दूसरे देशों के लोगों पर नस्लीय हमलों के पीछे है न्यूटन का एक सिद्धांत...

16 जुलाई 2026  

 

ब्रिटेन में अभी घर में सोती हुई एक सिख युवती की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। घर घुसकर इतने खूनी तरीके से चाकूओं के वार करने वाले 44 साल के एक व्यक्ति, डेनियल सीन को गिरफ्तार कर लिया गया है। परिवार का कहना है कि इस युवती को पिछले कुछ समय से नस्लीय हिंसा की धमकियां दी जा रही थीं। सिख संगठनों ने इस हमले को हेट क्राईम से जोड़ा है, जो कि ब्रिटेन में बढ़ते ही चले जा रहे हैं। 2025 में ब्रिटेन और वेल्स में हेट क्राईम की एक लाख सैंतीस हजार घटनाएं हुई हैं। इसी तरह अमरीका में पिछले पांच बरस में नस्लीय हेट क्राईम साठ फीसदी से ज्यादा बढ़े हैं। कल की ही अमरीका की एक अलग घटना में एक मॉल में एक भारतीय मुस्लिम से उसका देश और उसका धर्म पूछकर 48 बरस के पीटर माइकल ने चाकू के 15 वार किए, और वह बुरी तरह से जख्मी हाल में अस्पताल में है। पीटर ने धर्म के कारण, मुस्लिमों की मारने की नीयत से यह हमला करना मंजूर किया है।

लोगों को याद होगा कि अभी दो बरस पहले जब बांग्लादेश में जनआंदोलन के बाद शेख हसीना की सरकार सत्ता से उखाड़ फें की गई, तो उनके हिंदुस्तान के साथ गहरे ताल्लुकात की वजह से वहां हिंदुस्तानियों पर, खासकर हिंदुओं पर हमले बहुत हुए। मंदिरों पर, रामकृष्ण मठ, इस्कॉन के मंदिर, सभी निशाने पर आए। पश्चिम के बहुत से देशों में मुस्लिम देशों से वहां गए हुए शरणार्थियों, अवैध घुसपैठियों, और कानूनी रूप से बसे हुए लोगों पर हमले बढ़े क्योंकि उनमें से कुछ लोग उन देशों में होने वाले नस्लीय हमलों में हमलावर थे। भारत के लोगों पर कनाडा, अमरीका, और दूसरे कुछ पश्चिमी देशों में हमले बढ़ते जा रहे हैं। रूस में 2025 में 350 भारतीय छात्रों से नस्लीय भेदभाव किया गया, या उन्हें हिंसक धमकियां मिलीं। अभी के आंकड़े बतलाते हैं कि 2014 से 2020 के बीच विदेशों में हिंदुस्तानियों पर होने वाले नस्लीय हमलों में असली उछाल 2019 के बाद आया। रोजगार के लिए जो भारतीय खाड़ी के देशों में, सऊदी अरब, ओमान, कतर, यूएई जाते हैं, वहां उनके साथ भेदभाव, और नस्लीय प्रताडऩा की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। खबरों में तो सिर्फ किसी गंभीर हिंसक हमले, या मौत की बात ही आती है, लेकिन असल जिंदगी में कदम-कदम पर लोगों को भेदभाव झेलना पड़ता है, नफरत झेलनी पड़ती है। ऐसे बहुत से वीडियो आते रहते हैं जिनमें पश्चिमी, अंग्रेजीभाषी देशों में भारतीयों को गालियां दी जा रही हैं। इसके साथ-साथ पाकिस्तान के लोगों को भी बहुत से देशों में भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

महान वैज्ञानिक न्यूटन का एक सिद्धांत है, हर क्रिया की बराबर, और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। इसे भौतिक विज्ञान में न्यूटन का गति का तीसरा नियम कहते हैं। जैसे, जब बंदूक से गोली आगे निकलती है, तो उस क्रिया की प्रतिक्रिया में बंदूक पीछे की तरफ कंधे पर झटका मारती है। जब लोग नाव से किनारे की तरफ कूदते हैं, तो उनके पैर नाव को पीछे की तरफ धकेलते हैं। इसी सिद्धांत पर रॉकेट बनाए जाते हैं, जो नीचे से बहुत सारी गर्म गैस छोड़ते हैं, और उसकी प्रतिक्रिया में रॉकेट ऊपर जाते हैं। 

पाकिस्तान में जिस तरह ईशनिंदा का आरोप लगाकर हर बरस किसी न किसी ईसाई को सार्वजनिक रूप से भीड़ मार डालती है, उसका असर भी दूसरे देशों में पाकिस्तानियों पर पड़ता है। भारत में ही मुस्लिमों की भीड़त्या के कई मामले हुए हैं, ईसाईयों से देश के कई राज्यों में भारी हिंसा हो रही है, भारी भेदभाव हो रहा है। ऐसी हर क्रिया की अनिवार्य और बराबर प्रतिक्रिया पाकिस्तान या हिंदुस्तान के लोगों को दूसरे देशों में झेलनी पड़ती है। अपने देश में तो बहुसंख्यकवाद चल सकता है, बहुसंख्यक आबादी की हिंसा को नवसामान्य मान लिया जा सकता है, लेकिन दुनिया के दूसरे देश ऐसी घटनाओं को अनदेखा नहीं करते हैं। और जिस तरह के नफरती लोग हिंदुस्तान या पाकिस्तान में हैं, वैसे नफरती लोग दुनिया के दूसरे देशों में भी हैं। आज अमरीका, जर्मनी, इटली, पोलैंड, फ्रांस, जैसे बहुत से देश हैं जहां नस्लवाद का एक नया सैलाब लोगों को भिगा रहा है। ऐसे में ये नफरती तबका दूसरे देशों में उनकी राष्ट्रीयता या उनके धर्म के लोगों की हिंसा को भी देखता है, और उसकी प्रतिक्रिया उन देशों में होती है। स्थानीय स्तर पर नस्लीय, धार्मिक, या साम्प्रदायिक हिंसा करने वाले लोग अधिकतर वे रहते हैं, जिन्हें दुनिया की दूसरी संस्कृतियों में जाकर कभी जीना-खाना नहीं पड़ता। अपने ही कुएं में पूरी जिंदगी गुजार देने वाले लोगों को इस बाद की परवाह नहीं रहती कि उनके धर्म, उनके देश के लोगों के साथ दुनिया के बाकी देशों में क्या होगा। किसी भी देश में बहुसंख्यकवाद की ताकत से लैस जो नफरती लोग हिंसा करते हैं, वे आमतौर पर इस लायक भी नहीं रहते कि कभी वे दूसरे देश जाने का सपना भी देखें। अगर वे ऐसा सपना देखने के काबिल होते, तो उनका सपना दूसरे देशों में होने वाली प्रतिक्रिया की खबरों से टूट जाता। लेकिन अपने-अपने देश में ऐसी हिंसा करने वाले लोग उन सपनों से मुक्त रहते हैं, उनके परिवार के लोग भी उन देशों में बसे हुए नहीं रहते, और न्यूटन के विज्ञान से तो उनका लेना-देना वैसे भी नहीं रहता, इसलिए उन्हें हिंसा करते हुए न कोई फिक्र रहती, न कोई आशंका रहती।

आज पल-पल खबरों के वजह से पूरी दुनिया एक गांव से भी छोटी हो गई है। ऐसे में लोगों को अपने देश में हिंसा जारी रखते हुए दूसरे देश से वहां हो रही अपने लोगों पर हिंसा का विरोध करने का कोई नैतिक हक तो नहीं रहता। हर देश के लोगों को यह याद रखना चाहिए कि किसी रंग, धर्म, या राष्ट्रीयता पर उनकी जमीन पर होने वाले हमले उनके देशवासियों पर, स्वधर्मी लोगों पर दूसरे देशों पर खतरा बनते हैं। इसके साथ-साथ आज कोई भी जिम्मेदार देश हिंसक देशों, और धर्मों के लोगों को वीजा देने के पहले कई बार हिचकता है। अब तो अधिकतर विकसित देशों ने यह इंतजाम कर लिया है कि किसी की सोशल मीडिया प्रोफाईल देखे बिना उसे वीजा नहीं देना। ऐसे में नफरती लोग अपने बाकी जिंदगी की संभावनाएं भी खोते जा रहे हैं। यह सब क्रिया की प्रतिक्रिया ही रहेगी, और जिन समझदार देशों में वैज्ञानिक सोच कायम है, वहां पर तो लोग ऐसे खतरे भांप भी सकते हैं, जिन देशों में वैज्ञानिक सोच का गला नफरती-धर्मांधता ने घोंट दिया है, वहां लोगों को खतरे समझ नहीं आते।

(Daily Chhattisgarh)   

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