कैसे सम-विधान की यह कैसी सालगिरह?


25 जनवरी 2012
संपादकीय
संविधान की सालगिरह, एक और बार आकर खड़ी हो गयी है। जब-जब कोई सालगिरह आती है, लोगों को लगता है कि कौन-कौन सी बातें पिछले बरसों में इस मौके को नाकामयाब करने वाली हो चुकी हैं। देश के एक तबके को आज़ादी की सालगिरह, संविधान की सालगिरह, बरसी की तरह लगती है। अपने को गांधीवादी कहने वाले लोगों से लेकर अपने को माओवादी कहने वाले अनगिनत लोगों तक का कहना है कि हिंदुस्तान का लोकतंत्र बोगस हो चुका है और यह अब महज ताकतवर बाहुबलियों के हाथ का औजार बनकर रह गया है, जो इसे हर पांच बरस में धार करने लोगों के पास ले जाते हैं। लोग हैं कि पांच बरस में धार करके खुश हो लेते हैं, इतने कि फिर अपना गला ही इस धार पर रख देते हंै। इसीलिए हिंदुस्तान के एक समाजवादी नेता ने एक वक्त कहा था कि जि़ंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं। लेकिन संविधान है कि इन तमाम जि़ंदा कौमौं को पांच बरस कब्रिस्तान में रहने को कहता है। 
संविधान शब्द की बात करें, तो सम और विधान से मिलकर बना हुआ लगता है। अब सोचें कि क्या इस देश में कानून सबके लिए बराबरी का रह गया है? इस देश की आधी से अधिक, शायद तीन चौथाई,  गरीबी की रेखा के नीचे की आबादी को देखें, तो लगेगा कि वह सबसे ताकतवर एक चौथाई आबादी के मुकाबले शेर की गुफा के बाहर अपनी बारी का इंतज़ार करते खड़े खरगोश की तरह ही है। किस कोने में लोगों को दिखता है कि विधान सम है? समानता के हक़ कहाँ दीखते हैं? सिर्फ भाषणों में? यही वजह है कि जब देश के जंगलों में नक्सली इस सम-विधान को खारिज कर देते हैं, जब इस देश के शहरों में अन्ना-बाबा सरीखे अलोकतांत्रिक लोग सम-विधान को ख़ारिज कर देते हैं, तो बहुत से आम लोग उन्हें मसीहा मान बैठते हैं। लोगों को लगता है कि जब विधान सम नहीं रह गया है, तो विधान की जरूरत क्या है? और फिर चाहे कुछ वक्त के लिए सही, इन लोगों को लोगों की हमदर्दी मिल जाती है। 
दरअसल इस देश में कहीं-कहीं समानता बची हुई भी है। लोगों को समानता का हक वहीं मिला हुआ है जहां पर गरीब की रोटी ताकतवर तबके तो पसंद नहीं आती है। लोगों को उन तमाम जगहों पर समानता हासिल है जहां ताकतवर तबका वसूली और उगाही, लूट और डकैती को अपने फायदे का नहीं पा रहा, मानो लूटने की लागत अधिक आ रही हो और माल का दाम कम हो। ऐसे असम-विधान की सालगिरह फिर आ गयी है। एक बार वे तमाम लोग फिर इसे बनाने वाले डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर को याद करेंगे, जो अपनी प्रतिमाओं पर सैकड़ों करोड़ खर्च करने जैसा गैरदलित, असमान काम करते हैं, और वे लोग भी याद करेंगे जिनको लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी में किसी दलित की जरूरत नहीं लगी थी। जिसके हाथ ताकत आ जाती है, फिर वह चाहे किसी भी पेशे में हो, समाज के किसी भी तबके में हो, वह कमजोरों के हक खाने में जुट जाता है, ऐसे लोकतंत्र में लोकतंत्र या संविधान से जुड़े हुए किसी भी सालाना जलसे के क्या मायने हैं?
सालाना जलसे लोगों को एक खुशफहमी में रखने के लिए अधिक होते हैं, कम  ही लोग, कम ही संस्थाएं ऐसी हैं हिंदुस्तान में, जो सालाना जलसे को फख्र के साथ मनाने की हकदार रह गयी हैं। इस मौके पर लोगों को दो बातों पर विचार करना चाहिए और चर्चा करनी चाहिए। पहली तो यह कि अपने नाम के ठीक उलटे, कैसे सम-विधान आज असम-विधान होकर रह गया है, और कौन सी बाड़ खेत को खा रही है। सिर्फ कुछ कलमाडिय़ों, राजाओं और येद्दियुरप्पाओं के जेल जाने से कुछ नहीं होगा, और भ्रष्टाचार के खत्म हो जाने से भी सब कुछ नहीं होगा। भारतीय लोकतंत्र में दूसरी जो सौ किस्म की बेइंसाफी जमकर बैठ गयी है, वह भ्रष्टाचार से बहुत अलग किस्मों की भी है, और उससे अधिक खतरनाक भी है। जब तक इन सब पर बात नहीं होती, कोई इलाज ढूंढा नहीं जाता, तब तक इसे सम-विधान की सालगिरह के बजाय असम-विधान की बरसी ही कहा जा सकता है। 

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