फरवरी 2012
रोज की जिंदगी में हम कारखानों में बने हुए ऐसे सामान इस्तेमाल करते हैं जो तरह-तरह के रसायनों से बने होते हैं। इनसे शरीर को भी नुकसान हो सकता है और धरती को तो नुकसान होता ही है। इसलिए टूथपेस्ट, साबुन, शैंपू से लेकर मच्छर भगाने और मारने तक के सामानों का इस्तेमाल कैसे कम से कम हो सकता है यह सोचना चाहिए। मच्छरों और कीड़े-मकोड़ों के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले जहर इंसानों को भी नुकसान पहुंचाते हैं। हर किसी की जिंदगी में और उनके घर-दफ्तर में ऐसी बातों का इलाज अलग-अलग किस्म का हो सकता है, लेकिन इस बारे में कुछ ध्यान देने से खर्च और सेहत दोनों की बचत हो सकती है।
कुछ तरह के साबुन और शैंपू कुछ इलाकों के पानी से आसानी से नहीं धुलते और इनसे नहाते हुए कई गुना अधिक पानी खर्च हो जाता है। ऐसे ब्रांड कभी दुबारा नहीं लेने चाहिए। इसी तरह यह ध्यान भी रखना चाहिए कि ठंड के मौसम में ऐसे साबुन का ही इस्तेमाल करें जिनमें तेल या उस तरह कोई दूसरी चीज अधिक अनुपात में हो। ध्यान से देखेंगे तो पैकिंग पर यह दिख जाएगा और आप पहले बदन की प्राकृतिक चिकनाई को कम करके फिर किसी क्रीम, तेल को लगाकर उसकी भरपाई करने से बच जाएंगे। ये छोटी-छोटी बातें न सिर्फ आपकी सेहत और जेब की बचत के लिए है बल्कि धरती को बचाने के लिए भी है। यह ध्यान भी रखा जा सकता है कि किन कपड़ों को हर बार साबुन से धोने की जरूरत नहीं पड़ती और किस तरह सिर्फ पानी से धोकर काम चल सकता है। इससे साबुन, पानी, और कपड़ों जिंदगी, सबकी बचत होती है। कपड़ों पर पे्रस करने के बारे में हम यहां पहले भी लिख चुके हैं कि जींस और टी-शर्ट जैसे कपड़ों को पे्रस की जरूरत जरा भी नहीं होती। अंगे्रजों का खाली किया हुआ यह देश अभी तक एक ऐसी मानसिक गुलामी में जीता है जिसमें बिना जरूरत की तामझाम को इतनी अहमियत दी जाती है। जब भी आप बिना जरूरत कपड़े पे्रस करते हैं तो बिजली खर्च करते हैं और उस बिजली के लिए धरती पर बहुत सा प्रदूषण पैदा होता है। ताकतवर तबका ऐसी बहुत सी फिजूलखर्ची इसलिए करता है क्योंकि वह इसका खर्च उठा सकता है। लेकिन अपनी आने वाली पीढिय़ों पर आने वाले इस बोझ को भी कोई उठा सकेगा?
-सुनील कुमार

सबसे अव्वल तो हम इंसान खुद ही बेहिसाब पैदा हुए चले जा रहे हैं यह भी तो धरती पर बोझ ही है :)
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