माँ गिरफ्तार हुई, तो बेटे ने की खुदकुशी, तात्कालिक कारण से परे की वजहें भी

22 फरवरी 2026 

 

कल छत्तीसगढ़ में एक नौजवान ने खुदकुशी कर ली। कुछ अरसा पहले पिता की मौत हुई थी, और आपदा राहत राशि हड़पने वाले एक गिरोह ने परिवार को झांसा दिया कि अगर सांप के काटने से मौत दिखाई जाए तो सरकार से चार लाख मिल सकते हैं। ऐसे में कई तरह के फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए, और निकली रकम में से विधवा महिला को कुल 50 हजार रूपए मिले, और बाकी रकम इस गिरोह के लोगों ने बांट ली। जब दस्तावेज फर्जी पाए गए, तो इस महिला को कल गिरफ्तार किया गया, और बेटे ने सदमे में आकर थाने से घर जाकर खुदकुशी कर ली। हम आत्महत्या की कई अलग-अलग वजहों को लेकर कई बार लिखते हैं क्योंकि उन्हें ठीक से समझने की समाज को जरूरत लगती है। अभी दो-चार दिन पहले ही या तो इसी जगह, या अपने अखबार के यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर हमने बच्चों की खुदकुशी का मुद्दा भी उठाया था। अब यह आत्महत्या सामने आई है, इसलिए समाज में आत्महत्या की वजहों के बारे में कुछ अधिक खुलासे से सोचने-समझने, और उस पर चर्चा करने की जरूरत है।

जब समाज में तरह-तरह के जुर्म, जालसाजी, और ठगी-धोखाधड़ी का चलन बढ़ गया हो, तो धीरे-धीरे लोगों को यह आसान कमाई सुहाने लगती है, और मेहनत के कामकाज को जरूरी मानना बंद कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि कुछ लोग लगातार जुर्म करते रहते हैं, और बहुत से लोग लगातार जुर्म के शिकार होते रहते हैं। हवा में एक नकारात्मकता छाई रहती है। कई लोग जुर्म करके खतरे की आशंका में तनावग्रस्त रहते हैं, और बहुत से लोग जुर्म के शिकार होकर, नुकसान झेलकर एक अलग किस्म की कुंठा में चलते हैं। हवा में तनाव घुला रहता है। इससे परे जब कभी जिस देश-प्रदेश में, किसी शहर-समाज में जातिवाद या साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद या भाषा के विवाद चलते रहते हैं, तो उससे भी एक तनाव रहता है। जब किसी इलाके में स्थानीय और बाहरी-परदेसिया का मुद्दा रहता है, तो दोनों ही तबकों के लोग एक अलग तरह के तनाव में रहते हैं। जिन्हें बाहरी-परदेसिया कहा जाता है, वे संख्या में कम रहते हैं, और वे आशंका से भर जाते हैं, उन्हें अपने काम और कारोबार, संपत्ति और परिवार को लेकर आशंकाएं रहती हैं। दूसरी तरफ जो स्थानीय होने का दावा करते हैं, रहते हैं, उन्हें जब स्थानीयता का कोई अतिरिक्त फायदा नहीं दिखता, तो उनके भीतर भी भड़ास का गुबार बढ़ते चलता है। 

जब लोगों को यह लगता है कि उनके दिए हुए वोट से सत्ता पर आने वाले लोग भ्रष्ट हैं, दुष्ट हैं, और वोट के दिन उनके पास ऐसे ही लोगों में से किसी एक को छांटने की मजबूरी है, तो उनके भीतर भी लोकतांत्रिक-निराशा बढ़ती चलती है। इसी तरह कहीं किसी सरकारी दफ्तर की भ्रष्ट व्यवस्था से लोग निराश रहते हैं, कहीं पर अदालत की धीमी रफ्तार लोगों को बेइंसाफी लगती है, और वह रहती भी है। ऐसे बहुत से कारण रहते हैं जो कि लोगों में निराशा बढ़ाते हैं। लोगों को किसी आत्महत्या के पीछे इतनी सारी वजहों को हमारा गिनाना हो सकता है कि गैरजरूरी लगे, लेकिन हमारा यह साफ-साफ मानना है कि किसी देश-प्रदेश या समाज में लोगों के खुश रहने का अपना एक असर होता है, जहां जिंदगी बेहतर, सुख से भरी हुई, संभावनाओं वाली, और खुशहाल होती है, वहां तो लोग इतनी खुदकुशी नहीं करते होंगे। आज अगर हिन्दुस्तान में बच्चों से लेकर बूढ़ों तक बड़ी संख्या में खुदकुशी होती है, तो वह उनके सामने की एक तात्कालिक वजह के साथ-साथ बहुत सी परोक्ष वजहें भी उनके मामले में रहती है, जो कि उनकी दिमागी हालत को आत्मघाती बनाने का काम करती हैं। 

जिस देश-प्रदेश, या समाज को खुश रहना है, उन्हें नफरत, हिंसा, और बाकी किस्म के नकारात्मक कारणों से छुटकारा पाने की तरकीबें ढूंढनी चाहिए। आज लोग अपने घरों में अगर नफरत की बातें करते हैं, तो घर के दूसरे बालिग सदस्यों के साथ-साथ बच्चों की रगों में भी लहू के साथ-साथ नफरत भी दौडऩे लगती है। बच्चे स्कूलों में उस नफरत का इस्तेमाल शुरू कर देते हैं, और फिर उस नफरत के शिकार दूसरे बच्चों में उसकी एक प्रतिक्रिया भी होने लगती है। आत्महत्या हो, या हत्या, दोनों के पीछे एक हिंसक इरादे की जरूरत रहती है, चाहे वह अपने खिलाफ हो, चाहे दूसरों के खिलाफ। कुछ बच्चे दूसरों के हाथों परेशान होकर खुदकुशी कर सकते हैं, और कुछ दूसरे बच्चे दूसरों का कत्ल। अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ के दुर्ग में कुछ मुस्लिम स्कूली बच्चों को पाकिस्तान के एक आतंकी-हैंडलर के साथ संपर्क में पकड़ा गया। इन बच्चों को इनकी स्कूल के दूसरे गैरमुस्लिम बच्चे धर्म की वजह से आतंकी कहते हुए, पाकिस्तानी कहते हुए प्रताडि़त करते थे। नतीजा यह हुआ कि किसी तरह यह घटना पता लगने पर पाकिस्तान में बैठे भारत में आतंक फैलाने वाले एक एजेंट ने इन मुस्लिम बच्चों को भडक़ाना शुरू किया, और इन बच्चों ने इंटरनेट पर डार्क वेब वाली जुर्म की दुनिया में जाकर हथियारों की पूछताछ शुरू कर दी थी। इसी वक्त भारत की एजेंसियों की नजर इन पर पड़ी, तो पता लगा कि स्कूल में दूसरे बच्चों की प्रताडऩा की वजह से इन बच्चों के मन में हिंसक भावनाएं भडक़ रही थीं। 

इस तरह हर हत्या या आत्महत्या के पीछे तात्कालिक कारण जो भी हों, ऐसी हिंसा करने की दिमागी सोच, उतनी ताकत या नफरत लोगों में रातोंरात नहीं जुटती हैं, इसके पीछे हवा में फैली हुई नफरती हिंसा, दूसरे किस्म के तनाव, या कि किसी दाखिला इम्तिहान या नौकरी के मुकाबले में बेईमानी जैसी कोई बेइंसाफी भी एक वजह हो सकती है। समाज में दिमागी सुकून आसानी से नहीं आता है। जो लोग यह सोचते हैं कि बहुसंख्यक तबके का राज आ जाने से पूरे देश में अमन-चैन आ जाएगा, उन लोगों को दुनिया के दूसरे देशों का इतिहास और वर्तमान भी देखना चाहिए। लोकतंत्र में बहुसंख्यक तंत्र खुशहाली नहीं ला सकता, बहुलतावादी तंत्र ला सकता है। और जब तक खुशहाली नहीं आती, तब तक लोगों के पास की निजी आत्मघाती वजहों को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक तनाव हमेशा ही हाथ बंटाता रहेगा। बात थोड़ी जटिल है, लेकिन पूर्वाग्रहों को अलग रखकर अगर सोचेंगे, तो यह बहुत जटिल भी नहीं लगेगी।

(Daily Chhattisgarh)       

अफगान महिलाएं, जरा याद इन्हें भी कर लो, आंखों में भर लो पानी

21 फरवरी 2026 

 

करीब 20 बरस अफगानिस्तान पर राज करने के बाद अमरीका को जब यह समझ आया कि वह किसी किनारे पहुंच नहीं रहा है, न तो अफगानिस्तान में किसी तरह का लोकतंत्र, या पिट्ठू सरकार कायम करने की गुंजाइश है, और न ही इतने लंबे खर्च को, अमरीकी सैनिकों की जिंदगी को खतरे में डालते हुए जारी रखना मुमकिन है, तो उसने 2021 में दुम दबाई, और रातों-रात अफगानिस्तान छोडक़र भागा। उस दिन वहां की जो खबरें आ रही थीं, वे बता रही थीं कि किस तरह राजधानी काबुल के एयरपोर्ट से अमरीकी विमानों पर सवार होकर अमरीकी सैनिक भाग रहे थे, और तालिबान एयरपोर्ट की तरफ बढ़ते चले जा रहे थे। आखिर में हाल यह था कि ढेर सारे हथियार, गोला-बारूद, और फौजी हेलीकॉप्टर भी छोडक़र अमरीकी भागे थे। लेकिन इसके साथ-साथ अमरीका अपने तमाम अफगान मददगारों को भी धोखा देकर भागा था, जो कि इतने बरस तक अमरीकी हुकूमत की मदद कर रहे थे, उसकी फौज के साथ काम कर रहे थे, तालिबानों के खिलाफ अफगान महिला जज फैसले दे रही थीं, महिलाएं तरह-तरह के दूसरे सरकारी कामकाज में लगी हुई थीं, इन सबको छोडक़र, तालिबान के हवाले करके अमरीका भाग गया था। नतीजा यह निकला कि अभी पांच बरस होने को हैं, अफगान तालिबानों ने दुनिया की सबसे जुल्मी महिलाविरोधी सरकार कायम करके रखी है, और अमरीका सहित दुनिया के कोई भी देश उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रही है। 

ऐसे तालिबानों ने छांट-छांटकर उन महिलाओं के खिलाफ पहले कार्रवाई की जो कि अमरीकी फौजी शासन के साथ मिलकर काम कर रही थीं। उनमें से अधिकतर को अफगानिस्तान की कोई न कोई सरहद पार करके पड़ोसी देश के रास्ते भागना पड़ा। लेकिन जो महिलाएं वहां बच गईं, उनकी पढ़ाई-लिखाई, कामकाज, कोई नौकरी करना, अकेले घर से निकलना, या घर पर भी खुली आवाज में नमाज पढऩा, इन सब पर तालिबानी रोक लग गई। एकदम से अमरीका के छोड़े गए शून्य में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के अभूतपूर्व और असाधारण पैमाने लागू हो गए। विश्व समुदाय इस बात को लेकर दुविधा में फंस गया कि भूखे और बीमार मरते अफगान लोगों को मदद करने के लिए वह तालिबान हुकूमत के सामने महिला अधिकारों की शर्त रखे, या अफगान आबादी को जिंदा रहने में मदद करे? भारत जैसे बहुत से देशों के लिए रणनीतिक रूप से यह आसान नहीं था कि वह तालिबानों को महिला अधिकार का सम्मान करना सिखाए, और उस शर्त पर उनसे बातचीत करे। भारत जैसे बहुत से देशों ने तालिबानी हुकूमत को मान्यता नहीं दी है, लेकिन बहुत से देशों ने तालिबानी नेताओं के साथ औपचारिक और अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला जारी रखा है, और लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले इस सरकार का एक बड़ा नेता भारत आया था, तो उसकी प्रेस कांफ्रेंस में महिला पत्रकारों को नहीं बुलाया गया था। इस पर बवाल होने के बाद अगले दिन फिर एक प्रेस कांफ्रेंस हुई जिसमें महिला पत्रकारों को भी शामिल किया गया। कई दिनों तक अफगान नेता भारत में रहा, और मान्यता दिए बिना भी भारत अफगान सरकार के साथ एक बड़े तालमेल के साथ चल रही है क्योंकि वह पाकिस्तान से लगा हुआ देश भी है, और उसका पाकिस्तान के साथ बड़ा टकराव भी चल रहा है, और यह बात भारत अनदेखी नहीं कर सकता। 

आज इस पर लिखने की जरूरत इसलिए है कि अफगान-तालिबान के सबसे बड़े नेता ने अभी पिछले ही महीने 90 पेज का एक नया क्रिमिनल कोड जारी किया है जो कि महिलाओं को संपत्ति की तरह मानता है, और पत्नी पर पति की हिंसा को एक बड़ी सीमा तक कानूनी दर्जा देता है। यह लिखित नियम बताते हैं कि अगर पति पत्नी को इस बुरी तरह पीटता है कि उसकी हड्डियां टूट जाती हैं, जख्म आते हैं, लहू निकलता है, तो इसके सुबूत अगर पत्नी अदालत में देती है, तो उस पर अधिकतम 15 दिनों की कैद का प्रावधान है। दूसरी तरफ जानवरों को चोट पहुंचाने पर इससे अधिक सजा है। इस क्रिमिनल कोड का एक दूसरा हिस्सा बताता है कि पत्नी अगर पति की अनुमति के बिना मायके या रिश्तेदारों के घर जारी है, और वापिस नहीं लौटती है, तो पत्नी और उसके परिवार को तीन महीने की कैद हो सकती है। कुल मिलाकर पति को ‘विवेकपूर्ण सजा’ की छूट है, जिसका मतलब है कि हड्डी तोड़े बिना, खून बहाए बिना पीटना। दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों ने महिला पर ऐसी भयानक हिंसा को कानूनी दर्जा दे देने के तालिबानी फैसले की जमकर निंदा की है। 

2021 में अफगान सत्ता पर लौटने से अब तक तालिबानों ने महिलाओं के बारे में 80 से ज्यादा हुक्म जारी किए हैं, जिनमें 54 ऐसे हैं जो महिलाओं के खिलाफ तरह-तरह की बंदिशों वाले हैं। अफगानिस्तान अब दुनिया का अकेला देश है जहां लड़कियां 6वीं कक्षा से ज्यादा नहीं पढ़ सकती। इसकी वजह से 10 लाख से अधिक लड़कियों की पढ़ाई छूट गई है, या शुरू ही नहीं हो पाई है। 2024 में तालिबान सरकार ने नया नैतिकता कानून बनाया जिसमें महिलाओं पर सार्वजनिक जगहों पर बोलना, बिना चेहरा ढांके जाना, बिना पुरूष पारिवारिक साथी के कहीं सफर करना, सब पर रोक लगा दी गई है। यूनिसेफ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के मुताबिक अफगानिस्तान में दसियों लाख लड़कियां शादी के पहले पुरूषों का शोषण झेलती हैं। संयुक्त राष्ट्र ने अफगानिस्तान को महिलाविरोधी कानून और व्यवस्था को देखते हुए लैंगिक-रंगभेदी देश करार दिया है। ह्यूमन राइट्स वॉच की 2025 की रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों की पिछले 20 बरस की प्रगति खत्म हो चुकी है। इस तरह की जानकारी अथाह है, अफगानिस्तान में महिलाओं के जिस पहलू को देखें, वह जुर्म की हिंसा से लहूलुहान है। ऐसे में अब यह बाकी दुनिया की जिम्मेदारी है कि वह तालिबान को किस तरह काबू में करे, किस तरह अफगानिस्तान को आर्थिक या दूसरी मदद देने के एवज में तालिबानी सरकार की बांहें मरोडक़र उसे महिलाओं को बेहतर, और अधिक हक देने पर मजबूर करे। आज दिक्कत यह है कि दुनिया भर की सरकारें न सिर्फ अफगानिस्तान, बल्कि दुनिया के किसी भी देश के साथ नैतिकता की बात करने में दिलचस्पी नहीं रखतीं, सिर्फ अपने राष्ट्रीय हितों को देखती हैं, जिनके मुकाबले कोई नैतिकता अहमियत नहीं रखती। अफगान महिलाएं दुनिया में सबसे अधिक लैंगिक भेदभाव की हिंसा झेलने वाली हो गई हैं, और उनके हक के लिए कई सरकारों की कोई दिलचस्पी नहीं है, कई सरकारों को उसे अनदेखा करना सहूलियत का लग रहा है। दुनिया का इतिहास इन तमाम बातों को अच्छी तरह दर्ज करते चल रहा है, लेकिन आज दुनिया में जो नेता पांच-पांच बरस के अपने भविष्य और अस्तित्व से दूर का नहीं सोच पाते हैं, उन्हें इस बात की भला क्या फिक्र होगी कि इतिहास उन्हें कैसा दर्ज करेगा? 

(Daily Chhattisgarh)       

दीवारों पर लिक्खा है, 21 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

स्कूली बच्चों की आत्मघाती हिंसा से उठते हैं कई सवाल, पर जवाब सरकार के पास

20 फरवरी 2026 

 

छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में अभी 48 घंटे के भीतर स्कूली इम्तिहानों में शामिल होने जा रहे चार नाबालिग बच्चों ने खुदकुशी कर ली। इनके पीछे मोटेतौर पर पढ़ाई का तनाव दिख रहा है, लेकिन जैसा कि किसी की भी जिंदगी में होता है, यह भी हो सकता है कि साथ-साथ कोई दूसरा तनाव भी हो। एक नाबालिग ने तो खुदकुशी की जो चिट्ठी लिख छोड़ी है उसमें परिवार से कहा है कि उसका शरीर मेडिकल कॉलेज को दे दिया जाए। यह अतिपरिपक्व सोच इस उम्र के हिसाब से कुछ अधिक गंभीर है, और हक्का-बक्का करने के अलावा यह हैरान भी करती है। वैसे तो बालिगों, या नाबालिगों, अक्सर ही प्रेमीजोड़ों, या वैध-अवैध कहे जाने वाले रिश्तों में उलझे हुए लोगों की खुदकुशी की खबरें आती रहती हैं, लेकिन एक ही जिले में दो दिनों के भीतर इम्तिहान के मौसम में चार नाबालिग छात्र-छात्राओं की खुदकुशी दिल दहलाती है, और लोग इसे गंभीर मानें तो यह सोचने का एक बहुत बड़ा मुद्दा है। वरना इसे कोई महत्व न देना हो, तो यह पुलिस, अस्पताल, पोस्टमार्टम का मामला है, और इसके साथ ही केस बंद हो जाएगा। समाज या सरकार के सामने इससे अधिक कुछ करने की कोई बेबसी नहीं है।

एक बिल्कुल अलग मामले में धमतरी जिले की एक सरकारी स्कूल में 35 बच्चे ऐसे मिले हैं जिन्होंने अपने कलाई पर किसी नुकीली या धारदार चीज से खरोंच लगाई है, अपने ही बदन को नुकसान पहुंचाया है, कई मामलों में काटने का निशान मिला है। यह जानकारी तो अभी सामने आई है, लेकिन इस मिडिल स्कूल के छात्र-छात्राओं की कलाई पर ये निशान कुछ हफ्तों तक से कुछ महीनों तक के पुराने दिख रहे हैं। इनमें लडक़े-लड़कियां दोनों ही शामिल हैं, और किसी ने घर के तनाव की वजह से ऐसा किया है, किसी ने दिल टूट जाने के कारण। ऐसा लगता है कि एक-दूसरे के देखादेखी इन बच्चों ने अपने को नुकसान पहुंचाने का यह तरीका निकाला है। इसे लेकर अधिकारी हड़बड़ाए हुए हैं, और बच्चों से और उनके मां-बाप से बात करने के लिए किसी परामर्शदाता को गांव भेजा भी गया है। यह मामला खुदकुशी तक नहीं पहुंचा है, लेकिन कुछ कम दर्जे का आत्मघाती मामला तो है ही, अपने को नुकसान पहुंचाने का। 

हम किसी भी खुदकुशी को उस व्यक्ति की असफलता के साथ-साथ उसके पारिवारिक और सामाजिक दायरों की असफलता भी मानते हैं जिन्होंने वक्त रहते अपने बीच के सदस्यों की निराशा को नहीं भांपा, और वे खुदकुशी कर बैठे। अधिकतर मामलों में यह होता है कि खुदकुशी की कगार पर पहुंचने के पहले लोगों के बर्ताव से आसपास के लोगों को यह अहसास हो सकता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है। लोग चाहें तो अपने बीच के व्यक्ति को संभाल सकते हैं, और कोई ठोस मदद न सही, कम से कम दिलासा दिला सकते हैं, उनमें आत्मविश्वास जगा सकते हैं। जब लोगों के मन में जिंदगी छोड़ देने का ख्याल आता है, तब वे ऐसी अस्थिर मानसिक स्थिति में रहते हैं कि वे निराशा जरा सी और बढऩे पर कगार के बाहर कदम बढ़ा सकते हैं, और हौसला थोड़ा सा मिल जाए, तो वे उस कगार से वापिस भी लौट सकते हैं। इम्तिहानों के दिनों में कई नेता, कहीं-कहीं पर प्रशासन और पुलिस के अधिकारी भी छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए सामान्य अपील जारी करते हैं, लेकिन इन दिनों सोशल मीडिया और मोबाइल सरीखे उपकरणों की मेहरबानी से लोगों को सिर्फ सबसे अधिक आकर्षक, सनसनीखेज, या उत्तेजक सामग्री ही बांध पाती है, और ऐसे में नसीहत की बातें उन पर अधिक असर नहीं करती, सच तो यह है कि उनका ध्यान तक नहीं खींचती। 

सरकार और समाज को आज की परीक्षा के मौसम की अपीलों से बढक़र कुछ सोचना होगा। हमने अपने अखबार में, और यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर बार-बार इस मुद्दे को उठाया है कि आज समाज में हर उम्र के लोग जिस तरह से हिंसक या आत्मघाती होते चल रहे हैं, उसे देखते हुए समाज के बीच अधिक परामर्शदाताओं की जरूरत है। आज मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं को देखें, तो पौन घंटे की उनकी फीस ही हजारों रूपए होती है, और एक-एक की उलझन को सुलझाने में कई बार ले जाना पड़ता है। आज देश में कितने ऐसे लोग हैं जो कि अपने परिवार के एक सदस्य पर हजारों रूपए खर्च कर सकें? फिर यह भी है कि देश में अंधविश्वास की वजह से मानसिक उलझन के लोगों को प्रेत-बाधा का शिकार मान लिया जाता है, या किसी ने जादूटोना कर दिया होगा, ऐसा मान लिया जाता है। मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता, या मनोचिकित्सक न आसानी से उपलब्ध हैं, और न ही वे सस्ते हैं, दूसरी तरफ झाड़-फूंक करने वाले, भूत उतारने वाले, तंत्र-मंत्र करने वाले पाखंडी गली-गली मौजूद हैं, और वे मनोविज्ञान के पेशेवर लोगों के मुकाबले बड़े-बड़े दावे भी करते हैं, भरोसा दिलाते हैं, और उनके गिरोह में शामिल लोग उनसे ठीक होने वाले लोगों की कहानियां भी फैलाते रहते हैं। कई धर्मों में इस तरह के पाखंडी लोगों का बड़ा बोलबाला है, और कई तरह के बाबा, चंगाईसभा करने वाले पादरी लोगों पर से दुष्टात्मा हटाने का पाखंडी-प्रदर्शन करते हैं। कई तरह की धार्मिक सभाओं में असली या नकली मानसिक विचलित लोगों को तरह-तरह की अस्वाभाविक हरकतें करते दिखाया जाता है, और फिर धार्मिक पाखंड से जुड़े हुए लोग उन्हें ठीक कर देते हैं। देश में जब अंधविश्वास एक आम ढर्रा बन जाता है, तो पेशेवर मनोवैज्ञानिकों की जरूरत भी कम रहती है, और वे वैसे भी लोगों की पहुंच के बाहर हैं। 

हम शायद 50वीं बार अपनी इस सलाह को दुहरा रहे हैं कि केन्द्र और राज्य सरकारों को यह चाहिए कि अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले विश्वविद्यालयों के मनोविज्ञान विभाग में बड़े पैमाने पर परामर्शदाता तैयार करने का ढांचा खड़ा करे। इसके लिए स्कूलों के मौजूदा प्रशिक्षित शिक्षकों को भी आमंत्रित किया जा सकता है कि वे अपनी तनख्वाह पाते हुए भी मनोवैज्ञानिक-परामर्श का एक या दो बरस का एक कोर्स करें, और फिर अपनी तैनाती की जगह पर अपनी स्कूल के बच्चों के अलावा भी वे शहर-कस्बे की दूसरी स्कूलों में जाकर वहां भी हर हफ्ते बच्चों की उलझन सुलझाएं। इससे नाबालिग हिंसा, और आत्मघाती हरकतों के मामले घटेंगे। यह भी होगा कि जब कम उम्र से बच्चे मानसिक रूप से अधिक मजबूत रहेंगे, तो वे बेहतर बालिग भी साबित होंगे। लेकिन आज न सिर्फ बच्चों, बल्कि समाज के बड़े लोगों के लिए भी तरह-तरह के परामर्शदाताओं की जरूरत है। स्कूलों के शिक्षक चूंकि पढ़ाने के बीएड जैसे कोर्स किए हुए रहते हैं, इसलिए वे परामर्श के कोर्स करने के लिए अधिक सही व्यक्ति भी होते हैं। सरकारें अगर समाज में औपचारिक जगहों पर, और अनौपचारिक रूप से भी मनोवैज्ञानिक-परामर्श की सहूलियत मुहैया नहीं कराएंगी, तो एक तो सरकार के हाथ हिंसा के बहुत से मामलों से भरे रहेंगे, दूसरी बात यह भी रहेगी कि एक बीमार या विचलित समाज कभी भी एक स्वस्थ और खुश समाज जितना उत्पादक नहीं हो सकता। हमें आज के लिए सबसे जरूरी, और सबसे आसान बात यही लगती है कि सरकार अपने ढांचे में मौजूद शिक्षकों को ऐसी पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करे, और अभी से इस बात की घोषणा करे कि आने वाले बरसों में शिक्षकों के लिए जिस तरह बीएड अनिवार्य है, उसी तरह मनोवैज्ञानिक-परामर्श का कोर्स किए हुए लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। भारत में समाज इतना सक्षम और संपन्न नहीं है कि वह अपनी बहुत सी दिक्कतों को खुद सुलझा सके, इसलिए सरकारों का योगदान जरूरी है, जिसके बिना कई तरह के खतरे टल नहीं सकते।

(Daily Chhattisgarh)       

दीवारों पर लिक्खा है, 20 फरवरी 2026



 

दीवारों पर लिक्खा है, 19 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)




 

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों से महिला की देह फिर फोकस में..

19 फरवरी 2026 

 

कल छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दो अलग-अलग मामलों में दिए गए फैसले बलात्कार में लडक़ी या महिला की अलग-अलग स्थितियां तय करते हैं। इन दोनों की आपस में तुलना करने की कोई वजह नहीं है, दोनों की घटनाएं अलग हैं, लेकिन भारतीय कानून में महिलाओं की स्थिति, और भारतीय हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के नजरिए को लेकर इन दोनों की एक तुलना करना जरूरी भी है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक जिला अदालत द्वारा सुनाई गई सात साल की सजा को घटाकर साढ़े तीन बरस कर दिया, क्योंकि हाईकोर्ट जज का यह मानना था कि किसी महिला की योनि पर अगर आरोपी ने अपना गुप्तांग टिकाया था, और वहीं उसका स्खलन हुआ, तो जब तक उसने योनि के भीतर प्रवेश नहीं किया था, तब तक वह बलात्कार नहीं, सिर्फ बलात्कार का प्रयास कहलाएगा। यह पूरी बात सुनने में बड़ी अप्रिय लगती है, लेकिन सेक्स अपराधों के मामले में इस चर्चा से इसलिए नहीं बचा जा सकता कि ऐसे बारीक तकनीकी फर्क से कानून के नजर में जुर्म बदल जाता है। हाईकोर्ट ने इस तकनीकी फर्क के आधार पर मौजूदा कानून के तहत इसे बलात्कार की कोशिश ही माना, और उस आधार पर ही सजा सुनाई, ट्रॉयल कोर्ट की दी गई सजा घटाकर आधी कर दी। 

एक दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पिछले बरस इलाहाबाद हाईकोर्ट के दिए गए उस विवादास्पद आदेश को रद्द कर दिया जिसमें एक नाबालिग लडक़ी को सीना पकडक़र, उसका नाड़ा खींचा गया था, उसे पुल के नीचे ले जाया गया था, और हाईकोर्ट ने इसे बलात्कार का प्रयास मानने से भी इंकार कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर दिया है। हमने पिछले बरस के इस फैसले के तुरंत बाद इसी जगह यह लिखा था कि जज का यह तर्क सही नहीं है कि उस नाबालिग लडक़ी का सीना भींचना, और उसका नाड़ा खोलने या तोडऩे की कोशिश करना बलात्कार की कोशिश नहीं है। इसके खिलाफ हमने अपने अखबार के यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर जमकर कहा था, और सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि इस फैसले को तुरंत खारिज करे। इसे खारिज करने में सुप्रीम कोर्ट ने करीब 11 महीने लगा दिए, और सर्वोच्च अदालत को जो संवेदनशीलता दिखानी थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राममनोहर नारायण मिश्रा का नाम तब से हमारे दिमाग में घूम ही रहा था कि कैसे कोई जज इतना संवेदनाशून्य हो सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के ही एक दूसरे जज संजय कुमार सिंह ने बलात्कार के एक आरोपी को जमानत देते हुए लिखा था कि पीडि़ता ने खुद ही मुसीबत को न्यौता दिया था, और वह खुद जिम्मेदार है। हमने इस पर पहले भी लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट जब अदालती संवेदनशीलता के लिए कुछ निर्देशक-सिद्धांत बनाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले यह तय करना चाहिए कि इस तरह की हिंसक, पुरुषवादी, महिलाविरोधी, और संवेदनाशून्य टिप्पणियां करने वाले जजों को उनकी बाकी नौकरियों तक इस किस्म के मामलों से अलग रखा जाए। जो जज सदियों का पूर्वाग्रह ढोते हुए हिंसक बने हुए हैं उन्हें ऐसे किसी भी मामले की सुनवाई का हक नहीं है। हम जजों से यह उम्मीद तो नहीं करते कि वे पुरखों से मिली हिंसा की विरासत से पूरी तरह मुक्त हो सकेंगे, लेकिन उन्हें महिलाओं और बच्चों के मामलों से, धर्म या जाति के मामलों से पूर्वाग्रह की वजह से ही अलग रखना चाहिए। 

जब-जब हमारी कही कोई बात सुप्रीम कोर्ट में जायज करार दी जाती है, तो थोड़ी तसल्ली होती है कि प्राकृतिक न्याय पर आधारित हमारी सीमित समझ सही साबित हुई है। इससे भी अधिक तसल्ली यह होती है कि भारतीय समाज में जो तबके सबसे कमजोर हैं, उन तबकों के साथ, उनमें से कम से कम किसी एक तबके के साथ यह थोड़ी हमदर्दी की बात हुई है। हालांकि इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के मामले में नफरती-बयान की याचिका पर जो रूख दिखाया है, वह एकदम ही निराश करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट के पिछले, रिटायर हो चुके जजों ने हेट-स्पीच के मामले में जो साफ-साफ फैसले दिए थे, और पूरे देश के प्रशासन पर एफआईआर दर्ज करने की जो जिम्मेदारी डाली थी, आज के चीफ जस्टिस खुद ही हाल के बरसों के उस फैसले को अनदेखा करते हुए दिख रहे हैं। खैर, आज लड़कियों और महिलाओं के हक, उनकी गरिमा, उनके साथ इंसाफ की चर्चा में हम नफरती-बयानों के मुद्दे को जोडक़र सब कुछ बहुत जटिल करना नहीं चाहते, इसलिए उस पर अलग से। 

फिलहाल बिलासपुर हाईकोर्ट का यह ताजा फैसला कुछ फिक्र खड़ी करता है कि कोई पुरूष अपने निजी अंग को महिला के निजी अंग पर दस मिनट तक रखे, और वहीं उसका स्खलन हो जाए, और उसे बलात्कार न माना जाए। जज अपनी जगह सही होंगे, क्योंकि भारत के कानून में बलात्कार की परिभाषा में महिला की देह के भीतर प्रवेश एक अनिवार्य शर्त है, और उसके बिना उसे रेप नहीं माना जा सकता। लेकिन यह कानून जब भी बना होगा, उस वक्त इस बात को अनदेखा किया गया कि महिला के गुप्तांग पर इस तरह स्खलित होने का मतलब उस महिला को एड्स सहित दूसरे सभी सेक्स-संक्रमित बीमारियों को देना भी है। इनमें से एड्स अभी तक पूरी दुनिया के लिए लाइलाज है। इसे उस लडक़ी या महिला की पूरी जिंदगी के लिए एक जानलेवा खतरा बनाने वाले को अगर बलात्कारी न माना जाए, तो क्या माना जाए? एक संकुचित परिभाषा के तहत उसे बलात्कारी न मानना तकनीकी रूप से जायज तो हो सकता है, लेकिन उसे महज बलात्कार के प्रयास का आरोपी मानकर छोड़ देना तो कानून की बहुत ही अदूरदर्शी, और सीमित सीमाओं का एक सुबूत है। जज ने अपने हिसाब से तंगनजरिए वाले कानून के तहत सही व्याख्या की होगी, लेकिन हमारी समझ यह भी कहती है कि हाईकोर्ट को कानून की व्याख्या करने के साथ-साथ जरूरत पडऩे पर उसमें फेरबदल भी सुझाना चाहिए। इस फैसले में जज ने वह सुझाया है या नहीं, वह पूरा फैसला अभी हमें देखने नहीं मिला है। लेकिन जिस संसद से कानून बनते हैं, उस संसद में यह बात आनी चाहिए कि किसी लडक़ी या महिला को इस तरह एड्स के खतरे में डालने को क्या कहा जाए? जिंदगी का खतरा, पूरी जिंदगी की बीमारी का खतरा, यह बलात्कार के दर्जे में नहीं आ रहा है, यह गैरइरादतन हत्या के दर्जे में नहीं आ रहा है, तो फिर कहां आ रहा है? एक तरफ तो सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला खारिज करते हुए लडक़ी के नाड़े तोडऩे को बलात्कार का प्रयास मान रहा है, तो दूसरी तरफ लडक़ी के बदन से अपना गुप्तांग रगडक़र वहीं स्खलित हो जाने को भी बलात्कार का प्रयास ही माना जा रहा है। इन दोनों में साफ-साफ फर्क होना चाहिए। और अगर जरूरत हो तो बलात्कार से जुड़े हुए कानूनों में बारीकी से इस बात का प्रावधान करना चाहिए कि एड्स जैसी बीमारी का खतरा पैदा करने वाले बलात्कार की कोशिश करने वाले को पूरा बलात्कारी माना जाए, या गैरइरादतन हत्या का मुजरिम माना जाए? इस पर संसद को बात करना चाहिए, और एक खास सजा का इंतजाम करना चाहिए। बदलते हुए वक्त, और हो रही अलग-अलग घटनाओं को लेकर कानून में फेरबदल की जरूरत आते रहती है, और संसद को एक ऐसा कानून भी बनाना चाहिए कि किस तरह के फैसले देने वाले जजों को उस तरह के मामलों से अलग रखने की अनिवार्यता अदालती-प्रशासन पर लागू हो। क्या पक्ष-विपक्ष की लड़ाई में उलझी हुई संसद को भारतीय कानून और अदालत की ऐसी जटिलताओं पर कोई गंभीर बात करने का वक्त है? 

(Daily Chhattisgarh)      

बाल सुधारगृहों से बच्चे तो भाग जाते हैं, अपने पीछे कई सवाल छोड़ भी जाते हैं

18 फरवरी 2026 

 

छत्तीसगढ़ में अभी सरगुजा के एक बाल सुधारगृह में गंभीर अपराधों में बंद किए गए 13 नाबालिग फरार हो गए। उनमें से 4 पकड़ा गए हैं, लेकिन 9 को कई जिलों में ढूंढा जा रहा है। समाचार बताता है कि वे गार्ड को बंधक बनाकर, उन पर हमला करके, दीवाल से छलांग लगाकर भाग निकले। इन नाबालिगों पर कुछ सबसे गंभीर अपराधों के मामले किशोर न्यायालय में चल रहे हैं। यह पहला मौका नहीं है कि इस राज्य के बाल सुधारगृह में हिंसा करके वहां बंदी बनाए गए किशोर फरार हुए हों, लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले तो दुर्ग के एक बाल सुधारगृह की छत पर चढ़ गए लडक़े रसोई गैस सिलेंडर को पुलिस पर फेंकने के लिए उठाकर खड़े थे, और दिल दहलाने वाली उनकी वैसी तस्वीरें सामने आई थीं। देश का कानून नाबालिगों को मुजरिम नहीं मानता है, उन्हें कानून से टकरा रहे नाबालिग ही मानता है। सुप्रीम कोर्ट में एक बहस यह भी चल रही है कि बहुत भयानक जुर्म में शामिल नाबालिगों को भी क्या बालिग मानकर सजा नहीं दी जानी चाहिए? इस मामले में मानवाधिकारवादी लोगों का कहना है कि नाबालिगों के साथ अलग सुलूक होना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ निर्भया जैसे भयानक सामूहिक बलात्कार कांड में शामिल एक नाबालिग ने निर्भया की देह के साथ जैसे जुल्म किए थे, उसे देखते हुए लोगों को यह भी लगता है कि कई किस्म के जुर्म उम्रसीमा से परे मान लेने चाहिए। 

हम बाल सुधारगृह के नाम पर ही आते हैं। इसे सुधार माना गया है। लेकिन वहां का जो हाल रहता है, क्या उसमें सचमुच ही किसी तरह के सुधार की कोई गुंजाइश रहती है? एक तो जो नाबालिग वहां पहुंचते हैं, उनमें से बहुत सारे लगातार जुर्म के बीच बरसों से जीते हुए रहते हैं। वे नशा सीख चुके रहते हैं, दूसरे बालिग मुजरिमों के मातहत और उनके साथ काम करते हुए वे जुर्म की दुनिया का हिस्सा बन चुके रहते हैं। किसी मामले में पकड़ में आने के बाद जब उन्हें बाल सुधारगृह भेजा जाता है, तब तक वे अपराधों में रम चुके रहते हैं। बहुत ही कम नाबालिग ऐसे रहते होंगे जो अपनी पहली चूक या पहली गलती, पहले गलत काम के साथ ही पकड़ाए जाते हों, और बाल सुधारगृह भेज दिए गए हों। फिर सरकार के दूसरे किसी भी इंतजाम की तरह बाल सुधारगृह में नाबालिगों के भीतर के भी अलग-अलग उम्र सीमा के सभी तरह के बच्चे वहां रहते हैं, और जैसा कि बालिगों की जेल में होता है, जो अधिक बड़े मुजरिम रहते हैं, उन्हीं का राज चलता है। बाल सुधारगृह में भी अधिक बड़े जुर्म में पकडक़र भेजे गए लडक़ों का दबदबा रहता है, और यह बात तो बहुत आम है कि देश की सबसे सुरक्षित जेलों में भी मोबाइल भी पहुंच जाते हैं, नशा भी पहुंच जाता है। यह मानना भी फिजूल होगा कि नशे के आदी हो चुके नाबालिग सुधारगृह में नशे का जुगाड़ करने की कोशिश नहीं करते होंगे। सरकारों की सारी व्यवस्था जितनी भ्रष्ट रहती है, उसमें ऐसा इंतजाम बहुत मुश्किल भी नहीं रहता होगा। बाल सुधारगृह तो जेलों जैसी बहुत कड़ी सुरक्षा व्यवस्था वाले भी नहीं रहते, हथकड़ी, बेड़ी, सलाखों की कोठरियां उनमें नहीं रहतीं, और ऐसे में अधिक बड़े जुर्म वाले, अधिक अराजक हो चुके लडक़ों का वहां अधिक दबदबा स्वाभाविक ही लगता है। 

जब देश का कानून नाबालिगों को एक अलग दर्जा देता है, और किसी जुर्म में उनके शामिल होने पर भी न उन्हें मुजरिम कहता, न उन्हें दी जाने वाली सजा को कैद कहता, और सब कुछ सुधार के नजरिए से किया जाता है। ऐसे में सच तो यह है कि सरकारों को सुधारगृहों को सचमुच ही सुधार के लायक बनाना होगा, वरना नाबालिगों को वहां रखकर उन्हें जुर्म से अधिक वाकिफ करके ही छोड़ा जा रहा है। बड़े या बालिग कैदियों की जेलों में भी यही होता है, जिनको वहां बंद रखा जाता है, वे और अधिक बड़े, और अधिक कड़े मुजरिम बनकर निकल सकते हैं। अब बच्चों के, नाबालिगों के सुधारगृह में भी अगर माहौल वैसा ही है, तो फिर सरकारें अपनी न्यूनतम बुनियादी जिम्मेदारी भी पूरी करते नहीं दिखती हैं। यह बात भी समझना चाहिए कि बड़े लोगों की जेलों में पहुंचे हुए लोग जिंदगी का अधिक बड़ा हिस्सा गुजारने के बाद वहां पहुंचते हैं, और वहां पर वे अपने जुर्म के अनुपात में ही लंबे बरसों के लिए कैद रहते हैं। दूसरी तरफ बाल सुधारगृह में पहुंचे हुए नाबालिगों की उम्र बहुत बाकी रहती है, उन्हें सुधारगृह में बंद रखने का वक्त भी बड़ा कम रहता है, और अगर वे जुर्म में मंजकर बाहर निकलते हैं, तो वे समाज में लंबे समय के लिए एक खतरा रहते हैं। इसलिए सरकार को समाज की व्यापक हिफाजत और भलाई के लिए कानून से टकरा रहे बच्चों के लिए बेहतर इंतजाम करना चाहिए। हम किसी रहस्य की बात नहीं कर रहे हैं, पूरी दुनिया का यही तजुर्बा है कि अगर वहां बच्चों को ठीक से नहीं रखा गया, तो भविष्य बहुत लंबे वक्त के लिए बर्बाद होता है, उन बच्चों का भी, और पूरे समाज का भी। 

बाल सुधारगृहों की पूरी सोच को आम सरकारी ढर्रे से अलग हटकर विश्लेषण की जरूरत है। सरकारों को समाज के जानकार और विशेषज्ञ तबकों से सलाह लेना चाहिए, और बाल सुधारगृहों के अनुभवी लोगों से भी यह पूछना चाहिए कि अलग-अलग सीमा तक अराजक हो चुके, अलग-अलग सीमा तक जुर्म सीख चुके, नशे के आदी हो चुके, अलग-अलग उम्र के बच्चों को एक साथ रखना क्या जायज है? क्या यह सभी तरह के जानवरों को एक बाड़े में बंद कर देने सरीखा नहीं है? क्या बिना किसी पुख्ता हिफाजत, और इंतजाम के, अलग-अलग दर्जे के बिगड़े हुए बच्चे एक साथ रखने से, कम बिगड़े हुए बच्चों के अधिक बिगड़ जाने का एक बड़ा खतरा नहीं रहता है? ये सारे असुविधाजनक सवाल किसी बाल सुधारगृह में हिंसा, या अराजकता सामने आने पर उठ खड़े होते हैं, कम से कम हमारे मन में तो उठते ही हैं, लेकिन हमारा मन काफी नहीं है, ये सरकारों के सामने, और समाज के बीच भी उठने चाहिए। आज के नाबालिग बच्चे अधिक जुर्म सीखकर, अधिक हिंसक होकर, अधिक बड़े मुजरिम बनकर बालिग होकर बाहर निकलेंगे, तो वे समाज और सरकार दोनों के लिए एक बड़ी समस्या रहेंगे। इस समस्या को देखते हुए ही नहीं, देश के बच्चों का इससे परे भी ख्याल रखने के लिए सरकार और समाज दोनों को बाल सुधारगृहों की पूरी सोच और व्यवस्था के बारे में गंभीरता से विश्लेषण, और आत्ममंथन करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)     

दीवारों पर लिक्खा है, 18 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)