झूठ फैलाते सोशल मीडिया से खड़े हुए बड़े खतरे...

संपादकीय
15 नवम्बर 2016  
भारत में सोशल मीडिया नए किस्म का खतरा खड़ा कर रहा है, और बहुत से लोग उसे मीडिया के एक विकल्प के रूप में इस्तेमाल करके खुद भी खतरे में घिर रहे हैं, और बाकी लोगों को भी खतरे में डाल रहे हैं। सूरत के एक हीरा कारोबारी के बारे में कल से खबरें तैर रही हैं कि उसने छह हजार करोड़ रूपए के नोट बैंक में जमा कराए हैं, और उस पर वह दो सौ फीसदी जुर्माना भी देने को तैयार है। सामान्य समझबूझ के लोग भी यह हिसाब लगा सकते हैं कि कोई रकम जमा कराकर उस पर दो सौ फीसदी जुर्माना देने से बेहतर यह होगा कि उसे जलाकर हाथ ताप लिए जाएं, और एक इतिहास भी रच दिया जाए। यह झूठी खबर जंगल की आग की तरह सोशल मीडिया पर खबर बनाकर फैलाई गई, और जिस कारोबारी का नाम दिया गया वह पहले से जाना-पहचाना इसलिए भी था कि उसने नरेन्द्र मोदी का एक पहना हुआ सूट नीलामी में करोड़ों में खरीदा था। आज सुबह एक विश्वसनीय समाचार चैनल के कैमरे पर इस कारोबारी ने इस खबर को झूठा बताया और कहा कि उसने एक रूपया भी जमा नहीं करवाया है। लेकिन इसके बाद भी कई घंटे तक बड़े-बड़े अखबार अपनी वेबसाइटों पर इस खबर को पोस्ट करते रहे।
आज के वक्त में जब तक सच अपने जूते के तस्मे भी नहीं बांध पाता है, चटपटा झूठ पूरी दुनिया की सैर करके लौट आता है। एक दिक्कत यह हो गई है कि सोशल मीडिया नाम के इस नए जानवर के नाम में मीडिया शब्द जुड़ गया है और लोग इसे एक किस्म का मीडिया मान बैठे हैं। जबकि एक वक्त, टीवी आने के पहले मीडिया का मतलब प्रेस हुआ करता था, और कागज पर छपे हुए शब्द बड़ी जिम्मेदारी से छापे जाते थे, उनकी विश्वसनीयता रहती थी, और अखबार अपने छापे हुए के प्रति जवाबदेह भी रहते थे। इसके बाद रेडियो और टीवी आए, और उन पर खबरें हवा में तैरती लोगों तक पहुंचती थीं, और पल भर में हवा में घुल जाती थीं। नतीजा यह होता था कि इस मीडिया की जवाबदेही अखबार के मुकाबले कम होती गई। और अब तो सोशल मीडिया नाम के इस नए जानवर का न कोई डीएनए है, न इसके कोई फिंगर प्रिंट हैं, और न ही इसका कोई चेहरा है। नतीजा यह होता है कि इस पर सबसे गैरजिम्मेदार खबर, या सबसे चटपटा झूठ सबसे तेजी से आगे बढ़ाया जाता है, और अब तो इंटरनेट और फोन की टेक्नालॉजी लोगों को सहूलियत बढ़ाते चल रही है, और पल भर में लोग अपने फोन से झूठ को सैकड़ों लोगों तक बढ़ा सकते हैं, और जंगल की आग की तरह अफवाह एक हकीकत बनकर लोगों तक पहुंचती रहती है।
फिर यह भी है कि चटपटे झूठ का मजा लेने वाले कमअक्ल, जागरूकताविहीन लोगों को सच को परखने की नसीहत देना चाट के ठेले पर बेस्वाद खिचड़ी खाने की राय देने जैसा है। अमरीका में राष्ट्रपति का चुनाव जीतने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने भी यह कहा कि उनकी जीत में सोशल मीडिया का बड़ा हाथ रहा है। भारत में भी नरेन्द्र मोदी की पार्टी अपने सारे सांसदों और विधायकों से सोशल मीडिया पर मौजूदगी बढ़ाने और सक्रियता बढ़ाने को कहते आ रही है। खुद प्रधानमंत्री हर कुछ मिनट में कहीं न कहीं अपनी मौजूदगी दर्ज कराते चलते हैं। ऐसे वक्त में भारत में झूठ और नफरत पर आधारित तस्वीरें, लिखा हुआ, या वीडियो बड़ी रफ्तार से फैल रहे हैं, और जिम्मेदार लोग जब तक किसी एक झूठ को उजागर करते हैं, वह झूठ तो चारों तरफ फैल ही चुका रहता है, कई नए झूठ दौड़ शुरू कर चुके रहते हैं। भारत का आईटी कानून एक तरफ तो जरा-जरा सी राजनीतिक बातों पर जुर्म दर्ज करते चल रहा है, लेकिन लगातार साम्प्रदायिकता, हिंसा, और नफरत फैलाने वाले लोगों पर कोई कार्रवाई होते दिखती नहीं है। हमारा मानना है कि सोशल मीडिया एक नए किस्म की अराजकता का हथियार बन चुका है, और आगे भी बने रहेगा, लेकिन जिम्मेदार तबके को झूठ का भांडाफोड़ करने के लिए कुछ वक्त जरूर निकालना पड़ेगा, वरना दुनिया झूठ पर ही चलने लगेगी।

गृहमंत्री के सहायक पर कानून लागू नहीं होता?

संपादकीय
14 नवम्बर 2016  
छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा के बहुत ताकतवर निजी सहायक को अफसरों के एक वॉट्सऐप ग्रुप पर बहुत से अश्लील वीडियो पोस्ट करते पाया गया, और उन्हें चेतावनी देकर उस ग्रुप से हटाया गया है। शुरू में ही इस पर प्रक्रिया मांगने पर किसी अखबार से उन्होंने इसे अपनी चूक कहा, और फिर बाद में अपने टैब के चोरी हो जाने की रिपोर्ट लिखाने की बात कही। यह समझना सहज है कि जुर्म हो जाने के बाद जुर्म के सुबूत चोरी हो जाने की रिपोर्ट लिखा देना पुलिस का पुराना मिजाज रहता है, और गृहमंत्री के निजी सहायक का पूरा वास्ता ही रात-दिन पुलिस से पड़ता है, इसलिए यह आसान रास्ता चुनना स्वाभाविक ही था।
अब सवाल यह है कि एक फेसबुक पोस्ट, या एक वॉट्सऐप संदेश को देकर अगर प्रदेश में अब तक दर्जनों या सैकड़ों गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, या जुर्म कायम हो चुके हैं, तो फिर सुबूतों वाला यह मामला उससे अलग कैसे है? और अगर गृहमंत्री का निजी सहायक ही ऐसी अश्लीलता फैलाकर देश के बहुत ही कड़े आईटी कानून को तोड़ रहा है और उसके खिलाफ कोई रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हो रही है, तो ऐसे प्रदेश की पुलिस पर जनता का क्या भरोसा रहेगा? लोगों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले एक दूसरे मंत्री के बेटे ने त्यौहार के मौके पर हो रहे सार्वजनिक अश्लील या वयस्क डांस के बीच पहुंचकर अपने अंगरक्षक से गोलियां चलवाईं थीं, और वह मामला भी रफा-दफा हो गया। इसके अलावा भी छत्तीसगढ़ में बहुत से ऐसे मामले हुए हैं जिनमें आम और खास के लिए अलग-अलग कानून सामने आया है। सत्ता से जुड़े हुए नेताओं, या बड़े अफसरों के खिलाफ न आईटी कानून लगता, और न ही ट्रैफिक के नियम लगते। दूसरी तरफ आम जनता के बीच के नासमझ लोग भी अगर चूक से कुछ कर बैठते हैं, तो वे मामला-मुकदमा झेलते हैं, या लंबा जुर्माना पटाते हैं। एक हेलमेट न लगाने पर एक मध्यमवर्गीय को भी पांच सौ रूपए का जुर्माना पटाना पड़ता है, दूसरी तरफ सत्ता से जुड़े हुए लोग अपनी गाडिय़ों पर नाजायज तरीके से लालबत्ती और सायरन लगाकर दहशत फैलाते हुए घूमते हैं, और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। हेलमेट न लगाने वाला महज अपनी जिंदगी को खतरे में डालता है, न कि दूसरों को परेशान करता है। लेकिन ताकतवर तबका गाडिय़ों से आतंक फैलाता है, नंबर प्लेट लगाए बिना घूमता है, और पकड़े जाने पर पुलिस को पीटकर भी चले जाता है।
सत्ता के साथ ऐसी ही दिक्कतें कार्यकाल खत्म होने के बाद चुनाव में अपना असर दिखाती हैं। कई प्रदेशों में चुनावी नतीजों के बाद कहा जाता है कि एंटीइंकमबेंसी का असर दिखा और सत्तारूढ़ पार्टी हार गई। ऐसा इसलिए होता है कि लगातार पांच बरस की सत्ता सत्तारूढ़ पार्टी के लोगों को बददिमाग कर देती है, और उन्हें ऐसा एहसास कराने लगती है कि वे कानून से ऊपर हैं। नतीजा यह होता है कि इस मजे के चलते पांच साल आम जनता इसे देख-देखकर थकी हुई रहती है, और वह चुनाव के वक्त अपनी भड़ास निकालती है। छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ पार्टी इस बात पर गौर करे।

सरहद से परे आज देशभक्ति दिखाने का एक बड़ा मौका

विशेष संपादकीय
13 नवम्बर 2016  
पिछले एक-दो बरस से भारत में देशभक्ति और राष्ट्रवाद की बातें प्रचलन में बहुत अधिक हैं। बात-बात में लोग एक-दूसरे की देशभक्ति और गद्दारी तय करने लगे हैं, यहां तक कि जिन्हें सूर्य नमस्कार पसंद नहीं, वे भी पाकिस्तान जाने के फतवे पाने लगे हैं। ऐसे तमाम फतवेबाज सरहद पर पाकिस्तान से दो-दो हाथ कर लेने की ललकार-फुफकार के बिना दिन पूरा नहीं करते। ऐसे तमाम लोग जो कागजों पर लिखकर या सोशल मीडिया में पोस्ट करते हर कुछ घंटों में अपने-आपको शहीद का दर्जा देते हैं, उनके लिए महानता का एक मौका अनायास आ गया है।
आज देश भर में सबसे गरीब, सबसे बेसहारा, सबसे लाचार लोग बैंकों के सामने कतारों में रातें गुजार रहे हैं, दम तोड़ रहे हैं, खुदकुशी कर रहे हैं, अपने बीमार बच्चे के इलाज के लिए अस्पतालों के सामने बिलख रहे हैं, अपने मरे हुओं की लाशें अस्पताल से वापिस पाने के लिए जूझ रहे हैं, इसलिए कि केन्द्र सरकार ने बिना तैयारी पुराने नोट बंद कर दिए। अभी टीवी के परदे पर एक औरत रोते दिख रही थी जो आठ महीने के बच्चे को लिए आठ घंटे से बैंक के सामने खड़ी थी। पूरा देश ऐसे नजारों से भरा पड़ा है और ये भी वे हैं जहां तक मीडिया के कैमरे पहुंच रहे हैं। एक खबर यह भी है कि देश के सैंतालीस फीसदी लोगों के बैंक खाते हैं ही नहीं। अनगिनत खबरें हैं कि केन्द्र सरकार की रोजगार योजनाओं की मजदूरी लोगों को महीनों से नहीं मिली है। जाहिर है कि सबसे कमजोर आज सबसे मुसीबत में है।
ऐसे में कांग्रेस के राहुल गांधी ने अपनी पार्टी के लोगों से कहा है कि वे बैंकों और एटीएम की कतारों में लगे बुजुर्गों, कमजोर लोगों की मदद करें। ऐसे में वे तमाम लोग जो पाकिस्तानियों के सिर काटकर लाना चाहते हैं, जिनकी रग-रग में देशभक्ति फड़क रही है उनके सामने देशभक्ति साबित करने का एक अनोखा मौका आया है। फिलहाल वे पाकिस्तानी सरहद छोड़कर पास के बैंक या एटीएम जाकर किसी की मदद कर सकते हैं। उनकी जगह कतार में खड़े हो सकते हैं, पानी पिला सकते हैं, लोगों को बिस्किट जैसा कुछ खिला सकते हैं, उनका मोबाइल दस-बीस रूपये से चार्ज करवा सकते हैं। कुछ लोग अस्पताल जाकर दवा-फीस के भुगतान में मदद कर सकते हैं, कुछ लोग ऐसे गरीबों की मदद कर सकते हैं जो बिना बैंक खातों वाले हैं, फुटपाथी बच्चे या भिखारी, या कुछ रोगी-लावारिस, विक्षिप्त लोग, वे कहां जाएंगे?
जिन लोगों को नवरात्रि या दूसरे मौकों पर भंडारे चलाना अच्छा लगता है, तीर्थयात्रियों को पानी पिलाना अच्छा लगता है, उनके लिए भी एक मौका है सच्ची सेवा का, सच्चे तीर्थ का। जिन लोगों के रोज मंदिर-मस्जिद, गुरूद्वारा जाना अच्छा लगता है या हर इतवार चर्च जाना उनके लिए भी एक मौका है कि वे बैंक, एटीएम जाकर ईश्वर को खुश कर सकें। जो लोग उपदेशकों की बातें सुनने में पूरे-पूरे दिन गुजार देते हैं, उनको भी चाहिए कि सुने हुए प्रवचन, उपदेश पर अमल करने के लिए वक्त गुजारें, कतारों में लगे लोगों की मदद करके।
आज मोदी सरकार की तारीफ करने या उसे कोसने से परे यह जरूरी है कि इंसान, इंसान की मदद करें। जो लोग आज अपने शहर-गांव के लोगों की मदद नहीं कर सकते वे पाकिस्तानियों से क्या खाकर लडऩे जाएंगे? आज देखना है कि देश की कितनी पार्टियां, कितने धार्मिक, आध्यात्मिक या सांस्कृतिक संगठन अपने लोगों को जनता की मदद में झोंकते हैं। 

अफवाहों के लिए नाजुक इस देश में वैज्ञानिक सोच जरूरी

संपादकीय
12 नवम्बर 2016  
उत्तरप्रदेश में कल ऐसी अफवाह फैली कि नमक ढाई सौ रूपए किलो हो रहा है, और बात की बात में लोग मनमाने दामों पर नमक बेचने लगे, और खरीदने लगे। किसी जगह तो किसी दुकान के लूट लेने की भी खबर है। और यह नोटों को लेकर देश में चल रही दहशत के बीच की अफवाह का असर है। दरअसल हुआ यह है कि जिस तरह ये नोट बंद हुए हैं, उन्हें लेकर जनता के मन में तरह-तरह की आशंकाएं पैदा हो गई हैं, और लोग कहीं सोने की तरफ बढ़ रहे हैं, तो किसी तरह से अपने नोट बदलकर फिर नोटों से परे किसी और जगह अपनी जमा पूंजी लगाने की सोच रहे हैं। यह फैसला देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा रहा, और जनता के लिए हिला देने वाला रहा, खासकर आम जनता के लिए। इसलिए ऐसे माहौल में किसी भी तरह की अफवाह तेजी से विश्वसनीयता पा लेती है।
लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले इस देश में गणेश प्रतिमाओं के दूध पीने की अफवाह फैली थी, और लोग अपने सरकारी दफ्तर या कारोबार को छोड़कर लोटे-गिलास में दूध लेकर मंदिरों और लोगों के घरों की प्रतिमाओं तक पहुंच रहे थे। कई बार ऐसा लगता है कि भारत जैसे लोकतंत्र में अंधविश्वास की जो पकड़ है, जितनी साम्प्रदायिकता है, या जितनी अंधभक्ति है, उसमें कोई भी अफवाह फैलाना बड़ा आसान काम है, और नमक के रेट बढऩे की अफवाह तो फिर भी ठीक है, अगर किसी साम्प्रदायिकता की, किसी राष्ट्रवादी हिंसा की अफवाह फैलाई जाएगी, तो क्या होगा? हमारे पाठकों को याद होगा कि हम बीच-बीच में देश में वैज्ञानिक सोच, और तर्कसंगत बातों के महत्व पर लिखते हैं। ऐसा जरूरी इसलिए है कि धर्म से लेकर आध्यात्म तक, और राजनीति से लेकर किसी जाति के संगठन तक, जहां-जहां लोगों का विश्वास लोकतंत्र और तर्क से परे किसी पर भी होता है, तो वह कभी भी आपा खोकर हिंसक हो सकता है, और ऐसा हमने जगह-जगह गुरुओं के मामले में देखा हुआ भी है। बरसों से बलात्कार के मामले में जेल में बंद आसाराम को आज भी जब पेशी पर लाया जाता है, तो उसके भक्तगण अदालत के बाहर भीड़ लगा लेते हैं। छत्तीसगढ़ में जगह-जगह सरकारी स्कूलों में कहीं आसाराम की किताबें खपाने की कोशिश करते हैं, तो कहीं उसके पोस्टर लगाकर जुलूस निकालते हैं। अगर लोगों के बीच लोकतंत्र के प्रति आस्था होती, तो ऐसा नहीं होता।
नमक की अफवाह आज देश की अर्थव्यवस्था पर लोगों के हिल गए भरोसे का एक संकेत और सुबूत है। केन्द्र सरकार को इस भरोसे को दुबारा कायम करने के लिए खासी मेहनत करनी पड़ेगी। आज तो जगह-जगह लोग सदमे में मर रहे हैं, या आत्महत्या कर रहे हैं। और इनसे परे भी अनगिनत ऐसे लोग हैं जो अपनी रोज की मजदूरी-कमाई को छोड़कर बैंकों के सामने खड़े हैं। ऐसी दिमागी हालत में जब लोगों के नोट बदल भी जाएंगे, तो एक बहुत बड़ा खतरा देश में यह रहेगा कि बैंकों और नोटों पर से लोगों का भरोसा घटा हुआ रहेगा, और वे पूंजी निवेश या बचत के कई ऐसे रास्ते ढूंढने लगेंगे जिसमें उनकी जमा रकम के डूबने का खतरा और अधिक रहेगा। यह सिलसिला थामने के लिए केवल बाजार में विश्वास लौटना जरूरी नहीं है, सभी तरह की वैज्ञानिक सोच को जनता में लाना जरूरी है, और यह बात महज जुमलों से हो नहीं पाएगी।

नोटों की यह बदली, नीयत की बदली नहीं दिखती है..

संपादकीय
11 नवम्बर 2016  
नोटों को बदलने का मोदी सरकार का फैसला अब धीरे-धीरे लोगों की अधिक आलोचना का शिकार हो रहा है। आम जनता को बहुत ही दिक्कतें हो रही हैं, और  किसी भी शहर-कस्बे की कोई ऐसी सड़क नहीं है जहां बैंकों के सामने, डाकघर या एटीएम के सामने लंबी-लंबी कतारें न लगी हों। और ये वे तमाम लोग हैं जिन्हें कुल चार हजार रूपए निकालने की या बदलने की छूट है। लोगों को लग रहा है कि करोड़ों लोगों को अपनी रोज की मजदूरी छोड़कर, अपना कामकाज छोड़कर अगर कुछ हजार रूपए बदलने के लिए पूरा-पूरा दिन खराब करना पड़ रहा है, तो केन्द्र सरकार को इसका कोई दूसरा रास्ता सोचना चाहिए था। दूसरी तरफ अर्थशास्त्रियों और जानकार लोगों की यह बात भी सामने आ रही है कि देश में कालाधन शायद कुल तीन फीसदी ही नोटों की शक्ल में है, बाकी कालाधन दूसरी चीजों में लगा हुआ है। ऐसे में आम जनता को बड़ी दिक्कत देकर अगर इस तीन फीसदी कालेधन का एक बड़ा छोटा सा हिस्सा ही हासिल किया जा सकेगा, तो यह पूरी मशक्कत ही फिजूल की साबित होगी।
आज बाजार की चर्चा यह है कि लोग अपने कालेधन के पुराने नोटों को नए नोटों में बदलने के रास्ते निकाल रहे हैं, और वे रास्ते निकल भी जा रहे हैं। एक आशंका यह है कि देश में जो दसियों करोड़ जन-धन खाते खुले हैं, उन खातों में लोग दलालों और एजेंटों के मार्फत अपना कालाधन जमा करके निकाल लेंगे, और छोटी-छोटी रकम से भी उनका बड़ा-बड़ा काम हो जाएगा। इसके अलावा देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो आयकर नहीं देता है, और उनमें से हर किसी के खाते में लाख-दो लाख रूपए डालकर लोग नई नगदी निकाल सकते हैं, और बाजार का एक अंदाज यह है कि इसमें पांच-दस फीसदी से अधिक खर्च नहीं आएगा। अगर ऐसा होता है तो नए नोटों को छापने पर किया गया पन्द्रह-बीस हजार करोड़ रूपए का खर्च, और उससे कई गुना अधिक बैंकों का खर्च, और उससे भी कई गुना अधिक आम जनता के वक्त का खर्च मिलकर इस पूरी कसरत को पानी में बहाते दिख रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे कार्टून तैर रहे हैं जिनमें देश के सबसे बड़े कारोबारी प्रधानमंत्री के साथ खड़े जोरों से हॅंस रहे हैं कि मूर्ख जनता यह सोचती है कि बड़े लोग अपना कालाधन नोटों की शक्ल में रखते हैं।
सोशल मीडिया पर ही एक दूसरी अफवाह भी जोरों से तैर रही है, और हो सकता है कि उसके चलते सरकार की एक संभावित संभावना खत्म हो जाए। लोग यह फैला रहे हैं कि सरकार सारे बैंक लॉकर भी सील करने वाली है। अब यह बात पिछले दो दिनों में इतनी फैल चुकी है, और लोग अपने लॉकर खोल-खोलकर नगद पैसे निकाल भी चुके हैं, गहने भी शादी के मौसम की वजह से निकाल चुके हैं, कि अब लॉकरों से बहुत कुछ हासिल करना शायद आसान नहीं होगा। लेकिन अगर केन्द्र सरकार नोटबंदी के साथ-साथ एक पखवाड़े के लिए लॉकरबंदी भी कर देती, और उसके बाद वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ ही एक-एक लॉकर खोलने की छूट देती, तो हो सकता है कि नोटों के मुकाबले अधिक कालाधन बरामद होता। फिलहाल तसल्ली की एक बात यह है कि हजार-पांच सौ के नोटों में जो नकली नोट चल रहे थे, वे देश की अर्थव्यवस्था से बाहर हो जाएंगे, और नकली नोट छापने वाली प्रेसों में जो ताजा स्टॉक रवाना होने वाला होगा, वह बेकार हो जाएगा। लेकिन इसके दूसरे पहलू को अगर देखें, तो ऐसे सारे नकली नोट आज बेकसूर लोगों के हाथों में अनजाने में पहुंचे हुए हैं, और जब बैंक उन्हें लेने से मना कर देगा, तो ये नुकसान ऐसे आम लोगों का होगा। यह नुकसान देश की अर्थव्यवस्था का न होकर, निजी लोगों का होगा और इसकी वजह से नकली नोटों के खत्म होने का फायदा भी खत्म होते दिखता है।
सरकार जब भी कोई इतनी व्यापक कार्रवाई करेगी, उससे कई लोगों को तकलीफ होना बहुत स्वाभाविक है। लेकिन फिलहाल नोटबंदी से कोई बड़ा फायदा दिख नहीं रहा है, और आम और गरीब लोगों को रोजाना नुकसान होते जरूर दिख रहा है। एक खतरा यह भी है कि गरीब और मध्यम वर्ग के पास अगर कहीं दबे हुए कुछ नोट रह जाएंगे, तो बाद में उनके मिलने पर उसकी कोई भरपाई नहीं हो सकेगी। एक आखिरी बात यह कि पहले दिन भी हमने लिखा था कि अगर बड़े दाम वाले नोटों की वजह से कालाधन बढ़ता है, तो अभी दो हजार रूपए के नए नोट जारी करने का क्या तुक है? एक तरफ तो सरकार ने नगद भुगतान की सीमा घटा दी है, दूसरी तरफ अधिक दाम के नोट जारी कर रही है, ये दोनों बातें एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं।
अगर सरकार कालेधन पर सचमुच कोई कार्रवाई करना चाहती है, तो उसे सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ तगड़ा वार करना पड़ेगा, भ्रष्ट लोगों को उम्रकैद देने जैसे कड़े कानून बनाने पड़ेंगे, सरकारी भ्रष्टाचार में पकड़ाए गए लोगों के खिलाफ तेजी से जांच और उतनी ही तेजी से मुकदमे की इजाजत देनी पड़ेगी, जो कि आज जरा भी दिखाई नहीं पड़ती है। ऐसा किए बिना नोटों की यह बदली, नीयत की बदली नहीं दिखती है।

ट्रंप के साथ यह दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध के सबसे करीब हो गई...

संपादकीय
10 नवम्बर 2016  
कल इसी जगह पर लिखने के लिए दो मुद्दों के बीच बड़ी कड़ी टक्कर थी। एक तो अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत की खबर थी, और दूसरी खबर हिन्दुस्तान में हजार-पांच सौ के नोट बदलने की। चूंकि हिन्दुस्तानियों की जिंदगी को नोट अधिक प्रभावित कर रहे थे, इसलिए कल उस पर लिखा गया, और दुनिया के सबसे ताकतवर दफ्तर के लिए दुनिया के एक सबसे बेदिमाग, सनकी, घटिया, हिंसक, और तानाशाह ट्रंप के चुने जाने पर लिखने की बारी आज आई है।
एक चुनाव में कांटे की टक्कर पर चल रहे दो उम्मीदवारों में से किसी का भी जीतना बहुत हैरान करने वाला नहीं होना चाहिए, लेकिन फिर भी दुनिया के अमन-पसंद और समझदार लोगों को यह भरोसा था कि अमरीका का बहुमत इतनी बड़ी चूक नहीं करेगा कि एक बहुत ही घटिया इंसान को राष्ट्रपति बना देगा। लेकिन ऐसा लगता है कि पढ़ाई-लिखाई से समझदारी का अनिवार्य रूप से कोई रिश्ता नहीं होता है, क्योंकि अमरीका में पढ़े हुए तो सभी हैं, लेकिन समझदार लोग या तो वोट डालने गए नहीं, या उनके बहुमत ने ट्रंप को वोट दिया। वहां पर वोटों की गिनती का तरीका कुछ अलग है, इसलिए वहां का बहुमत भी कुछ अलग तरीके से तय होता है। फिलहाल यह बात साफ हो चुकी है कि अगले चार बरस डोनाल्ड ट्रंप अमरीका को हांकेंगे। पिछले आठ बरस से डेमोक्रेटिक पार्टी के बराक ओबामा राष्ट्रपति थे, और इस बार भी इस पार्टी की तरफ से अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव की पहली महिला उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन का विकल्प मतदाताओं के सामने था, लेकिन घोर साम्प्रदायिक, नस्लविरोधी, अल्पसंख्यक विरोधी, दकियानूसी सोच को पूरी हिंसा और दमखम के साथ बार-बार दुहराने वाले, राजनीति से परे के कारोबारी डोनाल्ड ट्रंप को मतदाताओं ने पसंद किया। यह पहला मौका था कि जब रिपब्लिकन पार्टी के बड़े-बड़े नेता, उसके तमाम जिंदा भूतपूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ थे, और ट्रंप जितनी गालियां मुस्लिमों को, प्रवासियों को दे रहे थे, उतनी ही गालियां उन्होंने अपनी ही पार्टी के बड़े-बड़े दिग्गजों को दीं, और फिर भी चुनकर आए।
ऐसा लगता है कि अमरीका में लोकतंत्र का एक नया तौर-तरीका इन दिनों लोगों के बीच जगह बना रहा है। लोगों को हिंसा से परहेज नहीं रहा, गंदी जुबान से परहेज नहीं रहा, दूसरी महिलाओं पर यौन हमले करने के ट्रंप के दावों से परहेज नहीं रहा, और मुस्लिमों को अमरीका से बाहर कर देने जैसी साम्प्रदायिक बातों से भी जनता को परहेज नहीं रहा। अमरीकी जनता की यह दिमागी हालत बहुत ही हैरान और हक्का-बक्का करने वाली है। लेकिन दुनिया में नफरतजीवी नेताओं के जीतने के मामले कहीं-कहीं सामने आते रहते हैं, औैर हिन्दुस्तान भी समय-समय पर इस तरह के सदमे पाते रहता है। फिलहाल डोनाल्ड ट्रंप की शक्ल में दुनिया का सबसे बड़ा खतरा सामने आया है, और हमारी यह आशंका है कि आज दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के खतरे के सबसे करीब है, और अगले चार बरस ऐसे ही धड़कन थामकर इस खतरनाक आदमी का कार्यकाल खत्म होने का रास्ता देखना पड़ेगा। अमरीकी जनता के बहुमत ने, और उस बहुमत से भी शायद दुगुनी घर बैठी जनता की चुप्पी ने वहां के लोकतंत्र की साख चौपट कर दी है। अमरीकी लोकतंत्र के दुनिया भर में बरसाए जाने वाले दावे अब खोखले हो गए हैं, क्योंकि जो देश इतने भयानक अलोकतांत्रिक को चुनता है, वह बाकी दुनिया को लोकतंत्र की भला क्या नसीहत दे सकता है? हमारा ख्याल है कि जिस तरह एक वक्त जर्मन मतदाताओं को यह शर्म आई थी कि उन्होंने हिटलर को चुना था, अमरीकी मतदाता भी शायद चार बरस बाद की वैसी ही शर्मिंदगी की ओर बढ़े हैं। आज अमरीका को और बाकी दुनिया को शुभकामनाओं को बहुत जरूरत है, और पूरी दुनिया के सबसे बड़े गुंडे से बचने के लिए हम अमरीका और बाकी दुनिया को अपनी शुभकामना देते हैं।

नोटों के रंग बदलना गिरगिट के रंग बदलने जैसा होकर न रह जाए

संपादकीय
9 नवम्बर 2016  
कल रात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिन्दुस्तानी मीडिया में हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रम्प को खो कर दिया। उन्हें खबरों से ऐसा बाहर धकेला कि लोग अपने घर और जेब में पांच सौ और हजार के नोट गिनने में लग गए, और अगले दिन कैसे इसका निपटारा किया जाएगा यह सोचने में लग गए। नोटों को इस तरह एकाएक बंद करना एक बड़ा फैसला है, और यह फैसला अपने किस्म का देश का पहला फैसला न होते हुए भी आज की एक बड़ी विकसित भारतीय अर्थव्यवस्था में तूफान खड़ा करने वाला जरूर है। इन नोटों की जगह सरकार नए नोट छाप चुकी है और बैंकों में पहुंचा भी चुकी है। इसलिए दो-तीन दिनों की जनता की दिक्कत मानवीय तकलीफ की खबरें तो बनेंगी लेकिन देश की अर्थव्यवस्था से कालेधन को घटाने की एक कोशिश को एक मौका भी देगी। दो दिनों में देश में नए नोट प्रचलन में आ जाएंगे, और अगले डेढ़ महीने में तमाम छोटे और गरीब लोगों की दिक्कतें दूर हो चुकी रहेंगी, ये अपने मौजूदा हजार-पांच सौ के नोट बदल चुके होंगे। इसके बाद दिक्कतें केवल उनकी बचेंगी तो बचेंगी, जिन्होंने बड़ा कालाधन जमा कर रखा है, हालांकि उनकी दिक्कतों का भी अधिक खतरा दिखता नहीं है।
इन नोटों को दो वजहों से बदला गया है। एक तो यह कि आतंक से लेकर तस्करी तक, तरह-तरह के जुर्म से लेकर टैक्स चोरी तक, और भ्रष्टाचार से लेकर कालेधंधे तक, हर कहीं इन बड़े नोटों से ही लेन-देन चलता था, और अब इसे एक झटका लगेगा क्योंकि इतनी रकम को काले से सफेद करना थोड़ा सा मुश्किल होगा। इसकी एक दूसरी वजह यह है कि इन्हीं दोनों नोटों में लगातार नकली नोट बढ़ते जा रहे थे, और उनसे छुटकारा मुश्किल पड़ रहा था। अब उम्मीद की जाती है कि नए नोट ऐसी तकनीक के होंगे कि उनकी नकल करना आसान नहीं रहेगा। एक तीसरी बात बड़ी रकम के नोटों को बंद करने के पीछे यह रहती है कि कालेधन को ढोकर ले जाने में बड़े नोट सहूलियत देते हैं, और यह बात पूरी दुनिया में मानी जाती है। योरप में भी अभी पांच सौ यूरो के नोट को बंद करके बस दो सौ यूरो तक का नोट रखा जा रहा है। ऐसा कई जगहों पर हुआ है और इससे आतंक, जुर्म और समानांतर अर्थव्यवस्था को झटका लगता है। लेकिन भारत के संदर्भ में यह बात याद रखना जरूरी है कि यहां कालाधन कभी भी कम नहीं रहा है। अमरीका या योरप में, जहां पर कि तकरीबन सारी अर्थव्यवस्था बैंकों के माध्यम से चलती है, वहां पर नगदी के बड़े नोट अधिक मायने रखते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था तो हमेशा से नगदी पर चलती समानांतर अर्थव्यवस्था से लदी रही है, इसलिए इस तात्कालिक झटके के बाद हो सकता है कि दो महीनों के भीतर ही सारे कालेधंधे नए नोटों से होने लगें, और आने वाले चुनावों में नए नोट उसी तरह काम आएं जिस तरह अब तक आते रहे हैं।
भारत में कारोबार और काले-सफेद धन की दुनिया में एंट्री लेना एक बड़ा प्रचलित शब्द है जिसमें लोग दूसरों के खातों में अपना कालाधन डालकर उनसे सफेद धन अपने खाते में ले लेते हैं। अभी हमें केन्द्र सरकार के फैसले को लेकर यह शक है कि भारतीय बाजार और कारोबार अपने इस पुराने तरीके को फिर इस्तेमाल कर लेगा, और देश में हाल ही में खुले दसियों करोड़ जनधन खातों का इस्तेमाल, कर्मचारियों के खातों का इस्तेमाल करके पूरे ही कालेधन को सफेद बना लिया जाएगा, और सरकार की इतनी पूरी मशक्कत बेकार जाएगी। हमारा यह पुख्ता अंदाज है कि हफ्ते भर के भीतर देश भर में करेंसी एजेंट उग आएंगे, जो कि कुछ फीसदी कमीशन लेकर पुराने नोटों को नए नोटों में तब्दील करने का धंधा करने लगेंगे, और ऐसे एजेंटों के कर्मचारी बड़े संगठित रूप से करोड़ों जनधन खाता धारकों का इस्तेमाल करने लगेंगे। आज भी भारत में बैंकों के मुकाबले हवाला कारोबार इतना पनपा हुआ है कि बैंकों से रकम जितनी देर में दूसरे शहर पहुंचती है, उससे जल्दी दो नंबर की हवाला रकम पहुंच जाती है। और सरकार इस खुले कारोबार पर आज तक रोक लगा नहीं पाई है, और देश का एक भी ऐसा कारोबारी शहर नहीं है जहां से जितनी चाहे उतनी रकम हवाला न की जा सके। इसलिए महज नियम काफी नहीं होते, उन पर अमल पर सब कुछ टिका होता है। देखना है कि सरकार ने ऐसे खतरों की काट सोच रखी है, या नहीं। फिलहाल मोदी के इस फैसले की आलोचना की कोई वजह नहीं दिखती है, और देश की जनता की कुछ दिनों या कुछ हफ्तों की दिक्कत के बाद अगर नकली नोट, आतंकी कारोबार, जुर्म की दुनिया को झटका लगता है, तो यह अच्छी बात है, लेकिन अगर ये सब संगठित होकर सरकार की इस कोशिश के शिकंजे से बच निकलते हैं, तो फिर यह एक अच्छी लेकिन नाकामयाब कोशिश ही कही जाएगी।
इस पूरे सिलसिले में एक बात यह समझ नहीं आई है कि मोदी सरकार को दो हजार रूपए के नोट जारी करने की क्या जरूरत थी? क्योंकि सरकार ने बीस हजार रूपए से अधिक के नगदी लेन-देन पर रोक लगाई हुई है, खरीदी पर भी तरह-तरह के सुबूत देने की बंदिश लगाई हुई है, ऐसे में हजार रूपए के नोट ही कारोबार के लिए काफी थे, और बड़े नोट बड़ी जल्द ही दो नंबर के धंधों की सहूलियत बन जाएंगे, और सरकारी कोशिश पर हंसने लगेंगे। ऐसा लगता है कि आयकर विभाग ने जितने कालेधन की घोषणा की उम्मीद की थी वह पूरी नहीं हुई है, और नोटों का यह फैसला उसके पहले ही लिया जा चुका था, और कालेधन की घोषणा की तारीख खत्म होने के बाद अब यह दूसरी कोशिश की जा रही है।
सरकार को अपने खुद के कामकाज से भ्रष्टाचार को घटाना होगा। भारत में कालाधन खुद सरकार के धंधों से उपजता है, सरकार चलाने वाले नेताओं के चुनावों से उपजता है, और इसीलिए बाजार के कारोबार में उससे रियायत बरती जाती है, चुनाव के लिए उसे कायम रखा जाता है। आज भी बाजार का यह मानना है कि नेता, अफसर और ठेकेदार के पास ही सबसे अधिक कालाधन रहता है, और यह जनता के हक की कमाई से ही छीना गया पैसा होता है। अगर केन्द्र और राज्य सरकार अपने खुद के भ्रष्टाचार को घटाए, तो देश की अर्थव्यवस्था से कालेधन को वह कड़ाई से दूर कर सकेगी, वरना नोटों के ऐसे रंग बदलना कहीं गिरगिट के रंग बदलने की तरह की एक अस्थायी कार्रवाई होकर न रह जाए।

अगर कांग्रेस राहुल से परे सोच नहीं सकती, तो...

संपादकीय
8 नवम्बर 2016  
कांग्रेस कार्यसमिति ने कल सोनिया गांधी की गैरमौजूदगी में यह तय किया कि अब वे पार्टी की कमान अपने बेटे राहुल गांधी को सौंप दें। हिंदुस्तान की राजनीति में यह सबसे ही कम रहस्य की बात थी कि राहुल गांधी इस पार्टी के अध्यक्ष बनेंगे। और इसके साथ ही मोटे तौर पर ऐसा लगता है कि अगले कई राज्यों के चुनावों और देश के अगले आम चुनाव, इन सबमें कांग्रेस का भविष्य भी तय हो गया है। पूरी तरह से दरबारी चाटुकारिता वाली यह पार्टी एक कुनबे से परे देखना भूल चुकी है। और कुछ वक्त पहले जब नरसिंह राव के दौर में पार्टी और सरकार इस कुनबे के कब्जे से बाहर रहीं, तो उसके तुरंत बाद तमाम दरबारी जाकर फिर सोनिया गांधी के इर्दगिर्द लेट गए, और उन्हें मनाकर पार्टी का मुखिया बना दिया। सोनिया ने पार्टी को दो बार चुनावी जीत दिलवाई, और तमाम खामियों के बावजूद अपनी पार्टी के एक बेहतर नेता मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। उस वक्त सोनिया ने कांग्रेस संसदीय दल द्वारा उन्हें प्रधानमंत्री चुन लेने के बावजूद मनमोहन को जिम्मा दिया, और वह बड़ी समझदारी की बात थी। लेकिन आज ऐसी एक दूसरी समझदारी हो सकती है कि अगर राहुल गांधी से परे देखा जाता, और किसी दूसरे कांग्रेस नेता को पार्टी को जिंदा करने का मौका दिया जाता। पिछले दस से अधिक बरस में राहुल गांधी यह साबित कर चुके हैं कि वे किसी लीडरशिप के लायक नहीं हैं, और उनकी क्षमता की अपनी सीमाएं हैं। ऐसे में उन्हीं के कंधों पर पार्टी के पूरे भविष्य को लादकर कांग्रेसी-दरबारी न तो राहुल के साथ इंसाफ कर रहे हैं, और न ही कांग्रेस के साथ। हमारी फिक्र इससे कुछ और बढ़कर भी है कि कांग्रेस अगर विपक्ष में भी हाफ सेंचुरी से नीचे की पार्टी रहेगी, तो देश में लोकतंत्र का संतुलन पूरी तरह तबाह रहेगा। पिछले आम चुनाव में कांग्रेस की सांसद-संख्या 44 पर सिमट चुकी है।
दरअसल किसी एक कुनबे पर या किसी एक नेता पर टिकी हुई पार्टी का भविष्य तभी तक रहता है जब तक पार्टी की अगली पीढ़ी या वैसे अकेले नेता का करिश्मा कायम रहे। बाल ठाकरे के जाने के बाद बाकी लोगों का वैसा करिश्मा नहीं रहा, लेकिन दूसरी तरफ अखिलेश यादव हो सकता है कि मुलायम के मुकाबले भी अधिक करिश्मे वाले साबित हों। राहुल गांधी की शक्ल में कांग्रेस को नेहरू-गांधी कुनबे का एक ऐसा नेता मिल सकता था जो कि पूरी पार्टी को एक रख सके। पार्टी के बाकी नेता एक दूसरे की लीडरशिप के तहत काम करने को शायद तैयार न हों, और यही बात सोनिया या राहुल के मातहत सबको जोड़कर रख सकती है। लेकिन देश के संसदीय चुनाव कांग्रेस के भीतर नहीं होते, वे देश में मतदाताओं के बीच होते हैं, और वहां पर राहुल गांधी पूरी तरह, और बुरी तरह बेअसर हैं। अगर कांग्रेस राहुल से परे सोच नहीं सकती, तो जनता भी कांग्रेस के बारे में क्यों सोचेगी?

मेरा मुझको अर्पण

7 नवंबर 2016     

इसी महीने 29 तारीख को वल्र्ड गिविंग डे मनाया जाएगा। परोपकार या देने का,  दूसरों के लिए कुछ करने का दिन। और इसके लिए एक अंतरराष्ट्रीय गैरसरकारी संगठन ने अभी दो-चार दिन पहले एक सर्वे के नतीजे जारी किए हैं, उनके मुताबिक भारत के पड़ोस में बसा हुआ म्यांमार दुनिया में इस बात में सबसे आगे है। हालांकि यह देश बहुत संपन्न नहीं है, और यह आंतरिक अशांति से भी गुजर रहा है, लेकिन फिर भी लोगों में अजनबियों की मदद करना, दूसरों के लिए धन या समय देना, इन सभी पैमानों पर म्यांमार दुनिया में अव्वल है। अमरीका दूसरे नंबर पर है, और हिन्दुस्तान 140 देशों की इस लिस्ट में 91वें नंबर पर है।
अब इससे जुड़ी हुई बहुत सी छोटी-छोटी बातें याद पड़ती हैं कि किस तरह हिन्दुस्तान के लोग अपनी संस्कृति, और अपने जीवन मूल्यों को लेकर कुछ लोगों द्वारा खड़े किए गए एक पाखंड को हकीकत मानकर जीते हैं। वे अपने इतिहास की ऐसी गैरमौजूदगी कहानियों को सच मान बैठते हैं कि दुनिया में सबसे अधिक विकसित संस्कृति, विज्ञान, और सबसे महान नीति-सिद्धांत यहीं के थे। लेकिन जब कुछ देने की बात आती है, दूसरों के लिए कुछ करने की बात आती है तो यह देश कतार में सबसे आखिर में खड़ा दिखता है।
और ऐसा तब है जब महावीर और बुद्ध जैसे लोग इस देश में हुए जिन्होंने सांसारिकता को छोडऩे, और दूसरों के लिए करने की मिसालें कायम कीं। इसी देश में गांधी हुए जिन्होंने अपने तन पर एक लंगोटी सी आधी धोती के अलावा शायद चप्पल, चश्मा और एक घड़ी की विरासत भी समाज के लिए छोड़ी, और परिवार के लिए तो अपने नाम के बोझ ढोने के अलावा और कुछ नहीं छोड़ा। यह वही देश रहा जहां जवाहर लाल नेहरू ने अपनी निजी संपत्ति समाज के लिए दी, यह एक अलग बात है कि उन्हीं के कुनबे की आल-औलाद से लेकर कुनबे के दामाद तक ने सरकारी नियम-कायदों के लूटपाट से निजी जागीर खड़ी करने का काम किया, कहीं ट्रस्ट का बेजा इस्तेमाल किया और कहीं पार्टी के रूपयों का।
अब इस देश में अगर हम बड़े-बड़े लोगों को देखें, तो उनमें दो किस्म के लोग दिखते हैं। दूसरों को देने वाले लोग गिने-चुने हैं, और वे बस मिसाल तक सीमित रह जाते हैं। बाकी संपन्न तबका अपने लिए इतना ऊंचा मकान बनाने की सोच रखता है कि उसकी छत पर से हाथ बढ़ाकर चांद को छुआ जा सके। भारत में नारायण मूर्ति और अजीम प्रेमजी जैसे लोग हैं जिन्होंने अपने खुद के खड़े किए हुए पहली पीढ़ी के कारोबार से अपने कमाए हुए पैसों में से दसियों हजार करोड़ समाज के लिए देना तय किया है, देना शुरू कर दिया है, और यह एक अलग बात है कि इनको सार्वजनिक जीवन में विमान की इकॉनॉमी क्लास की सबसे सस्ती सीटों पर बैठे सफर करते देखा जा सकता है, हालांकि इनकी कम्पनियों के दूसरे अफसरों को महंगी सीटों पर भी सफर करने का हक हासिल है।
दूसरी तरफ अदानी और अंबानी जैसे लोग हैं जो कि सत्ता के चहेते रहकर लगातार लाखों-करोड़ रूपए कमा रहे हैं, और अपने देश की सरकार से सीधे और दूसरे देशों के साथ कारोबार में इस कमाई को जारी रख रहे हैं, लेकिन इनका दान किसी ने सुना नहीं है। फिर पुराने कारोबारियों में बिड़ला जैसे लोग हैं, जिनके घर में गांधीजी ठहरा करते थे, प्रवचन किया करते थे, और वहीं उन्होंने आखिरी सांस भी ली थी। एक वक्त बिड़ला को हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना माना जाता था, और हमें पहली नजर में बिड़ला का जो सामाजिक योगदान याद पड़ता है वह है कुछ शहरों में बिड़ला मंदिर बनवाने का। अब मंदिर के भीतर पता नहीं किस देवी-देवता की प्रतिमाएं हैं, लेकिन वह मंदिर कहलाता बिड़ला मंदिर है। इसलिए कुछ करोड़ रूपए खर्च करके इस कारोबारी ने अपने नाम को भगवान के नाम के साथ अमर कर लिया है, और ऐसा लगता है कि जिस तरह गांधी इस कुनबे के घर में ठहरते थे, उसी तरह देवी-देवता भी इन्हीं के घर में ठहरते हैं।
आज अमरीका में अपनी पीढ़ी से ही कारोबार को शुरू करके आसमान पर ले जाने वाले वारेन बफेट और बिल गेट्स जैसे लोग हैं जो कि खुद अमरीका में सबसे संपन्न लोगों में से हैं, और इन्होंने अपने सारे साम्राज्य के आधे या अधिक हिस्से को दान में देने की शपथ ली है, और देना शुरू भी कर दिया है। जिस उम्र में एक आम हिन्दुस्तानी अपनी पहली कार खरीदने की सोचते हैं, उस उम्र में फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने दसियों हजार या लाखों-करोड़ दान में देने की घोषणा कर दी है, ट्रस्ट बना दिया है, और दान का काम शुरू कर दिया है।
लेकिन दान का मौका अकेले दौलतमंद को नहीं मिलता, मामूली हैसियत के लोग भी समाजसेवा में अपना समय दे सकते हैं। हिन्दुस्तान में लोगों के बीच में इस बात को लेकर भी कोई जिम्मेदारी नहीं दिखती है, और गिने-चुने लोग किसी शहर में ऐसे दिखते हैं जो कि दूसरों के लिए खून जुटाने का काम करें, अपने इलाके की सफाई करें, बीमार जानवरों की मदद करें, फुटपाथ पर जी रहे इंसानों के लिए कुछ करें। इन सबमें पैसा नहीं लगता लेकिन एक दिलचस्पी लगती है, और हमदर्द होने की एक सोच लगती है। जाहिर है कि जब भारत 140 देशों में 91वें नंबर पर आ रहा है, तो यहां के लोग चाय ठेले या पान ठेले पर वक्त को बर्बाद कर लेते हैं, लेकिन उस वक्त का धरती के लिए, अपने लिए, दूसरों के लिए बेहतर इस्तेमाल नहीं करते।
और हिन्दुस्तान में दान का शायद पूरे का पूरा हिस्सा धर्म से जुड़ा हुआ है जिसमें लोग अपने धर्म के गुरुओं को, मंदिरों को ऐसा दान देते हैं जो कि उनके ही धर्म के दूसरे धर्मालु लोगों के काम आता है। जो पैसा सबसे जरूरतमंद के सबसे अधिक काम आए, वही दान हो सकता है। जब किसी का दिया हुआ दान अपने धर्म, अपनी जाति, अपनी आस्था, अपने ईश्वर, या अपने गुरू के लिए दिया हुआ होता है, तो वह उनकी निजी आस्था ही होती है, कोई दान नहीं होता।
हिन्दुस्तानी सड़कों के किनारे हर त्यौहार पर लोग भंडारा लगा देते हैं, और वहां पर बिना जाति या धर्म पूछे भी लोगों को प्रसाद खिलाते हैं, या ईश्वर के नाम पर कुछ और खिलाते-पिलाते हैं। लोगों को लग सकता है कि वे भूखे-गरीबों को खिला रहे हैं, लेकिन हकीकत यह रहती है कि राह चलते रूककर यहां पर खाने वाले लोग भूखे बिल्कुल भी नहीं होते, क्योंकि शहरों में भूख की जगह नहीं होती है। वे दिखने में गरीब जरूर होते हैं, और आस्था के नाम पर, या कि मुफ्त मिलने के नाम पर रूककर खा लेते हैं, या उससे उनके जिंदा रहने की बात नहीं जुड़ी होती। जो हकीकत में भूखे हैं, और जो बिना खाने के मरने की कगार पर हैं, वे शहरी भंडारों तक पहुंच भी नहीं पाते, और न इन भंडारों का कुछ प्रसाद वहां तक पहुंच पाता। लेकिन ऐसे भंडारों पर खर्च करने वाले लोगों को यह तसल्ली रहती है कि वे दान कर रहे हैं।
यह तसल्ली उसी तरह की है जिस तरह मुम्बई के एक राजनीतिक-डॉन राज ठाकरे ने पिछले दिनों वहां के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस की मौजूदगी में एक फिल्म  से सैनिक कल्याण के लिए पांच करोड़ का दान दिलवाकर पाई है। इस फिल्म में पाकिस्तान के एक कलाकार को लिया गया था, और उसकी सामाजिक सजा के रूप में, फिल्म को बिना हिंसा सिनेमाघर पहुंचने देने के लिए मुम्बई में गुंडागर्दी के लिए कुख्यात इस नेता ने यह दान दिलवाया, और इसकी घोषणा से ही देश भर से इसकी निंदा भी होने लगी कि क्या देश के सैनिकों को गुंडों की बंदूक की नोंक पर उगाहे गए दान की जरूरत है?
दान और परोपकार का यह पूरा सिलसिला लोगों की धार्मिक सहूलियत से भी चौपट हो जाता है। जो लोग मंदिरों के बाहर बैठे भिखारियों को कुछ सिक्के देकर बाद में दिन भर अपने काम और कारोबार में भ्रष्टाचार, टैक्स चोरी, और कालाबाजारी के लिए मानसिक ताकत पा जाते हैं, वे भी अपने आपको दानी और परोपकारी मान लेते हैं। यह तो अपनी ही आत्मा को बोझमुक्त करने का सबसे सस्ता और आसान रास्ता रहता है, और हिन्दुस्तान में इसी का चलने सबसे अधिक है।
लेकिन आने वाले 29 नवंबर को वल्र्ड गिविंग डे मनाया जाने वाला है, हर बरस की तरह। और इस दिन लोगों को सचमुच अपने भीतर झांककर देखना चाहिए कि उनकी कितना देने की ताकत है, दूसरों के लिए कितना करने की ताकत है, और वे अब तक क्या करते आए हैं? मिसाल के लिए अमरीका तक जाने की जरूरत नहीं है, भारत की सरहद से लगकर बसा हुआ म्यांमार एक मिसाल है। हम अभी पूरी लिस्ट नहीं देख पाए हैं, लेकिन भारत की दूसरी सरहद पर बसा हुआ श्रीलंका एक दूसरी बात के लिए मिसाल है कि वहां लोग इतना नेत्रदान करते हैं कि वहां से आंखें दूसरे देशों के नेत्रहीन लोगों के लिए भी भेजी जाती हैं।
हिन्दुस्तानी सोच और संस्कृति में कहने के लिए तो कह दिया जाता है कि तेरा तुझको अर्पण। लेकिन जब ऐसा करने की नौबत आती है तो लोग मेरा मुझको अर्पण पर ही अमल करते दिखते हैं। मुकेश अंबानी जैसे लोग अपने लिए दुनिया का सबसे ऊंचा रिहायशी मकान बनाते हैं, और उनके हिसाब से वह स्वर्ग से चार हाथ नीचे ही होगा। दूसरी तरफ नारायण मूर्ति और अजीम प्रेमजी जैसे लोग हैं जो कि सादगी और किफायत में जीकर अपना कमाया हुआ सब कुछ समाज को देने पर आमादा और उतारू हैं, और भारत संस्कृति को महान बनाने का काम कर रहे हैं।

एनडीटीवी पर कार्रवाई से सरकार का बड़ा नुकसान

संपादकीय
7 नवम्बर 2016  
देश के एक प्रमुख समाचार चैनल एनडीटीवी पर केन्द्र सरकार ने एक दिन की रोक लगाई है कि इस चैनल ने कश्मीर में सुरक्षा बलों की कार्रवाई के प्रसारण में संवेदनशील सूचनाएं दिखाई थीं। इसके बाद से देश भर के मीडिया के संगठन, और विपक्षी दलों के नेता लगातार सरकार की इस बात के लिए गंभीर आलोचना कर रहे हैं। इस चैनल का कहना है कि उसने कोई भी ऐसी जानकारी नहीं दिखाई जो कि बाकी सारे मीडिया पर नहीं चल रही थी। यह अपने किस्म का पहला मौका है जब देश के एक प्रमुख समाचार चैनल को चौबीस घंटे बंद रखने के लिए कहा गया है, और यह आज के माहौल में अधिक महत्वपूर्ण इसलिए भी हो जाता है कि एनडीटीवी अपनी रीति-नीति की वजह से लगातार केन्द्र सरकार की आलोचना करते आ रहा था, और आज जिस तरह मीडिया दो खेमों में बंटा हुआ सा दिखता है, उसमें एनडीटीवी मोदी सरकार, भाजपा, और संघ परिवार के एजेंडा के आलोचक के रूप में एक बड़ी प्रमुख आवाज के रूप में स्थापित है। इसके साथ-साथ एनडीटीवी देश के सबसे विश्वसनीय समाचार चैनल के रूप में भी जाना जाता है, और इस विश्वसनीयता की वजह से वह देश के स्वघोषित राष्ट्रवादी, और साम्प्रदायिक ताकतों की आंखों की किरकिरी भी बना हुआ है।
अब यहां पर दो सवाल उठते हैं। हम केन्द्र सरकार के इस अधिकार को चुनौती नहीं देते कि अगर कोई समाचार चैनल या अखबार राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नुकसान पहुंचाने वाले किसी कवरेज का कुसूरवार ठहराया जाता है तो उस पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। जब किसी कार्रवाई का कानून बना है तो वह कानून या तो जायज होगा, या उस कानून को ही चुनौती दी जानी चाहिए। लेकिन जब उस कानून के तहत कोई कार्रवाई की जा रही है, तो हम उसे अपने आपमें इमरजेंसी की सेंसरशिप जैसा कहना नहीं चाहते। एनडीटीवी के पास अदालत में जाकर सरकार के इस आदेश को खारिज करवाने की अपील का हक है, और यह चैनल सुप्रीम कोर्ट चले भी गया है। दूसरी तरफ मुम्बई पर आतंकी हमले के वक्त से लगातार यह बात भी चली आ रही थी कि समाचार चैनल अपने जीवंत प्रसारणों में कई बार ऐसी बातें दिखाते हैं जो कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई को ही खतरे में डाल देती है। हम इसमें से कोई बात इस चैनल को लेकर नहीं कर रहे हैं, लेकिन फिर भी अगर बहस के लिए मान भी लिया जाए कि एनडीटीवी ने ऐसी खतरनाक और सवंदेनशील बातों या तस्वीरों को प्रसारित किया था, तो भी उस पर यह कार्रवाई एक समझदार सरकार को नहीं करनी चाहिए थी।
भारत में टीवी की दर्शक संख्या को जानने वाले लोग यह भी जानते हैं कि एनडीटीवी शुरू के दर्जन भर चैनलों जितनी कमाई नहीं करता है, और उसे देखने वाले भी कम हैं। लेकिन पिछले चार दिनों से देश के मीडिया पर केवल एनडीटीवी का नाम चल रहा है, और हमारा ख्याल है कि एक दिन प्रसारण बंद रहने से इसे जो नुकसान होगा उससे सौ गुना या हजार गुना अधिक फायदा इन चार दिनों में हो चुका है। दूसरी बात यह कि केन्द्र सरकार को पिछले चार दिनों में लगातार यह तोहमत झेलनी पड़ रही है कि वह मीडिया का गला घोंटने की कोशिश कर रही है। कोई सरकार अगर ऐसा करने की नीयत रखती भी है, तो भी हमारा ख्याल है कि वह ऐसी तोहमत से बचती है। और एक ही दिन पहले तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सार्वजनिक मंच से माईक पर देश को यह याद दिलाया था कि अब इमरजेंसी जैसी कोई सरकार कभी नहीं आनी चाहिए। और इसके अगले ही दिन केन्द्र सरकार का लगाया गया यह प्रतिबंध एनडीटीवी को हीरो बना गया है। राजनीतिक रूप से भी हमारा ख्याल है कि मोदी सरकार को इससे बड़ा नुकसान हुआ है, और एनडीटीवी को अभूतपूर्व हमदर्दी भी मिली है, और यह चैनल सुर्खियों में आ गया है, और बना रहेगा। इसने देश के मीडिया के लगभग पूरे तबके को एक होने का मौका दिया है, और हर प्रदेश या बड़े शहरों में पत्रकारों के संगठन बैठक करके एनडीटीवी के साथ खड़े हो रहे हैं, और मोदी सरकार की आलोचना कर रहे हैं। हमारा ख्याल है कि केन्द्र सरकार ऐसी किसी गलती, अगर हुई भी है तो, पर किसी चैनल या अखबार को एक चेतावनी दे सकती थी, और वही कार्रवाई राजनीतिक समझदारी की भी होती। एनडीटीवी बाकी बहुत से चैनलों के मुकाबले बहुत ही पेशेवर और जिम्मेदार चैनल है, और उस पर की गई कार्रवाई को जनता भी अच्छी नजर से नहीं देखेगी। यह एक टालने लायक गलती है, या गलत काम है, और किसी भी सरकार को इससे बचना चाहिए। फिलहाल एनडीटीवी को इससे बड़ा फायदा हो रहा है, और मीडिया के बीच एक जिंदा बहस भी छिड़ी है।