुबारा इसी काम को देने का ठेका तय करेगी, तो उस वक्त मुकाबले में एआई से होने वाली मेहनत की बचत की वजह से रेट गिर जाएंगे। ऐसा लगता है कि आज एआई विकसित करने वाली कंपनियां दुनिया के लोगों की नजरोंं में खलनायक बनने से बचने के लिए इससे होने वाले बेरोजगारी के खतरों को कम बताती हैं। हम खुद एआई के कई किस्म के इस्तेमाल से कम्प्यूटरों पर होने वाले बहुत से कामों को इतनी आसानी से कर रहे हैं कि यह करने वाले लोग आज चाहे न हटाए जाएं, लेकिन कल भी ऐसे कामों के लिए किसी की भर्ती बिल्कुल नहीं होगी। 

एआई से कारोबार और रोजगार पर पडऩे वाले असर पर विशेषज्ञ रिपोर्ट जो कहती है, उसके साथ-साथ अपनी खुद की अकल का विश्लेषण भी काम में लाना चाहिए। खासकर उन लोगों को जो अपने रोजगार के भरोसे मकान के लिए बीस बरस का, या किसी वाहन के लिए पांच बरस का कर्ज ले रहे हैं, और किस्त का बोझ अपने ऊपर लाद रहे हैं, क्या एआई उन्हें आने वाले इतने बरस आसानी से किस्त भरने देगी? एआई आपकी चादर को कितना छोटा कर देगी, इसका कोई ठिकाना नहीं है, इसलिए पैर समेटकर सोने की आदत डाल लेने में ही समझदारी है। है कि नहीं?

(Daily Chhattisgarh)   

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