06 जनवरी 2012
संपादकीय
देश के अपराधों को जांच करने वाली सबसे बड़ी एजेंसी सीबीआई को लेकर संसद से सड़क तक सौ किस्म की बातें लगातार होती हैं। एक वक्त छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने इसे प्रधानमंत्री का थाना कहा था। आज जब जो पार्टी या नेता सीबीआई जांच के घेरे में आते हैं वे इसे कोसना शुरू कर देते हैं। लोकपाल विधेयक पर बहस के दौरान बार-बार यह बात उठी कि इस एजेंसी को सरकार के काबू से बाहर किया जाए, आजाद कर दिया जाए, लोकपाल के भीतर कर दिया जाए, सबसे अधिक बहस इसी एक एजेंसी को लेकर हुई।हम सीबीआई को कोई चरित्र प्रमाण-पत्र देना नहीं चाहते क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि राज्य सरकारें भी, और देश के भीतर के सभी किस्म के ताकतवर तबके अपनी जान लगा देते हैं कि अपने खिलाफ किसी जांच को प्रभावित करें या किसी दुश्मन के खिलाफ उसका इस्तेमाल करें। इसमें कोई नई बात नहीं है। लेकिन अभी हम इसी जांच एजेंसी को लेकर बात करना चाहते हैं कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियां विपक्ष में रहने पर राज्य की किसी जांच एजेंसी से परे, सीबीआई से इसकी जांच करवाने की मांग करती हैं, या राज्य सरकारें अधिक कठिन मामलों को सीबीआई को दे देती हैं। ऐसा करते हुए यह जाहिर है कि सीबीआई पर लोगों को भरोसा है या दूसरी एजेंसियों के मुकाबले कुछ कम अविश्वास उस पर है इसलिए लोग वहां तक जाते हैं। इसकी कुछ मिसालें देखें तो महाराष्ट्र के आदर्श घोटाले को सीबीआई को देने की मांग वहां की विपक्षी पार्टियां लगातार करती रहीं। महाराष्ट्र के ही भाजपा के एक जाने-माने नेता किरीट सोमैया ने पिछले दिनों मायावती के जिस दागी मंत्री के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग की थी, उसे भाजपा ने उत्तरप्रदेश में अपनी पार्टी में दाखिला देकर मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ दिया है। कांगे्रस के काबू वाली केंद्र सरकार के तहत काम करने वाली सीबीआई पिछले कुछ महीनों से लगातार राजस्थान में कांगे्रस के मंत्री-विधायक को गिरफ्तार करने के बाद अब एक महिला की हत्या के और सुबूत जुटा चुकी है। इसी सीबीआई ने चाहे सुप्रीम कोर्ट के दबाव के बाद, चाहे मीडिया के दबाव में, एक के बाद एक मामले यूपीए सरकार के कई लोगों के खिलाफ अदालत में पेश किए हैं और वहां उसका रूख कई बार बहुत आक्रामक भी दिखता है।
यह बात ठीक है कि लालू यादव, मुलायम सिंह और मायावती जैसे कटघरे में खड़े कई नेताओं के साथ बर्ताव करते हुए सीबीआई केंद्र सरकार की संसद के भीतर या संसद के बाहर मदद करते भी दिखती है, लेकिन देश की कौन सी ऐसी सरकारी या संवैधानिक संस्था है जो कि न सिर्फ राजनीतिक बल्कि पैसों की ताकत से प्रभावित नहीं दिखतीं? अदालत का काम भी देखें तो वहां सुबूतों से लेकर गवाहों तक और वकील से लेकर सुनवाई के तौर-तरीकों तक पैसों का सीधा-सीधा असर दिखता है, और यह बात भी लंबे समय से हवा में तैर रही है कि बहुत से भ्रष्ट जज इस देश में हर वक्त काम करते रहते हैं। ऐसे में सीबीआई जैसी किसी एक जांच एजेंसी को लगातार कटघरे में खड़े रखना ठीक नहीं है। आज पूरे देश के अलग-अलग प्रदेशों में अगर सीबीआई की चल रही जांच देखें तो कोई भी ऐसी भ्रष्ट पार्टी और दुष्ट नेता नहीं हैं जो कहीं न कहीं सीबीआई की वजह से नींद खो बैठे हैं।
ऐसे में बयानबाजी करने वाले नेताओं और पार्टियों से हम यह जानने चाहते हैं कि उनका अपना चाल-चलन, उनके अपने नीति-सिद्धांत क्या इतने खराब साबित नहीं हो चुके हैं, जितना खराब वे सीबीआई को साबित करना चाहते हैं? आज जब कांगे्रस, भाजपा, सपा, राजद, बसपा जैसी अनगिनत पार्टियों के अनगिनत नेता सीबीआई पर एक पहाड़ सरीखे राक्षस बनकर लद गए हैं तब इन सबको अपने आपको देखना चाहिए या सीबीआई को कोसना चाहिए? और बात सिर्फ आर्थिक अपराधों की नहीं है, साम्प्रदायिक दंगों से लेकर गुजरात के मानवसंहार तक अनगिनत ऐसी किस्में हैं जिनका बोझ कुल मिलाकर एक एजेंसी पर जाकर गिरता है। आज जगन मोहन रेड्डी सीबीआई पर बदनीयत होने का जो आरोप लगा रहे हैं, तो उनके खिलाफ अनुपातहीन संपत्ति की जांच का आदेश तो एक अदालत ने दिया है। और भारत का कानून किसी भी जांच एजेंसी के पेश किए हुए मामले में सौ गुनहगारों को बरी हो जाने का मौका देता है, बजाय किसी एक मासूम को सजा देने के। तो ऐसे में नेताओं को अपनी हजारों करोड़ की दौलत जुटाने के पहले यह सोचना चाहिए कि क्या देश के कटघरे सिर्फ जेबकतरों और दूध में दो-चार लीटर पानी मिलाने वालों के लिए ही रहने चाहिए? आज यह समय आ गया है कि जनता पार्टियों और नेताओं से यह मांग करे कि सीबीआई को कोसने से पहले वे यह बताएं कि उनका अपना चाल-चलन किस तरह का है और वे उसके चलते किन-किन अदालतों में कौन-कौन से मामले झेल रहे हैं? सारी पार्टियां और सारे नेता इतनी ताकत रखते हैं कि किसी झूठे मुकदमे के लिए वे बड़ी सी बड़ी अदालत में सीबीआई को घेर सकें। अगर सीबीआई ने बुरी नीयत से कोई मामले झूठे खड़े किए हैं तो उनके लिए अखबारी लड़ाई लडऩे के साथ-साथ लोग अदालत में जाकर भी देख लें। सीबीआई का आज का काम एक आईना दिखाने जैसा है और लोगों को इसे पत्थर से तोड़कर कुछ साबित करने के बजाय अपने-आपको ठीक रखना चाहिए।
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