मॉल्स में खरीददारी से नहीं मिलती महानता

संपादकीय
18 जनवरी 2017


पिछले दो-चार दिनों में उन एक दर्जन उपन्यासों की फेहरिस्त आई है जो अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी पसंद से छांटे हैं। अपनी पढ़ी हुई इन किताबों के अलावा उन्होंने उन किताबों को भी एक इंटरव्यू में गिनाया है जो उन्होंने अपनी बेटियों को पढऩे के लिए दी हैं। और इनमें से हर एक पसंद के लिए उन्होंने वजह भी गिनाई है। आज हिन्दुस्तान में ऐसे कितने लोग हैं जो कि अपने बच्चों के लिए किताबें छांटते हैं, और फिर उन्हें तोहफे में देते हैं कि वे पढ़ सकें? और बच्चों से परे भी ऐसे कितने लोग हैं जो कि खुद भी किताबें पढ़ते हैं? अभी कुछ समय पहले एक किसी प्रमुख व्यक्ति की जिंदगी की कहानी आई थी कि जब वे अपनी बेटी के लिए रिश्ता देखने गए थे तो वहां लड़के वालों के महल जैसे घर को देखकर भी बिना रिश्ता किए लौट आए थे, क्योंकि उन्हें वहां किताबें नहीं दिखी थीं। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने कुछ हफ्ते पहले दुनिया की एक सबसे बड़ी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के मुखिया बिल गेट्स की बताई हुई एक लिस्ट छापी थी कि पिछले दिनों उन्होंने कौन-कौन सी किताबें पढ़ी थीं, और उनमें से वे कौन सी किताबों को पढऩे की सिफारिश करते हैं।
दिल्ली में अभी हुए विश्व पुस्तक मेले की खबरें बताती हैं कि प्रकाशक और किताबें दोनों घटते चले जा रहे हैं। शहरों में हम देखते हैं कि लोगों की खरीददारी और उनके वक्त गुजारने की जगह किताबों से परे की ही रहती हैं। जो संपन्न लोग हैं, उन्हें अपने बच्चों और मेहमानों को घुमाने-फिराने, दिखाने, और खरीददारी कराने के लिए मॉल्स ही मिलते हैं। बहुत ही कम लोग ऐसे हैं जो कि तोहफे में किताबें देने पर भरोसा रखते हैं। यह एक खतरनाक नौबत इसलिए है कि आज दुनिया में अधिकतर लोग अपनी पसंद से परे, और अपनी जरूरत से परे के मनोरंजन पर वक्त गुजारते हैं। कोई किताब तो अपनी पसंद की हो सकती है, लेकिन जब घर के साथ बैठकर लोग टीवी देखते हैं, तो उसमें न तो उनकी पसंद रहती, और न ही उनकी जरूरत रहती, और नतीजा यह होता है कि उनसे उनको हासिल भी कुछ नहीं होता।
किसी सभ्यता के विकसित होने में हजारों बरस से किताबों का एक बेमिसाल योगदान रहते आया है, और आज उस योगदान की जरूरत को बिल्कुल ही भुला दिया गया है। ऐसा भी नहीं है कि लोगों के पास पढऩे को वक्त नहीं है, लेकिन आज लोग अपने फोन पर, अपने कम्प्यूटर पर, सोशल मीडिया पर इस कदर उलझे रहते हैं, कि अपनी जरूरत और अपनी पसंद तक वे पहुंच भी नहीं पाते। एक सुनामी के बेकाबू सैलाब की तरह अनचाही चीजें लोगों तक पहुंचती रहती हैं, और उन्हें पलटकर, देखकर, डिलीट करने में ही उनका वक्त निकल जाता है। किताबों के साथ जितनी गंभीरता से लोगों का रिश्ता बनता था, और पढऩे वालों के साथ आज भी बनता है, वह फोन और इंटरनेट पर नहीं बनता, जहां पर कि लोग फिजूल की बातों में उलझते ही रहते हैं।
आज किसी को यह सलाह देना पता नहीं काम की बात है या नहीं, लेकिन लोगों को अपने खर्च का एक हिस्सा, चाहे बहुत थोड़ा ही हिस्सा, किताबों पर खर्च करना चाहिए, और यह याद रखना चाहिए कि दुनिया के अधिकतर महान और कामयाब लोग किताबों की सीढिय़ों से चढ़कर ही ऊपर तक पहुंचते हैं, मॉल्स में खरीददारी करके नहीं।

सपा के शहंशाह अकबर के पांव आखिर जमीन पर टिके

संपादकीय
17 जनवरी 2017


उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी में चल रहे एक गैरफिल्मी दंगल का फिलहाल खात्मा सा दिखता है, और वह चुनाव आयोग का एक सही फैसला भी लगता है। मुलायम सिंह यादव शहंशाह अकबर के अंदाज में पार्टी नाम की अनारकली को दीवार में चुनवा रहे थे, लेकिन मामला चुनाव आयोग में जाने पर साबित हुआ कि उनके पास न ईंट थी, न रेत थी, न सीमेंट थी, और न ही राजमिस्त्री था। नतीजा यह हुआ कि समाजवादी पार्टी के जो विरोधी इसके चुनाव चिन्ह, साइकिल, के जब्त हो जाने की उम्मीद कर रहे थे, वे अब हताश होकर बैठ गए हैं। अब लोगों को यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि बाप-बेटे के बीच दंगल करवाने का ठेका अगर किसी राष्ट्रीय दलाल ने लिया था, तो उसे अब दलाली कहीं से मिलेगी, या नहीं मिलेगी? और आयोग के फैसले से मुलायम सिंह का वह नशा भी टूटा होगा जिसके चलते वे अपनी पार्टी को अब तक अपनी सनक की जागीर मानकर चल रहे थे, और अपने मुख्यमंत्री बेटे को घर में नंगे खेलने वाला टीपू मानकर चल रहे थे। चुनाव आयोग के सामने जमा किए गए सांसदों और विधायकों के सैकड़ों हलफनामों ने यह साबित कर दिया कि टीपू ही सुल्तान है, और मुलायम की जगह अब वृद्धाश्रम रह गई है।
समाजवादी पार्टी की कुनबापरस्ती के बारे में हम सौ बार लिख चुके हैं, लेकिन उत्तरप्रदेश में मुलायम-अखिलेश का कुनबा एक राजनीतिक हकीकत है, और इन दोनों के बीच जब किसी को चुनने की बात आती है, तो जाहिर तौर पर समझदार लोग अखिलेश को चुनेंगे, क्योंकि मुलायम एक राष्ट्रीय दलाल के हाथों खेलते भी दिख रहे हैं, और वे उत्तरप्रदेश से एक बेहतर सरकार को खत्म करने की तरफ भी बढ़ रहे थे। यह समाजवादी पार्टी के भीतर एक अच्छी नौबत रही कि पार्टी नेताओं का बहुमत अपनी जीत की संभावनाओं को देखते हुए अखिलेश के साथ रहा, जिन्होंने खुलकर यह घोषणा पहले ही कर दी थी कि वे कांग्रेस के साथ गठबंधन के हिमायती हैं। दूसरी तरफ मुलायम अपने सलाहकारों के साथ बार-बार यह घोषणा कर चुके थे कि वे किसी भी पार्टी से कोई गठबंधन नहीं करेंगे।
फिलहाल उत्तरप्रदेश की चुनावी राजनीति पर इससे होने वाला फर्क अगर देखें, तो यह साबित होता है कि एक नई पीढ़ी के, बेहतर सोच वाले अखिलेश यादव की पीढ़ी ने उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी की राजनीति को सम्हाल लिया है, और इस नौजवान में यह समझ भी है कि कांग्रेस पार्टी एक समविचारक पार्टी हो सकती है, और उसके साथ तालमेल करके चुनाव लडऩा बेहतर होगा। उत्तरप्रदेश की राजनीति में कांग्रेस अपने दम पर सपा के पासंग भी नहीं बैठती, लेकिन इन दोनों के नौजवान नेताओं के साथ मिलकर चुनाव लडऩे से साम्प्रदायिकता-विरोधी वोटों के छिन्न-भिन्न होने की गारंटी नहीं रह जाएगी, और वहां सपा-कांग्रेस दोनों को खासा फायदा होगा। अब उत्तरप्रदेश की राजनीति का एक दूसरा पहलू यह भी है कि वहां भाजपा के विरोधी दो खेमे आपस में एक-दूसरे से सांप-नेवले जैसे संबंध रखते हैं, और जिनके बीच किसी तरह का तालमेल मुमकिन नहीं है, इसलिए भाजपा-विरोधी वोट वहां पर सपा गठबंधन और बसपा के बीच बंटेंगे, और भाजपा इसी को लेकर बड़ी उम्मीद लगा सकती है। उत्तरप्रदेश अब एक त्रिकोणीय मुकाबला जरूर देखने जा रहा है, और चुनाव के बाद हो सकता है कि अंकगणित के आधार पर एक त्रिशंकु विधानसभा भी बन जाए, और उस वक्त इन तीनों पार्टियों में से किसी का एक-दूसरे के साथ जाना एक अजीब के साथ हमबिस्तर होने सरीखा रहेगा, लेकिन वैसी नौबत भी देखना दिलचस्प होगा।
फिलहाल चुनाव आयोग ने उत्तरप्रदेश के चुनाव को साइकिल की रफ्तार से आगे बढ़ा दिया है, और आगे जनता सोचेगी कि उसे किसमें अपनी बेहतरी दिखती है।

निजी जिंदगी से लेकर राजनीति और सरकार तक अकेलेपन के घेरे में मोदी

आजकल
16 जनवरी 2017  
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के पहले से ही खबरों में इस कदर हैं कि सारा मीडिया उनको छापने और दिखाने पर मजबूर और बेबस रहता है। वे शायद पहले ऐसे भारतीय प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने अपने विदेशी दौरों में मीडिया को साथ ले जाना बंद कर दिया है। अब उनके साथ महज सरकारी टीवी और सरकारी रेडियो के लोग जाते हैं, और मोदी से खबरें इतनी निकलती हैं कि तमाम बड़े अखबार या छोटे-बड़े सभी किस्म के समाचार चैनल अपने खर्च पर अपनी टीम उनके पहुंचने के पहले उन विदेशी शहरों में पहुंचाकर वहां से रिपोर्टिंग शुरू कर चुके रहते हैं। इस मायने में मोदी से अधिक कामयाब समाचार-महत्व का नेता और कौन होगा जो न खिलाता है, न पिलाता है, न घुमाता है, और न ही विदेश से पत्रकारों को बिना कस्टम पटाए सामान लाने देता है, फिर भी सबसे अधिक कवरेज पाता है!
लेकिन हमारी हैरानी की ये बातें यहां पर थमती हैं, और यहां से आगे जब हम एक उलझी हुई हकीकत की बात करते हैं, तो यह लगता है कि मोदी अपनी निजी जिंदगी से लेकर अपनी राजनीति तक, और अपनी सरकार से लेकर अपनी नीतियों तक एक बहुत ही अकेले इंसान हैं, जिनके पास न बांटने को कोई है, न किसी से पाने के लिए उनके इर्द-गिर्द कोई है। हम मोदी की निजी जिंदगी को महज उनके व्यक्तित्व के इस जटिल पहलू को समझने जितना ही छू रहे हैं, और हमें दिख रहा है कि किस तरह वे शादी के तुरंत बाद से पत्नी से अलग रहे, अपनी मां और अपने भाईयों के परिवार से अलग रहे, एक संघ प्रचारक के रूप में शायद वे बिना परिवार रहने के आदी हो गए। इसके अलावा जब हम गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनको देखते हैं, तो वे गुजरात दंगों के लिए अपने रूख को लेकर शायद अकेले थे, और उनकी सरकार में भी उनके इर्द-गिर्द सामूहिक जिम्मेदारी वाली कोई बात न 2002 के दंगों के वक्त थी, और न शायद तब से लेकर अब तक उनके सत्ता के लगातार सफर में कभी रही। 
लोगों को यह अच्छी तरह याद है कि मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के समानांतर अपना एक ढांचा खड़ा कर लिया था, और वे उसी पर निर्भर बताए जाते थे, बल्कि उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद जैसे कई हिन्दू संगठनों को भी किनारे कर रखा था, और गुजरात के जानकार बताते हैं कि मोदी के कार्यकाल में तोगडिय़ा जैसे लोग हाशिए से भी और बाहर धकेल दिए गए थे। इस तरह मोदी परिवार से अलग, दोस्तों के बिना, पार्टी और सरकार में सामूहिक जवाबदेही वाली किसी टीम के बिना, और एकदम अकेले काम करने के आदी इंसान दिखते हैं। उनके बारे में जितनी जानकारी आम है, उनको जितना अधिक बारीकी से देखें, उतना ही अधिक यह बात सही लगती है कि वे अकेलेपन के इस कदर शिकार हैं कि भारतीय जनता पार्टी और केन्द्र सरकार दोनों अपनी दो जेबों में रहने के बावजूद उन्हें पार्टी चलाने के लिए अपने एक सबसे भरोसेमंद अमित शाह को पार्टी का मुखिया बनाना पड़ा, और अमित शाह से उनका घरोबा एक अकेलेपन सा घरोबा है, किसी टीम जैसा नहीं है। 
अब एक बात यह समझ आती है कि भाजपा के भीतर मोदी के अलावा बाकी किसी की कोई आवाज न रह जाने, और सरकार में मोदी से परे किसी की कोई ताकत न रह जाने का एक नतीजा यह भी है कि मोदी के तमाम फैसले उनके निजी फैसले दिखाई देते हैं, और उनमें से किसी के पीछे सामूहिक विचार-विमर्श, सामूहिक जिम्मेदारी की बुनियाद दिखाई नहीं देती है। उनके अब तक के कार्यकाल का रूख यही रहा है कि उनके लिए विदेश मंत्री का कोई अस्तित्व नहीं है, और तमाम विदेश नीति वे अकेले तय करते हैं, किसी देश से भारत लौटते हुए अचानक पाकिस्तान रूककर नवाज शरीफ का जन्मदिन मनाकर, उनके घर शादी की दावत पर जाकर, उनके परिवार से मिलकर, सारी विदेश नीति वे पल भर में खुद तय करते हैं। जाहिर है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आज केन्द्र सरकार में एक बड़े ओहदे पर रहने के बावजूद अपनी उस ताकत का एक हिस्सा भी नहीं रखतीं जो कि वे लोकसभा में विपक्ष की नेता रहते हुए रखती थीं। 
कुछ ऐसा ही हाल वित्तमंत्री अरूण जेटली का है जो कि ओहदे के हिसाब से देश के सबसे ताकतवर आधा दर्जन मंत्रियों में से एक रहने चाहिए थे, लेकिन ऐसा लगता है कि नोटबंदी की घोषणा से उनको महज इतना ही समय मिल पाया होगा कि अपने लाख-दो लाख रूपए वे बैंकों से बदलवा सकें। भारत की इतिहास का यह अकेला ऐसा फैसला था जिसने जिंदगी को इस कदर उथल-पुथल कर दिया, और अब धीरे-धीरे यह खुलासा होते जा रहा है कि किसी जरा भी काबिल वित्तमंत्री को अगर ऐसे फैसले की समय रहते हवा लगती, तो देश में इतनी बदहाली, और इतनी बदइंतजामी नहीं हुई रहती, और लोगों की जिंदगी इस कदर जहन्नुम न बनी होती। 
लेकिन हम इन पुराने मुद्दों पर जाना नहीं चाहते हैं, हम मोदी का विश्लेषण कर रहे हैं जो कि एक बहुत ही अकेला इंसान पेश करता है। और इस अकेलेपन के साथ-साथ मोदी की कई और दिक्कतें भी हैं। पहली तो यह कि संसद और केन्द्र सरकार में आने के पहले उन्हें इन दोनों में काम का एक दिन का अनुभव नहीं था। नतीजा यह था कि जिस दिन वे पहली बार संसद में घुसे, उस दिन वे पहली बार संसद को भीतर से देख रहे थे, इसके पहले वे दर्शकदीर्घा से भी संसद की कार्रवाई देखे हुए नहीं थे। और केन्द्र सरकार में काम का तजुर्बा लोगों को अपने राज्य से बाहर बाकी हिन्दुस्तान को देखने-समझने का मौका देता है, और ऐसा मौका मोदी को कभी नसीब नहीं हुआ था, इसलिए भी वे इस सरकार में आने के बाद अपनी हिचक के कैदी रहे, और खबरें बताती हैं कि वे गुजरात में अपने साथ काम कर चुके अफसरों पर दिल्ली आकर भी बहुत आश्रित रहे, और उन्हें दिल्ली लेते आए। 
पार्टी के भीतर जिन राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री थे, उनमें से कम से कम दो बड़े राज्यों के मुख्यमंत्री मोदी के प्रधानमंत्री बनने तक उनके खिलाफ तेवर रखने वाले रहे। राजस्थान की वसुंधरा राजे, और मध्यप्रदेश के शिवराज सिंह, इन्होंने तो मोदी के चुनाव प्रचार के वक्त भी मोदी की हस्ती को बहुत बाद में जाकर माना था, और पोस्टरों पर इजाजत दी थी। इन दो के मुकाबले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह मोदी के लिए अधिक सहूलियत के रहे जो कि पार्टी के भीतर किसी गुटबाजी से परे राष्ट्रीय नेतृत्व को बिना विवाद मानते आए हैं, और उन्होंने मोदी की लहर को न अनदेखा किया, न अनसुना किया, और न उसका अनादर किया। लेकिन कुल मिलाकर मोदी अपनी पार्टी के मुख्यमंत्रियों के बीच भी अकेले और अलग से रहे। 
भारत जैसे विविधता से भरे हुए, विभिन्न विचारधाराओं और धर्म-जातियों वाले समुदायों वाले इस देश पर एकमुश्त राज करने के लिए मोदी का तजुर्बा अकेले ही काफी नहीं हो सकता था, और इसीलिए उनकी सरकार आने के बाद से उग्र राष्ट्रवाद, उग्र साम्प्रदायिकता, उग्र ब्राम्हणवादी गौरक्षक हिंसा, उग्र असहिष्णुता का सैलाब सा आ गया, उनकी पार्टी के नेता और मंत्री गांधी को एक बार फिर मारने और गोडसे को एक बार फिर स्थापित करने में लग गए, और इसका भारत के विशाल नक्शे पर नुकसान मोदी सोच नहीं पाए, आज भी उन्हें इसका एहसास नहीं है। निजी जीवन से शुरू और राजनीतिक जीवन से लेकर सरकारी जिम्मेदारियों तक जो अकेलापन मोदी को घेरे हुए है, वह घेरा मोदी तक देश और दुनिया की समझ को भी ठीक से पहुंचने नहीं दे रहा है, और यह घेरा उनका अपना उसी किस्म का खोल है जिसके भीतर एक कछुआ अपने को महफूज पाता है। लेकिन भारत के लोकतंत्र के लिए ऐसा अकेला प्रधानमंत्री ठीक नहीं है जिसके इर्द-गिर्द बोलने की ताकत रखने वाले तजुर्बेदार नेताओं की पहुंच नहीं है। 
यहां यह समझना कुछ मुश्किल है कि इस अकेलेपन ने मोदी को आत्मकेन्द्रित और आत्ममुग्ध बना दिया है, या कि उनके आत्मकेन्द्रित और आत्ममुग्ध होने से वे मेले में अकेले रहते आए हैं। लोग उनकी जीवनशैली, उनकी कार्यशैली, और उनके व्यक्तित्व की कमजोरियों को लेकर उन्हें महत्वोन्मादी भी कहते हैं कि वे हर जगह, हर पल महत्व ढूंढते हैं, और विदेशी प्रमुख नेताओं के साथ उनकी गर्मजोशी को वे इसी का एक सुबूत मानते हैं। बॉडी लैंग्वेज के अधिक जानकार मोदी के तौर-तरीकों को बेहतर समझ और समझा सकते हैं, फिलहाल अपने ऐसे तमाम फैसलों के लिए, तौर-तरीकों के लिए मोदी अकेले ही जिम्मेदार दिखते हैं, क्योंकि उनके आसपास कोई सलाहकार तो मौजूद है नहीं।

ये तमाम बातें मोदी को कुछ दूरी से देखकर ही लिखी जा रही हैं, लेकिन ये बहुत ही आम जानकारी की बुनियाद पर किया गया एक विश्लेषण है, ऐसी आम जानकारी जो कि आसपास के सभी लोगों ने दूर-दूर से मोदी को देख-देखकर पिछले दशकों में लिखी हैं। मोदी को जो अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा सुहाते हैं, उनकी सरकार को भी वहां पर प्रशासन कहा जाता है जिसमें अनगिनत सलाहकार रहते हैं, विश्लेषक रहते हैं, और थिंक टैंक रहते हैं। मोदी के मुनादियों वाले फैसलों से लेकर देश के जलते मुद्दों पर उनकी ऐतिहासिक चुप्पी तक यह जाहिर करते हैं कि वे अकेले चलने की एक अनोखी मिसाल हैं, और भारत में तो आज राष्ट्रपति शासन प्रणाली भी नहीं है। ऐसा अकेलापन दुनिया के राज में, दुनिया के कारोबार में लोगों से अनगिनत आत्मघाती गलतियां भी कराता है, और मोदी भी इस नुकसान से बचे हुए नहीं हैं। दिक्कत यह है कि सत्ता पर बैठे लोग जब गलतियां करते हैं, तो उनके दाम जनता चुकाती है।

बांग्लादेश की हत्यारी पुलिस को थोक में फांसी की सजा, भारत में भी सरकारों को सोचने की जरूरत

संपादकीय
16 जनवरी 2017


बांग्लादेश की एक अदालत में आज एक हत्याकांड में 26 लोगों को मौत की सजा सुनाई है जिसमें एक भूतपूर्व अवामी लीग नेता भी शामिल है, और वहां की पुलिस के एक खास दस्ते के 17 अधिकारी-कर्मचारी भी शामिल है। इन लोगों पर 7 लोगों के अपहरण और हत्या का आरोप था, मरने वालों की लाशें 2014 में एक नदी में तैरती मिली थीं। नारायण गंज हत्याकांड के नाम से कुख्यात इस जुर्म में बांग्लादेश रैपिड एक्शन बटालियन के 25 लोगों पर आरोप थे। लोगों को याद होगा कि पंजाब या कुछ और जगहों पर इसी तरह अपहरण और हत्या, या मुठभेड़-हत्याओं के मुकदमे चले हैं, और कई जगहों पर ऐसा करने वाले पुलिस अधिकारियों को मौत की सजा थोक में हुई है। फिर इस तरह की हत्याओं से परे मुम्बई जैसे शहर में संगठित अपराधियों को मारने के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों पर भी लगातार बेकसूरों को मारने के मामले चले हैं, और कुछ ऐसे कुख्यात अफसरों पर फिल्में भी बनी हैं। मुम्बई से यह बात सामने आई थी कि जुर्म के आरोपियों या फरार मुजरिमों को मारकर हीरो बनने वाले ऐसे पुलिस अफसर खुद किस तरह धीरे-धीरे जमीन-जायदाद के धंधे में भूमाफिया बनकर करोड़ों कमाने लगे। पंजाब की पुलिस के बारे में यह बात कई बार सामने आई कि आतंक के मोर्चे पर काम करने वाली पुलिस खुद किस तरह नशे की तस्करी का धंधा करने लगी, और किस तरह उसने मानवाधिकारों को कुचलते हुए बेकसूरों को मारा।
बांग्लादेश से लेकर पंजाब, मुम्बई, और दूसरी जगहों से होते हुए अगर बस्तर तक आएं, तो यहां की पुलिस भी इसी तरह के आरोपों से घिरी हुई है। पिछले बरसों में बस्तर के नक्सल मोर्चे पर काम करने के लिए पुलिस और सुरक्षा बलों को जिस तरह की छूट दी गई है, उससे मानवाधिकार कुचलने से लेकर बस्तियों को जलाने तक, बेकसूर नाबालिगों को नक्सली बताकर मारने तक, आदिवासी लड़कियों से बलात्कार करने और बेकसूरों को नक्सली बताकर उनका समर्पण करवाने तक कई तरह के काम तरह-तरह की जांच में सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट से लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक ने इस बात को सही पाया है कि बस्तर में सुरक्षा बल और खासकर छत्तीसगढ़ की पुलिस इस तरह के सारे संगठित जुर्म में शामिल रही है। बांग्लादेश का यह ताजा फैसला न सिर्फ छत्तीसगढ़ पुलिस, बल्कि छत्तीसगढ़ सरकार के लिए भी फिक्र पैदा करने वाला होना चाहिए कि सरकारी सुरक्षा कर्मचारी जरूरत से अधिक आजादी और संविधानेतर अधिकार पाने पर, जवाबदेही न रहने पर किस तरह के जुर्म की लत में फंस जाते हैं, और बाद में इंसाफ का वक्त लौटने पर किस तरह वे सजा भी पाते हैं। हिन्दुस्तान की न्यायपालिका में दशकों बाद भी ऐसे फैसले हुए हैं जिनमें बड़े-बड़े दिग्गज और नामी-गिरामी पुलिस अफसरों को उनके वफादार मातहत कर्मचारियों के साथ फांसी और उम्रकैद जैसी सजा भी हुई है, जबकि उनका वक्त चलते समय उनके इलाकों में उनका कहा हुआ ही कानून रहता था। आज ऐसी बातों को लेकर छत्तीसगढ़ में खुले दिमाग से यह सोचने की जरूरत है कि क्या भविष्य में यह राज्य ऐसे ही किसी खतरे को झेलने नहीं जा रहा है?
फिर हमारा यह भी मानना है कि बलात्कारी या कातिल पुलिस को जितनी सजा जब मिलनी है, तब मिलती रहे, लेकिन उससे परे भी क्या सत्ता पर बैठे हुए बाकी नेताओं और अफसरों की यह जिम्मेदारी नहीं बनती है कि छत्तीसगढ़ के सबसे मासूम और सबसे सीधे-सरल इलाके बस्तर के आदिवासियों पर इस तरह की हिंसा और जुर्म की जो खबरें आती हैं, उन तमाम खबरों को नक्सल-हिमायतियों का शोर करार न देकर आरोपों की ईमानदारी और गंभीरता से जांच करवाई जाए। आज प्रदेश के भीतर या प्रदेश के बाहर, मीडिया, सामाजिक कार्यकर्ता, या मानवाधिकार आंदोलनकारी, यहां तक कि गरीब और बेबस आदिवासियों के मुकदमे मुफ्त में लडऩे वाले सामाजिक प्रतिबद्धता से समर्पित वकीलों को भी पुलिस नक्सल करार दे रही है, और उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल रही है। भारत के कानून के साथ दिक्कत यह है कि ऐसे मामलों में फंसाए गए बेकसूर को भी जेल से निकलने में बरसों लग जाते हैं, और यह पूरा सिलसिला बस्तर में एक निलंबित-लोकतंत्र का सुबूत बनकर दर्ज होते जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार और भारत के बाकी राज्यों की सरकारों को भी बांग्लादेश के इस ताजा फैसले को देखते हुए अपनी पुलिस और अपने सुरक्षा बल को दी गई अंधाधुंध छूट के बारे में फिर सोचना चाहिए कि भविष्य का इतिहास इसे किस तरह दर्ज करेगा। 

मौतों पर मुआवजों के लिए राष्ट्रीय नीति की जरूरत...

संपादकीय
15 जनवरी 2017


पटना में एक नाव हादसे में दो दर्जन के करीब मौतों के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सारे कार्यक्रम रद्द कर दिए और मरने वालों को लिए अलग-अलग मुआवजों का ऐलान किया है। ऐसे हर हादसे पर मुआवजा एक सरीखा नहीं रहता, जबकि मौत तो मौत रहती है, और कोई एक मरे तो भी वह मौत है, और दर्जनों लोग एक साथ मरे तो भी वह मौत है। फिर इसके बाद यह भी रहता है कि किसी राज्य में या उसके पड़ोस में अगर चुनाव होने हैं तो कई बार मौत पर मुआवजे के रेट बढ़ जाते हैं। कभी-कभी यह भी होता है किसी जाति या धर्म की भीड़ की मौत होने पर उस समुदाय की एकजुटता और ताकत को देखते हुए भी उस पर गम कम या अधिक होता है, और ऐसा ही हाल मुआवजे का होता है।
भारत जैसे लोकतंत्र में जहां एक संघीय ढांचा है, और जहां केन्द्र और राज्य सरकारें ऐसे हादसों पर हमेशा ही मुआवजे की घोषणा करती हैं, वहां इसमें एकरूपता की जरूरत है। एक किस्म की मौतों पर बिना किसी मुनादी के, बिना किसी राजनीतिक लुभावने फायदे के, सरकार की तरफ से एकमुश्त, एक मुआवजा घोषित हो जाना चाहिए, दिया जाना चाहिए, और इसके अलावा अलग-अलग कई मुआवजे बंद होने चाहिए। हमारा ख्याल है कि मुआवजे का जिम्मा और अधिकार राज्यों को दिया जाना चाहिए क्योंकि भारत का हर हिस्सा किसी न किसी राज्य या केन्द्र प्रशासित प्रदेश के तहत ही आता है। भारत सरकार किसी मौत पर मुआवजा तभी दे जब ऐसी मौत देश के बाहर होती हो, और केन्द्र सरकार पर सीधे जिम्मा आता हो।
अब जरा बात मुआवजे की रकम पर हो जाए। भारत में मौतें प्राकृतिक विपदाओं के कारण होती हैं, और फिर मानव निर्मित दुर्घटनाओं में भी होती हैं। ऐसी मानव निर्मित दुर्घटनाएं कई बार सरकारों की तैयारी की नाकामयाबी से होती हैं, और कभी-कभी लोगों की निजी गलती से भी होती हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों को ऐसे तमाम मुआवजों के लिए अलग-अलग दर्जे तय करना चाहिए, और मदद की रकम भी तय करना चाहिए। आज देश में जितने तरह की बीमा कंपनियां काम कर रही हैं, सरकारें अगर चाहें तो आम जनता की किसी भी तरह की मौत पर परिवार के बाकी लोगों को मदद के लिए मुआवजा देने का बीमा भी करवाया जा सकता है। हमारा ख्याल है कि किसी भी तरह के मुआवजे से आयकरदाता तबके को बाहर रखना चाहिए, क्योंकि वह तबका ऐसे नुकसान को उठा सकता है। इससे परे जब कोई गरीब परिवार किसी कमाऊ सदस्य को खोता है, तो परिवार पर मुसीबत टूट पड़ती है। ऐसे में सरकार को मुआवजे की रकम अधिक भी रखनी चाहिए। इसके लिए संसद में या विधानसभाओं में व्यापक विचार-विमर्श के बाद नियम-शर्तें और पैमाने तय करने चाहिए, ताकि मौतों पर मुआवजे का ऐलान राजनीतिक नफे की कोशिश जैसा न रह जाए। ऐसा इसलिए भी होना चाहिए कि इंसानी जान की कीमत एक जैसी लगानी चाहिए, मौत अकेले हो तो वह सस्ती है, और वह थोक में हो तो वैसी जिंदगियां महंगी हैं, यह बात न्यायसंगत नहीं है। यह बात विधानसभा और संसद शायद खुद होकर न उठे क्योंकि हर नेता को मुआवजे की ऐसी घोषणा करने में महत्व का अनुभव होता है, और वे शायद ही इस लालच को छोड़ सकें, ऐसे में जनता के बीच से यह बात उठनी चाहिए कि राष्ट्र की मुआवजा नीति क्या हो, और वह राज्यों की सहमति से कैसे बनाई जाए।

गांधी की अस्थियों को राजघाट से देशनिकाला भी दे दिया जाए

संपादकीय
14 जनवरी 2017


बीबीसी जंगली जानवरों पर एक फिल्म बना रही है और इस दौरान शूटिंग के लिए उसने राजस्थान के जंगलों में बंदरों के बीच एक ऐसा बंदर का पुतला बनाकर बिठा दिया जिसके भीतर दूर से नियंत्रित कैमरे लगे हुए थे, और उसके आसपास बंदरों की जिंदगी और हरकत के फिल्मांकन के लिए यह कोशिश की गई थी ताकि बंदरों को कोई बाहरी चीज वहां न दिखे और वे अधिक से अधिक स्वाभाविक रहें। लेकिन बंदरों को अचानक यह अहसास हुआ कि उनके बीच उनका एक बच्चा हिलडुल नहीं रहा है, और उसे छूकर देखकर जब उन्हें लगा कि उसमें जान नहीं है, तो उन्होंने यह मान लिया कि वह मर गया है, और इसके बाद वे गमगीन होकर सन्नाटे में बैठे रहे, एक-दूसरे से लिपटकर गम बांटते रहे। जिन जानवरों को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है, और इंसानों की खराब हरकतों पर जब उन्हें जंगली कहा जाता है, तो यह अंदाज नहीं रहता कि वे किस तरह संवेदनशील रहते हैं।
अब इसी के साथ-साथ आज कई दूसरी खबरें भी हवा में तैर रही हैं, जिनमें से एक तो यह है कि किस तरह खादी ग्रामोद्योग आयोग ने अपने कैलेंडर से गांधी की चरखा चलाती परंपरागत तस्वीर हटाकर उसकी जगह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चरखा चलाती तस्वीर छापी है। यह कैलेंडर और डायरी एकदम से खबरों में आ गई हैं क्योंकि गांधी की जगह मोदी लोगों को एकदम से पच नहीं रहे हैं, और बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं। आयोग की बड़ी दिलचस्प सफाई है कि पिछले बरसों में खादी की बिक्री लगातार गिरती जा रही थी, और प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद यह बिक्री एकदम से बढ़ी है, और इसलिए वे सबसे कामयाब ब्रांड एम्बेसडर हैं। यह बात सही है कि गांधी कोई कामयाब कारोबारी तो थे नहीं, और उन्होंने खादी को बिक्री के टारगेट के हिसाब से सामने नहीं रखा था, इसलिए अब जो अधिक बिक्री करवा दे, उसकी तस्वीर गांधी की जगह लगा देना एक नया गांधीवाद है, और इस पर कुछ बोलने की हिम्मत भी हमारी नहीं है।
लेकिन मानो यह काफी न हो, हरियाणा के एक मंत्री अनिल विज ने कहा है कि भारतीय रुपये का अवमूल्यन भी इसीलिए हुआ कि उस पर गांधी की तस्वीर थी, और अब धीरे-धीरे नोट से भी गांधी की तस्वीर हटा दी जाएगी। दो दिनों से कैलेंडर और डायरी खबरों में हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उस बारे में कुछ नहीं कहा है। और अब उनकी पार्टी की एक राज्य सरकार के मंत्री ने दिल्ली के बगल हरियाणा में बैठकर गांधी को नोटों से भी धक्का देकर हटाने की बात कही है। हमारा ख्याल है कि इस मुद्दे पर बहुत अधिक शब्दों में कुछ कहने के बजाय महज एक सलाह हम दे सकते हैं कि यह सरकार राजघाट से गांधी की अस्थियों को भी देशनिकाला दे दे, क्योंकि गांधी मरने के बाद भी उन्हीं तमाम मूल्यों और सिद्धांतों को याद दिलाते रहेंगे, जो कि बहुत से लोगों को बर्दाश्त नहीं हो पाएंगे। गांधी को न कैलेंडर की जरूरत है, न नोट की, और न राजघाट की। वे पार्टियां और वे नेता अपना सोचें जिन्हें कि चुनाव के बीच विश्वसनीयता पाने के लिए गांधी की जरूरत पड़ती है। फिलहाल भारत का इतिहास मोदी की चुप्पी दर्ज कर रहा है, जो कि उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद से उनकी एक बड़ी पहचान बन चुकी है।
इस देश के इंसानों को बीबीसी की फिल्म के बंदरों से कुछ सीखने की जरूरत है।

डकैतों को लूटने वाले की नौकरी जाने में लग गए पूरे सत्रह बरस

संपादकीय
13 जनवरी 2017


छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के लिए बदनाम अफसरों की लिस्ट में से एक आईपीएस को केन्द्र सरकार ने बर्खास्त कर दिया है। बर्खास्तगी के लिए सरकारी भाषा में अनिवार्य सेवानिवृत्ति शब्द का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन बोलचाल की जुबान में उसका मतलब बर्खास्तगी के अलावा और कुछ नहीं होता। आईजी स्तर के इस अफसर राजकुमार देवांगन के खिलाफ सत्रह बरस से कार्रवाई होना बाकी थी, और मामलों में से एक मामला यह था कि जब यह अफसर एसपी था, तब वहां बड़ी एक डकैती में पकड़ाई रकम में पुलिस ने हाथ मार दिया था। अब डाके की रकम में लूट करने वाली पुलिस पर कार्रवाई करने में सरकार को सत्रह बरस लग गए। यह सोचें कि इन सत्रह बरसों में यह अफसर एसपी या एसपी से ऊपर की कुर्सियों पर ही रहा होगा, और जो डकैती में लूट की तोहमत वाला हो, उसने ऊपर की इन कुर्सियों पर आईजी तक बनते हुए, और एडीजी बनने की तैयारी तक क्या-क्या नहीं किया होगा?
सरकार के काम की रफ्तार उस समय धीमी हो जाती है जब बड़े-बड़े भ्रष्ट बड़े-बड़े अफसरों पर कार्रवाई की नौबत आती है। आज भी राज्य में बहुत से ऐसे अफसर हैं जो कि भ्रष्टाचार के मामलों में दस-पन्द्रह बरस पहले घिर चुके हैं, लेकिन आज तक वे एक से बढ़कर एक कमाऊ कुर्सियों पर बैठते आए हैं, और उनकी पुरानी जांच रिपोर्ट से उनके कमाने की मौजूदा संभावनाओं पर जरा भी आंच नहीं आई है। यह सिलसिला थमना चाहिए। जब भ्रष्टाचार को रोकने के लिए बनाई गई एजेंसियां किसी पर छापा मारती हैं, उसके बाद किसी के खिलाफ अदालत में मामला चलाना चाहती हैं, तो कदम-कदम पर सरकार की इजाजत लगती है। जो सबसे बड़े अफसर रहते हैं, उनके लिए यह इजाजत केन्द्र सरकार से आती है, और उसके बाद फिर राज्य की एजेंसियां महीनों लगा देती हैं, लेकिन वे जेल जाते दिखते नहीं हैं। इसी तरह कुछ बिल्कुल ही नौजवान अफसर ऐसे पकड़ाए हैं जिन्होंने अपनी शुरुआती पोस्टिंग में ही कमाने के लिए जमकर चौके-छक्के लगाए, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई हुई नहीं हैं। ऐसे में जनता इस बात पर हैरान होती है कि यह सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ कैसी जीरो टॉलरेंस की नीति है?
हमारा ख्याल है कि अफसरों की कमी रहने पर भी भ्रष्टाचार के मामलों से घिरे हुए अफसरों को किसी भी कमाऊ कुर्सी से दूर रखना चाहिए, क्योंकि एक नया अफसर लाना सस्ता पड़ेगा, बजाय एक भ्रष्ट को और कमाने का मौका देने के। दिक्कत यह है कि अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से, कांग्रेस सरकारों के समय से भ्रष्ट अफसरों को लेकर जो सरकारी नरमी चली आ रही है, वह मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक, और देश के अधिकांश दूसरे राज्यों तक जारी है। और भ्रष्टाचार के मामले में भी छोटे कर्मचारियों और बड़े अफसरों के बीच एक बड़ा भेदभाव होता है। छत्तीसगढ़ में ही पटवारी और क्लर्क जैसे लोग तो तुरंत जेल चले जाते हैं, लेकिन नान घोटाले में फंसे हुए आईएएस अफसर भी शान से जेल के बाहर हैं, और उनकी गिरफ्तारी के आसार भी नहीं दिख रहे हैं। केन्द्र सरकार की मंजूरी आने के बाद भी, उनके खिलाफ पुख्ता सुबूत रहते हुए भी राज्य की जांच एजेंसी इनके आईएएस होने से इनके साथ खास नरमी बरत रही है। ऐसे रूख की वजह से सरकारी अफसरों का पूरे का पूरा तबका नाहक ही बदनाम होता है, जिसमें कि बड़ी संख्या में ईमानदार लोग भी रहते हैं, और इस दर्जे के भ्रष्ट अफसर कम रहते हैं।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को अपने भ्रष्टाचार में फंसे हुए अफसरों को सरकारी कामकाज से अलग करके एक बड़े हॉल में एक साथ बिठाकर मुफ्त की तनख्वाह देना अधिक सस्ता पड़ेगा। यह राज्य गरीबों का राज्य है, जहां बहुत रियायती चावल मिलने से ही गरीब दो वक्त खा पा रहे हैं। ऐसे राज्य को खा लेने की इजाजत उन अफसरों को नहीं मिलनी चाहिए जिन्हें लाख-लाख रूपए महीने की तो तनख्वाह ही मिलती है, और इसके अलावा ढेरों सहूलियतें अलग से मिलती हैं। इसके बाद भी अगर किसी की कमाने की हवस पूरी नहीं होती, तो ऐसे लोगों के खिलाफ राज्य सरकार को कड़ा रूख अपनाना चाहिए।

...महज अतीत के गौरव पर भविष्य निर्माण नहीं हो सकता

संपादकीय
12 जनवरी 2017


विवेकानंद जयंती पर आज देश भर में कार्यक्रम हो रहे हैं, और नौजवानों को विवेकानंद की याद दिलाई जा रही है। उन्हें आगे बढऩे के लिए एक प्रेरणा दी जा रही है कि नौजवान रहते हुए ही विवेकानंद किस तरह विश्व धर्म संसद में पहुंचकर एक ऐतिहासिक प्रभावशाली भाषण देकर भारत का नाम रौशन कर चुके थे। यह बात सही है कि विवेकानंद कम उम्र में ही दुनिया के बीच भारत के धर्म और दर्शन को असरदार तरीके से रख चुके थे लेकिन आज उनकी जयंती के समारोहों के बीच यह सोचने की जरूरत है कि अतीत की स्मृतियों के बीच ही क्या भविष्य का निर्माण हो सकता है?
भारत सहित कुछ और देशों में भी एक यह दिक्कत लगातार बनी रहती है कि इतिहास के कुछ गौरवशाली पन्नों को लेकर समारोह चलते रहते हैं, और उन्हीं पन्नों को भविष्य भी मान लिया जाता है, वर्तमान भी मान लिया जाता है। स्मृतियों पर गौरव अच्छी बात है, लेकिन स्मृतियों से ऊपर उठकर, आगे जाकर आगे बढऩा भी जरूरी है, उसके बिना ऐसा गौरव पूरी की पूरी पीढिय़ों को झांसे में रख देता है। हमें आज के अपने काम ऐसे रखने चाहिए जिन पर आने वाले कल को गौरव हो सके, लेकिन आज ऐसा करने की फिक्र छोड़कर इतिहास के गौरव पर ही जीने वाली पीढ़ी कभी भी अपनी पूरी संभावनाओं को नहीं पा सकती।
आज भारत में जलसों और समारोहों में जितना उत्साह दिखता है, उतना उत्साह मौजूदा नौजवान पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए ठोस काम करने में नहीं दिखता। ऐसा इसलिए है कि अतीत के गौरव के समारोह एक आरामदेह सोफा की तरह रहते हैं जिन पर बैठ जाएं या सो जाएं, अच्छा ही अच्छा लगता है। दूसरी तरफ वैसा ही गौरव, या उससे आगे का गौरव हासिल करना हो, तो एक बड़ा लंबा और कड़ा सफर तय करना पड़ता है जो कि आसान काम नहीं होता। ऐसे लंबे सफर के लिए रास्ता तैयार करने की जिम्मेदारी सरकार और समाज की होती है, लेकिन वे भी इतनी मेहनत-मशक्कत करने के लिए तैयार नहीं रहते, ऐसे में अतीत का गौरव बड़ी सहूलियत के मौके जुटा देता है। आज अगर कोई यह कहे कि विवेकानंद जितने तरह की विविध विचारधाराओं और धर्म-दर्शन की विविधताओं को पढऩे के बाद स्वामी बन पाए थे, सम्मान के लायक बन पाए थे, तो वैसी विविधता के लिए, वैसी मेहनत के लिए कोई सम्मान आज लोगों की नजर में रह नहीं गया है। राष्ट्रीय युवा उत्सव को मनाना तो ठीक है, लेकिन यह बात समझ लेने की जरूरत है कि विविधता को समझे बिना, उसके सम्मान बिना, उससे गुजरे और उसे भोगे बिना, विवेकानंद कभी स्वामी न बने होते। समुद्र मंथन की जो कहानी है, उसमें जब तक पानी को मथा नहीं जाता है, उसमें से अमृत तो अमृत, विष भी नहीं निकलता। इसलिए आज युवा उत्सव के मौके पर, विवेकानंद को याद करते हुए, उनका सम्मान करते हुए, उनको प्रेरणा मानते और बताते हुए यह याद रखने की जरूरत है कि महज एक विचारधारा के कीर्तन में बैठ-बैठकर कोई विवेकानंद नहीं बन सकते, इसके लिए अलग-अलग सोच को समझना भी पड़ता है, तब कहीं जाकर एक ऐसी समझ विकसित होती है, जिसे सुनने के लिए दुनिया की धर्म संसद चौकन्नी होकर बैठे। अगर विवेकानंद उस संसद में जाकर महज किसी एक धर्म का नारा लगाते, और धर्मान्धता की बातें करते, तो वे कोई इतिहास नहीं रच पाते। इसलिए युवा दिवस के मौके पर नौजवानों को एक खुले दिमाग के साथ दुनिया को देखने और समझने का मौका देना भी तय करना चाहिए। वरना महज अतीत के गौरव पर भविष्य का निर्माण नहीं हो सकता।

धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा और सामाजिक मूल्यों में टकराव

संपादकीय
11 जनवरी 2017


स्विटजरलैंड की खबर है कि वहां बचपन में ही हालैंड से आकर बसी हुई, और अब अधेड़ हो चुकी एक महिला को नागरिकता नहीं दी जा रही क्योंकि उसने वहां की स्थानीय परंपराओं के साथ तालमेल बिठाना नहीं सीखा। वह इस बात को लेकर आंदोलन करती रहती थी कि गायों के गले में एक राष्ट्रीय प्रतीक की तरह टंगी हुई बड़ी-बड़ी और भारी-भरकम घंटियों पर रोक लगाई जाए क्योंकि इससे उन गायों के गले पर बहुत बोझ पड़ता है, और घंटियों की सामूहिक आवाज उनको तकलीफ पहुंचाती है। आज की ही एक दूसरी खबर है कि स्विस सरकार ने वहां के स्कूलों पर यह नियम लागू किया है कि मुस्लिम लड़कियां भी बाकी लड़कियों की तरह लड़कों के साथ ही तैराकी सीखेंगी, और इसे यूरोपीय मानवाधिकार अदालत में भी आज जीत हासिल हुई है। लोगों को याद होगा कि पिछले कुछ बरसों में लगातार फ्रांस, जर्मनी सहित योरप के बहुत से देशों में इस बात को लेकर मुस्लिम समुदाय और सरकार के बीच टकराव चल रहा है कि सार्वजनिक जगहों पर बुर्का पहना जाए या नहीं, और समुद्र तट पर मुस्लिम महिलाएं अपने बदन को पूरी तरह ढांके हुए कपड़े पहनकर नहाएं या नहीं। सरकारें लगातार मुस्लिम प्रतीक चिन्हों और रीति-रिवाजों के खिलाफ आदेश कर रही हैं, और यूरोपीय देशों की संसदें भी एक के बाद एक सरकार की लगाई ऐसी रोक को सही ठहरा रही हैं। ऐसे में आज यूरोपीय मानवाधिकार अदालत का फैसला स्विटजरलैंड के बाहर के दूसरे देशों के लिए भी एक मिसाल बनकर सामने आ गया है।
अब यह संस्कृतियों के टकराव का एक मामला है जिसका कोई आसान जवाब नहीं है। लोगों को याद होगा कि ब्रिटेन से लेकर अमरीका तक, और ऑस्ट्रिेलिया से लेकर कनाडा तक जगह-जगह सिखों को कई बार नस्लवादी हमलों का शिकार होना पड़ता है, और ऐसे अधिकतर मामलों में यह पाया जाता है कि उनको दाढ़ी-पगड़ी वाला मुस्लिम समझकर लोगों ने हमले किए। दूसरी तरफ महिला अधिकारों और समानता की बारीकियों पर काम करने वाले यूरोपीय देशों ने यह महसूस किया है कि वहां बसी हुई मुस्लिम महिलाओं को अगर यूरोपीय महिलाओं की तरह की बराबरी का माहौल नहीं मिलेगा, तो उनका उस तरह से सांस्कृतिक मेल नहीं हो पाएगा। इसलिए उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता के ऊपर देश की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता की जरूरत को रखा, और कपड़ों की आजादी को एक किस्म से उन्होंने दकियानूसी धार्मिक रीति-रिवाजों से बाहर लाने की कोशिश भी की। यह सिलसिला एक टकराव इसलिए भी खड़ा कर रहा है कि अमरीका की अगुवाई में योरप के कई देशों की फौज ने जिस तरह इराक और अफगानिस्तान पर हमले किए, और लाखों मुस्लिमों को मारा, उससे संस्कृतियों का एक टकराव खड़ा हो गया है।
ऐसे में एक बात और जुड़ गई कि सीरिया जैसे देश से निकलकर जो लाखों मुस्लिम शरणार्थी योरप में दाखिल हुए, और वहां पर जगह-जगह उन्हें बसाया गया, तो उनकी मुस्लिम संस्कृति का मेल स्थानीय संस्कृतियों के साथ नहीं बैठ पा रहा है, और इस वजह से जगह-जगह सामाजिक तनाव भी हो रहे हैं। हम इस सवाल को आसान नहीं मानते कि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक एकरूपता में से ऐसे मामलों में किसे अधिक महत्वपूर्ण मानना चाहिए, और साथ-साथ यह बात भी है कि दूसरे देशों से आए हुए शरणार्थियों को शरण देने वाले देशों को क्या यह आजादी होनी चाहिए कि वे अपने सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों को लागू करने की शर्त पर ही ऐसी शरण दें? कुछ लोगों को यह लग सकता है कि ये देश अपनी ताकत की वजह से दूसरों की धार्मिक स्वतंत्रता खत्म करने वाले नियम लागू कर रहे हैं, और कुछ दूसरे लोगों को यह भी लग सकता है कि उदार सामाजिक मूल्यों वाले देश वहां पर रहने वाली मुस्लिम महिलाओं के लिए ऐसे नियम लागू करके मुस्लिम समाज के भीतर ही उन्हें एक बेहतर माहौल दे रहे हैं।
यह एक बेहद उलझा हुआ मुद्दा है, और इस पर काफी बहस भी चल रही है। हम निजी आजादी के हिमायती हैं, लेकिन साथ-साथ हमारा यह भी मानना है कि जिन समाजों में आदमी और औरत के बीच बराबरी नहीं आ पा रही है, वहां पर इस बराबरी को लाने की जिम्मेदारी भी विकसित देशों और समाजों की है, और उसे निभाना चाहिए।

सुरक्षाबलों से जुड़े मुद्दे न तो देशपे्रम हैं, और न ही गद्दारी

संपादकीय
10 जनवरी 2017


बीएसएफ के एक जवान ने अपने अफसरों से शिकायत का एक वीडियो बनाया, और सरहद पर काम करने की बदहाली का नजारा दिखाते हुए प्रधानमंत्री से मांग की कि वे इसकी जांच कराएं कि ग्यारह-ग्यारह घंटे लगातार बर्फ पर तैनाती के पहले और बाद उन्हें किस तरह का बुरा खाना मिलता है। मीडिया में यह वीडियो आते ही केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बीएसएफ से इस पर रिपोर्ट मांगी है, और बीएसएफ ने अपनी पहली सफाई में इस जवान के खिलाफ ही दुनिया भर का कहा है कि इसके खिलाफ बहुत शिकायतें पहले से चली आ रही थीं।
अब सोशल मीडिया दो तरह से उबल रहा है। बहुत से लोग इस वीडियो का पहली नजर में हकीकत मानकर यह कहते हुए टूट पड़े हैं कि देश की सरहद पर शहादत के लिए भी तैयार लोगों को अफसरी भ्रष्टाचार इस तरह झेलना पड़ रहा है। मीडिया ने भी पहली नजर में इस शिकायत को हकीकत मानते हुए बीएसएफ अफसरों को भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार मान ही लिया है। इस देश में जब कभी फौज, सरहद, देश की रक्षा, और शहादत जैसे शब्द किसी चर्चा में आते हैं, तो वहां पर फौज या वर्दीधारियों की की हुई ज्यादतियों की कोई चर्चा करना भी देश के साथ गद्दारी मान लिया जाता है। कश्मीर और मणिपुर बरसों से संघर्ष कर रहे हैं कि सशस्त्र बलों को उनके किसी जुर्म से भी बचाने वाले कानून को खत्म किया जाए, लेकिन ऐसे इलाकों में काम करने वाली फौज और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों का यह मानना है कि उन्हें झूठी शिकायतों का शिकार बनाया जा सकता है, और जब तक उन्हें खास कानूनी हिफाजत नहीं मिलेगी, उनका काम करना मुश्किल होगा।
आज जब हम यह बात लिख रहे हैं, छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह राज्य के तमाम पुलिस अफसरों की बैठक ले रहे हैं, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के ताजा नोटिस को देखते हुए वे यह हिदायत दे रहे हैं कि नक्सल इलाकों में भी कार्रवाई करते हुए मानवाधिकारों का सम्मान किया जाए। हालांकि छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाकों में तैनात पुलिस अफसरों के चेहरों पर इससे कोई शिकन नहीं पडऩी है, क्योंकि वे एक किस्म से लोकतंत्र के प्रति जवाबदेही से पूरी तरह आजाद हैं, और कितनी ही हत्याओं और कितने ही बलात्कारों की तोहमत उन पर लगे, वे पूरी तरह महफूज हैं। दूसरी तरफ यह बात भी है कि बस्तर के नक्सल मोर्चे पर तैनात पुलिस और बाकी सुरक्षा बल बदहाली में ड्यूटी करते हैं, मच्छरों के हाथों भी मारे जाते हैं, और नक्सली उन्हें दर्जनों की संख्या में थोक में मारते हैं। जहां अपनी जान पर इतना भयानक खतरा हो, वहां पर जाहिर है कि सुरक्षाकर्मी मानवाधिकार की फिक्र को किताबों में छोड़कर काम करते होंगे।
सुरक्षाबलों को जब मुश्किल हालात में काम करना पड़ता है, तो उनका रवैया बहुत बार अलोकतांत्रिक हो जाता है, काम के तनाव में करीब-करीब हर हफ्ते ही ऐसे मोर्चों पर कोई न कोई आत्महत्या होती है। नक्सल मोर्चों पर देश में हर बरस सैकड़ों जवान मारे जाते हैं। ऐसे में सुरक्षाबलों की अपनी जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ, उनकी जवाबदेही भी तय करने की जरूरत रहती है। और देश की आबादी को इस खुशफहमी में जीना बंद कर देना चाहिए कि सुरक्षाबलों के भीतर भ्रष्टाचार या फौज की ज्यादती के मुद्दों को न उठाना देशप्रेम है। जहां कहीं सरकारी वर्दीधारी लोगों की ज्यादतियों को अनदेखा किया जाता है, वहां-वहां जनता के बीच भी बगावत और सत्ता के लिए नफरत पैदा होने लगती हैं। कुल मिलाकर सुरक्षाबलों का मुद्दा इन दोनों ही वजहों से अनदेखा नहीं करना चाहिए, न उन पर खतरे और दिक्कतों को अनदेखा करना चाहिए, और न ही उनकी ज्यादतियों को।