28 जनवरी 2012
संपादकीय
नौ जिलों के उद्घाटन के साथ ही प्रदेश में 27 जिले अस्तित्व में आ गए हैं और सभी नए जिलों में कामकाज शुरू हो गया है। छोटे राज्यों और छोटे जिलों के हम हमेशा हिमायती रहे हैं। हमारा यह अनुभव रहा है कि प्रशासनिक ढांचे के विकेन्द्रीकरण के साथ-साथ सरकार चौकन्ना होकर काम करती है, क्योंकि अधिकारियों और सत्ता के दूसरे जिम्मेदार लोगों की जिम्मेदारियां छोटी जगह पर केंद्रित रहती हैं और उनका किया अच्छा या बुरा काम खुलकर सामने दिखता है। इस जिम्मेदारी का बहुत बड़ा फायदा राज्य की जनता को मिलता है। सन् 2000 में जो तीन राज्य बने उसमें छत्तीसगढ़ ने यह साबित किया कि वह विकास के मामले में बाकी राज्यों से कहीं आगे है। बाकी के दो राज्यों में न तो ऐसी राजनीतिक स्थिरता है और न ही ऐसा विकास हो रहा है। राज्य के अस्तित्व में आने के साथ ही छत्तीसगढ़ के लोगों को ऐसा फायदा मिला जो भोपाल में सरकार के रहते कभी नहीं मिल सकता था। चाहे बिजली के मामले में हो, सिंचाई या सड़क के मामले में राज्य के साथ हमेशा भेदभाव होता था। इन क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ काफी पिछड़ा हुआ था। बड़े राज्य होने और छत्तीसगढ़ के, राजधानी भोपाल से दूर होने का नुकसान आधी सदी तक इस क्षेत्र को उठाना पड़ा। इसी तरह बड़े जिलों के बारे में भी हमारा यही मानना है। चाहे रायपुर से पौने 2 सौ किलोमीटर दूर सरायपाली हो या सवा 2 सौ किलोमीटर दूर देवभोग वहां के लोगों को हर छोटे-मोटे काम के लिए रायपुर आना तकलीफदेह रहता था। प्रशासनिक नियंत्रण भी नहीं रहता था। कलेक्टर इन क्षेत्रों के दौरे पर जाते थे तो उन्हेें वापस लौटने में दो दिन लग जाते थे। केंद्र और राज्य सरकारों की इतनी योजनाएं और विकास कार्यक्रम चल रहे हैं जिन पर निगरानी और काबू दूर के जिला मुख्यालयों से ठीक से नहीं हो सकता है। अलग जिले बनने के बाद छोटी-छोटी जिला ईकाईयों की उत्पादकता बढ़ती है तो इन जिलों पर होने वाले प्रशासनिक व्यय के मुकाबले यह कुछ भी नहीं है। जब एक-एक जिले में सैकड़ों करोड़ के काम महीनों तक लेट होते हैं, या उनमें भ्रष्टाचार इस वजह से भी होता है कि जिला स्तर के अधिकारियों के पास निगरानी का समय नहीं है, तो गड़बड़ी का कम से कम यह हिस्सा तो छोटे जिलों के बनने से कम हो सकता है।
छोटे राज्यों और छोटे जिलों की तरह हम छोटे-छोटे विभागों के भी हिमायती हैं। राज्यों में मंत्रियों की संख्या सीमित करना भी ठीक नहीं है। एक-एक मंत्री के पास कई-कई विभाग होंं और उनकी निगरानी भी वे ठीक से न कर पाएं तो ऐसी संख्या सीमित करने का कोई मतलब नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में तो एक-एक मंत्री के पास तीन-तीन, चार-चार विभाग हैं। मंत्रियों के लिए इतने सारे दायित्वों को संभालना और विभागीय योजनाओं की ठीक से निगरानी करना कठिन होता है। यह तर्क दिया जाता है कि मंत्रियों की संख्या सीमित रहने से प्रशासनिक खर्च बचेगा। लेकिन देखा जाए तो हर विभाग के दो हजार, तीन हजार करोड़ के बजट में मंत्रियों पर होने वाला कुल खर्च सालाना 5-7 लाख से ज्यादा नहीं होता। सरकार जिनको लालबत्ती बांटना चाहती है वह उसके लिए आज भी रास्ता निकाल लेती है। इसीलिए हमारा स्पष्ट मानना है कि छोटी इकाइयां अधिक उत्पादक और जन कल्याणकारी रहती हैं। और देश भर में मंत्रियों की संख्या के बारे में लागू किया गया यह नियम जनता को इस झांसे में तो रखता है कि इससे सरकारी खर्च में बचत हो रही है, लेकिन इससे उत्पादकता में कितना नुकसान हो रहा है, जनता के काम कितने लेट हो रहे हैं, उसके महंगे पडऩे का अंदाज आंकड़ों में नहीं लग सकता है, इसलिए नहीं लगाया जाता है।
हर जगह अस्पताल न रहे और सबको इलाज कराने दिल्ली के एम्स जाने पड़े तो जिस तरह दिक्कत होगी उसी तरह की दिक्कत प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण न होने से होती है। इसीलिए केंद्र सरकार को दिल्ली के एम्स जैसे अस्पताल 6 और राज्यों में खोलने पड़ रहे हैं ताकि अच्छे इलाज के लिए देश के दूर-दराज के राज्यों से लोगों को दिल्ली न आना पड़े और वहीं पर उनका इलाज हो सके। जहां तक भ्रष्टाचार और नालायकी की बात है तो वह बड़े राज्य में भी है और छोटे राज्य में भी। बड़े जिलोंं में भी इस तरह की शिकायत सामने आती थी और छोटे जिलोंं में भी इस तरह की शिकायत आ सकती है। लेकिन जहां तक प्रशासनिक व्यवस्था का विकल्प है, छत्तीसगढ़ ने इस दिशा में यह एक अच्छा काम किया है। जिलों की संख्या बढऩे से लोगों को सरकारी काम अपने घर के कुछ करीब मिलेगा। छोटे-छोटे कामों के लिए एक-एक, दो-दो दिन का समय बर्बाद नहीं होगा। वे एक ही दिन में अपना काम कराकर अपने घर वापस लौट सकेंगे।
नए जिलों के उद्घाटन के दौरान नक्सल प्रभावित सुकमा, कोंटा से लेकर बलरामपुर, सूरजपुर और बालोद, बेमेतरा से लेकर मुंगेली और बलौदाबाजार में लोगों की जिस तरह भीड़ उमड़ी वह भी इस बात की ओर इशारा करती है कि सस्ता सुलभ सरकारी काम पाने की उम्मीद से उनमें खुशी है, लेकिन यह खुशी बहुत सी उम्मीदों के साथ भी है और इनको पूरा करना मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सरकार के लिए नए जिले बनाने के मुकाबले कई गुना अधिक कड़ा काम होगा। लोग दूर-दूराज के जिला मुख्यालयों में जाकर परेशान थे। जिस तरह बिना किसी बड़े आंदोलन के छत्तीसगढ़ राज्य बना, उसी तरह बिना आंदोलन के 9 जिले बन गए। घोषणा पत्र में किए वादे को पूरा करते हुए डॉ. रमन सिंह ने पहले दो और अब 9 नए जिले बना दिए। उनका कहना है कि हर स्तर पर शासन-प्रशासन को जनजीवन तक पहुंचाने के लिए उनकी सरकार ने यह अभियान छेड़ा है। पूर्व में कुछ जिलों के लिए जरूर आंदोलन हुए थे, लेकिन अचानक इतने नए जिले बनने की उम्मीद उन जिलों के निवासियों को भी नहीं थी। हम यह उम्मीद भी करते हैं कि विकेन्द्रीकरण के साथ-साथ प्रशासन में पूरी तरह कसावट भी होगी और लोगों का काम आसानी से होगा। आने वाला वक्त बताएगा कि इन नए जिलों पर होने वाला खर्च उससे हजारों गुना अधिक बचत करके, और लोगों की उम्मीद और जरूरत को पूरा करके कामयाब होता है या नहीं। अगले विधानसभा चुनाव में इन नए जिलों की कामयाबी या नाकामयाबी असर डालेगी यह तय है।

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