24 जनवरी 2012
संपादकीय
बाबा आमटे के शुरू किए गए आनंदवन को मदद की जरूरत है। कुछ लोगों ने इस बात को चारों तरफ पहुंचाना शुरू किया है ताकि कुछ लोग आगे आएं। कुष्ठ रोगियों के बीच पूरी जिंदगी काम करते हुए उन्होंने करीब चौथाई करोड़ कुष्ष्ठ रोगियों के इलाज और उनके पुनर्वास में मदद की थी। और भारत में जिस तरह आज गली-गली में सत्ता की भूखी और हिंसक दौड़ में कुनबापरस्ती दिखती है, उसके ठीक उल्टे किस्म की एक कुनबापरस्ती बाबा आमटे के परिवार में दिखती है जहां उनके डॉक्टर बेटे उनके छोड़े गए काम को आगे बढ़ाते हुए अपने सुख को भूलकर लोगों के दुख को दूर करने में लगे हुए हैं। ऐसी कोशिशों का जब देखें तो देश की बाकी हालत के मुकाबले इनका कद और अधिक ऊंचा दिखता है। जब चारों तरफ बाजार की ताकतें, सत्ता पर काबिज लोग, हर कोई महज अपने से घिरे हुए दिखते हैं, इसमें लगे रहते हैं कि दूसरों के हक को किस तरह नोंच-खा सकें। देश के बड़े-बड़े दौलतमंद लोग अपने फर्जी ट्रस्ट बनाकर, फर्जी समाजसेवा दिखाकर टैक्स की छूट पाते हैं और बाजार की सामाजिक जवाबदेही की जिम्मेदारी पूरा करने का दिखावा भी कर लेते हैं। लेकिन ऐसे दिखावे पर कोई कार्रवाई करने का नैतिक या वैधानिक हौसला सरकारों में इसलिए नहीं होता क्योंकि अधिकतर सरकारें कम या अधिक हद तक इन कारोबारियों से दबी होती हैं या उनके साथ भागीदार होती हंै।
आनंदवन की आज की जरूरत अधूरी होने को पढ़कर याद पड़ता है कि किस तरह देश भर में आज कुष्ठ रोगी सड़कों पर एक-दूसरे को धकेलते हुए भीख मांगते घूमते हैं। उनमें से बहुत से लोग एक मामूली सा बैंड लिए हुए गाते-बजाते कुछ सिक्के मांगते हैं। यह पूरा सिलसिला 21वीं सदी के चमचमाते भारत के लिए एक ऐसे पैबंद की तरह है जिसके मखमल को ही लोग चुरा चुके हैं। इस देश का प्रधानमंत्री कुदरती हादसों के मौकों पर दुनिया के दूसरे देशों से आई हुई मदद को यह कहकर वापिस कर देता है कि भारत को आज मदद की जरूरत नहीं है। लेकिन बिना इलाज, जिंदा रहने की जरूरतों के बिना कुष्ठ रोगी अपने गले हुए हाथ-पैरों से सुबह से शाम तक शहर घूमने को बेबस रहते हैं और उनके बच्चे संक्रमण का खतरा झेलते हुए भी उनकी झोपडिय़ों में उनके साथ रहते हैं। इस मौके पर एक दूसरी बात को भी याद करना चाहेंगे कि किस तरह संपन्न लोगों के एक अंतरराष्ट्रीय क्लब में पूरी दुनिया में पोलियो को हटाने का बीड़ा उठाया था और उस मदद से ही आज भारत में पोलियो खत्म हो जाने का अहसास हो रहा है। रोटरी क्लब ने इस पूरे अभियान में एक बड़ी हिस्सेदारी की, और उसे देखते हुए यह लगता है कि उस जैसे लायन्स क्लब या कारखानेदारों और कारोबारियों के दूसरे संगठनों का क्या ऐसा जिम्मा नहीं बनता कि वे कुष्ठ रोग जैसे या टीबी जैसे किसी दूसरे मामले में एक अगुवाई लेने का हौसला दिखाएं?
बाबा आमटे हों या मदर टेरेसा, या ऐसे कुछ और भी लोग हों जिनके कम या अधिक योगदान की चर्चा यहां पर जरूरी नहीं है, ऐसे लोगों के काम में हाथ बंटाकर समाज के ताकतवर तबके अपनी जिम्मेदारी भी कुछ दूर पूरी कर सकते हैं और अगर समाज बहुत तकलीफों को झेलते रहेगा तो उसका एक छोटा संपन्न तबका खुशहाली के किसी टापू पर रह भी नहीं पाएगा। लोग करोड़ों के खर्च की शादियों में कुछ सौ भिखारियों को खाना खिलाकर अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही पूरी मान लेते हैं। ऐसे लोगों को बिल गेट्स जैसे खरबपतियों से सीखना चाहिए कि किस तरह अपनी आधी दौलत, या उससे भी अधिक, समाज के लिए ईमानदारी से दान देकर, दूसरे लोगों को पे्ररणा देकर दुनिया में थोड़ी सी समानता की कोशिश की जा सकती है।

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