29 जुलाई 2026
जंतर-मंतर को लेकर पहले तो पुलिस कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट तुरंत कुछ सुनना नहीं चाहती थी, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की एक जुबानी टिप्पणी चारों तरफ घूमती रही कि उनके पास इस जुबानी जिक्र को सुनने को समय नहीं है, बाद में उन्होंने मीडिया की रिपोर्टिंग को गलत करार दिया, और कहा कि उनके सामने कोई याचिका नहीं आई थी, एक वकील ने सिर्फ जिक्र किया था जिस पर वे सुनवाई नहीं कर सकते थे। इस तरह वे भारत के ऐसे पहले मुख्य न्यायाधीश हो गए हैं जिन्हें दस हफ्तों के भीतर अपनी जुबानी टिप्पणियों के लिए दो बार मीडिया पर गलतबयानी की तोहमत लगानी पड़ी। अब जब जंतर-मंतर पर, और संसद की राह पर दिल्ली पुलिस ने निहत्थे और लोकतांत्रिक आंदोलनकारियों पर जो हमले किए, जिस तरह से लाठियों से उनके सिर और पैर तोड़े, जिस तरह पैलेट गन के छर्रे लोगों के बदन में घुसे मिल रहे हैं, और जिस तरह बिहार में एके-47 नाम की असॉल्ट रायफल से पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर गोलियां चलाई हैं, उन सब पर जब बहुत से लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, तब सुप्रीम कोर्ट ने उसे सुनना तय किया, दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा, लेकिन राहत महज इतनी दी कि जिन बेदाग लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उन्हें छोड़ा जाए।
अब किसी आंदोलन में शामिल लोगों में बेदाग किसे करार दिया जाए? किसी की अपने पड़ोसी से कोई झड़प हुई हो, और पुलिस में एक मामला दर्ज हो, किसी का सडक़ पर किसी से झगड़ा हुआ हो, और उसका मामला दर्ज हो, तो वह भी पुलिस की जुबान में बेदाग नहीं कहलाएगा। देश की राजधानी में कई विश्वविद्यालय हैं, और लाखों छात्र पढ़ते हैं, ऐसे में छात्र आंदोलन चलते ही रहते हैं, किसी और आंदोलन में जिन लोगों के खिलाफ पुलिस ने जुर्म दर्ज कर लिया होगा, उन लोगों को भी पुलिस अब बेदाग मानने से इंकार कर देगी। सुप्रीम कोर्ट का एक शब्द सैकड़ों-हजारों नौजवानों पर भारी पड़ सकता है, और जो दिल्ली पुलिस छात्रों पर पैलेट गन चला रही है, छात्राओं के बदन में लाठी घुसा रही है, महिला को थप्पड़ मार रही है, वह पुलिस हर किसी को दागदार साबित करने पर जुट जाएगी। अब सवाल यह उठता है कि पहले किसी के खिलाफ कोई मामला दर्ज रहा होगा, लेकिन वे अगर जंतर-मंतर पर शांत हैं, तो उन्हें बेदाग होने की शर्त से क्यों लादा जा रहा है? यह तो सुप्रीम कोर्ट इनकी बातों को सुनता भी नहीं, लेकिन जब बड़े-बड़े वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के अहाते में ही कैमरों के सामने खड़े होकर छात्रों के मुद्दों का समर्थन किया, आंदोलन के लोकतांत्रिक-संवैधानिक अधिकार को गिनाया था, और यह सब करने के बाद राष्ट्रगान भी गाया था, तो वकीलों का यह रूख देखकर चीफ जस्टिस का एक-दो दिन पहले का रूख पिघला, और इस बार छात्रों पर जुल्म करने वाली दिल्ली पुलिस पर सुनवाई हुई। यह तो अदालत के बाहर भी अभी साबित हो चुका है कि राजधानी के एक बड़े पुलिस अफसर के आदेश पर आंदोलनकारियों पर पैलेट गन चलाई गई थी, जो कि शायद सरकार के ही नियमों के खिलाफ थी। यह तो अगर आंदोलनकारियों के बदन को छलनी की तरह छेदने वाले छर्रों के फोटो और वीडियो मौजूद नहीं रहते, खोजी पत्रकारों ने अगर पुलिस का यह आदेश ढूंढ नहीं निकाला होता, तो पुलिस तो पैलेट गन की बात मानने को तैयार ही नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट का रूख बहुत ही निराश करता है। जजों के अपने राजनीतिक पूर्वाग्रह हो सकते हैं, चीफ जस्टिस को इस बात का मलाल हो सकता है कि उनके कहे हुए एक शब्द, कॉकरोच को लेकर इस देश के इतिहास का एक खासा बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया, और इस आंदोलन के चलते हर दिन देश और दुनिया इस बात का जिक्र भी कर रहे हैं कि यह तिलचट्टा किस बिल से निकला है। आमतौर पर आंदोलनों को सरकारें कुचलने की कोशिश करती हैं, और अदालतें उनमें आंदोलनकारियों के अधिकार बचाने की। इस बार उल्टा हुआ है, आंदोलनकारियों को पहली राहत सरकार से मिली है, उसकी चाहे जो भी वजह रही हो, और सुप्रीम कोर्ट उसी शहर में बैठे हुए भी शांतिपूर्ण, निहत्थे, लोकतांत्रिक आंदोलनकारी नौजवानों को कोई भी राहत देने में पिछड़ गया। अब जब खींचतान कर सुप्रीम कोर्ट इस आंदोलन में गिरफ्तार लोगों के बारे में सुनवाई कर भी रहा है, एक राहत सी दिखती हुई कोई चीज दे भी रहा है, तो भी वह बेदाग लोगों को ही छोडऩे की एक ऐसी शर्त जोड़ रहा है जिसका बेजा इस्तेमाल करने का भरपूर मौका और अधिकार दिल्ली पुलिस को मिल जाएगा। इतने जुल्म ढाने वाली दिल्ली पुलिस के हाथ में इस तरह का एक हथियार देना सुप्रीम कोर्ट की एक गलत उदारता है, और आंदोलनकारी कॉकरोच जनता पार्टी ने यह आपत्ति ठीक ही की है कि ऐसी शर्त जोडक़र सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का साथ दिया है। यह बड़ी अजीब सी नौबत है कि एक तरफ सरकार आंदोलनकारियों से बातचीत का लोकतांत्रिक तरीका दिखाकर अपने मंत्री का इस्तीफा ले रही है, और दूसरी तरफ अदालत इन्हीं आंदोलनकारियों में से बहुत से लोगों के खिलाफ कड़ाई बरतने का हथियार पुलिस को दे रही है।
हिन्दुस्तान की अदालतों को कॉकरोच या तिलचट्टा शब्द से एक जाहिर
परहेज हो सकता है, लेकिन ऐसा परहेज अगर अदालती रूख में झलकेगा, तो इससे अदालत का कोई
लोकतांत्रिक सम्मान नहीं बढऩे जा रहा। हम अदालत को संविधान से परे सिर्फ जनभावनाओं
पर काम करने जैसी कोई बात नहीं सुझा रहे, लेकिन जब सत्ता की पूरी ताकत किसी भी निहत्थे
और शांत आंदोलनकारियों पर टूट पड़ती है, तो लोकतंत्र तो अदालत की तरफ ही देखता है कि
वह अपनी जिम्मेदारी पूरी करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बड़ा निराश किया है।
बहुत देर से इस मामले को सुना है, और बहुत कम राहत दी है। टू लेट, एंड टू लिटिल। लोकतंत्र
में संसद, अदालत, और सरकार के बीच शक्तियों का संतुलन इसीलिए बनाया गया था कि जब कभी
इनमें से कोई एक बददिमाग हो जाए, तो बाकी दो के पास उसे काबू में करने की ताकत रहे।
इस मामले में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था कम से कम कागजों पर तो अमरीका के आज के
बददिमागी के शिकार लोकतंत्र के मुकाबले बहुत अच्छी है, दूसरी तरफ वह ब्रिटेन के शाही
घराने से ग्रस्त लोकतंत्र से भी बहुत अच्छी है। लेकिन यह तभी अच्छी है, जब लोकतंत्र
के ये तीनों स्तंभ अपनी-अपनी जगह पर रीढ़ की हड्डी ठीक से सीधी रखकर अपनी जिम्मेदारी
पूरी करें। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो फिर इस लोकतंत्र में संतुलन तीनों में से
किसी एक स्तंभ की तरफ झुक जाने का खतरा रहता है, अमूमन सरकार की तरफ। भारत की न्यायपालिका
को देश की जनता को इतना निराश नहीं करना चाहिए कि वह लोकतंत्र की रक्षा करने में अपनी
जिम्मेदारी भी नहीं निभा पा रही है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें