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हिंदुस्तान की सबसे बड़ी और खूबसूरत झील का बचना जरूरी

25 जून 2011
सुनील कुमार


एक हफ्ते के कश्मीर में सबसे फिक्र की बात डल झील रही। आज सुबह ही एक खबर में आंकड़े आए हैं कि पिछले 20 बरसों में यह बरस सबसे कम आतंकी हमलों वाला रहा। कश्मीर के लिए तो यह राहत की बात तो है ही, कश्मीर के बाहर बसे आम हिन्दुस्तानी के लिए भी यह राहत की बात है क्योंकि जो तबका घूमने-फिरने पर खर्च कर सकता है वह कश्मीर को इस देश के भीतर की सबसे बड़ी सैर मानता है। आतंकी हमले चलते रहें तो बहुत से लोग यहां घूमने का सपना नहीं देख पाते। लेकिन एक दूसरी जो बात तय है कि कश्मीर का प्रतीक वे शिकारे हैं जो डल झील में चलते हैं और अगर यह झील बर्बादी की तरफ बढ़ी तो कश्मीर से सैलानियों का कारोबार भी बर्बाद हो जाएगा।
शंकराचार्य मंदिर की पहाड़ी से मैंने भी कुछ तस्वीरें डल झील की ली हैं, लेकिन किसी भी जगह की सबसे अच्छी तस्वीरें साल के हर दिन या हर मौसम में या दिन के हर वक्त नहीं आ पातीं। इसलिए इस जगह की यह तस्वीर मैं इंटरनेट पर विकीपीडिया से लेकर दे रहा हूं जो कि मेरी खींची तस्वीरों से बेहतर है लेकिन अफसोस यह है कि इसके साथ फोटोग्राफर का नाम नहीं है। डल झील के बारे में एक वैज्ञानिक अंदाज यह है कि अगर इसे बचाने के लिए बड़े पैमाने पर कोशिशें न हुईं तो डेढ़ सौ बरसों में यह पूरी तरह से खत्म हो जाएगी।
इनवायरमेंट सर्विसेस एंड रिसर्च ऑगनाइजेशन की एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है कि डल झील 1880 में 75 वर्ग किलोमीटर की थी जो कि 2004 में 10.5 वर्ग किलोमीटर रह गई है। इसमें अब हर बरस 250 से 300 लाख लीटर गंदगी मिल रही है।
इस झील पर सौ से अधिक बस्तियां हैं जिनमें एक लाख से अधिक लोग बसे हैं। तीन हजार से अधिक परिवार कच्चे मकानों में हैं और 6 हजार परिवार पक्के मकानों में हैं। इन सबकी रोज की गंदगी सीधे इस झील में जा रही है। शहर के बीचों-बीच इस बस्ती पर बसे हुए लोगों में से अधिकांश की रोजी-रोटी वहीं पर चलती है। वहां शिकारे वाले हैं, वहां फल और सब्जियां उगाने वाले हैं, वहां कागज की लुग्दी से तरह-तरह के हस्तशिल्प बनाने वाले लोग हैं, सैलानियों के लिए बाजार हैं।
इन सबको वहां से हटाकर किसी दूसरी जगह बसाने का एक मतलब उनकी रोजी-रोटी से उन्हें अलग करना और पीढिय़ों से पानी के बीच रहने की अपनी संस्कृति से भी उन्हें अलग करना होगा। लेकिन जैसा कि इस तस्वीर से दिख रहा है डल झील के किनारे का एक बड़ा हिस्सा इस तरह कब्जों में और बसाहटों में, हाउसबोटों में दब गया है कि वहां पानी कम दिखता है। वहां पर हजार के करीब हाउसबोट हैं जिन पर सैलानियों के रहने के लिए होटलों जैसे कमरे हैं। उन्हीं बोट पर उनका खाना बनता है और वहीं पर उनके शौचालय हैं। इस झील पर बसे लोग अपने छोटे-छोटे शिकारों से चारों तरफ तुरंत जा सकते हैं और शहर के हर किनारे तक की दूरी कम रहती है। विस्थापन के बाद ये जहां कहीं बसाए जाएंगे वह जगह उनके काम की जगह से भी दूर होगी और भावनात्मक रूप से भी ये लोग बची पूरी जिंदगी शरणार्थी से बने रहेंगे।
लेकिन इनमें से कोई भी बात इतनी ताकतवर नहीं है कि डल झील को इसी तरह रहने दिया जाए। इसका अगर कायाकल्प नहीं किया गया तो इस देश के नक्शे से कुदरत का यह बेमिसाल तोहफा मिट ही जाएगा। यही सोचकर सन् 2000 में कश्मीर के एक मानवाधिकार वकील और एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी जिस पर इस झील को बचाने के लिए अदालत से एक असाधारण कदम उठाते हुए दखल देने की अपील की गई थी। यह मामला अभी चल ही रहा है लेकिन इस बीच अदालत के आदेश से और खुद होकर भी केंद्र सरकार ने कुछ काम किए हैं। इस झील को बचाने की कोशिशें सुप्रीम कोर्ट और उसके निर्देश पर लगाई गई एक दूसरी याचिका के आधार पर जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट द्वारा चल रही हैं। लेकिन जैसा कि सरकारी ढर्रा होता है, अदालती नोटिसों के बावजूद न विस्थापन हो पाया और न पुनर्वास की नौबत आई।
डल झील के सैलानियों वाले हिस्से से परे जब बस्तियों से घिरे बाकी हिस्से को भीतर जाकर देखा जाए तो यह लगता है कि किसी भी कीमत पर इस झील को चारों तरफ से अगर खुला बनाया जा सके तो वह हिन्दुस्तान के लिए एक बहुत बड़ी बात होगी। लेकिन एक लाख लोगों की दुबारा बसाहट के लिए बहुत बड़ी रकम भी लगेगी और बहुत बड़ी राजनीतिक हिम्मत भी। केंद्र सरकार इस काम के लिए कुछ हजार करोड़ रुपए आसानी से अलग कर सकती है और उसका जो असर कश्मीर के पर्यटन पर पड़ेगा उससे अगले कुछ बरसों में उसकी भरपाई भी हो जाएगी, फिर चाहे वह राज्य की जेब में जाए।
सुप्रीम कोर्ट का कुछ महीने पहले का एक अलग मामले में आया फैसला डल झील पर भी लागू होता है। इस फैसले में सभी चारागाह, तालाब या ऐसी दूसरी सार्वजनिक उपयोग की जगहों को खाली कराकर उनके मूल्य स्वरूप में वापिस लाने का आदेश दिया गया है। इसके चलते भी डल झील के लोगों को हटाने के बारे में अदालती रूख साफ है। लेकिन इतने लोगों को उनके रहने और कमाने-खाने की जगह से अचानक कैसे दूर किया जा सकता है?
इसी झील में तैरती एक बड़ी बोट पर पोस्ट ऑफिस चल रहा है। यहीं किसी बोट पर शिकारा चलाने वाले लोगों के लिए खाने की दूकान चल रही है। यहां हाउसबोटों में ठहरे हुए लोगों को किनारे लाकर छोडऩे वाले शिकारे सुबह दर्जनों दिखते हैं और उनसे अपना सामान लेकर उतरते हुए सैलानी भी। कुछ इतने बूढ़े लोग शिकारा चलाते दिखे कि कुछ हैरानी भी हुई। लेकिन वहां की जिंदगी ऐसी है कि शिकारे पर चलना ठीक वैसा है जैसा कि बाकी जगहों पर पैदल चलना। कुछ महिलाएं, कुछ बच्चे सांस लेने की तरह सहज तरीके से शिकारे चलाते घूम रहे थे। 
लेकिन यहां एक तस्वीर मुझे ऐसी भी मिली जिसमें डल झील के किनारे के फुटपाथ पर इक_ा कचरा दर्जनों बोरों में भरकर ले जाने की तैयारी की जा रही थी। हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से के लोगों में यह बेहद ताकत है कि वे कितनी भी साफ जगह को कूड़ेदान में तब्दील कर सकते हैं। चारों तरफ सैलानियों का कचरा है या कचरा सैलानी बनकर आया है?
कश्मीर और डल की कहानी यहां पर आज पूरी। और कभी आगे बढऩे के लिए। (समाप्त)