27 जनवरी 2012
संपादकीय
कल जब देश संविधान लागू होने की सालगिरह मना रहा था तब दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल एम्स में दो बरस की एक ऐसी बच्ची जिंदगी की लड़ाई लड़ रही थी जिसे बुरी तरह पीटा गया था और जिसके बदन पर किसी इंसान द्वारा काटने के निशान भी थे। इस मामले की अभी जांच चल रही है इसलिए हम इसके ज्यादा खुलासे में यहां नहीं जा रहे लेकिन इतना तो तय है ही देश में एक बच्ची की ऐसी हालत हुई है। दूसरी तरफ बंगाल की खबर है कि वहां पर मालदा सब डिवीजन में सरकारी अस्पताल में बारह घंटों में सात और नवजात बच्चों की मौत हो गई है और पिछले एक हफ्ते में इस अस्पताल में अब तक 39 बच्चे मारे गए हैं, और पिछले बीस दिनों का आंकड़़ा 82 हो चुका है। एक महिला मुख्यमंत्री के राज में लगातार जिस रफ्तार से सरकारी अस्पतालों में नवजात शिशु मारे जा रहे हैं वह बहुत ही तकलीफदेह और नामुमकिन सी बात लगती है लेकिन चूंकि खुद मुख्यमंत्री ने इसके पीछे किसी साजिश की बात नहीं कही है इसलिए हम बैठे-बैठे किसी अपराधकथा जैसी कल्पना करना नहीं चाहते हैं। लेकिन यह बेकाबू हालत फिक्र खड़ी करती है। यह खबर उस दौर में भी आ रही है जब योरप के एक देश में वहां की सरकार ने एक हिन्दुस्तानी मां-बाप से उनके बच्चों को इसलिए अलग कर दिया है क्योंकि वे उस देश के पैमानों पर लालन-पालन ठीक से नहीं कर रहे थे। अब भारत की सरकार वहां की सरकार से बहस कर रही है और बच्चों के मां-बाप अदालत में लगे हुए हैं। इन खबरों के साथ-साथ एक और खबर हमारे सामने है जो बताती है कि 2010 के भारत के आंकड़े अभी दिल्ली में एक साथ जोड़कर देखे गए और उनसे पता लगा कि एक बरस में सवा 8 हजार से अधिक दुल्हनें दहेज हत्या की शिकार हो गई हैं। मतलब यह कि हर घंटे में एक!
तथाकथित मानवीय मूल्यों के पैमानों पर तो यह सिलसिला बहुत भयानक है ही, सरकारों के लिए भी यह बहुत शर्म की बात है कि बच्चे और महिलाएं इस रफ्तार से मारे जा रहे हैं। इस सिलसिले में छत्तीसगढ़ में मितानिन नाम पाकर गांव-गांव में काम करने वाली स्वास्थ्य कार्यकर्ता को याद करना जरूरी है जिसकी वजह से इस राज्य में शिशु मृत्यु दर खासी गिर गई है और छत्तिसगढिय़ा बच्चे पैदा होते ही मरना कम हो गए हैं। बड़े-बड़े शहरी ढांचों की चकाचौंध को देश का विकास बताने वाले इस हिन्दुस्तान की हालत शर्मनाक है। सिर्फ मौतों के आंकड़े असली हकीकत नहीं बताते और खबरों और सरकारी रिकॉर्ड में आने वाली एक-एक मौत के पीछे शायद हजार-हजार ऐसी जिंदगियां और रहती हैं जो कि तकलीफ से भरी रहती हैं लेकिन चूंकि जिंदा लाश की तरह घिसटती रहती हैं इसलिए वे आंकड़ा नहीं बन पातीं। परिवारों के भीतर बहू की प्रताडऩा से लेकर समाज में बच्चों के कुपोषण तक तमाम हालात ऐसे हैं कि भारत दुनिया के विकसित देशों के मानवीय विकास के पैमानों पर शायद अगले कुछ दशकों में भी नहीं पहुंच पाएगा।
हम यह सोचकर भी हैरान होते हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट देश के रियायती अनाज की योजनाओं को एक स्कूली मास्टर की तरह हाथ में रूल लिए हुए निगरानी न करता होता, वह अगर अपने सहायकों की मदद से देशभर की स्कूलों में दोपहर के खाने पर नजर नहीं रखता, महिलाओं और बच्चों के लिए पोषण आहार की योजनाओं पर सरकार को आए दिन फटकार नहीं लगाता होता और देश में सड़ रहे अनाज के भंडार को मुफ्त में बांटने के लिए सरकार को मजबूर न करता होता तो जाने इस देश के औरत-बच्चों का क्या हाल होता? चूंकि देश की तमाम औरतें मतदाताओं का एक तबका नहीं है, और वे जाति के आधार पर, धर्म के आधार पर, क्षेत्र और प्रांत के आधार पर बंटी हुई हैं, इसलिए भारतीय महिला मतदाता नाम का कोई तबका किसी सरकार, किसी राजनीतिक दल, किसी उम्मीदवार के लिए खतरा नहीं लगता। और बच्चे, वे अगर जिंदा बच भी गए तो भी अगले दस-बीस बरस के बाद ही उनके वोटों की नौबत आएगी इसलिए उनकी भी फिक्र करना आज किसी की प्राथमिकता नहीं है। लेकिन 26 जनवरी के मौके पर यह सोच रहे हैं कि सम-विधान नाम का यह संविधान लोगों को किस तरह की समानता दे रहा है? एक तरफ चकाचौंध की जिंदगी पाने वाला बहुत छोटा सा संपन्न तबका देश के अधिकांश साधनों को उसी तरह भोग रहा है जिस तरह दुनिया के अधिकांश साधनों को कुछ गिने-चुने संपन्न देशों के सीमित संख्या वाले लोग भोग रहे हैं। ऐसे में इस संविधान की सालगिरह के मौके पर कुछ कड़वी बातें हमने इस जगह दो दिन पहले ही लिखी हैं, और आज सुबह से औरतों-बच्चों के बारे में आती हुई खबरें हमारे मुंह में और कड़वाहट घोल गई हैं।

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