ऐसे गोल्डन बाबाओं की हिफाजत पुलिस क्यों करे?

संपादकीय
29 जुलाई  2016
दो दिन पहले ही कई तस्वीरों के साथ एक खबर आई थी कि किस तरह गोल्डन बाबा नाम का साधू बना हुआ एक आदमी कांवर यात्रा कर रहा है, जो कि कई किलो सोने से लदा हुआ भी है। आज सुबह टीवी पर खबर थी कि इसके कई किलो सोने की हिफाजत के लिए राज्य की पुलिस का एक दस्ता इसके साथ चल रहा है, और जब इसने किसी सुरक्षित जगह पर ठहरने से मना कर दिया, तो पुलिस इसके लश्कर के साथ ही सो रही है।
इस गरीब देश में जहां पर कैदियों को जेल से अस्पताल या अदालत तक ले जाने के लिए पुलिस नसीब नहीं हो पाती, और वे बिना सुनवाई या बिना इलाज के जेलों में बंद पड़े रहते हैं, जहां पर गरीबों पर हुए जुर्म के मामलों की जांच बरसों तक नहीं हो पाती क्योंकि इन गरीबों की कोई ताकत नहीं होती है कि वे जांच को तेज करवा सकें, ऐसे देश में पुलिस की फिजूलखर्ची देखने लायक है। हमारे कहने का मतलब पुलिस का किया हुआ खर्च नहीं है, बल्कि जिस तरह से गैरजरूरी बातों पर पुलिस को खर्च किया जाता है, वह भयानक है। नेताओं और अफसरों के बंगलों पर अनगिनत पुलिस की तैनाती तो आम बात है ही, वहां पर तैनात सिपाहियों का मनोबल तोडऩे के लिए उनसे कपड़े भी धुलवाए जाते हैं, और कुत्ते घुमवाए जाते हैं। लेकिन आए दिन सड़कों पर तरह-तरह के अराजक जुलूस के लिए, गैरजरूरी और तंगदिल, तंगनजरिए के राजनीतिक आंदोलनों के लिए पुलिस को जिस तरह से झोंका जाता है, उससे लगता है कि अदालत को भारत के सार्वजनिक जीवन में अराजकता रोकने के लिए दखल देना चाहिए। जुलूस को लेकर, शहरों को बंद करवाने को लेकर, सड़कों पर हथियार लेकर चलने को लेकर कई किस्म के अदालती हुक्म बरसों से आकर लागू हैं, लेकिन उनका कोई इस्तेमाल कोई सरकार करना नहीं चाहती। नतीजा यह है कि पुलिस अपने बुनियादी काम को छोड़कर लोगों के शक्ति प्रदर्शन के इंतजाम में लगी रहती है, और इस पुलिस का तमाम खर्च इस देश की गरीब जनता की जेब से ही निकलता है।
हम छत्तीसगढ़ में ही लगातार होने वाले ऐसे राजनीतिक प्रदर्शन देखते हैं जिनमें पुलिस पुतलों की आग बुझाने के लिए बाल्टी और बोतलों में पानी लिए हुए तैनात रहती है, मानो किसी पुतले को नहीं, किसी जिंदा को जलाया जाने वाला है। इसी तरह बात-बात में कभी विधानसभा घेरने के लिए एक मुनादी होती है, तो शहर की तमाम सड़कों को खोदकर रास्तों को बंद कर दिया जाता है, और आम लोगों की जिंदगी को निलंबित कर दिया जाता है। ऐसे तमाम इंतजाम में इतनी बड़ी संख्या में पुलिस की तैनाती होती है कि बाकी सारे मामले धरे रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि मुजरिम पकड़ाते नहीं, अदालत में मामले जाते नहीं, जांच मजबूत हो नहीं पाती, और अपराधियों के छूट जाने का खतरा बढ़ते चले जाता है। ऐसे में जाहिर है कि जो पुलिस वर्दी में सामने दिखती है, उसके लिए लोगों के मन में हिकारत पैदा होती है।
आज धार्मिक पाखंडियों के लिए पुलिस की जितनी तैनाती होती है, उसे देखें तो लगता है कि जिसने संसार छोड़कर साधू बनना तय किया है, उसका कई किलो सोना पहनना कहां से जायज है? और अगर उसे अपने संन्यास के खिलाफ जाकर ऐसा करने का शौक है, तो उसकी हिफाजत के लिए पुलिस क्यों झोंकी जाए? जिसके पास ऐसे करोड़ों रुपये बर्बाद करने को हों, और जिसके सैकड़ों भक्त साथ चलते हों, वह चाहे तो खर्च करके अपने अंगरक्षक भाड़े पर ले, या फिर उस भगवान के भरोसे चले जिसका नाम लेकर वह ऐसा धंधा चला रहा है। बात-बात पर पुलिस को झोंकना पुलिस के हौसले को पस्त करना है, और उसे पेशेवर खूबियों से दूर करना भी है।

...अमरीकी का वोट इस बार पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा

संपादकीय
28 जुलाई  2016
अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हिन्दुस्तानी समय के मुताबिक आज सुबह अपनी पार्टी के राजनीतिक सम्मेलन में भारी गर्मजोशी के माहौल में जिस दरियादिली के साथ पार्टी की अगली राष्ट्रपति-प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन की तारीफ की, वह देखने लायक था। हिन्दुस्तान की राजनीति में कभी यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि कोई प्रधानमंत्री अगले चुनाव के पहले अपनी पार्टी के किसी और नेता की ऐसी तारीफ करे और इसकी एक सबसे बड़ी वजह यह है कि हिन्दुस्तान में लोग मरने तक प्रधानमंत्री रह सकते हैं, कई लोग रहे भी हैं। जबकि अमरीकी कानून के मुताबिक वहां एक राष्ट्रपति चार बरस के दो कार्यकाल के बाद किसी भी सरकारी पद पर नहीं आ सकते। इसका नतीजा यह होता है कि लोग अधिकतम 8 बरस के राष्ट्रपति-कार्यकाल के बाद के लिए दिमागी रूप से तैयार रहते हैं कि उन्हें क्या करना है। अधिकतर राष्ट्रपति रिटायर होने के बाद कोई न कोई ट्रस्ट या फाउंडेशन बनाकर अपने विश्वविद्यालय या अपने राज्य के लिए समाजसेवा का कोई बड़ा प्रोजेक्ट शुरू करते हैं, और उनके समर्थक-प्रशंसक उसके लिए चंदा देते हैं। अमरीका में राष्ट्रपति का यह चुनाव एक नया इतिहास इसलिए भी रच रहा है कि हिलेरी क्लिंटन पहली महिला राष्ट्रपति बन सकती हैं। एक अश्वेत बराक ओबामा के बाद एक महिला का राष्ट्रपति बनना एक बड़ा ऐतिहासिक फैसला हो सकता है। इसके अलावा हिलेरी के पति बिल क्लिंटन भी राष्ट्रपति रह चुके हैं, और राष्ट्रपति की जीवनसाथी का राष्ट्रपति बनना भी पहली बार ही शायद होने जा रहा है। फिलहाल जो बात लिखने की है वह यह कि बराक ओबामा ने जिस दरियादिली के साथ हिलेरी की खूबियां गिनाई हैं, वह भारतीय राजनीति में एक अनदेखा और अनसुना काम है।
लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर के ऐसे परस्पर-तारीफ के रिश्तों को छोड़ दें, तो एक दूसरी बात सोचने की यह है कि आज दुनिया भर में इस्लामी आतंक के चलते हुए योरप सहित कई पश्चिमी देश जिस तनाव से गुजर रहे हैं, उसमें रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप शायद अमरीकी इतिहास के सबसे बड़े युद्धोन्मादी उम्मीदवार हैं, जो कि रंग की नफरत, नस्ल की नफरत, गरीबी से नफरत, प्रवासियों से नफरत, महिलाओं से नफरत, निहत्थों से नफरत, मजदूरों से नफरत, और इस्लाम धर्म से नफरत के साथ मैदान में हैं, और जैसा कि आज सुबह ओबामा ने गिनाया है, डोनाल्ड ट्रंप अमरीकियों में दहशत पैदा करके, उन्हें डराकर जीत तक पहुंचना चाहते हैं। ऐसे नफरतजीवी डोनाल्ड ट्रंप को देखते हुए दुनिया के बाकी लोगों को भी यह समझना चाहिए कि ऐसी नफरत अमरीका में हो या कि किसी और देश में, वह किसी दूसरे देश पर हमला करने के लिए हो, या कि अपने ही देश के लोगों के खिलाफ हो, वह दुनिया के लिए एक नया खतरा लेकर आ रही है, और इसे आज की दुनिया में पैदा करने के लिए दो कार्यकाल पहले के अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश, और उनके ब्रिटिश सहयोगी प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर को जिम्मेदार के तौर पर इतिहास में दर्ज किया गया है। अमरीकी लोगों के सामने यह एक बड़ा मौका है कि वे अमरीका की विविधता वाली संस्कृति का सम्मान करते हुए डोनाल्ड ट्रंप को खारिज करें। ऐसी नफरत और ऐसे युद्धोन्माद के साथ ट्रंप अमरीकी लोगों के लिए एक बहुत खतरा ही बनकर आए हैं, और अगर उन्हें अमरीका में जीत मिलती है तो बाकी दुनिया के नफरजीवी लोग भी ताकत पाएंगे। इसलिए अमरीकी वोटरों का इस बार का वोट न सिर्फ अमरीका को प्रभावित करेगा, बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा।

...अफसरों की बददिमागी शुरू होती है पदनाम से भी

संपादकीय
27 जुलाई  2016
इन दिनों तरह-तरह के कैमरों की मेहरबानी से हर तरह की तस्वीरें और वीडियो बात की बात में सोशल मीडिया और मीडिया पर तैरने लगते हैं। आज सुबह मध्यप्रदेश के एक अफसर का वीडियो एक समाचार चैनल पर था कि किस तरह छह महीने से राशन न पाने वाली गरीब महिलाएं उस अफसर के जूते पकड़-पकड़कर उसे प्रणाम करती जा रही हैं, और राशन देने की मेहरबानी मांग रही हैं। कल ही छत्तीसगढ़ के अखबारों में एक खबर थी कि एक आदिवासी महिला अपने शरारती बच्चे को एक आदिवासी आश्रम-छात्रावास में दाखिल करवाने गई, तो उसका आरोप है कि वहां बैठे अफसर ने उसे कहा कि कुत्ते-बिल्ली की तरह बच्चे पैदा ही क्यों करते हो। पिछले चार-छह दिनों से छत्तीसगढ़ के मीडिया में एक जिले की महिला कलेक्टर की तस्वीरें चल रही हैं जिनमें पहली तस्वीर में तो उन्हें वाहवाही मिल रही है कि वे बांध पर बहते पानी को पैदल पार करके किसी गांव तक पहुंच रही हैं, लेकिन इस वाहवाही की जिंदगी एक दिन से भी कम की रही क्योंकि अगले ही दिन उसी बांध की उनकी दूसरी तस्वीरें सामने आ गईं जिनमें उनका सुरक्षा गार्ड उनकी चप्पलें उठाए पीछे-पीछे चल रहा था। अब नक्सल इलाके में इस महिला कलेक्टर के ग्रामीण दौरे के समय गनमैन की अकेली जिम्मेदारी अपनी बंदूक के साथ चौकस रहते हुए अफसर की सुरक्षा होनी चाहिए थी, लेकिन उसका ध्यान अगर चप्पलों में रखा गया है, तो वह सुरक्षा क्या खाकर करेगा? और दूसरी बात यह कि आज जब भारत जाति व्यवस्था के जहर का शिकार है, तो अपने किसी मातहत से चप्पलें उठवाना भी कानून के भी खिलाफ है, और सामाजिक मर्यादा के भी। लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ के एक और कलेक्टर ने पिछले दिनों एक अस्पताल का दौरा करते हुए मरीज के पलंग पर अपना जूता रखते हुए उससे बात की थी, और मीडिया में यह तस्वीर छाने के बाद उसे सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगनी पड़ी थी।
सरकारी नौकरी के साथ कई तरह की दिक्कतें हैं। एक तो यह कि सरकार में गड़बड़ी कुर्सियों के नाम से ही शुरू हो जाती है। जिले में सबसे अधिक ताकत की जो व्यवस्था कलेक्टर की कुर्सी के साथ जुड़ी हुई है, उसका वह नाम अंग्रेजों के वक्त से चले आ रहा है, और उसका काम जनता से टैक्स कलेक्ट करना हुआ करता था। अब अंग्रेजों के वक्त तो टैक्स इक_ा करना ही सबसे बड़ा काम था, लेकिन आज तो कलेक्टर शायद ही कुछ इक_ा करते हैं, और वे सरकारी बजट के सैकड़ों करोड़ रूपए अपने जिलों में खर्च ही करते हैं। फिर सरकार का नारा लोकतंत्र में जनता की सेवा का है, लेकिन इस कुर्सी का नाम कलेक्टर, जिलाधीश, या जिला दंडाधिकारी होने से इस पर बैठे हुए लोगों की सोच उसी मुताबिक ढलना स्वाभाविक है। छत्तीसगढ़ के ही एक बड़े अफसर ने एक वक्त यह सुझाव दिया था कि कलेक्टर या जिलाधीश के पद का नाम जिला जनसेवक रखना चाहिए ताकि पदनाम की वजह से उनके दिमाग में यह बात हमेशा साफ रहे कि उनका काम क्या है। आज सरकार और लोकतंत्र घोषित रूप से जनसेवा का काम बताते हैं, लेकिन नाम अंग्रेजों के वक्त का चले आ रहा है। जब देश का प्रधानमंत्री अपने आपको देश का पहला सेवक कह रहा है, तो फिर अफसरों के पदनाम से सामंती प्रतीक हटा देने चाहिए, और इसके साथ-साथ उनके काम के दायरे, उनके अधिकारों से भी सामंती व्यवस्था खत्म करनी चाहिए।
भारत में जब तक कोई अफसर कलेक्टर बनते हैं, या किसी की बराबरी की दूसरी कुर्सियों पर आते हैं, उनका सामाजिक शिक्षण सिर्फ एकेडमी में होता है। जिंदगी की असल हकीकत को उन्होंने बहुत कम देखा होता है, और उनके लिए नौकरशाह जैसे शब्दों का इस्तेमाल होता है जो कि हमारे हिसाब से एक अपमानजनक शब्द है और अफसरों के तबके को इसका विरोध भी करना चाहिए। न तो वे शाह हैं, और न ही नौकर हैं। वे महज एक सरकारी कर्मचारी हैं, जिनका काम जनता की सेवा करना होना चाहिए, और जहां-जहां अफसरों में यह परिपक्वता नहीं आती है, यह जिम्मेदारी नहीं आती है, वहां-वहां उनका अहंकार बदजुबानी और बदसलूकी के साथ जनता के बीच दिखता है। सरकार के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भी यह याद रखना चाहिए कि सत्ता का कार्यकाल पूरा करने के बाद जब वे जनता के बीच चुनाव के लिए दुबारा जाते हैं, तो वे अफसरों के अच्छे या बुरे बर्ताव का भी नफा-नुकसान पाते हैं। इसलिए अपनी लोकतांत्रिक और संवैधानिक-सरकारी जिम्मेदारियों के तहत न सही, नेताओं को अपनी चुनावी-जिम्मेदारियों के तहत ही सही, अफसरों के व्यवहार पर काबू रखना चाहिए। और इसकी शुरुआत पदनाम बदलने से होना चाहिए, और जो सरकार ऐसे व्यवहार को अनदेखा करती है, वह सरकार अपने दुबारा लौटने की संभावनाओं को खोती ही है। चुनाव में जीत-हार छोटी बात हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों के व्यवहार से पूरी की पूरी सरकार के लिए आम जनता के मन में अगर हिकारत और नफरत बैठ जाती है, तो यह लोकतंत्र पर से भरोसा उठने की बात रहती है। लोगों को याद होगा कि हिन्दी टीवी सीरियलों में एक सीरियल मुसब्बीलाल नाम के किरदार पर केन्द्रित, ऑफिस-ऑफिस नाम का भी था, जिसमें अभिनेता पंकज कपूर सरकारी दफ्तरों में धक्के खाते घूमता दिखता था, और हमारे आसपास के सरकारी दफ्तरों की हकीकत इससे कुछ बेहतर नहीं है।

एक दिव्यांग बेरोजगार की आत्महत्या और राजनीति

विशेष संपादकीय
27 जुलाई  2016
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री-निवास पर नौकरी के लिए अर्जी देकर निकले एक दिव्यांग (विकलांग) नौजवान ने बाहर सड़क पर पेट्रोल छिड़का और आग लगा ली। जैसा कि उस खबर के आने के वक्त से लग रहा था, आज सुबह उसकी मौत हो गई। इस दौरान मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह उसे देखने अस्पताल गए, और उसके इलाज का सरकारी खर्च पर इंतजाम किया। इस खबर के साथ-साथ लोगों को यह भी याद आया कि पिछले मुख्यमंत्री, कांग्रेस के अजीत जोगी के कार्यकाल में भी इसी तरह एक बेरोजगार नौजवान ने नौकरी की मांग करने के बाद मुख्यमंत्री निवास के बाहर जहर खा लिया था, और अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी। ऐसी मौतों को लेकर राजनीति एक आम बात है, और उस वक्त हो सकता है कि बीजेपी ने उसे मुद्दा बनाया हो, और आज तो राज्य में विपक्ष में कांग्रेस और जोगी की कांग्रेस दोनों है, और दोनों के लिए यह एक बड़ा मुद्दा है।
लेकिन आज सभी पार्टियों को और सरकार को यह समझने की जरूरत है कि हर किसी को सरकारी नौकरी देना न तो मुमकिन है, और न ही जायज भी है। लोगों के आत्महत्या कर लेने के दबाव में कोई नौकरी नहीं दी जा सकती, और ऐसे दबाव के बिना भी शायद हजार बेरोजगारों पर एक ही सरकारी नौकरी मौजूद भी होगी। इसलिए ऐसी मौतों पर राजनीति करते हुए लोगों को यह याद रखने की जरूरत है कि इसके लिए मौत के वक्त की सरकार पर तोहमत लगाना तो आसान है, लेकिन क्या ऐसी तोहमत लगाकर बाकी बेरोजगारों को राह से भटकाने का काम तो नहीं हो रहा ? आज बेरोजगारों को यह समझने की जरूरत है कि सरकारी नौकरियों का दायरा बुरी तरह से सिमट रहा है, और निजी क्षेत्र में रोजगार भी बढ़ रहे हैं, और स्वरोजगार के मौके भी बढ़ रहे हैं। भारत की बाजार की अर्थव्यवस्था, और तरह-तरह की सेवाओं की जरूरत पूरी तरह से करवट ले चुकी है, और आज नए-नए किस्म के रोजगार रोज सामने दिखते हैं। ऐसे में सरकारी नौकरी न मिलने से निराश होकर आत्महत्या कोई विकल्प नहीं है।
न सिर्फ राजनीति में सक्रिय लोगों को, बल्कि सार्वजनिक जीवन में जो लोग भी अहमियत के ओहदों पर हैं, उनको अपने आसपास के लोगों को यह बताना होगा कि सरकार से परे भी खाने-कमाने के कितने तरह के विकल्प आज मौजूद हैं। सरकारी योजनाएं कागजों पर जितनी अच्छी दिखती हैं, उनसे अगर हकीकत में एक चौथाई भी अच्छी होंगी, तो भी कौशल विकास से कई लोग गैरसरकारी काम के लायक हो सकते हैं। फिर बैंकों से नए स्वरोजगार के लिए कर्ज मिलने को आसान बनाया गया है, और उसमें भी कई लोगों की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, शायद बढ़ी भी हैं। इसलिए न सिर्फ सत्तारूढ़ दल, बल्कि विपक्षी दलों और बाकी लोगों की भी यह जिम्मेदारी है कि सरकार की योजनाओं के तहत लोगों को शिक्षण-प्रशिक्षण दिलवाने की पहल भी करें, और उनको स्वरोजगार शुरू करवाने में भी। मौतों पर राजनीति न नई बात है, और न ही यह कभी खत्म होगी। लेकिन चाहे जोगी के वक्त की मौत हो, चाहे रमन सिंह के वक्त की, ऐसी मौतों के मौकों पर समाज के सभी जिम्मेदार तबकों को यह तय करना चाहिए कि सरकारी नौकरियों से परे वे लोगों को खाने-कमाने के लिए किस तरह से तैयार कर सकते हैं। अगर राजनीति में सक्रिय तबके ऐसी लाशों को सरकार की नाकामयाबी साबित करने में लगे रहेंगे, तो वे समाज के बाकी नौजवान बेरोजगारों के सामने एक ऐसा झांसा चाहे-अनचाहे पेश कर देंगे कि नौकरी देना सरकार की जिम्मेदारी है। अगर सरकार देश-प्रदेश के हर बेरोजगार को नौकरी दे दे, तो साल भर में एक हफ्ते की तनख्वाह भी किसी को नहीं मिल पाएगी। इसलिए ऐसी तकलीफदेह मौत के मौके पर सत्ता और विपक्ष सभी को केन्द्र और राज्य की योजनाओं का फायदा अधिक से अधिक लोगों को दिलवाने की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। ये योजनाएं रमन सिंह या नरेन्द्र मोदी की निजी योजनाएं नहीं है, यह देश की जनता के टैक्स के पैसों और सरकारी खजाने से चलने वाली योजनाएं हैं, और इनके तहत लोगों का कौशल विकास करना, उन्हें स्वरोजगार शुरू करवाना एक बड़ी प्राथमिकता रहनी चाहिए। निजी जिंदगी में निराशा से ऐसी मौत बड़ी तकलीफदेह बात है, और इसे लेकर मौत के दिन की सरकार को जिम्मेदार ठहराने की गैरजिम्मेदारी किसी को नहीं करनी चाहिए। कोई भी राजनीतिक दल ऐसा दावा नहीं कर सकते कि वे सत्ता में आने पर हर किसी को नौकरी दे देंगे।

जापान की भयानक हिंसा से सबक लेने की जरूरत

संपादकीय
26 जुलाई  2016
जापान में मानसिक रोगियों के एक केंद्र में वहीं के एक भूतपूर्व कर्मचारी ने देर रात घुसकर 19 रोगियों को चाकू से काट डाला, और खुद को पुलिस के हवाले करते हुए उसने कहा कि वह तमाम विकलांगों और मानसिक रोगियों को धरती से मिटा देना चाहता है। वह पिछले कुछ समय से अपने आसपास के लोगों को यह कहते आया है कि विचलित और विकलांग लोग मार डाले जाने चाहिए। उसने जापानी संसद को भी एक चिट्ठी लिखकर यह मांग की थी कि ऐसे तमाम लोगों को इच्छामृत्यु देनी चाहिए। इस चिट्ठी में उसने ऐसे दो केंद्रों पर हमला करके 470 लोगों को मार डालने की योजना भी बयां की थी।
दुनिया के सक्षम लोगों के एक तबके में कमजोर लोगों के लिए हिकारत हमेशा से चली आ रही है बात है। संपन्नों के मन में विपन्नों के लिए जो नफरत रहती है वह बिरला वाईट सीमेंट के इश्तहारों में भी दिखती है कि हम बिरला वाईट वालों से चूने से रंगी दीवार वालों का क्या मुकाबला। जो ताकतवर होते हैं उनमें कमजोर लोगों के लिए नफरत होती है। भारत जैसे देश में जाति-व्यवस्था के चलते जो ताकतवर ऊंची जाति मानी जाती है, उसके मन में नीची मानी जाने वाली जाति के लोगों के लिए नफरत रोजाना ही कहीं न कहीं पुलिस में दर्ज हो रही है। इसी तरह औरत और मर्द में से ताकतवर मर्द का बाहुबल औरत पर तरह-तरह से कहर ढाते ही रहता है। बहुत से लोगों का यह मानना रहता है कि विकलांग, विचलित, या विशेष जरूरतों वाले बच्चों को खत्म कर देना चाहिए, ताकि न उनकी जिंदगी मुश्किल हो, न ही आसपास के लोगों की। जापान में जिस नौजवान ने वहां के इतिहास की अपने किस्म की यह सबसे बड़ी हिंसा की है, उसकी सोच भी इसी तरह की हिंसक सोच थी, और ऐसी जिंदगियों को खत्म करना उसे एक किस्म की सेवा का काम लग रहा था। इतने कत्ल करने के बाद उसने अपने-आपको पुलिस के हवाले कर दिया मानो उसका मकसद पूरा हो गया हो।
इस भयानक जुर्म के बाद अब जापान में लोग इस बात पर भी सोच रहे हैं कि लोगों के मन विचलित और हिंसक होने से कैसे रोके जाएं। विकलांग लोगों के मुद्दों पर काम करने वाले एक विशेषज्ञ का कहना है कि आज की जरूरत मानसिक केंद्र में दाखिल मानसिक-रोगियों के बारे में सोचने की कम है, ऐसे हत्यारे की दिमागी हालत के बारे में सोचने की अधिक है। हालांकि जापान और भारत के हालात अलग हैं, लोगों की सोच अलग है, लेकिन फिर भी तमाम देशों के और तमाम लोगों के इस हिंसा से यह सबक लेने की जरूरत है कि अपने-अपने दायरे में वे ऐसे तनाव, ऐसी नफरत, और ऐसी हिंसा को कैसे टाल सकते हैं।

सड़कों पर अराजकता कड़ाई से कुचली जाए

संपादकीय
25 जुलाई  2016
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछले खासे वक्त से बददिमाग रईसों की बिगड़ैल औलादें सड़कों पर महंगी गाडिय़ां दौड़ाते या तो खुद जान दे रही थीं, या दूसरों की जान ले रही थीं। और इनके सामने इस राजधानी में बैठे हुए पुलिस के बड़े-बड़े अफसर मानो बेबस थे कि इनको छूना वर्दी उतरवाने जैसा होगा। नतीजा यह था कि सड़कों पर लोगों का पैदल चलना मुश्किल हो रहा था कि कब कोई गाड़ी आकर कुचलकर चली जाएगी। कोई चाहकर भी इस शहर में साइकिलों पर नहीं चल सकते क्योंकि अधिक ताकतवर इंजनों वाली कारों और मोटरसाइकिलों के मन में पैदल और पैडल के लिए हिकारत के सिवाय कुछ नहीं है।
अच्छी खासी बड़ी कार जितनी कीमत वाली मोटरसाइकिलें दौड़ाते हुए लोगों की बददिमागी स्वाभाविक है क्योंकि इंजन और दाम सिर चढ़कर बोलते हैं। और लोग तरह-तरह के प्रेशर हॉर्न लगवाकर, साइलेंसरों से छेडख़ानी करके, हेडलाईट में फेरबदल करके सड़कों पर दौड़ का मुकाबला करते हैं, और बड़ी संख्या में तैनात पुलिस महज चालान करके छोड़ देती है। पिछले हफ्ते-दस दिन से रायपुर की पुलिस ने ऐसी दर्जनों महंगी बाईक जब्त की हैं, और शायद पहली बार इनके मामलों को अदालत ले जाया जा रहा है, न कि चालान की पर्ची थमाकर छोड़ा जा रहा है। हमारा यह मानना है कि सड़कों पर बददिमागी दिखाने वालों पर सिर्फ ट्रैफिक के नियम लागू करना काफी नहीं है, सड़क के दूसरे लोगों की जिंदगी के लिए जो खतरा ऐसे लोग खड़ा करते हैं, उनके खिलाफ पुलिस को दूसरी दफाओं के तहत भी कार्रवाई करनी चाहिए, और कानून में इसका खासा इंतजाम भी है। यह बात सबको समझ लेनी चाहिए कि जब सार्वजनिक जगहों पर नियम तोडऩे वाले लोगों पर कार्रवाई नहीं होती है, तो उससे दूसरे बददिमाग लोगों में भी कानून तोडऩे का हौसला खड़ा होता है, और बढ़ता है। यह सिलसिला कुचलने की जरूरत है, और जहां तक पुलिस पर खर्च की बात है, तो ऐसे चालान से सरकार को खासी कमाई भी होती है, और उससे पुलिस पर अधिक खर्च करने की जरूरत भी है।
लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी में ही जो काम नहीं हो पा रहे हैं, वे यहां के बाकी शहरों में होने की संभावना नहीं हो सकती। रफ्तार नापने वाले राडार किसी वक्त आए होंगे, लेकिन उनका इस्तेमाल न दिखाई पड़ता, न सुनाई पड़ता। दूसरी तरफ शराब पिये हुए लोगों के नशे की जांच के उपकरण खराब पड़े हुए हैं, और जिनके पास बीस-पच्चीस लाख रूपए तक की बाईक के लिए पैसे हैं, उन्हीं लोगों का तबका देर रात तक मॉल्स में चलने वाले महंगे शराबखाने से नशे में भी निकलता है, और बिलासपुर में चार दिन पहले ऐसे ही नशे के बाद हुआ कत्ल इस बात का एक ताजा सुबूत है। छत्तीसगढ़ में छोटे-छोटे नियम-कानूनों की बड़ी-बड़ी अनदेखी आम बात है। राजधानी सहित बाकी शहरों में चाट ठेले तो साढ़े दस बजे रात से लाठी खाने लगते हैं, लेकिन मॉल्स के महंगे शराबखाने बिलासपुर के इस कत्ल के पहले तक सुबह तक दावतों से कमाई करते रहते थे, और फिलहाल उनकी जांच-पड़ताल शुरू हुई है। सरकार को आम जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी कड़ाई से पूरी करनी चाहिए, और सड़क, सार्वजनिक जगह, ऐसी कड़ाई के लिए सबसे पहले देखनी चाहिए। इन दिनों राजधानी में जो कड़ाई शुरू हुई है, वह पिछले बरसों में हुई रहती, तो ऐसी नौबत ही नहीं आती। हम यह भी नहीं मानते कि ऐसे छोटे-छोटे मामलों में कोई बड़े राजनीतिक दबाव आते होंगे। इसलिए पुलिस और प्रशासन में बैठे हुए लोगों को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और लोगों की जिंदगी बचानी चाहिए। कुछ लोगों के पास अगर जरूरत से अधिक पैसा है, तो उन्हें दूसरे लोगों को कुचलने का हक देना गैरजिम्मेदार अफसर ही कर सकते हैं।

साइबर-सक्रियता तो छा गई लेकिन साइबर-जागरूकता...

संपादकीय
24 जुलाई  2016
एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जब इंटरनेट या फोन, फेसबुक से कोई धोखा न खाते हों। फेसबुक पर दोस्ती करके अश्लील तस्वीरें जुटा लेना, ब्लैकमेल करना, और महंगे गिफ्ट भेजने का झांसा देकर उन्हें छुड़ाने के लिए बैंक खातों में पैसे जमा करवाना भी रोजाना कहीं न कहीं से पुलिस के पास पहुंच रहा है। बहुत सी अधेड़ महिलाएं भी अपने घरबार की फिक्र छोड़कर इंटरनेट की ऐसी दोस्ती के फेर में पड़ रही हैं कि वे लुट भी रही हैं, और ब्लैकमेलिंग का खतरा भी झेल रही हैं। दरअसल कम्प्यूटर, फोन, और इंटरनेट जैसी सहूलियतों से लोग सोशल मीडिया पर एक ऐसी जिंदगी जीने लगे हैं जिसके खतरे का उन्हें अंदाज नहीं है। मानो वे किसी अनजाने जंगल में पहुंच गए हैं, जहां पर खाने लायक फल कौन से हैं, और जहरीले कौन से हैं इसकी परख-पहचान नहीं है, लेकिन वहां लोग खूब दुस्साहस के साथ हर फल को चख रहे हैं, फेसबुक के खाते बना रहे हैं, वॉट्सऐप पर तस्वीरें और वीडियो भेज रहे हैं, और इनमें से जहां जहर साबित होगा, उसका असर दिखने तक उससे बाहर आने का वक्त निकल चुका होगा।
आज सरकार और समाज को, और सबसे अधिक, स्कूल-कॉलेज और परिवार को बच्चों-बड़ों सभी को कम्प्यूटर-फोन, नेट-सोशल मीडिया की संभावनाओं और उसके खतरों दोनों से वाकिफ कराना चाहिए। इस काम में कम्प्यूटर और फोन कंपनियां चाहे कोई मदद न करें, क्योंकि गैरजिम्मेदार ग्राहक अधिक मुनाफा देते हैं, और खतरे से डरे-सहमे ग्राहक इन तमाम सामानों और सेवाओं का कम इस्तेमाल करेंगे, लेकिन घर-समाज और सरकार को अपनी जिम्मेदारी तुरंत निभानी चाहिए। इसके लिए किसी साइबर-अपराध के विशेषज्ञों की जरूरत नहीं है, मामूली समझबूझ रखने वाले लोग भी स्कूल-कॉलेज जाकर या संगठनों-संस्थाओं की बैठक में जाकर लोगों को सूचना तकनीक के खतरों के बारे में बता सकते हैं। आज अधिकतर लोगों को इनमें से किसी बात के बारे में बड़ी कम जानकारी रहती है। लोग जिस तरह कहावत और मुहावरे में बंदर के हाथ उस्तरे की बात कहते हैं, वैसा बंदर के साथ होते तो किसी ने देखा नहीं है, इंसानों के हाथ मोबाइल फोन आने के बाद ऐसा जरूर देखने में आ रहा है।
पुलिस और अखबारों में जितने मामले पहुंच रहे हैं, उनसे हजार गुना अधिक मामले निजी ब्लैकमेलिंग तक पहुंचकर दब जाते हैं, और इससे न जाने कितने लोगों की जिंदगी तबाह होती है। जब मामला हत्या या आत्महत्या तक पहुंच जाता है, या परिवार के और लोगों की नजर में आ जाता है, तो उनमें से कुछ मामलों में लोग पुलिस तक जाने का हौसला दिखाते हैं। हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार को साइबर-जागरूकता नाम का एक ऐसा कार्यक्रम शुरू करना चाहिए जो कि कम्प्यूटर-मोबाइल इस्तेमाल करने की उम्र शुरू होते ही लागू किया जाए, और इस उम्र से ऊपर के तमाम लोगों को उपकरणों और संचार-प्रणाली के खतरों के बारे में जागरूक किया जाए। जिस तरह लापरवाह सेक्स से एड्स का खतरा रहता है, उसी तरह लापरवाह साइबर-सक्रियता से जुर्म का शिकार होने, या ब्लैकमेल होने का खतरा बढ़ता है।
सरकार को स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम में साइबर-अपराधों से सावधान रहने पर कुछ पन्ने जरूर जोडऩे चाहिए, और पुलिस भी अपनी सामाजिक भूमिका की अच्छी छवि बनाने के लिए जगह-जगह जाकर ट्रैफिक-जागरूकता की तरह साइबर-जागरूकता पर भी लोगों को जानकारी दे सकती है।

उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की पसंद, रणनीति और चुनावी संभावनाएं

संपादकीय
23 जुलाई  2016
उत्तरप्रदेश में चुनाव के पहले अपने पैर जमाने के लिए कांग्रेस ने दो ऐसे फैसले लिए हैं जो कि हमें समझदारी के दिखते हैं। एक तो राज बब्बर को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाना, और दूसरा यह कि आने वाले विधानसभा चुनाव को दिल्ली की भूतपूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की लीडरशिप में लडऩा। कांग्रेस के पास आज जितने तरह के विकल्प हैं, उनमें ये दोनों अच्छे फैसले दिखते हैं, और अब तक तो पार्टी के एक छोटे नारेबाज तबके की यह बात मानी जाती नहीं दिख रही है कि प्रियंका गांधी को इस चुनाव में पार्टी का चेहरा बनाकर उतारा जाए। एक कुनबापरस्त कांग्रेस ने मां और दोनों बच्चों के बीच ओहदों और ताकत का बंटवारा कैसा होता है, इससे देश या इस पार्टी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। मीडिया को जगह बर्बाद करने के बजाय इसे सोनिया के कुनबे पर ही छोड़ देना चाहिए। लेकिन आज उत्तरप्रदेश चुनाव को लेकर कांग्रेस के रूख पर लिखने का हमारा मुद्दा कुछ और ही है।
कांग्रेस ने आज एक नारे के साथ उत्तरप्रदेश का चुनाव अभियान शुरू किया है- 27 साल, यूपी बेहाल। ये 27 साल यूपी की सत्ता से कांग्रेस के बाहर रहने वाले 27 साल हैं, और इस दौरान मायावती से लेकर समाजवादी पार्टी, और भाजपा तक की सत्ता के दौर रहे हैं, और कांग्रेस का आखिरी मुख्यमंत्री 1989  का कैलेंडर हटने के पहले ही उत्तरप्रदेश से जा चुका था। ऐसे में पिछले 27 बरसों की उत्तरप्रदेश की सरकारों को कोसने के साथ कांग्रेस अकेले अपने दम पर यह चुनाव लडऩे को तैयार दिख रही है, और चौथाई सदी में जब उसकी कोई सरकार यहां बन नहीं सकी, तो उसके पास आज वहां खोने के लिए अधिक कुछ बचा नहीं है, और उसकी जो भी रणनीति है, वह उसके लिए भली हो सकती है। लेकिन हमारा आज यहां लिखने का मुद्दा यह है कि पिछले पूरे 27 बरसों को कोसने से उत्तरप्रदेश की चुनावी बिसात अब साफ हो जाती है कि वहां चार पार्टियां मैदान में रहेंगी, और भारतीय जनता पार्टी के लिए शायद यही सबसे सहूलियत की नौबत होगी। मायावती, मुलायम, कांग्रेस, और भाजपा इन सबके अलग-अलग लडऩे से न सिर्फ उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के समीकरण दिख रहे हैं, बल्कि अगले आम चुनाव में भाजपा विरोधी किसी वजनदार गठबंधन के बनने की संभावना भी इससे कुछ कमजोर होते दिखती है। हालांकि उत्तरप्रदेश के चुनावों के नतीजे चाहे जो हों, इसके बाद भी देश के आम चुनाव में साथ रहने पर कोई रोक तो रहेगी नहीं, लेकिन इस चुनाव में अगर कांग्रेस का बसपा या सपा से कोई तालमेल बैठता, तो वह अगले किसी गठबंधन में काम भी आ सकता था।
ये चुनाव अब देश में इसी बात को आगे बढ़ा रहे हैं कि भारतीय राजनीति किस तरह भाजपा के मुकाबले बाकी सब की नौबत ला रही है। भारतीय चुनावों ने आधी सदी तक कांग्रेस के मुकाबले बाकी सब की नौबत सामने रखी थी, और अब यह तस्वीर कांग्रेस के हाशिए पर आने की वजह से बदलकर ऐसी हो गई है। लेकिन फिर भी भारतीय लोकतंत्र में कांग्रेस का खत्म होना कोई अच्छी बात नहीं होती, इसलिए आज अगर उत्तरप्रदेश में कांग्रेस ने अपने लिए बेहतर लीडरशिप को छांटा है, तो यह राज्य की राजनीति और देश की राजनीति इन दोनों में कांग्रेस और लोकतंत्र दोनों के लिए अच्छा हो सकता है। कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश और उसी का हिस्सा रहे उत्तराखंड, इन दोनों राज्यों को बर्बाद करने का ठेका जिस तरह से बहुगुणा-भाईबहनों को दिया था, वह कुनबापरस्ती को सिर पर बिठाने के साथ-साथ बेवकूफी का फैसला भी था। इन दोनों ने मिलकर दो राज्यों में कांग्रेस को तबाह कर दिया, और अब उनसे छुटकारे के बाद  इन दोनों में कांग्रेस नए सिरे से बेहतर लोगों को बढ़ावा दे सकती है। हालांकि शीला दीक्षित के बारे में यह बात कही जा सकती है कि वे खुद कुनबाई राजनीति की उपज हैं, और उन्होंने दिल्ली में अपने बेटे को सांसद बनाकर विरासत को आगे बढ़ाया है, लेकिन उत्तरप्रदेश की चुनावी संभावनाओं में वे चर्चा के तमाम चेहरों में सबसे बेहतर हैं, और कांग्रेस इससे बेहतर नतीजों की उम्मीद नहीं कर सकती।

फोटो खिंचाने न आएं

संपादकीय
22 जुलाई  2016
गुजरात के ऊना में गौरक्षा के नाम पर जिन दलितों को बुरी तरह से मारा गया, उनसे हमदर्दी जाहिर करने के लिए गुजरात की भाजपा मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल पहुंचीं, और फिर कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। एक खबर यह है कि वहां मौजूद दलित परिवारों ने इन लोगों से कहा कि मिलने आए हैं वह तो ठीक है, लेकिन लौटकर उनके नाम पर राजनीति न करें। दूसरी तरफ देश के सभी प्रदेशों में जहां-जहां किसी हादसे या हिंसा के शिकार लोग अस्पतालों में भर्ती रहते हैं, उनसे मिलने के लिए, और उनके साथ तस्वीरें खिंचाने के लिए नेताओं की कतार लग जाती है। हादसा जितना हिलाने वाला हो, कतार उतनी ही लंबी, और कतार में नेता उतने ही बड़े कद के। इसके अलावा प्राकृतिक विपदाओं के समय भी सरकार में बैठे नेताओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे जल्द से जल्द बाढ़ या भूकंप या समुद्री तूफान, सुनामी के शिकार लोगों के बीच पहुंचें।
ऐसी उम्मीदों के बीच यह बात याद दिलाना जरूरी है कि अमरीका में कुछ बरस पहले जब सबसे बुरा तूफान आया, तो राष्ट्रपति बराक ओबामा कई दिन तक वहां नहीं गए, और उन्होंने बताया कि वे स्थानीय प्रशासन को बचाव-राहत में लगे रहने देना चाहते थे, राष्ट्रपति के पहुंचने से उनको उनके इंतजाम में लग जाना पड़ता है। यह बात अस्पतालों में घायलों को देखने जाने वालों पर भी लागू होती है, और बीमार या ऑपरेशन से उबर रहे लोगों को देखने जाने पर भी। यह बड़ी सामान्य समझबूझ की बात है कि अस्पताल में इलाज पा रहे लोगों का ऐसे नेताओं, या मीडिया के लोगों के आने-जाने से कोई फायदा तो हो नहीं सकता, उनका नुकसान जरूर हो सकता है, उनको संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है, और बढ़ता ही है। लेकिन नेताओं को जाकर जख्मी या मरीज के बगल खड़े रहकर तस्वीरें खिंचवाना अच्छा लगता है, फिर चाहे इससे मरीज के मरने का खतरा ही क्यों न बढ़ जाए। बड़े-बड़े नेताओं के पहुंचने पर अस्पतालों का इंतजाम तबाह हो जाता है, लंबी-चौड़ी भीड़ जुट जाती है, और अस्पताल का स्टॉफ मरीज को छोड़, नेताओं को देखने में लग जाता है।
हमारी यह सलाह है कि अस्पतालों में मरीज तक पहुंचना पूरी तरह से रोकना चाहिए, और डॉक्टर अगर किसी को इजाजत दे सकते हैं, तो वह मरीज के परिवार तक सीमित रहनी चाहिए। न तो मीडिया को, और न ही नेताओं को मरीज या जख्मी तक पहुंचने देना चाहिए, क्योंकि तस्वीरें खिंचवाने का ऐसा मौका उन बेबस जख्मियों का नुकसान छोड़ और कुछ नहीं करता। यह सिलसिला खत्म करने के लिए अगर नेताओं की तरफ से खुद पहल नहीं होती है, तो भी हमारा मानना है कि यह एक जनहित याचिका के लायक मुद्दा है, और अदालत ऐसी रोक लगा सकती है। हमारा यह भी मानना है कि जिस तरह गुजरात के घायल दलितों की तरफ से राजनीति न करने की बात उठी है, उस तरह की बात भी जनता के बीच से कई तबकों से उठनी चाहिए, और हमदर्द नेताओं से कहा जाना चाहिए कि अपनी सरकार या अपनी पार्टी की तरफ से जो मदद भेज सकें, वह भेज दें, और फोटो खिंचाने न आएं।

इससे न मायावती का नुकसान, न वेश्या का

संपादकीय
21 जुलाई  2016
उत्तरप्रदेश में चुनाव के ठीक पहले एक तरफ तो भाजपा दलितों को साथ जोडऩे के रास्ते ढूंढ रही है, और दूसरी तरफ उसके प्रदेश उपाध्यक्ष ने देश की सबसे बड़ी दलित राजनेता मायावती के बारे में सार्वजनिक बयान दिया कि वे वेश्या से भी गई बीती हैं। संसद के भीतर भाजपा के एक बड़े मंत्री को इस पर खेद जताना पड़ा, और पार्टी के इस बकवासी नेता को छह बरस के लिए पार्टी से निलंबित करना पड़ा। लेकिन जो नुकसान होना था, वह तो हो चुका है, और यह नुकसान अभी थमने वाला भी नहीं है, क्योंकि गुजरात में दलितों को जिस तरह से गौरक्षकों ने पुलिस की मेहरबानी से मारा है, वह दुनिया के सामने है, वहां दलित उबले हुए हैं, और सड़कों पर हैं। दूसरी तरफ कई महीनों से हैदराबाद यूनिवर्सिटी के रोहित से लेकर जेएनयू के छात्रों तक के खिलाफ स्मृति ईरानी ने जो कुछ किया था, उसे लेकर भी दलित खफा चल ही रहे थे। और कल ही शायद इस जगह पर हमने गोमांस पर रोक को लेकर यह लिखा ही है कि किस तरह इससे देश की एक बड़ी आबादी नाराज है।
लेकिन सवाल यह है कि भाजपा का एक के बाद एक नेता अगर लगातार इस तरह की हिंसक और हमलावर बयानबाजी जारी रखेगा, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विकास और आर्थिक आत्मनिर्भरता का एजेंडा कहां जाएगा? कल जब यह आग लगी ही हुई थी, तो इसी उत्तरप्रदेश में अपनी साम्प्रदायिकता के लिए कुख्यात भाजपा के एक विधायक संगीत सोम ने आजम खां के बनवाए विश्वविद्यालय को लेकर बयान दिया कि वह आतंक का अड्डा है, इस यूनिवर्सिटी को आतंकियों की फौज तैयार करने के लिए बनाया गया है। अब एक तरफ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ रमजान के मौके पर इफ्तार दावत रख रहा है, और मुस्लिमों के साथ बातचीत को आगे बढ़ाना चाहता है, दूसरी तरफ भाजपा के मंत्री, सांसद, विधायक, और पदाधिकारी एक दिन भी बिना किसी नई आग के पार नहीं होने देते हैं। फिर भाजपा से जुड़े हुए दूसरे संगठन इसी तरह के कई हमलावर काम कर रहे हैं। पंजाब में कश्मीर के मुस्लिम ट्रक ड्राइवरों की गाडिय़ों को रोका गया, उन्हें उतारा गया, उनसे पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगवाए गए, भारत माता जिंदाबाद के नारे लगवाए गए, और पाकिस्तान के झंडे उनसे जलवाए गए। यह पूरा सिलसिला देश के भीतर एक निहायत गैरजरूरी तनाव और टकराव खड़ा कर रहा है, और एक तरह का बंटवारा कर रहा है।
लेकिन हम फिर मायावती को दी गई गाली पर लौटें, तो हिन्दू संस्कृति और भारतीय संस्कृति की रात-दिन दुहाई देने वाली भाजपा के इतने बड़े-बड़े नेता अगर  देश की सबसे बड़ी दलित नेता मायावती के बारे में ऐसी गंदी बातें कैमरों के सामने कहते हैं, तो इससे उन्हीं के कंधों पर उठाए हुए हिन्दू धर्म, और उन्हीं के कंधों पर उठाई हुई भारतीय संस्कृति, दोनों की बेइज्जती होती है। किसी भी धर्म या संस्कृति की पहचान उसका झंडा लेकर चलने वाले लोगों के काम से होती है। इस्लाम के नाम पर गैरलोकतांत्रिक देशों में आतंकी खून-खराबे करने वाले लोग खून कम बहाते हैं, इस्लाम का नाम अधिक बदनाम करते हैं। और वैसा ही काम हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म का नाम लेकर राजनीति करने वाले लोग करते हैं, जब वे देश के एक प्रमुख नेता को वेश्या से गई बीती कहते हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनकी पार्टी, और पार्टी के साथ जुड़े हुए आरएसएस जैसे संगठनों को चाहिए कि अपने साथियों की ऐसी बदजुबानी को बंद करवाने का इंतजाम करें, क्योंकि इससे न मायावती का कोई नुकसान, न वेश्या का कोई नुकसान है, नुकसान है तो ऐसी बकवासियों के संगठनों का ही है। वेश्या तो महज अपनी देह बेचती है, न कि ऐसे बकवासी नेताओं की तरह देश की शांति बेचती है।