दिल्ली को देख बाकी देश को अपने-अपने घर सुधारने चाहिए

संपादकीय
6 नवम्बर 2016  
दिल्ली का भयानक प्रदूषण चूंकि दिल्ली में है इसलिए खबरों में है, और इसीलिए वह सुप्रीम कोर्ट में भी है। इसी दिल्ली के प्रदूषण को लेकर पिछले दशकों से कभी डीजल गाडिय़ों पर रोक लगती है, तो कभी सभी पुरानी गाडिय़ों पर। लेकिन जो लोग दिल्ली के प्रदूषण को एक स्थानीय समस्या मानते हैं, उन्हें यह समझना होगा कि राजस्थान के मरुस्थल से उड़कर आने वाली रेत भी दिल्ली की सड़कों पर प्रदूषण पैदा करती है, निर्माण कार्य के दौरान इमारतों से उडऩे वाले सीमेंट और बाकी सामान से भी प्रदूषण होता है, और दिल्ली से दो-दो सौ किलोमीटर दूर हरियाणा, उत्तरप्रदेश, और दूसरी जगहों पर फसलों के बाद खेतों में ठूंठ को जलाने की जो आदत पड़ी हुई है, उसका प्रदूषण भी दिल्ली तक फैलता है, और आसपास के कई प्रदेशों के कई शहरों तक भी। अब दिल्ली में इस प्रदूषण में गाडिय़ों का भयानक प्रदूषण और जुड़ जाता है, और कुछ सौ वर्गमील के इस शहर के घने इलाकों में गाडिय़ों की हालत देखकर ऐसा लगता है कि दिल्ली महज गाडिय़ों की बस्ती है। ऐसे में यह प्रदूषण रोक पाना आसान बात नहीं है।
फिर एक बात यह भी है कि यह सिर्फ दिल्ली की दिक्कत नहीं है, लोगों को याद होगा कि पिछले बरस चीन की राजधानी बीजिंग में जितना भयानक प्रदूषण हुआ था, उसकी तस्वीरों ने दुनिया भर में बीजिंग की साख घटाई थी। आज दिल्ली की साख भी दुनिया के शहरों में चौपट है, लेकिन दिल्ली थमती इसलिए नहीं है कि सरकार, अदालत, और संसद तीनों यहीं बसी हैं, और दुनिया भर में जिनको इनसे वास्ता पड़ता है, देश भर के जिन लोगों को इनसे वास्ता पड़ता है, उनको दिल्ली आना ही पड़ता है। और इसी एक बात को देखें तो यह समझ आता है कि किसी एक शहर में शहरीकरण का इतनी बुरी तरह केन्द्रीयकरण होना अपने आपमें खतरा होता है, और दिल्ली उसे भुगत रही है। दुनिया में कई ऐसे देश रहते हैं जहां लोकतंत्र के ये तीनों संस्थान अलग-अलग शहरों में बसे रहते हैं। इनसे एक तो क्षेत्रीय विकास का संतुलन बना रहता है, और दूसरी बात यह कि किसी एक महानगर में ट्रैफिक और आती-जाती आबादी का इतना बुरा हाल नहीं होता।
लेकिन दिल्ली के इस स्थानीय मुद्दे को लेकर आज यहां पर लिखने का मकसद यह है कि इनमें से कई बातें छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश पर भी लागू होती हैं, और इस प्रदेश की राजधानी रायपुर भी देश के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक गिनी जाती है। छत्तीसगढ़ में लोगों को इस बात पर तसल्ली हो सकती है कि पिछले साल-छह महीने में यहां का प्रदूषण कुछ नीचे गया है, लेकिन लोगों की सेहत को जो नुकसान हुआ है, वह नीचे नहीं जाने वाला है। दूसरी बात यह कि बहुत भयानक से कुछ कम भयानक हो जाना किसी राहत की बात नहीं है। जिस तरह दिल्ली में गाडिय़ों का हाल है, और सड़कें पार्किंग लॉट की तरह दिखती हैं, वैसा ही कुछ हाल रायपुर जैसे शहर का होने लगा है, और यहां की अतिविकसित नई राजधानी ने पिछले एक हफ्ते में दो बार ऐसा ट्रैफिक जाम देखा है कि लोगों के होश उड़ गए। यह बात सही है कि शहरी यातायात के लिए बसें बढ़ती जा रही हैं, लेकिन ऐसी बसों का जाल और अधिक बढ़ाने की जरूरत है चाहे यह सरकार के लिए शुरू में बड़ा नुकसानदेह ही क्यों न हो। जब तक निजी गाडिय़ों पर निर्भर रहने की लोगों की बेबसी खत्म नहीं होगी, तब तक सड़कों पर प्रदूषण नहीं घटेगा। फिर एक बात शहरी गंदगी की भी है, जिस प्रदेश की राजधानी साफ नहीं रह सकती, वहां पर प्रदूषण कैसे घटेगा? छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में स्थानीय म्युनिसिपलों को अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों की तरफ वापिस भेजना होगा। आज हर म्युनिसिपल कमाई के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाने में लगी हुई दिखती है, और सफाई की पहली जिम्मेदारी का एहसास किसी को नहीं रह गया है। गंदगी प्रदूषण बढ़ाती है, और छत्तीसगढ़ की राजधानी को तो नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल लगातार चेतावनी दे-देकर थक भी चुकी है। ये सारी चेतावनी म्युनिसिपल के खाते में जा रही है, और इसे अपनी पहली जिम्मेदारी की खबर नहीं दिखती है।
दिल्ली को लेकर अगर छत्तीसगढ़ सावधान नहीं होगा, तो बहुत दिक्कत होगी। यह पूरा राज्य खनिजों पर आधारित कारखानों वाला है, और कारखानों की यह किस्म हमेशा ही भारी प्रदूषण फैलाने वाली रहती है। कोरबा के बिजलीघरों से लेकर रायपुर के लोहे के कारखानों तक, चारों तरफ औद्योगिक प्रदूषण लोगों को मार रहा है, और सरकार इन पर काबू नहीं कर पा रही है। यह नौबत भी तुरंत सुधारना चाहिए क्योंकि प्रदूषण को आर्थिक प्रगति के लिए जरूरी मान लेने की गलती अगर एक बार हो जाएगी तो हालात कभी नहीं सुधारे जा सकेंगे। दिल्ली की हालत देखकर बाकी देश को अपने-अपने घर सुधारने चाहिए।

टकराव में भी स्कूल-अस्पताल हमलों से परे रखे जाने चाहिए

संपादकीय
5 नवम्बर 2016  
कश्मीर में लगातार स्कूलों को आतंकी और अलगाववादी बंद करवाते चल रहे हैं। कई हफ्तों या कुछ महीनों से कोई पढ़ाई नहीं हुई है, और दर्जनों स्कूलें जला दी गई हैं। इस बीच एक खबर यह भी है कि वहां के एक बड़े अलगाववादी नेता के परिवार की बच्ची जिस स्कूल में पढ़ती है उसे बंद नहीं करवाया गया है, और बाकी स्कूलों में पढ़ाई बंद है, इम्तिहान की तारीख आ चुकी है, लेकिन न पढ़ाई का ठिकाना है न परीक्षा का। लोगों को याद होगा कि बस्तर में एक वक्त था जब सुरक्षा बल वहां के गांवों में सिर छुपाने के लिए स्कूलों की इमारतों में टिकते थे, और उस वजह से नक्सली स्कूलों को बमों से उड़ाने लगे थे। बहुत सी स्कूलें तबाह हुई थीं, और उसकी भरपाई होने में समय लगा था।
इन दो घटनाओं के पीछे उग्रवादियों की सोच अलग-अलग हो सकती है, लेकिन उनका एक असर एक सरीखा है कि पढ़ाई चौपट कर दी जाए। दरअसल आतंकी और उग्रवादी जिस तरह के मुद्दों को लेकर चलते हैं, दुनिया में कहीं भी उन्हें पढ़ाई-लिखाई जैसी धीमी बात से कोई लेना-देना नहीं होता है। जो पढ़ाई बारह बरस की स्कूल और तीन-चार बरस के कॉलेज से पूरी होती हो, वह पढ़ाई आतंकी-एजेंडा की नजरों में महत्वहीन होती है। उनके सामने महज अगले कुछ दिन, महीने, या बरस रहते हैं, और आतंकियों की जिंदगी का भी ठिकाना नहीं रहता है, इसलिए समाज को धीमी रफ्तार से बदलने वाली बातों को उनको कोई परवाह नहीं रहती। नतीजा यह है कि कश्मीरी बच्चों की जिंदगी को एक तरफ तो सुरक्षा बलों की बंदूकों के छर्रे तबाह कर रहे हैं, और दूसरी तरफ जो जख्मी नहीं हैं, उनको भी स्कूल बंद होने से पढऩा नसीब नहीं हो रहा है।
नक्सली हो, या कश्मीर के आतंकी या अलगाववादी, यह बात इन सबको माकूल बैठती है कि जनता न पढ़े-लिखे। क्योंकि न पढ़ी हुई जनता बंदूक थामने और आतंकी-हिंसक हमले करने के लिए अधिक तैयार रहती है। जब लोग पढ़-लिख लेते हैं, तो उनमें से कुछ की नजर में लोकतंत्र का महत्व बढ़ जाता है, बहुतों की नजर में जिंदगी की सहूलियतों का महत्व दिखने लगता है, और वे देश के संविधान के खिलाफ आतंकी वारदातों से दूर रहना बेहतर समझते हैं। आतंकी नेता खुद तो पढ़े-लिखे रहते हैं, खुद के बच्चों को वे बाहर के महंंगे स्कूलों या कॉलेजों में पढ़ाते हैं, लेकिन जिस इलाके पर वे अपना राज चाहते हैं, वहां पर वे आम जनता को अनपढ़ पसंद करते हैं। लोकतंत्र के हिमायती लोगों को चाहिए कि आतंक की ऐसी सोच, और आतंकियों की निजी जिंदगी के पारिवारिक पाखंड का भांडाफोड़ करे। लोगों को यह भी याद होगा कि कर्नाटक का सबसे बड़ा चंदन तस्कर वीरप्पन जब मारा गया, तो पता लगा कि उसकी बेटी किसी महंगे कॉलेज में पढ़ रही थी। जो लोग बंदूक के बल पर जुर्म करते हैं, वे बिना राजनीतिक विचारधारा के मुजरिम हों, या राजनीतिक विचारधारा के साथ वाले मुजरिम हों, उनकी निजी जिंदगी का पाखंड बहुत रहता है। लोगों को यह फर्क भी समझना चाहिए कि लोकतंत्र में आज भी अधिकतर मौकों पर अधिकतर लोगों से सवाल पूछने की आजादी रहती है, और सार्वजनिक जीवन के लोगों के निजी जीवन की जानकारी भी जनता के बीच आती रहती है। लेकिन आतंकी न तो जवाबदेह रहते हैं, न ही उनके परिवार के ऐशोआराम सामने आते हैं। किसी भी अलोकतांत्रिक आंदोलन के भीतर के ऐसे विरोधाभास और पाखंड उजागर होने चाहिए। श्रीनगर के बंगले में बसे हुए अलगाववादी बुजुर्ग की पोती या नातिन का स्कूल तो बख्श दिया गया है, और वहां पढ़ाई चल रही है, लेकिन बाकी स्कूलें बंद करवा दी गई हैं, या जला दी गई हैं। यह कैसा वैचारिक आंदोलन है, यह कैसा राजनीतिक आंदोलन है? जिस तरह पूरी दुनिया में एम्बुलेंस को किसी भी युद्ध या टकराव के बीच भी हमले से परे रखा जाता है, ठीक वैसे ही स्कूलों और अस्पतालों को रखना चाहिए। आज तो सीरिया से जो खबरें आ रही हैं, उनमें सरकारी फौजें ही हवाई हमले करके अपने ही देश की स्कूलों और अस्पतालों में लोगों को दर्जनों और सैकड़ों की गिनती में मार रही हैं।

कमजोर तबकों पर जुल्म वाला यह कैसा विकसित लोकतंत्र है?

संपादकीय
4 नवम्बर 2016  
केरल से कल समाचार आया कि वहां गैंगरैप की शिकार एक महिला से पूछताछ करते हुए पुलिस ने यह जानना चाहा कि कई बलात्कारियों में से किसके साथ उसे सबसे अधिक मजा आया। यह बात भारत की पुलिस और अदालतों के बारे में पहले से जानी जाती है कि बलात्कार की शिकार महिला के साथ पूरी न्याय प्रक्रिया के चलते और कई बार जुबानी बलात्कार होता है। देश के कई हिस्से ऐसे हैं जहां पर शिकायत लेकर थाने पहुंची महिला के साथ पुलिस सचमुच ही शारीरिक बलात्कार करने में जुट जाती है। अब इससे परे की एक खबर अभी महाराष्ट्र से आई है कि एक आदिवासी इलाके में स्कूल की छोटी बच्चियों के साथ हेडमास्टर और शिक्षक बलात्कार करते थे, और अब वे गिरफ्तार हुए हैं। दूसरी तरफ भोपाल से लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं कि वहां की जेल से फरार सिमी के सदस्य, आतंक के आरोपी लोगों को पुलिस ने जिस तरह मुठभेड़ में मार गिराया, उसके पीछे पुलिस का मारने का पक्का इरादा दिखता है, और किसी को जिंदा पकडऩे की जहमत नहीं उठाई गई। मुंबई फिल्म उद्योग के एक कुख्यात साम्प्रदायिक और हिंसक बयान देने वाले गायक अभिजीत का बयान आया है कि आतंकियों के लिए अदालतों का समय बर्बाद करना ठीक नहीं है, वे जहां दिखें उन्हें ठोंक देना चाहिए। एक आखिरी खबर छत्तीसगढ़ के रायगढ़ की है जहां शव वाहन न मिलने पर एक गरीब परिवार अपने मृतक को कंधों पर ढोकर कई किलोमीटर ले जा रहा है।
इन सबमें एक बात एक सरीखी है कि ये सबके सब अलग-अलग किस्म के कमजोर तबकों के लोग हैं। भारत में महिला एक कमजोर तबका है, आदिवासी एक दूसरा कमजोर तबका है, अल्पसंख्यक भी कमजोर हैं, और गरीब भी कमजोर हैं। इसलिए इन सबके साथ जितने किस्म के जुल्म हो सकते हैं, उन्हें सामाजिक और राजनीतिक मंजूरी सी मिली हुई है। और भारत के धर्मालु बहुसंख्यक लोगों का यह भी मानना रहता है कि अगर ईश्वर इन्हें सजा देना नहीं चाहता, तो ये इस जन्म में गरीब क्यों होते, कमजोर तबके के क्यों होते, लड़की बनकर क्यों पैदा होते, या फिर विकलांग (दिव्यांग) क्यों होते? धर्म ने लोगों की सोच को इंसाफ से बहुत दूर धकेल दिया है, और जाति व्यवस्था ने, समाज की आर्थिक असमानता ने लोगों को और अधिक जुल्म करने के लिए तैयार भी कर दिया है और वे इसे बेइंसाफी भी नहीं मानते। भारतीय लोकतंत्र में न्याय प्रक्रिया से लेकर सरकारी व्यवस्था तक, और निजी क्षेत्र से लेकर समाज-मोहल्ले तक हर किस्म के कमजोर तबके ज्यादती झेलने के आदी हो गए हैं, और ताकतवर तबके ज्यादती करने के।
अधिकतर लोग ऐसे हैं जो भारत में चुनाव प्रणाली के पुख्ता होते जाने को लोकतंत्र का विकास मानने की गलती करते हैं। चुनाव प्रणाली से गड़बडिय़ों का खत्म होना एक वक्ती बात थी, मशीनें आईं, आयोग के हक बढ़े, और गड़बडिय़ां घट गईं। लेकिन ये गड़बडिय़ां भी सिर्फ प्रक्रिया में घटी हैं, असल चुनाव तो भ्रष्ट पैसों से, धर्म और जाति के भड़कावे से ही जीता जाता है। इसलिए भारत में लोकतंत्र के विकसित होने का धोखा या झांसा जिनको होता है, उनको अपने आपको दलितों और वंचितों, आदिवासियों और महिलाओं की जगह रखकर देखना चाहिए कि लोकतंत्र है कहां? लोकतंत्र शहरी सड़कों और पुलों का नाम नहीं हो सकता, लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें लोग अपनी जिम्मेदारी का एहसास करते हैं, और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हैं। आज इस लोकतंत्र में लोग यह तय करने लगे हैं कि दूसरे लोग क्या खाएं, क्या नहीं? यह भी तय करने लगे हैं कि उनका पसंदीदा कौन सा नारा न लगाने वाले लोग मुल्क के लिए गद्दार हैं, और उन्हें पाकिस्तान भेज देना चाहिए।
लोकतंत्र बहुमत से चुने गए बुरे लोगों की संसद और विधानसभा को नहीं कहा जा सकता, जहां तक पहुंचने के लिए लोकतंत्र की आत्मा को कुचलते हुए ही पहुंचना एक आम बात है। भारत में आज कदम-कदम पर कमजोर तबकों के साथ जिस परले दर्जे की बेइंसाफी दिखती है, उससे लगता है कि यहां का लोकतंत्र कमजोर ही होते चल रहा है, और मजे की बात यह है कि न इसकी चर्चा होती है, और न ही अधिकतर लोगों को इसका कोई एहसास ही है।

पीएम के दौरे की कामयाबी, और उनकी तारीफ के बाद...

संपादकीय
3 नवम्बर 2016  
प्रधानमंत्री की हैसियत से नरेन्द्र मोदी की यह तीसरी छत्तीसगढ़ यात्रा थी, लेकिन इस बार पहले के मुकाबले राज्य सरकार और प्रदेश के पार्टी संगठन में तनाव कम था, और आत्मविश्वास अधिक था। यह तैयारी से लेकर विदाई तक पूरे वक्त झलकते रहा, और देश भर के सारे तनावों से मानो आजाद होकर प्रधानमंत्री ने खुलकर छत्तीसगढ़ सरकार की तारीफ की, और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने इसके पहले प्रधानमंत्री की इससे अधिक तारीफ कर ही दी थी। कुल मिलाकर यह माहौल प्रदेश सरकार के लिए एक उत्साह का था क्योंकि राज्य सूखे से उबरा हुआ दिखता है, और कार्यक्रम में लाई गई या आई हुई भीड़ प्रधानमंत्री को भी खुश करने के लिए काफी थी। पिछले महीनों में कई राज्यों में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी राजनीतिक आमसभाओं में कुछ हजार की भीड़ देखना भी नसीब हुआ था, और ऐसे में अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री के सामने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनकी टीम की प्रधानमंत्री के मुंह से वाहवाही राज्य सरकार का उत्साह बढ़ा सकती है। यह पूरा कार्यक्रम गैरराजनीतिक था, और सरकारी मंच होने की वजह से सरकार ने लोगों के लाने के जो इंतजाम किए थे, वे किसी भी प्रदेश में किसी भी पार्टी की सरकार के लिए सत्ता के आम इस्तेमाल से अधिक नहीं थे, और इसके लिए महज मौजूदा सरकार को अलग से कोसना शायद ठीक नहीं होगा।
लेकिन प्रधानमंत्री का आना और तारीफ करके जाना, दीवाली और भाईदूज को छोड़कर तैयारी में लगे हुए राज्य सरकार और भाजपा के लोगों के लिए तो खुशी की बात हो सकती है, लेकिन चुनाव के दो बरस पहले की यह कामयाबी राज्य सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी में एक खुशफहमी पैदा करने का खतरा भी रखती है। राज्योत्सव के मौके पर ऐसा आयोजन सफल करना शायद अधिक आसान है बजाय अगले चुनाव में मतदाताओं के बीच ऐसी कामयाबी पाने के। इसलिए सत्ता और संगठन को अपने पांव जमीन पर रहने देना चाहिए, और राज्य स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री के भारी-भरकम कामयाबी वाले स्वागत को एक कार्यक्रम की सफलता भर मानना चाहिए। यह याद रखने की जरूरत है कि पिछला विधानसभा चुनाव भाजपा ने महज पौन फीसदी वोटों की लीड से जीता था। उस वक्त भी भाजपा की कुछ सीटों पर रहस्यमय और अप्रत्याशित जीत सत्ता में लौटने के पीछे थी। लेकिन इस बार राज्य की राजनीति में जोगी ने एक नया त्रिकोण बनाया है, और उसे लेकर सत्तारूढ़ पार्टी का इस खुशफहमी में रहना भी ठीक नहीं होगा कि जोगी अपनी पिछली पार्टी, कांग्रेस, को ही नुकसान पहुंचाएंगे, और ऐसे त्रिकोण में भाजपा का फायदा होगा।
दूसरी बात यह कि किसी भी तरह के समारोह या जलसे की बनाई गई चकाचौंध को कई बार सरकार में बैठे हुए लोग भी सरकारी जिम्मेदारी के मोर्चे पर कामयाबी मान बैठते हैं। मुख्यमंत्री को इस बारे में भी सोचना चाहिए कि सरकारी पैसों पर कामयाब हो रहे इस पूरे सालगिरह-जलसे से सरकारी काम की कामयाबी साबित नहीं होती है। पूरे प्रदेश में जमीनी स्तर पर हर विभाग के कामकाज में बड़ी गड़बडिय़ां भी हैं, और भारी सुधार की जरूरत भी है। इन दोनों बातों को अगले दो बरस में दूर कर पाना एक ऊंची पहाड़ी पर चढऩे से कम मशक्कत का काम नहीं है, और यह काम राज्योत्सव के आयोजन की तरह आसान नहीं हैं। अक्सर यह होता है कि लोग जनता के सामने रखी गई अपनी चमकीली तस्वीर को खुद भी सच मान लेते हैं, और अपनी कही बातों के झांसे में खुद भी आ जाते हैं। ऐसा होने पर ही देश-प्रदेश में कई बार और कई जगह सत्तारूढ़ पार्टी को बड़ा नुकसान भी झेलना पड़ता है। छत्तीसगढ़ सरकार को मोदी के मुंह से सुनी गई तारीफ को महज राज्योत्सव के कार्यक्रम की तारीफ मानना चाहिए, और इस आयोजन के निपटने के बाद भिड़कर जमीनी हालात सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। लगातार तीन कार्यकाल कम खतरनाक नहीं होते हैं, और ऐसे में लोग चौथी बार भी वोट पाना अपना हक और मतदाता की जिम्मेदारी मान बैठते हैं। अगले दो-तीन दिनों में राज्योत्सव खत्म हो जाए, फिर मुख्यमंत्री और उनकी सरकार, उनकी पार्टी, इन सबको भिड़कर राज्य को उतना ही चमकीला बनाने की कोशिश करनी चाहिए, जितनी चमकीली तस्वीर राज्योत्सव में पेश की गई है।

सांसद-विधायकों को भ्रष्टाचार पर आश्रित रखना ठीक नहीं

संपादकीय
2 नवम्बर 2016  
संसद की समिति ने सांसदों की तनख्वाह बढ़ाने की सिफारिश कर दी है। केन्द्र सरकार ने सांसदों के मूल वेतन को दुगुना करना तय किया है। अब यह पचास हजार से बढ़कर लाख रूपया हो सकती है। यह सिफारिश पिछले कुछ समय से हवा में तैर रही थी, और लोग सोशल मीडिया पर इसका मजाक भी उड़ा रहे थे कि आमतौर पर कई मुद्दों पर एक-दूसरे से असहमत रहने वाले सांसदों ने बिल्कुल एक होकर अपना वेतन दो गुना करने की सिफारिश की है। अगर वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री इस पर सहमत हो जाते हैं तो संसद के अगले सत्र में यह लागू हो सकता है। आज सांसदों को 50 हजार रूपए महीने तनख्वाह मिलती है, इसे दोगुनी करने का प्रस्ताव है, और संसदीय क्षेत्र का भत्ता 45 हजार रूपए महीने से बढ़ाकर 90 हजार रूपए महीने करने की सिफारिश भी की गई है। इससे पहले देश के अलग-अलग प्रदेशों में राज्य ने विधायकों की तनख्वाह बढ़ाई है, और छत्तीसगढ़ में इसे लेकर कांग्रेस के भीतर ही गुटबाजी का एक बखेड़ा खड़ा हुआ था। लोगों को यह लगता है कि सांसद या विधायक कोई नौकरी नहीं करते हैं, और उन्हें मिलने वाले भत्ते या वेतन को बाजार भाव के हिसाब से नहीं बढ़ाना चाहिए, और सांसद-विधायक सेवाभाव से काम करते रहें।
आज देश में लोगों के बीच यह भी एक भावना है कि सांसदों और विधायकों में से बहुत से लोग भ्रष्ट हैं, और कुछ लोग यह भी मानते हैं कि वे निजी कमाई के लिए अगर भ्रष्टाचार नहीं करते, तो भी वे चुनाव का खर्च जुटाने के लिए भ्रष्ट होते ही हैं। इस देश ने कई तरह के स्टिंग ऑपरेशन देखे हैं जिनमें विधायक और सांसद सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेते पकड़ाए हैं, सांसदों की सदस्यता खत्म की गई है, और अदालतों ने अपनी बेबसी दिखाई है कि संसद के भीतर के मामलों पर वे कार्रवाई नहीं कर सकतीं वरना सांसद-विधायक जेल में भी होते। लोगों का यह भी देखा हुआ है कि चुनावों में आयोग द्वारा तय की गई सीमा से कई गुना अधिक खर्च उम्मीदवार करते हैं, और जनता का एक हिस्सा भ्रष्टाचार को बड़ा पसंद करता है, धर्म और जाति के नेता उगाही करते हैं, और देश का मीडिया पेडन्यूज को लेकर काफी नंगा हो चुका है। ऐसे में एक बात और जुड़ जाती है कि सांसद या विधायक को अपने चुनाव क्षेत्र में जितना दौरा करना पड़ता है, और जितना सामाजिक शिष्टाचार निभाना पड़ता है, लोगों की आसमान छूती उम्मीदों के लिए कम्प्यूटर से लेकर फोटोकॉपी तक और कर्मचारियों से लेकर उनके फोन और पेट्रोल तक जितना खर्च करना पड़ता है, वह विधानसभा या संसद की तनख्वाह से कभी पूरा नहीं हो सकता।
ऐसे में इस देश को यह समझना चाहिए कि अपने घर-परिवार की जरूरतों को अनदेखा करके कोई जनता की सेवा नहीं कर सकते। देश में कुछ गिने-चुने बाबा आम्टे हो सकते हैं, कुछ गिनी-चुनी मदर टेरेसा हो सकती हैं, लेकिन अगर सांसद और विधायक ईमानदार चाहिए, और काबिल भी चाहिए, तो उसके लिए कुछ दाम चुकाना देश को मुफ्तखोरी के मुकाबले अधिक सस्ता पड़ेगा। हमारा यह मानना है कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों को अगर जरूरत के लायक तनख्वाह और भत्ते मिलेंगे, तो चुनावी राजनीति में कुछ बेहतर लोग भी आ पाएंगे। अपने परिवार को अभाव में रखते हुए लोग पूरी जिंदगी जनसेवा नहीं कर सकते। इसलिए जनता को अपने बाकी खर्च की तरह विधायक और सांसद पर भी खर्च करना सीखना चाहिए। बड़े बुजुर्ग बोल गए हैं कि सस्ता रोए बार-बार, महंगा रोए एक बार। पांच बरस में एक बार जिसे चुनना हो, और पांच बरस के बाद जिसके सामने इस काम के जारी रहने की कोई गारंटी न हो, उसे अपने वर्तमान और अपने भविष्य के लिए इतना भुगतान तो मिलना ही चाहिए कि वे घर की फिक्र से बेफिक्र रहकर जनता का काम कर सकें। हम इस सोच से बिल्कुल सहमत नहीं हैं कि सांसद और विधायक तो भ्रष्ट होते ही हैं इसलिए उन्हें अधिक तनख्वाह क्यों दी जाए? इस पैमाने पर तो फिर सरकारी अमले को भी तनख्वाह देने की जरूरत नहीं है क्योंकि उस पर भी भ्रष्टाचार की तोहमत लगती है। लोगों को भ्रष्ट होने से बचाना भी समाज का काम है, और हमारा यह मानना है कि थोड़े से महंगे सांसद या विधायक देश के लिए अधिक उत्पादक हो सकते हैं, बजाय इसके कि वे अपनी ही निजी उलझनों में फंसे रहें, और अपनी संसदीय जिम्मेदारी ठीक से न निभा सकें। निर्वाचित लोगों को बाजार के भ्रष्टाचार पर आश्रित रखना ठीक नहीं है।

भोपाल की फरारी और फिर मुठभेड़-मौतों से उठे सवाल

संपादकीय
1 नवम्बर 2016  
भोपाल की एक अतिसुरक्षित जेल से फरार हुए सिमी से जुड़े हुए आठ विचाराधीन कैदी कुछ घंटों के भीतर ही एक साथ मार गिराए गए। वे जेल के एक सिपाही की हत्या करके फरार हुए बताए जा रहे हैं, और जिस मुठभेड़ में उन्हें मार गिराया गया है, उसके कुछ वीडियो सामने आए हैं जिन्हें लेकर कांग्रेस, वामपंथी दल, और कुछ दूसरी पार्टियों ने भी जांच की मांग की है। इन वीडियो से ऐसा आभास होता है कि इनमें से कुछ लोगों को जिंदा पकडऩा शायद मुमकिन हो सकता था, लेकिन सुरक्षा बलों ने उन्हें करीब से गोली मारकर खत्म कर दिया। इसके साथ ही फरार होने की इस साजिश पर अब कोई गवाह नहीं बचा है, जो कि सुरक्षा व्यवस्था की जांच के लिए एक नुकसान की बात है।
आज देश में जिस तरह का धार्मिक और राजनीतिक धुव्रीकरण का माहौल बना हुआ है, उसमें इस इस्लामिक छात्र संगठन, सिमी, के विचाराधीन कैदियों को बात की बात में आतंकी करार देना शुरू हो गया, और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने मीडिया-बयानों में बार-बार इन्हें आतंकी कहा। किसी विचाराधीन कैदी को मुजरिम करार दे देना सिर्फ अदालत का काम होता है, और जब प्रदेश का मुख्यमंत्री यह काम करने लगता है, तो वह जांच एजेंसी, सरकारी वकील, और न्याय प्रक्रिया, इन सब पर असर डालने वाली बात होती है। लेकिन न सिर्फ मप्र के भाजपा मुख्यमंत्री, बल्कि देश के अधिकतर मीडिया ने भी इन विचाराधीन कैदियों पर फैसला सुनाते हुए इन्हें आतंकी लिखना और कहना जारी रखा है। यह सिलसिला लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है जिसके तहत जब तक कोई मुजरिम साबित न हो जाए तब तक उसे मासूम मानने को कहा जाता है। आज देश में धार्मिक धुव्रीकरण का जो माहौल है, उसके चलते भोपाल जेल के इस मारे गए सिपाही को राष्ट्रभक्त करार दिया जा रहा है, और फरार होकर मारे गए विचाराधीन कैदियों को आतंकी से लेकर देशद्रोही तक करार दिया जा रहा है।
अब देश के बहुत से संगठनों और राजनीतिक दलों को यह शक है कि यह फरारी और उसके बाद इस तरह की मौत स्वाभाविक साजिश का नतीजा नहीं है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इनके मामलों की सुनवाई हो चुकी थी, और इनके रिहा होने के आसार दिख रहे थे, इसलिए इन्हें इस तरह फरार करवाकर मार डाला गया। कई लोगों को इस बात पर हैरानी है कि भोपाल की अतिसुरक्षित जेल के अलग-अलग दरवाजों के पीछे बंद ये कैदी किस तरह एक साथ सब दरवाजों को तोड़कर बाहर आ सके, और किस तरह आसानी से ऊंची दीवार चादर से पार कर सके। हम अभी किसी किस्म की साजिश को लेकर अटकलबाजी में पड़ना नहीं चाहते क्योंकि यह एक बड़ी जांच के लायक मामला है। लेकिन लोकतंत्र में मुख्यमंत्री से लेकर मीडिया तक से हमारी यह उम्मीद बनी रहेगी कि वे किसी विचाराधीन कैदी को मुजरिम करार देने की सोची-समझी लापरवाही बंद करें। इस हिसाब से तो मीडिया के जो लोग ब्लैकमेलिंग के जुर्म में गिरफ्तार होकर जेल काटकर जमानत पर बाहर हैं, उनके नाम के साथ ब्लैकमेलर कहा जा सकता है, और फिर प्रधानमंत्री ऐसे लोगों को दूसरे देश के प्रमुखों से किस तरह मिलवाएंगे? दूसरी तरफ मुख्यमंत्री जैसे ताकतवर ओहदे पर बैठे हुए शिवराज सिंह चौहान को यह ध्यान रखना चाहिए कि मुकदमे के चलते हुए वे किसी को मुजरिम नहीं कह सकते। यह एक अलग बात है कि इस देश में कमजोर तबके के लिए किसी भी तरह की बातें कहना आम और जायज मान लिया जाता है, और लोग बेधड़क किसी आरोपी को मुजरिम कहने लगते हैं। लेकिन अगर कोई अदालती कटघरे में घसीटे, तो मीडिया हो या मुख्यमंत्री उन्हें अपने ऐसे बयानों के लिए सजा भी हो सकती है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को तो यह भी सोचना चाहिए था कि ऐसी सुरक्षित राजधानी की जेल से थोक में हुई ऐसी फरारी जेल की बड़ी लापरवाही थी, और इस पर शर्मिंदगी के बजाय अगर वे आरोपियों को मुजरिम कह रहे हैं, तो उनके बेकसूर रिहा होने  की एक संभावना या आशंका के सही साबित होने के बाद वे अपने शब्दों का क्या करेंगे?

सरकार हो या अखबार, सभी नजरियों की भागीदारी जरूरी..

संपादकीय
29 अक्टूबर 2016
मध्यप्रदेश के मंदसौर की एक खबर है कि वहां सरकारी कॉलेज में दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं को सरकार की एक योजना के तहत पीठ के जो बैग बांटे गए, उन पर पीछे एसटी-एससी योजना के तहत छपा हुआ है। जब इस पर हंगामा हुआ तो प्रिंसिपल का कहना था कि अगर किसी को इससे आपत्ति है तो वे बैग पर से इसे मिटवा देंगे। ऐसा ही हाल गरीब बस्तियों में कई जगह घरों के बाहर दीवारों पर दिखता है जहां सरकार मकानों पर गरीबी की रेखा के नीचे, या जाति का जिक्र लिखवा देती है। समाज और सरकार में जगह-जगह ऐसी कई बातें नजर आती हैं, और उनसे यह लगता है कि ताकत और अहमियत के बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों को भी कुछ समझ पाने की जरूरत बाकी है।
यह लिखने का मकसद कहीं भी दूसरों की आलोचना करना नहीं है, खुद मीडिया में समझ की कमी की ऐसी हालत है कि उसकी ऊंची कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को सामाजिक हकीकत का अंदाज भी नहीं रहता। भारत के काफी बड़े हिस्से के, कम से कम हिन्दी मीडिया को देखते हुए ऐसा लगता है कि अखबारों में लिखने का हक रखने वाले अखबारनवीसों के बीच सवर्णों का बोलबाला है। बहुत ही कम पत्रकार अल्पसंख्यक तबकों से आते हैं, या कि दलित-आदिवासी रहते हैं। संपादकों के नाम भी देखें तो शायद ही कोई ऐसे तबकों में से आया हुआ हो। नतीजा यह होता है कि जब सामाजिक मुद्दों पर बातचीत होती है, तो सबसे दबे-कुचले लोगों की बात कहने वाले लोग वहां पर नहीं रहते। और हिन्दुस्तान के ऐसे हाल को जब अमरीका या ब्रिटेन के मीडिया से देखें, तो फर्क समझ आता है कि किस तरह पश्चिम के प्रतिष्ठित अखबार या टीवी समाचार चैनलों में काम करने वाले प्रेस या मीडियाकर्मियों को उनके धर्म, या उनके रंग के आधार पर भी चुना जाता है ताकि संपादक मंडल में हर नजरिए की मौजूदगी हो, और हर किस्म के तजुर्बे वहां सामने आ सकें।
कुछ ऐसी ही नौबत सरकारों में रहती है जहां फैसले लेने वाले ऊंचे तबकों में कई ऐसे मौके रहते हैं जब कोई दलित-आदिवासी नहीं रहते, या अल्पसंख्यक नहीं रहते, या जाति या धर्म से परे की भी बात करें, तो गरीबों के मुद्दों की समझ रखने वाले लोग ऐसे फैसलों की कुर्सियों पर नहीं रहते। नतीजा यह होता है कि करोड़पतियों और अरबपतियों से भर चली संसद और विधानसभाओं से लेकर मंत्रियों और अफसरों तक के बीच कुछ नजरिए गायब रहते हैं। जब गाय के बारे में फैसला लिया जाता है, तो गाय की पूजा करने वाले लोग तो उन टेबिलों पर रहते हैं, लेकिन गाय के मरने के बाद उसे ठिकाने लगाने वाले तबके, और उससे जुड़े दूसरे रोजगारों की समझ रखने वाले कोई लोग ऐसे ताकतवर फैसलों के वक्त नहीं रहते। ऐसे फैसले ले लिए जाते हैं, और इनके बीच देश की सामाजिक हकीकत के इतिहास के जानकार भी नहीं रहते, या रहते भी हैं, तो वे इतिहास के साथ खड़े रहने का हौसला नहीं रखते। नतीजा यह होता है कि कुछ चुनिंदा ताकतवर तबकों के लोग अपनी पसंद को एक काल्पनिक इतिहास मानकर फैसले ले लेते हैं, और अपने से असहमति रखने वाले कमजोर लोगों के सिर पर थोप देते हैं।
धीरे-धीरे सरकार और राजनीति, संसद और अदालत, मीडिया और बाकी कारोबार, इन सभी जगहों के सीमित संपन्न तबकों के लोग मिलकर एक किस्म का नया तथाकथित लोकतांत्रिक शासक वर्ग बन जाते हैं, और बाकी कमजोर बहुसंख्यक लोगों के अधिकारों की अपने नजरिए से व्याख्या करने लगते हैं। यह नौबत कुछ उसी तरह की है जैसी आज अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में दुनिया के एक सबसे कुख्यात उम्मीदवार साबित हो चुके रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रम्प ने खड़ी कर दी है। परले दर्जे की मूर्खता के साथ जब दौलत का अहंकार जुड़कर मैदान में उतरता है, तो वह एक डोनाल्ड ट्रम्प बना पाता है। हिन्दुस्तान में भी देश-प्रदेश के अनगिनत फैसले ऐसे ही अज्ञान के साथ लिए जा रहे हैं, और दूसरों पर थोपे जा रहे हैं। हमारा ख्याल है कि एक जिम्मेदार अखबार से लेकर एक जिम्मेदार सरकार तक हर कहीं फैसले लेने में समाज के सभी तबकों, पृष्ठभूमियों की भागीदारी होनी चाहिए, और जहां पर ऐसी जाहिर हिस्सेदारी निभाने के लिए लोग मौजूद न हों, वहां पर सरकार, समाज, या अखबार को कुछ थिंकटैंक बनाकर अपने खुद के शिक्षण-प्रशिक्षण का इंतजाम करना चाहिए, अपनी खुद की परिपक्वता की कोशिश करनी चाहिए। दिक्कत यही होती है कि शहरी, संपन्न, शिक्षित, सवर्ण, और सक्षम तबकों का अहंकार उन्हें यह एहसास नहीं होने देता कि उन्हें भी कुछ जानने और सीखने की जरूरत है। अपने आपके सर्वज्ञ होने की खुशफहमी लोगों को अपनी समझ का दायरा बढ़ाने नहीं देती, और ऐसे अहंकार को पूरा समाज भुगतता है। मंदसौर के जिस सरकारी कॉलेज ने एसटी-एससी लिखे हुए ऐसे बैग तैयार करवाए हैं, वहां के प्राचार्य को निश्चित ही इस सामाजिक हकीकत की समझ नहीं होगी कि लोगों की पीठ पर उनकी जात की तख्ती टांग देने से वे किस तरह के सामाजिक भेदभाव का शिकार और अधिक होते चलेंगे।

लोकतंत्र में बातचीत सबसे सस्ता हथियार और औजार

संपादकीय
28 अक्टूबर 2016
भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री और भाजपा के एक वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा के साथ देश के कुछ प्रमुख लोग अभी कश्मीर गए और वहां करीब दो दर्जन प्रमुख लोगों, तबकों से बात करके यह तलाशने की कोशिश की कि कश्मीर में कैसे अमन-चैन लौट सकता है। उन्होंने यह साफ कर दिया था कि यह उनकी निजी पहल है और उनके पास पार्टी या केन्द्र सरकार का कहा हुआ कुछ नहीं है, और यह एक गैरसरकारी पहल है। जिन लोगों ने कश्मीर को ध्यान से देखना जारी रखा है, उन्हें यह देखकर खुशी हुई होगी कि वहां के जिन अलगाववादियों से बात करने में केन्द्रीय गृहमंत्री ने अपने कश्मीर प्रवास के दौरान परहेज किया था, और जिन अलगाववादियों ने राजनाथ सिंह के साथ गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के गैरसरकारी, गैरभाजपाई सदस्यों से भी बात करने से इंकार कर दिया था, उन अलगाववादियों से भी यशवंत सिन्हा वाले प्रतिनिधिमंडल की बातचीत हुई। और यह बात उभरकर सामने आई कि अलगाववादी कश्मीर-समस्या का एक अपरिहार्य हिस्सा हैं, और उनसे बात किए बिना समाधान की पूरी कोशिश नहीं हो सकती। दूसरी बात यह भी उभरकर सामने आई कि बातचीत बिना किसी शर्त के ही हो सकती है।
हम दूर कश्मीर से हटकर थोड़ा करीब आएं तो बस्तर के बारे में अभी सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को यह सुझाया कि वह नक्सलियों से बातचीत करें। ऐसी शांतिवार्ता की यह सलाह कोई आदेश तो नहीं हो सकती, लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट की बात वजनदार रहती है, और बस्तर के बहुत से मोर्चों को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत में इतने किस्म के मुकदमे चल रहे हैं कि राज्य सरकार भी शायद सुप्रीम कोर्ट से उसके अधिकार क्षेत्र को लेकर बहस करने के बजाय बातचीत की एक और कोशिश को बेहतर समझे, और वही लोकतंत्र के लिए बेहतर भी होगा। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश आने के हफ्ते-दस दिन पहले ही हमने इसी जगह संपादकीय में यह बात राज्य सरकार को सुझाई थी, और ऐसे मध्यस्थ के रूप में हमने एक पिछले मुख्य सचिव सुनील कुमार का नाम भी लिखा था जो कि बस्तर के एक कलेक्टर के अपहरण के बाद रिहाई की समझौता-वार्ता में शामिल रह चुके हैं।
कश्मीर हो या बस्तर हो, बातचीत के बिना लोकतंत्र का कोई गुजारा नहीं हो सकता। ब्रिटेन में उत्तरी आयरलैंड का सशस्त्र आंदोलन एक सदी से भी अधिक वक्त से चले आ रहा था। आए दिन इसमें कत्ल होते थे, और धमाके होते थे। वह सशस्त्र आंदोलन राजनीतिक विचारधारा वाला भी था। और जब कई दौर की शांतिवार्ताएं असफल साबित हो चुकी थीं, तो अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन बरस 2000 में उत्तरी आयरलैंड पहुंचे और सभी तबकों को बिठाकर मध्यस्थता की, उस वक्त समझौते के बाद हथियार डाले गए, और तब कायम हुई शांति आज तक चली आ रही है। इसलिए समझौते में हथियार रखे-रखे भी वार्ता होती है, दोनों तबकों को अपने पिछले कड़े रूख को छोड़कर कुछ-कुछ कदम आगे बढऩा पड़ता है, ऐसे मध्यस्थ स्वीकार करने पड़ते हैं जो कि दोनों पक्षों को मान्य हों, और जब नीयत अमनवापिसी की हो, तो फिर अहंकार को परे रखकर बातचीत करके अमन की कोशिश की जानी चाहिए और वैसी कोशिश ही कामयाब भी होती है। पिछली कई वार्ताओं की असफलता को देखकर निराश होकर नहीं बैठना चाहिए, और पूरी शांति कायम होने तक बातचीत जारी रखनी चाहिए। हमारा यह मानना है कि बातचीत के पहले कोई शर्त नहीं होनी चाहिए, और किसी मुद्दे से जुड़े हुए तमाम लोगों से बिना किसी परहेज के बातचीत होनी चाहिए। अविभाजित मध्यप्रदेश का इतिहास गवाह है कि अर्जुन सिंह ने डाकुओं से बात करके उनका आत्मसमर्पण करवाया था, और मध्यप्रदेश-उत्तरप्रदेश सीमा के करीब दशकों से आतंक बने हुए डाकू घर बैठ गए थे। अब उस वक्त कोई ऐसी शर्त रखी जाती कि पहले हथियार डाले जाएं, फिर बातचीत शुरू होगी, तो वह बात किसी किनारे पहुंचती ही नहीं। और ऐसी तमाम बातचीत की अधिक जिम्मेदारी उन लोकतांत्रिक सरकारों की होती है जो कि लोकतंत्र के आधार पर चुनकर आईं हैं, जिन्होंने लोकतंत्र की शपथ ली है, और जिनका लोकतंत्र पर भरोसा है। ऐसी सरकारों की जीत तो उसी दिन हो जाती है, जब ये सरकारें लोकतंत्र पर भरोसा न रखने वाले लोगों, अलगाववादी लोगों, हिंसक और हथियारबंद आंदोलन चलाने वाले लोगों को बातचीत की मेज पर ले आती हैं। इस जीत के बाद की समझौते की जीत तो छोटी होती है। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने जो सुझाया है, या निर्देश दिया है, हम उसे सही मानते हैं, और कश्मीर से लेकर बस्तर तक, उत्तर-पूर्व से लेकर पाकिस्तान तक, देश के भीतर और बाहर, बातचीत की हर कोशिश होनी चाहिए क्योंकि तमाम हथियारों और बुलेटप्रूफ जैकेटों के रहते हुए भी, लोकतंत्र में बातचीत सबसे सस्ता हथियार और औजार है।

आतंक के खिलाफ दुनिया के सबसे बड़े आतंकी की नसीहत

संपादकीय
27 अक्टूबर 2016
अमरीकी विदेश मंत्रालय ने अभी एक मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि दक्षिण एशिया में आतंकवाद से निपटने के लिए मिलजुलकर काम करने की जरूरत है। यह बात कहने और सुनने में अच्छी लगती है, और यह बात दक्षिण एशिया से परे भी दुनिया के तमाम देशों पर लागू होती है। लेकिन अमरीका का कहा हुआ और उसका किया हुआ, इन दोनों में बड़ा फर्क रहता है। खुद अमरीका दुनिया के अनगिनत देशों में अपनी खुफिया एजेंसी सीआईए के मार्फत गृहयुद्ध छिड़वाते आया है, तख्तापलट करवाते आया है, और इराक के मामले में उसने हद ही पार कर दी थी जब उसने सीआईए के गढ़े हुए झूठे किस्सों को सुबूत की तरह पेश करके जनसंहार के हथियारों को खत्म करने के नाम पर इराक पर फौजी हमला किया, और लाखों लोगों को मार डाला। इस पूरी कार्रवाई के बाद वहां से एक हथियार भी बरामद नहीं हुआ है। इसलिए यह मानना गलत है कि आतंकी सिर्फ कोई संगठन या गिरोह होते हैं, दुनिया में अमरीका सरीखी सरकार अपने आपमें आतंकी संगठन है, और वह हथियारों के बिना तो सारे वक्त आर्थिक प्रतिबंधों की नाकेबंदी से आतंक फैलाती है, गरीब मुल्कों से उनका छीनती है, और लोकतंत्र लाने के नाम पर देशों को तबाह करके वहां अपनी पि_ू तानाशाह सरकारें बिठाती है। अमरीका का इतिहास इस बात का गवाह है कि उसने कहीं तालिबानों को बढ़ावा दिया, तो कहीं किसी और आतंकी संगठन को। आज अमरीका पाकिस्तान और भारत जैसे देशों के सिलसिले में मसीहाई अंदाज में यह नसीहत देता है कि आतंक के खिलाफ मिलजुलकर काम करने की जरूरत है, तो यह एक बड़े पाखंड के अलावा और कुछ नहीं है।
दरअसल अमरीका अपनी कारोबारी और फौजी नीयत के चलते हुए दक्षिण एशिया के इस इलाके में जिस तरह से पाकिस्तान में तानाशाही, फौजी मनमानी, और आतंकियों को बढ़ावा देते आया है, और एक कमजोर लोकतंत्र को अपने पर आश्रित मुल्क बनाकर रखते आया है, उसके चलते ही इस इलाके में आतंक पनपा है। भारत और पाकिस्तान के रिश्ते शायद इतने खराब न हुए होते, अगर पाकिस्तान के पास अमरीका से आई हुई बहुत बड़ी आर्थिक मदद न होती। अगर महज अपने पैसों से पाकिस्तान को फौजी और आतंकी तैयारी करनी होती, तो उसके लोग भूखे मर गए होते। इसलिए अमरीका के लिए नसीहत देने के लिए ज्यादा आसान बात हो सकती थी, पाकिस्तान की फौजी और आतंकी नीयत और हरकत पर रोक लगाना। और ऐसा भी नहीं है कि हम यहां हिन्दुस्तान में बैठकर यह बात कह रहे हैं, खुद अमरीकी संसद में समय-समय पर कई लोग इस बात को उठाते आए हैं कि पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद रोकी जाए। लेकिन अमरीका की एक मजबूरी यह भी है कि अगर वह पाकिस्तान को बेआसरा, बेसहारा छोड़ दे, तो पाकिस्तान पल भर में चीन की गोद में जाकर बैठ जाएगा, और यह बात अमरीका की विस्तारवादी फौजी नीति और नीयत के खिलाफ जाएगी। इसलिए अमरीका इस इलाके में आतंक फैलने देने की कीमत पर भी पाकिस्तान को पाल रहा है, और बाकी लोगों को नसीहत दे रहा है कि वे लोग मिलजुलकर आतंक से लड़ें।
आज दुनिया में संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था महज बहस और कागजी फैसलों का दफ्तर बनकर रह गई है, और जिस अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र के लिए अपनी जमीन पर जगह दी थी, वह अमरीका इस अंतरराष्ट्रीय संस्था को एक पांवपोंछने की तरह मानता है, और इसके दर्जन भर बयानों के बावजूद उसके खिलाफ जाकर अमरीका ने इराक पर हमला किया था। दुनिया चाहे लोकतांत्रिक रूप से कितनी भी विकसित होने की खुशफहमी न पाल ले, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और फैसलों में एक पुरानी कहावत ही लागू होती है कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस। इसलिए अमरीका दुनिया भर में आतंक को बढ़ावा देकर भी यह नसीहत बांट रहा है कि लोग आतंक के खिलाफ मिलजुलकर लड़ें।

टाटा के मुखिया की बर्खास्तगी से निकलने वाले सबक

संपादकीय
26 अक्टूबर 2016
भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक, टाटा को परिवार से बाहर का एक आदमी संभाल रहा था, लेकिन उसके तौरतरीकों से खफा होकर टाटा के डायरेक्टरों ने एक मिनट में उसे बाहर कर दिया, और पिछले मुखिया रतन टाटा को चार महीनों के लिए वापिस बुलाकर कंपनी संभालने का जिम्मा दिया है। रतन टाटा इस कंपनी के संस्थापक परिवार के थे, और कंपनी के शेयर होल्डर भी थे। वे अपनी मर्जी से कुछ समय पहले रिटायर हुए थे, और घर बैठकर अपनी पूंजी को नए-नए कारोबारियों के साथ लगा रहे थे, और समाजसेवा के कुछ काम कर रहे थे। उनकी जगह साइरस मिस्त्री नाम के जिस नौजवान को यह विशाल साम्राज्य दिया गया था, वह कारोबार को भी शायद ठीक से नहीं संभाल पाया था, और कंपनी से जुड़े हुए समाजसेवा के काम भी वह शायद ठीक से नहीं देख पा रहा था।
अब देश के निजी क्षेत्र के इस एक सबसे बड़े ओहदे को संभाल रहे आदमी को जिस तरह पलभर में निकाल कर बाहर कर दिया गया है, उसे देखते हुए सोशल मीडिया पर यह मजाक किया जा रहा है कि सुरक्षित तो सरकारी नौकरी ही होती है, बाकी कोई नौकरी सुरक्षित नहीं रहती। अब इतना बड़ा तो ओहदा देश में अधिक संख्या में नहीं हो सकता, लेकिन इससे छोटे-छोटे पदों पर बैठे हुए लोग भी एक सबक ले सकते हैं कि आज की बाजार व्यवस्था में कोई भी कुर्सी ऐसी सुरक्षित नहीं रहती कि उस पर बैठे हुए लोग काम ठीक से न करते हुए भी अपनी नौकरी बचा सकें। यह बात छोटी-छोटी कुर्सियों पर भी लागू होती है, और सरकार से परे भी हर जगह इसलिए लागू होती है कि मजदूर और कर्मचारी कानून भी निकम्मेपन को नहीं बचा सकते। यह निकम्मापन टाटा के इस अफसर के संदर्भ में नहीं कहा जा रहा है, लेकिन जितने तरह की उम्मीदें किसी से कंपनी करती है, या मालिक करता है, उसे पूरा करना ही नौकरी को बचा सकता है।
दुनिया में जो कामयाब और उदार अर्थव्यवस्थाएं हैं, वे किसी तरह की सुरक्षा कर्मचारियों को नहीं देती हैं, और अमरीका जैसे देश में लोगों को बस दराज खाली करके निकलने जितना वक्त मिलता है। भारत में भी लोगों के सामने यह मिसाल बेहतर काम करने के लिए एक प्रेरणा की तरह काम आनी चाहिए। काम अच्छा होने पर लोग कम उम्र में भी आगे बढ़ सकते हैं, और काम अच्छा न होने पर कोई भी नौकरी कायम भी नहीं रहती। टाटा में हुए इस ताजा फेरबदल की बाकी जानकारी आने में कुछ दिन का वक्त लगेगा, लेकिन यह बात सोचने के लायक है कि समाजसेवा में कंपनी की भूमिका को ठीक से ना निभाना भी कुर्सी जाने की वजह हो सकता है।