गाय को लेकर शुरू हुई हिंसा अब लोकतंत्र के साथ हिंसा में तब्दील

संपादकीय
20 जुलाई  2016
गुजरात में गौभक्तों ने जिस तरह मरे हुए जानवरों की खाल निकालने वाले दलितों को बुरी तरह पीटा है, उसके जवाब में गुजरात में भी आंदोलन चल रहा है, और देश भर में दलितों के बीच खासा गुस्सा सामने आ रहा है। कल मुंबई में लाखों दलित अंबेडकर के एक स्मारक को गिराने के खिलाफ अनायास ही नहीं जुट गए, उनके बीच एक बड़ी बेचैनी चल रही है। यह समझने की जरूरत है कि गाय को बचाने के नाम पर मरी हुई गाय की खाल उतारने वाले लोगों को अगर मारा जाएगा, तो यह बात तो पिछले दो दिनों से उठ गई है कि क्या इस देश के दलित कुछ दिनों के लिए अपने परंपरागत पेशों को बंद करके देश को यह बता दें कि बिना दलितों के गैरदलितों का काम कैसा चलेगा।
आज देश भर में बिना किसी आरक्षण के नाली-गटर से लेकर पखाने साफ करने तक का काम सौ फीसदी दलितों के कंधों पर ही है, मरे हुए जानवरों की लाशों का निपटारा दलितों पर ही है, और रोज की जिंदगी के बहुत से दूसरे काम दलितों के बिना चल नहीं सकती, और ये काम ऐसे हैं जिनमें गैरदलितों को सौ फीसदी आरक्षण भी दे दिया जाए, तो भी उनमें से कोई ये काम करने नहीं आएंगे। ऐसे देश में आज एक सवर्ण और ब्राम्हणवादी सोच के हिंसक और हमलावर तेवर गाय काटने के खिलाफ चारों तरफ हिंसा कर रहे हैं, लेकिन उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि महाराष्ट्र में जो किसान खुद आत्महत्या कर रहे हैं, वे गैरजरूरी रह गए जानवरों के लिए खाना कहां से लाएं, उन्हें बेचने पर रोक है, तो फिर उनका आखिर क्या करें? और यह हिंसा बढ़ते-बढ़ते कई प्रदेशों में कानून की शक्ल ले चुकी है, और अब इसका फैलाव मरी गायों की खाल निकालने वाले दलितों तक हो चुका है।
एक आक्रामक सवर्ण सोच ने जिस तरह गोहत्या पर रोक लगाकर यह सोचा था कि इसका निशाना सिर्फ अल्पसंख्यक होंगे, उन्हें पता नहीं इस बात का अंदाज था या नहीं, है या नहीं, कि गाय खाने वाले लोगों में दलित और आदिवासी बड़ी संख्या में हैं। उनके अलावा हिन्दू समाज की दूसरी कई जातियों के लोग भी गाय या गोवंश के जानवरों का मांस खाते आए हैं, और बड़े जानवर का मांस गरीब तबकों के लिए अधिक प्रोटीन पाने का एकमात्र सस्ता विकल्प है। ऐसे में हिन्दू धर्म के एक तबके की सोच को जिस तरह कानून बनाकर, और उससे भी ऊपर, कानून अपने हाथ में लेकर बाकी लोगों पर थोपा जा रहा है, उससे देश बंट रहा है। और इस बंटवारे में कोई सरहद नहीं दिख रही है, लेकिन अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, और गरीबों को यह लग रहा है कि उनके खानपान पर देश का एक बहुत छोटा सा तबका काबू कर रहा है, और यह बेचैनी छोटी नहीं है। देश के कई हिस्से ऐसे हैं जहां पर ये तबके मिलकर वोटरों का भी बहुत बड़ा हिस्सा हैं, और हो सकता है कि अगले चुनाव में देश-प्रदेश में ऐसे हिंसक तेवरों की वजह से भाजपा और उसके साथियों को खासा नुकसान झेलना पड़े।
लेकिन चुनाव में किसको नुकसान होता है, यह हमारी कोई बड़ी फिक्र नहीं है, हमारी फिक्र यह है कि चुनाव के पहले आज की तारीख में देश के ताने-बाने को किन बातों से नुकसान पहुंच रहा है। और देश के धार्मिक या जातीय ढांचे को पहुंचने वाला ऐसा नुकसान किसी एक चुनाव से सरकार बदलने से भी नहीं सुधर पाएगा, और विविधताओं वाले इस देश में गाय को लेकर इतिहास और हकीकत को झुठलाकर जिस तरह का धार्मिक उन्माद फैलाया जा रहा है, वह लोकतंत्र के लिए आत्मघाती है। मतदाताओं के बहुमत से देश और प्रदेश में सरकारें बन जाना एक बात है, लेकिन यह एक बिल्कुल ही अलग बात है कि इतिहास को इस हद तक, इस तरह न बदल दिया जाए कि भविष्य का वर्तमान भी तबाह हो जाए।
आज गोवंश के एक निहायत गैरजरूरी मुद्दे को देश का सबसे जरूरी मुद्दा बनाकर इस हद तक उन्माद फैलाया जा रहा है कि मानो मोदी की किसी और योजना की देश को जरूरत नहीं है, और गोबर और गोमूत्र से सारा देश चल जाएगा। यह सोच देश का इतना लंबा नुकसान कर रही है कि उतने लंबे वक्त के लिए किसी पार्टी को सरकार चलाने का हक भी नहीं मिलता है।

बस्तर में मुठभेड़-मौत की न्यायिक जांच तो ठीक है लेकिन जज बाहरी होना था

संपादकीय
19 जुलाई  2016
बस्तर में एक युवती की पुलिस मुठभेड़ में बताई गई मौत, और उसे नक्सली बताने के बाद उसके परिवार और आदिवासी समुदाय ने हाईकोर्ट तक दौड़ लगाई, और उसका दुबारा पोस्टमार्टम हुआ, और अब हाईकोर्ट ने बलात्कार और हत्या के आरोप वाले इस मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। इसके पहले भी हाईकोर्ट ने बस्तर में पदस्थ वहां के मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों से पोस्टमार्टम करवाया था, अब न्यायिक जांच भी बस्तर के ही एक जिला न्यायाधीश करेंगे।
यह एक अच्छी बात है कि अदालत बस्तर से आने वाले बेबस आदिवासियों के ऐसे मुद्दों पर सीधे दखल देकर मेडिकल जांच या न्यायिक जांच करवा रही है, लेकिन इसके साथ-साथ फिक्र की एक बात यह भी है कि इसके लिए बस्तर में तैनात लोग ही लगाए जा रहे हैं। जो लोग बस्तर के हालात से वाकिफ हैं, वे जानते हैं कि वहां पर इस कदर फौलादी पुलिस-राज चल रहा है कि बाकी विभाग और अदालतों में भी पुलिस का दखल है। अभी कुछ ही अरसा हुआ है कि बस्तर के एक जज ने शिकायत की थी कि किस तरह प्रशासनिक अधिकारी उन्हें फोन पर धमका रहे हैं, और इसके बाद शायद किसी और मामले में इस जज को ही बर्खास्त कर दिया गया। जिले के अफसर और इस जज के बीच बातचीत बताई जा रही एक टेलीफोन रिकॉर्डिंग भी सामने आई थी, और हमारे सरीखे लोगों को यह उम्मीद थी कि हाईकोर्ट इसका नोटिस लेकर इसकी जांच का हुक्म देगा क्योंकि यह न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र में कार्यपालिका की एक भयानक दखल का मामला दिख रहा था।
बस्तर में होने वाली किसी भी जांच को लेकर हम हाईकोर्ट से इस बात की उम्मीद कर रहे थे कि वहां पोस्टमार्टम दुबारा करवाना हो, या कि वहां कोई न्यायिक जांच करवानी हो, इसके लिए बाहर के अफसरों और जजों से ही काम लिया जाना चाहिए। बस्तर में जिसके चाहे उसके टेलीफोन टैप होते हैं, हर किसी के कॉल डिटेल्स निकलवाने का दावा पुलिस खुलेआम करती है, और सोशल मीडिया पर पुलिस की दी हुई धमकियां भी तैरती रहती हैं। ऐसे में बस्तर में तैनात लोग जाहिर है कि पुलिस के ऐसे राज के भीतर जी रहे हैं, और भ्रष्टाचार से परे भी उनकी निजी जिंदगी की कई ऐसी बातें हो सकती हैं जिन्हें रिकॉर्ड करके पुलिस उन पर एक दबाव बना सकती है, या बनाती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट को बस्तर में तैनात जिला जज से जांच करवाने के बजाय बाहर के जज से जांच करवाना था।
बस्तर के हालात पर लिखने को बहुत कुछ है, लेकिन ये तमाम वे बातें हैं जिन पर हम बार-बार लिखते आए हैं, और इस राज्य में उन बातों का असर खत्म सा हो गया है। अभी बस्तर से दिल्ली जाकर पे्रस कांफे्रंस लेने वाले कुछ पत्रकारों के खिलाफ बस्तर के एक पुलिस अफसर ने एक वॉट्सएप गु्रप में जिस तरह की धमकी लिखकर पोस्ट की है वह हक्का-बक्का करने वाली है। उसने इन लोगों को चोर और नक्सलियों के पालतू कुत्ते लिखते हुए याद दिलाया है कि ये लोग डंडा भूल गए हैं, और न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। ऐसी बात लिखने का मतलब राज्य सरकार चाहे न भी जानना चाहे, लेकिन कोई भी जागरूक न्यायपालिका इस पर नोटिस जारी करके इस अफसर से पूछ सकती है कि यह धमकी किसके लिए है, और किसे मिटाया जाएगा? बस्तर का यह सिलसिला खतरनाक है, और दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि जिस युग में भी, आदिवासियों के साथ जिस देश में भी ज्यादातियां हुई हैं वहां की सरकार के सभ्य और लोकतांत्रिक होने के बाद भी उन आदिवासियों से माफी मांगी गई है।

प्रदेश में फिजूलखर्ची और बर्बादी दोनों रोकनी चाहिए

संपादकीय
18 जुलाई  2016
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में महल की तरह बनाए गए म्युनिसिपल के मुख्यालय के छत की तस्वीर आई है जहां पर स्कूली बच्चियों को सरकारी योजना के तहत बांटने के लिए बड़ी संख्या में साइकिलें खरीदी गईं, और किसी वजह से वे छत पर पड़ी रहीं, और अब बुरी तरह से जंग लगकर वे खराब हो रही हैं। यह प्रदेश अपनी खनिज कमाई के चलते बाकी कई प्रदेशों के मुकाबले कुछ बेहतर अर्थव्यवस्था वाला तो है, लेकिन इसे चलाने वाले लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि इस तरह की बर्बादी करने के लिए पैसा प्रदेश के पास नहीं है। अभी विधानसभा में सरकार यह जवाब दे ही रही है कि सैकड़ों करोड़ रूपए की मजदूरी ग्रामीण मजदूरों को देना बकाया है, और केन्द्र सरकार से रकम मिलने के पहले वह चुकारा मुमकिन नहीं है। दूसरी तरफ इस तरह की बर्बादी कोई अकेली बात नहीं है। छात्राओं के लिए साइकिलों का यह हाल है, और प्रदेश में शायद ही कोई ऐसी स्कूल हो जहां पर एक या अधिक कमरे टूटे हुए फर्नीचर से भरे हुए न हों। फर्नीचर खरीदे जाते हैं, और कुछ महीनों के भीतर ही वे टूट-फूट जाते हैं। कमोबेश ऐसा ही हाल सरकार के कई दूसरे विभागों का है, जहां पर महंगे दाम पर खरीदी हो रही है, कहीं पर दवा खराब हो रही है, तो कहीं चिकित्सा केन्द्रों में जांच की मशीनों में पड़े-पड़े जंग लग रहा है। कृषि विभाग से जुड़े कुछ दफ्तरों में खेती की मशीनें जंग खा रही हैं, और बीज छांटने की मशीन हो, या कोई और मशीन हो, खरीदने तक सबकी दिलचस्पी रहती है, उसके बाद उसका इस्तेमाल न हो, तो भी किसी को फिक्र नहीं है।
राजधानी के नगर निगम को देखें, तो उसकी इमारत को लंबा-चौड़ा खर्च करके एक महल की शक्ल का बनाया गया है। सरकार में बैठे लोगों को ऐसी फिजूलखर्ची बड़ी सुहाती है, और बहुत से लोगों को यह भी लगता है कि उनकी गाडिय़ां बड़ी हों, उनके दफ्तर बड़े हों, उनके बंगले बड़े हों, उनके कर्मचारी अधिक हों, और किफायत तो मानो सरकार को छू नहीं गई है। नतीजा यह है कि इसी म्युनिसिपल को लेकर अखबारों में हर कुछ महीनों में यह लिस्ट छपती है कि यहां के कितने कर्मचारी राज्य के किस-किस नेता और अफसर के बंगलों पर तैनात हैं, और उनका पैसा जनता की जेब से जाता है।
एक तरफ तो सरकारी योजनाओं और सरकारी सामान की बर्बादी, और दूसरी तरफ सरकारी कामकाज में रईसी की फिजूलखर्ची। इन दोनों को मिलाकर राज्य सरकार का मिजाज ऐसा हो गया है कि किसी दिन अगर किफायत की जरूरत पड़ी, तो सत्ता को समझ ही नहीं आएगा कि किस खर्च को घटाया जाए। और आज भी ऐसा नहीं है कि प्रदेश के गरीबों की सारी जरूरतें पूरी हो रही हैं। आज भी शहर से लेकर गांव तक गरीब की जिंदगी मुश्किल है, और राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में भी कमरों की कमी से, बिस्तरों की कमी से मरीजों के फर्श पर पड़े रहकर इलाज कराने की तस्वीरें अखबारों में छपती रहती हैं। ऐसे प्रदेश में जहां पर मजदूरों का सैकड़ों करोड़ का भुगतान बकाया है, सरकार में पैसों की इतनी बर्बादी रोकना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। इस राज्य की कमाई का अधिकांश श्रेय तो धरती को है जो कि यहां से कोयला, लोहा, और चूना-पत्थर जैसे खनिज देती है। उस कमाई से परे भी इस राज्य ने बहुत कम जोड़ा है, और खर्च ही खर्च सीखा है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह वित्त मंत्री भी हैं, और उन्हें फिजूलखर्ची रोकने, और बर्बादी रोकने का एक अभियान चलाना चाहिए। यह बात ठीक है कि आज लोहे-कोयले की कमाई से यह प्रदेश खासी सहूलियत वाला है, लेकिन जनता की जरूरतें अभी पूरी होने से कोसों दूर है, और ऐसे में लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी किफायत की होनी चाहिए।

राजा और प्रजा के बीच मीडिया का एकाधिकार खत्म, अब सीधा संवाद

संपादकीय
17 जुलाई  2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हर कुछ हफ्तों में अपने मन की बात रेडियो पर कहना शुरू किया, तो भूला-बिसरा रेडियो फिर खबरों में आया। इसके बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने हर महीने रेडियो पर प्रदेश की जनता से बातचीत शुरू की, तो ऐसे हर प्रसारण में कई खबरें भी निकलने लगीं, और लोगों का सवाल पूछना भी शुरू हुआ। इसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज इंटरनेट पर लोगों के सवालों के जवाब दिए, और अपने मन की बातें भी कहीं। पिछले कुछ बरसों से भारतीय राजनीति में सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से आम जनता नेताओं से, और सार्वजनिक जीवन के बाकी लोगों से सीधे सवाल पूछने लगी है, और बहुत से सवालों के या तो जवाब मिलने लगे हैं, या फिर यह उजागर होने लगा है कि इन सवालों के जवाब नहीं दिए जा रहे हैं। कुछ अरसा पहले तक ऐसे लोगों से सवाल पूछने का हक संसद या विधानसभा के भीतर वहां के सदस्यों का होता था, और इन सदनों के बाहर मीडिया का होता था। लेकिन अब ये एकाधिकार पूरी तरह धराशायी हो चुके हैं, और अब जनता को ऐसे ईश्वरों तक पहुंचने के लिए किसी पुजारी की जरूरत नहीं पड़ती है।
लोकतंत्र में जनता से सीधे बातचीत बहुत मायने रखती है, और लोगों के खुले सवालों का सामना करने के लिए थोड़ा सा हौसला भी लगता है। अब यह एक अलग बात है कि कौन से नेता कितने सवालों और कैसे सवालों का जवाब देने की हिम्मत रखते हैं, और कौन है जो महज अपने मन की बात कहकर बात खत्म कर देते हैं। लेकिन यह सिलसिला बहुत नया भी नहीं है। हिन्दुस्तान में आजादी के पहले के दिनों को देखें तो गांधी जिन अखबारों के संपादक थे, हरिजन, और यंग इंडिया नाम के इन अखबारों में वे कई बार या अक्सर लोगों के भेजे गए सवालों के जवाब देते थे, और किसी गांव का सरपंच भी फिलीस्तीन जैसे मुद्दे पर गांधी की सोच का जान पाता था। लोग पोस्टकार्ड पर सवाल पूछते थे, और गांधी अखबारों में उनके जवाब देते थे। आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने देश के तमाम मुख्यमंत्रियों को शायद हर कुछ महीनों में, या हर महीने, चिट्ठी लिखना शुरू किया था जिसमें वे देश-प्रदेश के मुद्दों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों तक अपनी बात लिखते थे। लिखने का शौक इस तरह रहता था कि नेहरू जेल में रहते हुए बाहर अपनी बेटी इंदिरा के नाम जो चिट्ठियां लिखते थे, वे समकालीन विश्व मुद्दों पर एक गहरी समझ वाली शिक्षा भी रहती थी, और बाद में वे चिट्ठियां किताबों की शक्ल में भी सामने आईं।
वैसे आज की सार्वजनिक और सामाजिक हवा बड़ी जहरीली और दुर्भावना से भरी हुई भी है। लोग सचमुच के सवाल पूछने के बजाय, तरह-तरह की झूठी तस्वीरें गढ़कर अफवाह फैलाने को अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता की जिम्मेदारी समझते हैं, और इसके लिए वे कितने भी घटिया स्तर तक उतर आते हैं। ऐसी हवा के बीच यह एक अच्छी बात है कि देश-प्रदेश के नेता लोगों को सवालों के जवाब दें, या कम से कम अपनी बातें खुलकर कहें। यह एक अलग बात है कि इससे हमारी तरह के अखबार वालों का राजा-प्रजा के बीच का हरकारा बनने का एकाधिकार खत्म हो गया है, और आज तो देश का कोई मीडिया नेताओं और बाकी लोगों के सोशल मीडिया पन्नों पर जाकर वहां लिखी गई बातों से खबरें बनाए बिना रह नहीं पाता। आज सोशल मीडिया की वजह से लोगों को एक यह मौका भी मिला है कि जो सवाल पूछे नहीं जा सकते, या कि जो सवाल सुने नहीं जा रहे, तो भी लोग सोशल मीडिया पर उन सवालों को उछालकर एक असुविधा तो खड़ी कर ही सकते हैं। आगे-आगे देखें होता है क्या।

धर्म के नाम पर नहीं, धर्म के लिए लहू बहाया जा रहा है

संपादकीय
16 जुलाई  2016
हिन्दुस्तान में आज सुबह हो रही और यह खबर आने लगी कि किस तरह तुर्की में एक फौजी बगावत चल रही है और देश के बाहर सफर पर से राष्ट्रपति ने जनता को कहा कि वे सड़कों पर आकर इन बागियों का विरोध करें, और लोग निकलकर टैंकों के सामने खड़े हो गए। कुछ घंटों के भीतर अब ऐसा लग रहा है कि यह विद्रोह काबू में आ गया है, लेकिन इसके पीछे की साजिश में राष्ट्रपति ने एक इस्लामी धर्मगुरू फतहुल्लाह गुलेन की तरफ इशारा किया है जिनके कि लाखों अनुयायी हैं, डेढ़ सौ से ज्यादा देशों में उनके स्कूल हैं, और अरबों डॉलर का उनका कारोबार है। पिछले दशकों से वे अमरीका में बस गए हैं, और ऐसा माना जाता है कि वे तुर्की की सरकार के खिलाफ बगावत भड़काते रहते हैं।
जिस वक्त आज सुबह तुर्की से यह खबर आ रही थी, उसी वक्त कल सुबह फ्रांस में एक इस्लामी आतंकी ने एक ट्रक लोगों के जश्न पर चढ़ा दी, और कोशिश करके अधिक से अधिक लोगों को कुचलकर मारा। इस हमले में 75 लोग मारे गए, और यह इस्लामी आतंक का एक नया तरीका सामने आया जिसमें बिना किसी हथियार या विस्फोटक के, रोज के इस्तेमाल की एक ट्रक से इतने लोगों को मार डाला गया। आज दुनिया के सबसे खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने 2014 में एक संदेश जारी किया था जिसमें कहा गया था कि अगर आप बम नहीं फोड़ सकते, या गोली नहीं चला सकते, तो उन पर अपनी कार चढ़ा दो, ऐसा माना जा रहा है कि यह ताजा हमला इसी बात को मानकर ट्रक से किया गया। दूसरी तरफ हम हिन्दुस्तान में देख रहे हैं कि किस तरह कुछ मुस्लिम संगठन, और कुछ हिन्दू संगठन आतंक में लगे हुए हैं। और हिन्दू संगठनों पर तो यह कार्रवाई केन्द्र की मोदी सरकार के मातहत काम करने वाली देश की सबसे प्रमुख जांच एजेंसी एनआईए कर रही है, और अदालत में इस बात को सुबूतों के साथ रख रही है।
पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक, और पड़ोस के म्यांमार तक धर्म के लिए लगातार हिंसा चल रही है, और इन धर्मों के मानने वाले बाकी लोग यह आड़ लेते हैं कि यह हिंसा धर्म के लिए नहीं है, धर्म के नाम पर है। कहने को यह भी कहा जाता है कि सभी धर्म शांति सिखाते हैं, और कोई भी धर्म हिंसा नहीं सिखाते हैं। लेकिन यह बात हकीकत से कोसों परे है। धर्म खून बिखेरने से परे भी कई तरह की हिंसा करता है। एक समय धर्म सती बनाता था, देवदासी बनाता था, और अपने ही धर्म के भीतर हिंसा की बहुत सारी तरकीबें हिन्दू धर्म से लेकर इस्लामिक स्टेट तक चारों तरफ अच्छी तरह दर्ज हैं। इसलिए धर्म को शांतिप्रिय करार देना महज एक नारा है जिसका कि सच से कोई लेना-देना नहीं है। धर्म की हकीकत यह है कि वह अपने आपको कानून से ऊपर, संविधान से ऊपर, लोकतंत्र और इंसानियत से ऊपर मानता है, और उसका बुनियादी मिजाज अराजकता का है, हैवानियत का है, और हिंसा का है। धर्म में अपने अलावा दूसरे धर्मों को कुचल देने की सोच कूट-कूटकर भरी रहती है, और हम हिन्द महासागर के देशों में चारों तरफ इसके नमूने देख रहे हैं। और जब किसी धर्म के लोगों को, उसके आतंकियों को मारने के लिए दूसरे धर्म के लोग नहीं मिलते, तब वे अपने ही धर्म के लोगों को मारना शुरू कर देते हैं, जैसा कि आज इस्लामी आतंकी कर रहे हैं, उनके मारे हुए लोगों में सौ में से निन्यानबे मुस्लिम ही हैं।
अभी तस्लीमा नसरीन ने एक बात कही थी कि जो बच्चे बचपन से ही धर्मग्रंथ जरूरत से अधिक पढऩे लगते हैं, उनके मां-बाप को सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि आगे चलकर उनके आतंकी होने का खतरा रहता है। यह बात हमारे हिसाब से अधिकतर धर्मों पर लागू होती है, और दुनिया में समझदार लोगों को इस पर सोचने की जरूरत है कि किस तरह धर्म की भूमिका को आस्था तक सीमित रखा जाए, और निजी आस्था को दूसरों की आस्थाओं का खून बहाने जैसा हिंसक बनने से रोका जाए। आज तो चारों तरफ, धर्म के नाम पर नहीं, धर्म के लिए लहू बहाया जा रहा है। 

सानिया मिर्जा की तरह विरोध करना सीखने की जरूरत

संपादकीय
15 जुलाई  2016
हिन्दुस्तान की सबसे कामयाब महिलाओं में से एक, टेनिस की दुनिया की अव्वल दर्जे की खिलाड़ी, सानिया मिर्जा ने अभी दो दिन पहले एक नामी-गिरामी टीवी पत्रकार को एक इंटरव्यू के दौरान बेजुबान कर दिया, और उसे माफी मांगनी पड़ी। इस पत्रकार ने पूछा था कि वे कब बसने वाली हैं, कब मां बनने वाली हैं? इस पर सानिया का कहना था कि वह पत्रकार निराश लग रहा है क्योंकि उन्होंने इस वक्त मां बनने के बजाय दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी बनना चुना है। सानिया ने कहा कि ऐसे कई मौके रहते हैं जब महिलाओं को ही ऐसे सवालों का सामना करना पड़ता है, और आदमियों को ऐसे सवाल कभी नहीं घेरते।
यह अच्छी बात है कि ऐसी बारीक बातचीत के फर्क को जानते और गिनाते हुए सानिया ने एक दिग्गज टीवी पत्रकार को घेर दिया, और माफी मंगवा ली। इसी वक्त देश के कई अलग-अलग हिस्सों में राजनीति और सामाजिक क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएं किसी नेता या अफसर को नालायकी पर सजा के तौर पर चूडिय़ां भेंट कर रही होंगी, और अपनी बातचीत की जुबान में औरत शब्द की जगह आदमी को काफी मान रही होंगी। बहुत सी महिलाएं इस फेर में होंगी कि परिवार की अपने से छोटी महिलाओं का भू्रण परीक्षण करवाकर अजन्मी कन्याओं की हत्या करवा दें, और बहुत सी आस्थावान महिलाएं पुत्र जन्म के लिए तरह-तरह के धार्मिक अनुष्ठान करने में लगी होंगी।
जिस सानिया मिर्जा की वजह से न सिर्फ उसके परिवार का सिर पूरी दुनिया में ऊंचा हुआ है, बल्कि हिंदुस्तान का नाम भी रौशन हुआ है, उस सानिया की जगह अगर कोई सोनू मिर्जा पैदा हुआ होता, और नालायक निकल गया होता तो वह किस काम का रहता? और देश भर में अनगिनत ऐसी लड़कियां हैं जो कि शादी के पहले या शादी के बाद भी अपने मां-बाप का ख्याल रखती हैं, और मां-बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ देने वाले खानदान के चिराग बेटों के मुकाबले उनकी सेवा करती हैं। ऐसे में समाज को महिलाओं के लिए अपना नजरिया बदलना चाहिए, और इसकी शुरूआत खुद महिलाओं को भी करनी चाहिए कि वे अपनी बातचीत में, अपनी भाषा में, अपने उदाहरणों में, कहावतों और मुहावरों में, प्रतीकों में कहीं भी महिला-तबके की कमजोरी न मानें, न बताएं। और इसके लिए यह भी जरूरी रहेगा कि महिलाओं को गैरबराबरी की नौबत आने पर चुप रहने के बजाय विरोध करना होगा, और आसपास के लोगों को याद दिलाना होगा कि उनका दर्जा न सिर्फ बराबरी का है, बल्कि मर्दों को पैदा करने वाली औरतों का भी है।
न सिर्फ हिंदी में, या हिंदुस्तानी जुबानों में, बल्कि दुनिया की बहुत सी दूसरी भाषाओं में भी औरतों के लिए गैरबराबरी और हिकारत का नजरिया रहता है। हम इसी कॉलम में हर कुछ महीनों में इस मुद्दे पर लिखते हैं कि किस तरह हिंदी का नरभक्षी, उर्दू में आदमखोर और अंगे्रजी में मैनईटर हो जाता है, मानो कि किसी शेर या चीते को औरत खाने के लायक भी नहीं रहती है। जब हिरोशिमा में बड़े पैमाने पर लोग मारे जाते हैं, या भोपाल में गैस त्रासदी होती है तो उसे नरसंहार कहा जाता है, मानो कि कोई नारी इसमें मरी ही न हो। इस तरह भाषा का सामाजिक रूख गैरबराबरी का रहते आया है, और जहां-जहां ऐसे शब्द सामने आएं, उनका खुलकर विरोध किया जाना चाहिए।

सहअस्तित्व का महत्व समझने की जरूरत है

संपादकीय
14 जुलाई  2016
अफ्रीकी देश सूडान में खड़े हुए भारी घरेलू तनाव को देखते हुए वहां काम कर रहे सैकड़ों हिन्दुस्तानियों को सुरक्षित वापिस लाने के लिए विदेश राज्यमंत्री, पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह एयरफोर्स के विमानों के साथ वहां पहुंचे हैं, और लोगों को हिफाजत से वापिस लाने में लगे हैं। पिछले दो बरस में कुछ और देशों से हिन्दुस्तानियों को इसी तरह निकालकर लाना पड़ा है क्योंकि खाड़ी के  देशों से लेकर अफ्रीकी देशों तक दसियों लाख हिन्दुस्तानी कारोबारी और कामगार हैं, और उनकी जिंदगी भी इस देश के लिए मायने रखती है, और उनकी कमाई भी। लेकिन ऐसे मौके पर यह भी याद रखने की जरूरत है कि उन देशों के स्थानीय तनाव से अगर मजबूरी में हिन्दुस्तानियों को निकलना पड़े, तो यह अलग बात है, लेकिन बीच-बीच में ऐसा भी हो रहा है कि भारत में किसी अफ्रीकी पर्यटक या छात्र को मार दिया गया, और उसका जवाबी तनाव अफ्रीका के देशों में वहां रह रहे हिन्दुस्तानियों को झेलना पड़ा है। अभी इसी पखवाड़े की बात है कि ऐसे ही एक देश में हिन्दुस्तानियों की दुकानों को जला दिया गया।
लेकिन ऐसी जवाबी हिंसा देश के बाहर ही होती हो, यह जरूरी नहीं है। देश के भीतर भी ऐसी जवाबी हिंसा होती है, और कश्मीर, उत्तर-पूर्व, महाराष्ट्र, यूपी-बिहार में कुछ दूसरे इलाके के लोगों के लिए तनाव होता है, या इन प्रदेशों के लोगों के लिए बाकी प्रदेशों में कहीं तनाव होता है, तो उसकी हिंसक प्रतिक्रिया भी होती है। लोगों को याद होगा कि महाराष्ट्र से उत्तर भारतीयों को भगाने का काम जमाने से शिवसेना के दोनों हिस्से करते आ रहे हैं, उनके खिलाफ हिंसा भी करते आ रहे हैं, और फतवे भी जारी करते आ रहे हैं। पिछले बरस की ही बात है कि कर्नाटक से उत्तर-पूर्व के लोगों को मारकर भगाया गया, और ट्रेनों में भर-भरकर लोग वहां से निकले। भारत जैसे विविधता वाले देश में जाति के आधार पर, धर्म या क्षेत्रीयता के आधार पर, पहरावे और खानपान के आधार पर कई बार ऐसा हिंसक भेदभाव होता है। अभी तीन दिन पहले ही दिल्ली एयरपोर्ट पर मणिपुर की एक युवती से विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने ऐसा बर्ताव किया कि उसे अपनी राष्ट्रीयता साबित करने को कहा गया।
देश के भीतर हो या कि दुनिया के दूसरे देशों में, एक जगह की प्रतिक्रिया दूसरी जगह होती है, एक हिंसा का जवाब दूसरी हिंसा से दिया जाता है, और हर जगह एक बात आम रहती है कि दूसरों से हिंसा करने वाले लोग ऐसे रहते हैं जिनके अपने कोई लोग उन दूसरे लोगों के देश-प्रदेश में बसे हुए नहीं रहते हैं। आज ऐसे ही मौके पर नेहरू की सोच याद पड़ती है और यह भी कि किस तरह उन्होंने भिलाई जैसे आधुनिक औद्योगिक तीर्थ बनाए थे जहां कि देश के हर कोने से आए हुए लोग मिलकर काम करते थे, आज भी करते हैं, और उनके बीच एक राष्ट्रीय ताने-बाने की सोच विकसित होती है, मजबूत बनती है, और कायम रहती है। आज भारत को भड़काऊ बातों से परे रहकर उसी दरियादिली की जरूरत है जिसके साथ नेहरू कश्मीर को एक अलग दर्जा देकर उसके हक को मानते थे। आज उसे नकारकर भारत की सरकार या भारत के लोग किसी किनारे नहीं पहुंच सकते। जिन लोगों को कश्मीर महज एक राज्य समझ पड़ता है, उनको यह भी समझना चाहिए कि बाकी हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच का यह राज्य देश की फौजी जरूरतों के लिए कितना महत्वपूर्ण है। बहुत से लोग कश्मीर की राजनीतिक समस्या का अतिसरलीकरण करते हुए यह कह बैठते हैं कि एक बार कश्मीर के लोगों को पाकिस्तान में शामिल होने दिया जाए और फिर उनको अकल आ जाएगी। लेकिन इन लोगों को उन फौजियों की जिंदगी की कीमत नहीं मालूम है जो कि सरहद को बचाने के लिए शहीद होते हैं। जिस दिन कश्मीर पाकिस्तान चले जाएगा, उस दिन पंजाब से लगी हुई सरहद देश के लिए कितनी महंगी पड़ेगी इसका कोई अंदाज आज के फतवेबाजों को नहीं है।
सारी दुनिया को एक-दूसरे से सबक लेना चाहिए। आज अफगानिस्तान से या इराक से हिन्दुस्तानियों को वापिस लाना हो, या कि सूडान से उन्हें वापिस लाया जा रहा है, तो यह महज सरकार के खर्च की बात नहीं है, ऐसे हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का सवाल भी है, और देश की अर्थव्यवस्था का सवाल भी। इसलिए दुनिया में, और  देश के भीतर भी विविधता का, क्षेत्रीयता का, जातीयता का, और धर्मों का सम्मान करते हुए एक-दूसरे के लिए सहनशक्ति बढ़ाने की जरूरत है और सहअस्तित्व के महत्व को समझने की भी।

कश्मीर के समाधान के लिए पूरे देश में माहौल बदलना होगा

संपादकीय
13 जुलाई  2016
कश्मीर में पिछले कई दिनों से सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई में मारे गए एक स्वघोषित उग्रवादी नौजवान की मौत के बाद का तनाव जारी है, और दो दर्जन मौतें हो चुकी हैं, केन्द्र और राज्य के सुरक्षा कर्मचारी कश्मीरी लोगों के एक बड़े तबके के हमले झेल रहे हैं, और इन दिनों जम्मू-कश्मीर में जारी हिन्दुओं की एक बड़ी तीर्थयात्रा, अमरनाथ, पर भी इस तनाव का असर पड़ा है। देश में यह पहला मौका है जब कश्मीर में हो रहीं इतनी अलगाववादी और आतंकी हिंसा के चलते हुए भी भाजपा चुप है, क्योंकि वह जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार में हिस्सेदार है। राज्य में कानून व्यवस्था को ठीक रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, और उसकी मदद के लिए केन्द्र सरकार की तरफ से भेजी गई जो फौज और पैरामिलिट्री वहां तैनात है, वह भी केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में कश्मीर उस भाजपा के लिए परेशानी का एक बड़ा सबब बन गया है जो कि पूरे देश के आम चुनावों में जनसंघ के दिया छाप के वक्त से धारा 370 खत्म करने, कश्मीर का अलग झंडा खत्म करने, कश्मीर का अलग दर्जा खत्म करने को राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर लड़ते आई थी। हम भाजपा की आज की सत्ता की बेबसी को समझते हैं, लेकिन विपक्ष और सत्ता की अलग-अलग और एक-दूसरे से विपरीत प्राथमिकताएं होती हैं, और उनके चलते आज अगर भाजपा को, और मोदी सरकार को अपना रूख बदलना पड़ रहा है, बर्दाश्त बढ़ाना पड़ रहा है, तो ऐसे में हम उन्हें उनकी पुरानी बातें याद दिलाकर फिर भड़काऊ बातें करना नहीं चाहते। सत्ता की जिम्मेदारी लोगों को सहनशील बना देती हैं, और विपक्ष की बेफिक्री लोगों को गैरजिम्मेदार भी बना देती है। यह एक अच्छी नौबत है कि भाजपा के प्रधानमंत्री को पाकिस्तान के मोर्चे से लेकर कश्मीर के मुद्दों तक केन्द्र और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के नजरिए से सोचना और काम करना पड़ रहा है, और यह बात लोकतंत्र के लिए एक नई विकसित हो रही समझ की भी है।
जहां तक सवाल कश्मीर का है, तो वहां के नौजवानों के एक तबके में अलगाववादी या कि उग्रवादी, या आतंकी सोच कोई नई बात नहीं है। और इसके पीछे के कई ऐतिहासिक कारण हैं, और उनका कोई आसान हल भी नहीं है। फिर यह भी है कि देश भर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथी मंत्री और पार्टी पदाधिकारी किस तरह से मुस्लिमों को लेकर भड़काने वाली बातें करते हैं, उन बातों को लेकर मुस्लिमों से भरी हुई कश्मीर घाटी में भी बेचैनी होती है। भारत जैसे देश में यह नहीं हो सकता कि दिल्ली के एयरपोर्ट पर उत्तर-पूर्व की एक लड़की से परदेसी जैसा बर्ताव किया जाए, और फिर यह उम्मीद की जाए कि उत्तर-पूर्वी लोग अपने आपको देश का हिस्सा मानकर चलें। वे लोग तो अपने को हिन्दुस्तानी मानते हैं, लेकिन बेंगलुरू से लेकर दिल्ली तक उनको सड़कों पर पीटने वाले बाकी हिन्दुस्तानी उनको इस अंदाज में नार्थ-ईस्ट का मानते हैं कि मानो वह इलाका भारत से बाहर का हो। कमोबेश यही हाल कश्मीर को लेकर देश में कई जगह लोगों के बर्ताव में आता है, और इसके जवाब में कश्मीर के लोगों के मन में भी ऐसी बात आती है कि वे अपने आपको कश्मीर और बाकी हिन्दुस्तान को इंडिया कहते हैं।
किसी भी इलाके में सुरक्षा बलों की बंदूकें जब बहुत लंबे समय तक तैनात रहती हैं, तो वहां स्थानीय लोगों पर कई किस्म की ज्यादतियां होने लगती हैं। अभी दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में भारतीय सेना पर लगे आरोपों की जांच के आदेश दिए हैं, वरना मणिपुर और कश्मीर जैसी जगहों पर फौज एक ऐसे खास कानून के साये में आरोपों से परे बैठती है जो कि उन्हें स्थानीय लोगों के आरोपों से बचाने के लिए बनाया गया है। आज छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी सुरक्षा बलों की ज्यादतियों के खिलाफ स्थानीय आदिवासियों में नाराजगी, और शायद नफरत भी, उबल रही है, यह एक अलग बात है कि उसकी कोई सुनवाई आसानी से हो नहीं रही है। इसलिए कश्मीर में फौज की लगातार मौजूदगी में जनता के एक तबके के बीच में लगातार बागी तेवर खड़े किए हैं, और इससे निपटना कोई आसान बात नहीं है।
केन्द्र सरकार ने आज कश्मीर पर एक बैठक की है जिसमें प्रधानमंत्री के साथ गृहमंत्री, रक्षामंत्री, विदेशमंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, विदेश सचिव की मौजूदगी में कश्मीर पर ही चर्चा हुई है। इसमें विदेश मंत्री और विदेश सचिव की मौजूदगी यह बात जाहिर करती है कि कश्मीर के मामले से देश की विदेश नीति भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कैसे जुड़ी हुई है। अभी हम वहां की जटिल स्थिति को लेकर कोई तुरत-समाधान सुझाना नहीं चाहते, लेकिन हमारा यह पक्का मानना है कि जब तक पूरे देश में राष्ट्रीय एकता के ताने-बाने को बचाने के लिए ठोस कोशिशें नहीं होंगी, और अल्पसंख्यकों या सरहदी लोगों के खिलाफ दिल्ली से हिकारत और नफरत दिखेगी, तब तक कश्मीर का कोई स्थानीय हल नहीं निकल पाएगा। कश्मीर की सोच बाकी देश के माहौल से जुड़ी रहेगी, और इस सोच को तबाह करने के लिए पिछले दो बरसों में देश में बहुत सी घटनाएं हुई हैं, और दिल्ली को पहले अपना घर सुधारना होगा, वरना श्रीनगर के पास कोई समाधान नहीं होगा।

कश्मीर के समाधान के लिए पूरे देश में माहौल बदलना होगा

संपादकीय
12 जुलाई  2016
कश्मीर में पिछले कई दिनों से सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई में मारे गए एक स्वघोषित उग्रवादी नौजवान की मौत के बाद का तनाव जारी है, और दो दर्जन मौतें हो चुकी हैं, केन्द्र और राज्य के सुरक्षा कर्मचारी कश्मीरी लोगों के एक बड़े तबके के हमले झेल रहे हैं, और इन दिनों जम्मू-कश्मीर में जारी हिन्दुओं की एक बड़ी तीर्थयात्रा, अमरनाथ, पर भी इस तनाव का असर पड़ा है। देश में यह पहला मौका है जब कश्मीर में हो रहीं इतनी अलगाववादी और आतंकी हिंसा के चलते हुए भी भाजपा चुप है, क्योंकि वह जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार में हिस्सेदार है। राज्य में कानून व्यवस्था को ठीक रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, और उसकी मदद के लिए केन्द्र सरकार की तरफ से भेजी गई जो फौज और पैरामिलिट्री वहां तैनात है, वह भी केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में कश्मीर उस भाजपा के लिए परेशानी का एक बड़ा सबब बन गया है जो कि पूरे देश के आम चुनावों में जनसंघ के दिया छाप के वक्त से धारा 370 खत्म करने, कश्मीर का अलग झंडा खत्म करने, कश्मीर का अलग दर्जा खत्म करने को राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर लड़ते आई थी। हम भाजपा की आज की सत्ता की बेबसी को समझते हैं, लेकिन विपक्ष और सत्ता की अलग-अलग और एक-दूसरे से विपरीत प्राथमिकताएं होती हैं, और उनके चलते आज अगर भाजपा को, और मोदी सरकार को अपना रूख बदलना पड़ रहा है, बर्दाश्त बढ़ाना पड़ रहा है, तो ऐसे में हम उन्हें उनकी पुरानी बातें याद दिलाकर फिर भड़काऊ बातें करना नहीं चाहते। सत्ता की जिम्मेदारी लोगों को सहनशील बना देती हैं, और विपक्ष की बेफिक्री लोगों को गैरजिम्मेदार भी बना देती है। यह एक अच्छी नौबत है कि भाजपा के प्रधानमंत्री को पाकिस्तान के मोर्चे से लेकर कश्मीर के मुद्दों तक केन्द्र और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के नजरिए से सोचना और काम करना पड़ रहा है, और यह बात लोकतंत्र के लिए एक नई विकसित हो रही समझ की भी है।
जहां तक सवाल कश्मीर का है, तो वहां के नौजवानों के एक तबके में अलगाववादी या कि उग्रवादी, या आतंकी सोच कोई नई बात नहीं है। और इसके पीछे के कई ऐतिहासिक कारण हैं, और उनका कोई आसान हल भी नहीं है। फिर यह भी है कि देश भर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथी मंत्री और पार्टी पदाधिकारी किस तरह से मुस्लिमों को लेकर भड़काने वाली बातें करते हैं, उन बातों को लेकर मुस्लिमों से भरी हुई कश्मीर घाटी में भी बेचैनी होती है। भारत जैसे देश में यह नहीं हो सकता कि दिल्ली के एयरपोर्ट पर उत्तर-पूर्व की एक लड़की से परदेसी जैसा बर्ताव किया जाए, और फिर यह उम्मीद की जाए कि उत्तर-पूर्वी लोग अपने आपको देश का हिस्सा मानकर चलें। वे लोग तो अपने को हिन्दुस्तानी मानते हैं, लेकिन बेंगलुरू से लेकर दिल्ली तक उनको सड़कों पर पीटने वाले बाकी हिन्दुस्तानी उनको इस अंदाज में नार्थ-ईस्ट का मानते हैं कि मानो वह इलाका भारत से बाहर का हो। कमोबेश यही हाल कश्मीर को लेकर देश में कई जगह लोगों के बर्ताव में आता है, और इसके जवाब में कश्मीर के लोगों के मन में भी ऐसी बात आती है कि वे अपने आपको कश्मीर और बाकी हिन्दुस्तान को इंडिया कहते हैं।
किसी भी इलाके में सुरक्षा बलों की बंदूकें जब बहुत लंबे समय तक तैनात रहती हैं, तो वहां स्थानीय लोगों पर कई किस्म की ज्यादतियां होने लगती हैं। अभी दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में भारतीय सेना पर लगे आरोपों की जांच के आदेश दिए हैं, वरना मणिपुर और कश्मीर जैसी जगहों पर फौज एक ऐसे खास कानून के साये में आरोपों से परे बैठती है जो कि उन्हें स्थानीय लोगों के आरोपों से बचाने के लिए बनाया गया है। आज छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी सुरक्षा बलों की ज्यादतियों के खिलाफ स्थानीय आदिवासियों में नाराजगी, और शायद नफरत भी, उबल रही है, यह एक अलग बात है कि उसकी कोई सुनवाई आसानी से हो नहीं रही है। इसलिए कश्मीर में फौज की लगातार मौजूदगी में जनता के एक तबके के बीच में लगातार बागी तेवर खड़े किए हैं, और इससे निपटना कोई आसान बात नहीं है।
केन्द्र सरकार ने आज कश्मीर पर एक बैठक की है जिसमें प्रधानमंत्री के साथ गृहमंत्री, रक्षामंत्री, विदेशमंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, विदेश सचिव की मौजूदगी में कश्मीर पर ही चर्चा हुई है। इसमें विदेश मंत्री और विदेश सचिव की मौजूदगी यह बात जाहिर करती है कि कश्मीर के मामले से देश की विदेश नीति भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कैसे जुड़ी हुई है। अभी हम वहां की जटिल स्थिति को लेकर कोई तुरत-समाधान सुझाना नहीं चाहते, लेकिन हमारा यह पक्का मानना है कि जब तक पूरे देश में राष्ट्रीय एकता के ताने-बाने को बचाने के लिए ठोस कोशिशें नहीं होंगी, और अल्पसंख्यकों या सरहदी लोगों के खिलाफ दिल्ली से हिकारत और नफरत दिखेगी, तब तक कश्मीर का कोई स्थानीय हल नहीं निकल पाएगा। कश्मीर की सोच बाकी देश के माहौल से जुड़ी रहेगी, और इस सोच को तबाह करने के लिए पिछले दो बरसों में देश में बहुत सी घटनाएं हुई हैं, और दिल्ली को पहले अपना घर सुधारना होगा, वरना श्रीनगर के पास कोई समाधान नहीं होगा।

एक सदी की कोशिश के बाद हासिल कामयाबी

संपादकीय
11 जुलाई  2016
इस बार के यूरोपियन फुटबॉल के एक रोमांचक मैच में कल रात पुर्तगाल ने फ्रांस की जमीन पर खेलते हुए फ्रांस को हराकर चैंपियनशिप हासिल की है और उसकी यह मेहनत करीब एक सदी बाद रंग लाई है। इस बीच खिलाडिय़ों की कम से कम 20 पीढिय़ां आई-गई हो गई होंगी और इस टूर्नामेंट में मेहनत करते-करते पुर्तगाल को पहली बार यह जीत हासिल हुई है। इस खबर के साथ ही यह जानकारी भी सामने आई है कि पुर्तगाल ने फ्रांस को 41 बरस बाद हराया है। अब इस मुद्दे पर लिखने को विचार तो बहुत अधिक नहीं हो सकते, लेकिन कितनी मेहनत से क्या कुछ हासिल किया जा सकता है, इसकी एक मिसाल पुर्तगाल की इस जीत से सामने आती है।
हिन्दुस्तान की हिन्दी जुबान में बड़े जानकार की लिखी हुई एक बात कही जाती है- रसरि आवत-जात से सिल पर परत निसान...। मतलब यह कि कुएं की पाल पर जिस जगह से लोग पानी निकालते हैं, वहां पर रस्सी से घिस-घिसकर पाल के पत्थर पर भी निशान पड़ जाता है। कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि किसी मंदिर-मस्जिद में मत्था टेक-टेककर माथे पर निशान पड़ जाता है। बहुत से दूसरे लोग यह नसीहत भी देते हैं कि करत-करत अभ्यास से, जड़मति होत सुजान..., मतलब यह कि कोशिश करते-करते मूर्ख भी ज्ञानी हो सकते हैं। कुछ ऐसा ही हाल पुर्तगाल की मेहनत के पीछे दिखता है जहां पर लोगों की कई पीढिय़ां ऐसी जीत के इंतजार में गुजर चुकी होंगी, और दस बरस की औसत खेल जिंदगी वाले खिलाडिय़ों की तो दस पीढिय़ां पुर्तगाल की फुटबॉल टीम में खेल-खेलकर निकल गई होंगी।
वैसे तो खेल में जीत और हार लगी ही रहती है, लेकिन कोई टीम किस तरह अपने सबसे बड़े सितारा खिलाड़ी रोनाल्डो के जख्मी होने के बाद भी मैदान पर डटी रही, और फ्रांस में हो रहे मैच में स्थानीय दर्शकों के समर्थन के बाद भी हौसले से खेलकर जिस तरह पुर्तगाल ने मैच जीता, उससे जिंदगी के अलग-अलग बहुत से दायरों के सभी लोगों को सीखने को कुछ न कुछ मिलता है। मुकाबला तो खेल के मैदान में भी होता है, इम्तिहान में भी होता है, और किसी कारोबार से लेकर किसी जगह की नौकरी में भी साथी कामगारों के साथ काम का मुकाबला भी होता है। बहुत से लोग हौसला खोकर, थककर बीच में बैठ जाते हैं, या कि दौड़ या सफर छोड़ बैठते हैं। ऐसे लोगों को 95 बरस बाद पुर्तगाल को मिली इस जीत को याद रखना चाहिए। और ऐसी जीत कारोबार की तरह किसी नाजायज तरीके से हासिल होने वाली जीत नहीं होती, इम्तिहान में नकल करके, या भोपाल की तरह पर्चे खरीदकर होने वाली जीत नहीं होती, यह किसी दफ्तर में बॉस की चापलूसी करके सहकर्मियों के ऊपर पाई हुई जीत भी नहीं होती, यह तो खुले मैदान में सैकड़ों करोड़ दर्शकों की नजरों के सामने मुकाबला करके पाई हुई एक निहायत पारदर्शी जीत होती है, और दुनिया की एक महाशक्ति फ्रांस की टीम के सामने एक कमजोर देश पुर्तगाल ने भी ऐसी जीत पाकर दिखाई है। इन नतीजों को इन ऐतिहासिक आंकड़ों के साथ जोड़कर लोगों को देखना चाहिए कि वे अपनी जिंदगी के दायरे में कोशिश और जीत का कैसा रिश्ता कायम कर सकते हैं। बहुत से जगहों पर यह बात पढऩे मिलती है कि थककर हार मानने वाले बहुत से लोग यह नहीं जानते कि जीत या कामयाबी बस कुछ ही कदम दूर खड़ी हुई थी।