तौलिया उतरने के दिन


04 जनवरी 2012
संपादकीय

उत्तरप्रदेश के चुनाव के शुरू होते ही पार्टी से लोगों को निकालना और दूसरी पार्टी में उनको लेना शुरू हो गया है। यह साधारण दल-बदल होता तो भी कोई बात न होती, लेकिन जिस एक मामले से यह शुरूआत हुई है उसमें मायावती का मंत्री रहा हुआ एक ऐसा नेता है जो ढाई हजार करोड़ रूपए के स्वास्थ्य घोटाले में सीबीआई की जांच के घेरे में है और जिसे मंत्रिमंडल से निकाला गया था और मायावती ने उसे टिकट न देने की घोषणा की थी। इसकी जांच कर रही सीबीआई ने इस नेता के ठिकानों पर आज लंबे-चौड़े छापे मारे हैं, और कल ही इसे भाजपा में शामिल करने का समारोह हुआ था। भाजपा के लिए यह कुछ उसी किस्म की शर्मिंदगी की नौबत है जैसी कि कई बरस पहले अटल बिहारी वाजपेयी और आरएसएस ने डीपी यादव को पार्टी में लिए जाने का कड़ा विरोध किया था। इसके बाद यादव को पार्टी में लेने का फैसला बदलना पड़ा था। आज फिर वैसी ही नौबत सामने है। एक तरफ तो पार्टी के प्रवक्ता ने अभी कुछ मिनट पहले यह कहा है कि भाजपा भ्रष्ट लोगों को बचाने का मंच नहीं है, और यह भी कहा है कि उत्तरप्रदेश में बहुत से घोटालों के कागजात नष्ट करके उनको छुपाने की कोशिश हो रही है, लेकिन घोटालों के कटघरे में खड़े कल के बसपाई को आज का भाजपाई बनाने को लेकर पार्टी के भीतर भी भारी बवाल मच गया है।
पिछले कई महीनों से देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो जनआंदोलन चल रहा था और जो जनचेतना या जनचर्चा भ्रष्टाचार पर सामने आ रही थी, भाजपा का यह अकेला फैसला उसके ठीक खिलाफ जा रहा है। दशकों से भाजपा विपक्ष के दिनों से शुचिता नाम के एक शब्द का इस्तेमाल करते आई है और लालकृष्ण अडवानी का कोई भाषण इसके बिना शायद ही पूरा होता था। आज कर्नाटक और उत्तराखंड जैसे भाजपा के राज वाले प्रदेशों में जो भ्रष्टाचार सामने आया है, वह तो अपने जगह है ही, वहां पर भाजपा पिछले बहुत बरसों से सत्ता में नहीं रही है, वहां के भ्रष्ट लोगों को अगर एक-एक सीट जीतने के लिए वह इस तरह पार्टी में लेती जाएगी तो वह किस मुंह से कांगे्रस के खिलाफ प्रचार करेगी? और यह बात सिर्फ भाजपा के बारे में नहीं है, जिस डीपी यादव की चर्चा हमने ऊपर की है, और जिसके बाहुबलि होने की वजह से वाजपेयी ने भाजपा में उसका आना रोक दिया था, उसे कल-परसों ही समाजवादी पार्टी में शामिल करने की बात हो रही थी। अब सवाल यह उठता है कि एक तरफ जब भारत का चुनाव आयोग अपराधियों को चुनाव से दूर रखने की कोशिश कर रहा है, जब अन्ना हजारे जैसे लोग यह गिना रहे हैं कि संसद में किस तरह डेढ़ सौ से अधिक अपराधी बैठे हैं, तब राजनीतिक दल क्या साबित कर रहे हैं? हम इसके पहले भी कई मौकों पर लिख चुके हैं कि अगर कोई नेता अपराधों को लेकर शक के घेरे में है, जांच या अदालत के कटघरे में है, तो उसकी पार्टी उसे चुनावों में खड़ा करने से बच क्यों नहीं सकती? जो बड़ी-बड़ी पार्टियां ये दावे करती हैं कि उनके करोड़ों सदस्य हैं उन्हें लाखों मतदाताओं वाली एक-एक सीट पर कोई ऐसा शरीफ अपनी पार्टी में नहीं मिलता जिसे वे चुनाव में खड़ा कर सकें? उत्तरप्रदेश के इस ताजा मामले से एक बात साबित होती है कि देश की मौजूदा बागी हवा और जनता के नफरत भरे तेवरों के बाद भी राजनीतिक दल सबक नहीं ले रहे हैं, क्योंकि हर किसी के सामने दूसरी किसी न किसी पार्टी की अधिक कालिख लगी मिसाल मौजूद है।
आज जब भाजपा के इस ताजा हीरे पर सीबीआई के ढेर-ढेर छापे पड़ गए हैं, तो भाजपा प्रवक्ता का यह कुछ मिनट पहले का बयान हमारे सामने है कि दिग्विजय सिंह और राहुल गांधी भ्रष्ट लोगों को बचा रहे हैं। भाजपा की ऐसी बातें उसे कोई सम्मान नहीं दिला पाएंगी क्योंकि मायावती के भ्रष्ट को अगर भाजपा गोद में बिठा रही है तो क्या इसके पीछे भी दिग्विजय और राहुल की साजिश है? क्या भाजपा दिग्विजय और राहुल के कहे हुए बसपा से बर्खास्त या खारिज नेताओं को अपनी पार्टी में लेती है?  लोकपाल विधेयक को लेकर संसद के भीतर और संसद के बाहर जिन पार्टियों ने भ्रष्टाचार पर जो कहा है, उन्हें आज अपनी उस कथनी के साथ-साथ आज की अपनी चुनावी करनी का जवाब देना ही होगा। उत्तरप्रदेश उन राज्यों में से एक है जहां की चुनावी राजनीति में दबंगों, बाहुबलियों और अपराधियों का बोलबाला हमेशा से माना जाता रहा है। हाल के बरसों में भ्रष्टाचार के जितने बड़े-बड़े मामले सामने आए हैं उनके चलते बाकी अपराधों के साथ-साथ आर्थिक अपराध भी उत्तरप्रदेश में सिर चढ़कर बोल रहे हैं। ऐसे में उत्तरप्रदेश के आने वाले दिन न सिर्फ भाजपा बल्कि बाकी पार्टियों का भी तौलिया उतारकर रख सकते हैं।

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