ईरान पर हमले को लेकर अमरीकी बिफरे हुए हैं डॉनल्ड ट्रंप से

06 मार्च 2026 

 

ईरान पर हमले को लेकर अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अमरीकी संसद में अपनी रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों को तो समर्थन देने के लिए तैयार कर लिया, लेकिन इससे अमरीका के लोकतांत्रिक समाज में एक गहरी दरार पड़ गई है। जिस तरह इजराइल के गुलाम की तरह बर्ताव करते हुए अमरीकी सरकार ने ईरान पर हमला किया है, उसे अमरीका का ईरान पर हमला कहना भी जायज नहीं होगा। यह हमला ट्रंप का निजी और अकेले का फैसला है, और उसके रक्षामंत्री, या विदेश मंत्री उसकी हां में हां मिलाने वाले पिछलग्गुओं से अधिक कुछ नहीं हैं। इस फैसले का अमरीका में अकेले विपक्षी दल डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से तो जमकर विरोध हो ही रहा है, अमरीका में जितने किस्म के और लोकतांत्रिक संस्थान हैं, वे सब भी ट्रंप के इस फैसले के खिलाफ खुलकर खड़े हो गए हैं। लेकिन ट्रंप न सिर्फ बेदिमाग है, बल्कि बद्दिमाग भी है। इन दोनों का मेल घातक और जानलेवा रहता है, ट्रंप का खुद का तो कुछ नहीं बिगडऩा है, वह अमरीका के इतिहास, वर्तमान, और भविष्य तीनों को तबाह करने पर आमादा है। अमरीका का हर बड़ा मीडिया संस्थान ईरान पर इजराइल के साथ मिलकर हमला करने के ट्रंप के फैसले की व्याख्या करते हुए यह साफ देख रहा है कि ट्रंप और उसके मंत्रियों ने इस हमले की वजहों को गिनाते हुए हर बार अलग बात कही, हर बार झूठ बोला। इसके साथ यह भी है कि सारी बातों को मिलाकर भी ट्रंप एक जायज वजह नहीं गिना पा रहे हैं कि यह हमला किस तरह अमरीका के लिए जरूरी था, और अमरीका के हित में था। खुद ट्रंप और उनके मंत्रियों की कही बातों में यह मंजूर किया गया कि इजराइल ने ईरान पर हमला तय कर लिया था, वह करने ही वाला था, और उसके बाद ईरान मध्यपूर्व के देशों में डेरा डाले हुए अमरीकी सैनिकों पर हमला कर सकता था, इसलिए अमरीका के संभावित नुकसान को रोकने के लिए पहले ही ईरान पर यह हमला कर देना जरूरी था। इस बयान से यह भी जाहिर होता है कि इजराइल अमरीका के काबू के बाहर का एक देश हो चुका है, और अमरीकी सैनिकों पर खतरा लाने की कीमत पर भी उसने यह हमला किया। ऐसे इजराइल को अंधाधुंध समर्थन करके ट्रंप अमरीकियों के लिए एक खतरा खड़ा कर रहा है, और किसी भी देश के मुताबिक यह उसके लिए सबसे महंगा मोल लिया जाने वाला खतरा है।

दूसरी तरफ जिस तरह ईरान में लड़कियों के एक स्कूल पर हवाई हमला किया गया जिसमें 165 से अधिक बच्चियां मारी गईं, उसने भी संयुक्त राष्ट्र से लेकर दुनिया के बाकी संवेदनशील, समझदार, और जिम्मेदार देशों को हिलाकर रख दिया है। खुद अमरीका को इस जंग के बीच यह कहना पड़ा है कि वह इस बात की जांच करेगा कि स्कूल पर यह हमला किसने किया है, और कैसे हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि जब ईरानी जनता 165 से अधिक बच्चियों की लाशें सफेद कफन में लपेटे हुए राष्ट्रीय शोक मना रही थी, उसी वक्त ट्रंप उनके लिए फतवा जारी कर रहा था कि उन्हें ईरान की इस्लामी-तानाशाह सरकार को पलट देना चाहिए। इस मौके पर ट्रंप के इस बयान को अमरीका के कुछ राजनीतिक टिप्पणीकारों ने दुनिया की सबसे घटिया स्क्रिप्ट करार दिया है। खुद अमरीका के अनगिनत लोगों को यह याद पड़ रहा है कि यह जंग, और इस किस्म के हमले वियतनाम युद्ध की याद दिला रहे हैं जो बरसों तक चलने के बाद अमरीका को शिकस्त पाकर वहां से पीछे हटना पड़ा था। हमले के कुछ दिनों के भीतर से ही अभी अमरीका के दर्जनों बड़े शहरों में जनता सडक़ों पर उतर आई है, और बैनर-पोस्टर लेकर नारे लगा रही है कि यह नाजायज, गैरकानूनी और असंवैधानिक हमला बंद करो। लोग बैनर-पोस्टर लेकर चल रहे हैं कि अमरीका को जंग नहीं चाहिए। 2 मार्च को अमरीकी राष्ट्रपति भवन के बाहर एक बड़े प्रदर्शन में लोग ट्रंप को जंगखोर करार दे रहे थे। कुछ लोगों का कहना है कि ट्रंप इजराइल की खुशी के लिए और उसकी जिद के लिए अमरीका को जंग में झोंक रहा है। अमरीकी मीडिया में ऐसे कार्टून बने हैं जिनमें इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू हाथ में पट्टा थामे हुए हैं, और उससे बंधा ट्रंप जैसा दिखता कुत्ता ईरान पर झपट रहा है, उसके पैरों में दांत धंसा रहा है। यह सब वह अमरीकी राष्ट्रपति कर रहा है जो दुनिया में जंग खत्म करने का नारा लगाते हुए अभी सवा साल पहले ही सत्ता पर आया था, और शांति का नोबल पुरस्कार पाने के लिए उसने बिफरे हुए किसी जानवर की तरह चारों तरफ सिर मारना जारी रखा हुआ है। अभी उसने खुद होकर यह कहा है कि जब उसे नोबल शांति पुरस्कार नहीं दिया गया, तो दुनिया में शांति अब उसकी जिम्मेदारी नहीं रह गई है। मतलब यह कि अब वह नोबल शांति पुरस्कार की उम्मीद रखे बिना दुनियाभर में तबाही लेकर आएगा। कुछ कार्टून ऐसे भी बने हैं जिनमें ट्रंप की फौज उससे पूछ रही है कि एक बम नोबल पुरस्कार कमेटी पर भी गिरा दें क्या?

अमरीकी संसद में अभी विपक्ष, डेमोक्रेटिक पार्टी ने ‘वॉर पॉवर्स रिजोल्यूशन’ पर मतदान करवाया। यह नया प्रस्ताव अमरीकी संविधान की इस पुरानी व्यवस्था के और अधिक खुलासे के लिए है कि राष्ट्रपति जंग की घोषणा नहीं कर सकते, यह संसद का विशेषाधिकार है, उसी की जिम्मेदारी है, उसी का हक है। दूसरी तरफ वहां के संविधान में यह धुंध भी छाई हुई है कि अमरीकी राष्ट्रपति देशहित में दुनिया में कहीं पर फौजी हमला कर सकता है, जंग का ऐलान नहीं कर सकता। यह संविधान ब्रिटिश संविधान की तरह अलिखित नहीं है, लिखित दस्तावेज है, फिर भी उसमें इतनी धुंध है कि ट्रंप उसके आपातकालीन अधिकारों का इस्तेमाल करके पूरी दुनिया पर टैरिफ लगाते रहा, संसद इस पर कुछ न कर सकी, और अमरीकी सुप्रीम कोर्ट को इसके खिलाफ एक फैसला देना पड़ा कि ट्रंप जैसे आपातकाल का हवाला देकर यह टैरिफ लगा रहा है, वैसी कोई आपात स्थिति नहीं है। किसी भी देश में जंग से गुजरते हुए नेता का साथ देना एक किस्म की मजबूरी हो जाती है। ऐसे में संसद में लाए गए इस नए प्रस्ताव पर ट्रंप का साथ देना उसकी रिपब्लिकन पार्टी की मजबूरी हो गई थी, जबकि कई रिपब्लिकन सांसद इसके खिलाफ सार्वजनिक बयान दे चुके हैं। अमरीका लगातार चलने वाले ओपिनियन पोल्स का देश है, वहां के ताजा पोल  से पता लगता है कि 59 फीसदी अमरीकी इन हमलों से सहमत नहीं हैं, और सिर्फ एक चौथाई ही इसके साथ हैं। अभी कुल आधा दर्जन अमरीकी सैनिकों के ताबूत देश लौटे हैं, और ट्रंप और उसके मंत्री लगातार यह बोल रहे हैं कि जंग में आगे नुकसान और बहुत अधिक हो सकता है। देखना है कि जिस-जिस शहर या प्रदेश में ये ताबूत पहुंचेंगे, वहां ट्रंप के खिलाफ, जंग के खिलाफ क्या माहौल होगा। फिलहाल तो सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि ट्रंप की ईरान-नीति अमरीका को गुलाम बना रही है, जैसाकि जॉर्ज वॉशिंगटन ने चेताया था। संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता ने कहा है कि ट्रंप प्रशासन की ईरान पर दी गई जानकारी पूरी तरह नाकाफी थी, वे जंग की जरूरतों, और उसके मकसद को साफ बता भी नहीं पाए। एक सांसद ने कहा कि अमरीका सबसे पहले का नारा लगाकर जो ट्रंप सत्ता पर आया, उसने अमरीका को ऐसे गैरजरूरी जंग में फंसा दिया है। पूर्व उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस ने कहा है कि ट्रंप ने अमरीका को ऐसी जंग में घसीट दिया है जिसे लोग नहीं चाहते। सैनिकों की जान खतरे में हैं, और यह चुनावी जंग है। उल्लेखनीय है कि अमरीका में अगले कुछ महीनों में मध्यावधि चुनाव होने हैं, जो कि सरकार के लिए बहुत ही नाजुक हैं। जंग के बारे में यह माना जाता है कि उस दौरान कोई चुनाव होने पर सरकार के मुखिया को इसका फायदा होता है। ट्रंप की सबसे बड़ी समर्थक मीडिया, फॉक्स न्यूज के करवाए गए ओपिनियन पोल में भी सिर्फ एक चौथाई लोग जंग के समर्थक मिले हैं। एक दूसरे पोल में ट्रंप की सत्तारूढ़ पार्टी रिपब्लिकन में भी 55 फीसदी ही जंग के साथ हैं, और 42 फीसदी उससे असहमत हैं।

आज ट्रंप ने अपनी टैरिफ-दीवानगी से हजार कदम आगे बढक़र मध्य-पूर्व को एक भयानक अस्थिरता में झोंक दिया है, और पूरी दुनिया को पेट्रोलियम की महंगाई में। अमरीका की खबरें हैं कि जंग से तेल के दाम दोगुने हो गए हैं, वैसे भी टैरिफ की मार से हर अमरीकी परिवार पर बोझ बढ़ गया था। यह नरपिशाच अमरीकी जनता का चुना हुआ है, और इसकी कुछ सजा तो उन्हें मिलनी ही थी, लेकिन वह जनता भी इतनी बड़ी सजा की हकदार तो नहीं ही थी। 

(Daily Chhattisgarh)            

हर बार खुदकुशी से उठते कई सवाल, और ढूंढते हुए तो दिखते नहीं कोई भी...

03 मार्च 2026 

 

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में सूरजपुर जिले में होली के एक दिन पहले ही बड़ा बुरा हादसा हुआ। एक नौजवान ने अपनी फसल को जानवरों से बचाने के लिए किनारे बाड़ में बिजली का करंट दौड़ा दिया था। इससे उसी का चचेरा भाई करंट लगने से मर गया। जब इसे लेकर उसे लगा कि घरवाले उसे कभी माफ नहीं करेंगे, या शायद उसके साथ हिंसा होगी, तो उसने तकलीफ और दहशत दोनों से गुजरते हुए खुदकुशी कर ली। एक दिन के भीतर एक परिवार के दो चचेरे भाई इस तरह चल बसे। इस घटना को लेकर दो-तीन पहलुओं से सोचने की जरूरत है। पहली बात तो यह कि फसल बचाने के लिए आज जिस तरह लोग खेतों के चारों तरफ बिजली का करंट दौड़ाते हैं, उसका क्या इलाज है? फसल को बचाना भी जरूरी है, और यह गैरकानूनी तरीका जानलेवा रहता है। कुछ जानवर भी इससे मरते होंगे, लेकिन बीच-बीच में इंसान भी इससे मारे जाते हैं। जानवरों की बढ़ती हुई दखल से किस तरह फसल और इंसान को बचाया जाए, यह सोचना जरूरी है। लेकिन इस घटना के एक पहलू और है, और वह यह है कि किसी दुख-तकलीफ या डर की वजह से लोगों का खुदकुशी करना। अब खेती-किसानी करने वाला नौजवान कोई बहुत निराश रहा हो, ऐसा तो नहीं लगता है। एक सेहतमंद दिल-दिमाग का नौजवान ऐसे हादसे से डरकर खुदकुशी कर ले, उससे यह भी समझ पड़ता है कि समाज के लोगों में किसी सदमे या हादसे से जूझने की दिमागी तैयारी नहीं है। लोग सौ किस्म की छोटी-बड़ी बातों को लेकर खुदकुशी कर रहे हैं, और हम हर बार कुछ बुनियादी मुद्दों को लेकर यह सलाह दोहराते हैं कि समाज में सरकार और लोगों को मिलकर परेशान लोगों के मानसिक परामर्श का इंतजाम करना चाहिए।

अभी पिछले ही महीने की बात है कि दो-चार दिन के भीतर ही एक जिले कोरबा में चार छात्रों ने खुदकुशी कर ली थी। उनकी वजहें अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन सारे के सारे स्कूली बच्चे थे। इस उम्र के बच्चे अगर जिंदगी से इतना निराश हो जाते हैं, तो उनके मानसिक विकास में सुधार की जरूरत है। इससे जुड़े हुए फिर कुछ पहलू सामने आते हैं। आज स्कूली उम्र से ही लडक़े-लड़कियों में मोबाइल और सोशल मीडिया के चलते असल जिंदगी से कटना हो जाता है। उनके आसपास असली दोस्त कम रह जाते हैं, और ऑनलाईन दोस्त अधिक। फिर यह भी होता है कि लगातार सोशल मीडिया और मोबाइल फोन के चलते बच्चे या बड़े भी अपने परिवारों से कटने लगते हैं, और किसी मानसिक सहारे की नौबत आने पर उनके पास कोई नहीं बचते। यहीं पर यह फर्क समझने की जरूरत है कि ऑनलाईन दोस्तियां मौज-मस्ती के लिए अधिक रहती हैं, ऑनलाईन अगर कोई मोहब्बत भी लगती है, तो वह मोहब्बत न होकर कुछ वक्त के लिए दिल लगाने सरीखा रहता है। ऐसे में जब भावनात्मक सहारे की जरूरत रहती है, तो जरूरी नहीं है कि कोई हमदर्द और राजदार दर्जे का कोई दोस्त ऑनलाईन उपलब्ध हो। इसलिए हर किसी को यह समझने की जरूरत है कि ऑनलाईन-डिजिटल जिंदगी असल जिंदगी का कोई विकल्प कभी नहीं बन सकती। 

यह भी समझने की जरूरत है कि जब कोई जिंदगी से निराश हो, उस वक्त उसे हौसला किसी इंजेक्शन की तरह तुरंत नहीं दिया जा सकता। अगर कोई समय रहते परिवार की जानकारी में बहुत निराश हो, और परिवार किसी परामर्शदाता तक ले जाने की हालत में हो, और परामर्शदाता आसपास कहीं मौजूद हो, तो हो सकता है कि निराश व्यक्ति को कुछ हौसला मिल सके। लेकिन अधिकतर मामलों में होता यही है कि परिवार के लोगों को भी अपने सदस्य की निराशा का अंदाज नहीं लग पाता, समझ पड़ता है तो उन्हें आसपास कोई परामर्शदाता नहीं दिखते, और अगर वे रहते भी हैं, तो भी उनकी फीस इतनी अधिक रहती है कि उच्च-मध्यम वर्ग के लोगों पर भी वह बोझ बन सकती है। ऐसे में सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह बड़े पैमाने पर परामर्शदाताओं को उपलब्ध कराए। हम कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि जिस तरह स्कूलों में पढ़ाने के लिए बीएड जैसी डिग्री एक अनिवार्य योग्यता रखी गई है, उसी तरह प्रदेश के स्कूली शिक्षक-शिक्षिकाओं को मानसिक परामर्श का एक कोर्स करवाना चाहिए, ताकि वे अपने स्कूल के स्तर पर ही बच्चों के व्यक्तित्व विकास में आत्मविश्वास पैदा कर सकें। इसके अलावा ऐसे परामर्शदाता स्कूली बच्चों की किसी उलझन को सुलझाने में भी काम के साबित हो सकते हैं। आज तो हमारी जानकारी में लाखों रूपए सालाना की फीस वाली स्कूलों में भी गिनी-चुनी स्कूलों में ही ऐसे परामर्शदाता हफ्ते में कुछ घंटों के लिए आते हैं। इस बात को अधिक व्यवस्थित और योजनाबद्ध बनाने की जरूरत है ताकि कोई बच्चे गहरी निराशा में फंसने के पहले ही मदद पा सकें। इसके लिए सरकार अपने शिक्षकों को एक अतिरिक्त भत्ता भी दे सकती है, और हम पहले भी सुझा चुके हैं कि राज्य के हर विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभागों में परामर्शदाता के ऐसे एक या दो साल के कोर्स शुरू करना चाहिए, और जब तक आबादी के अनुपात में इनकी एक संख्या तैयार न हो जाए, तब तक यह कोर्स चलाना चाहिए। इसके बाद भी जैसे-जैसे आबादी बढ़ती है, वैसे-वैसे परामर्शदाता भी बढ़ते चलें, वे हर शहर-कस्बे की स्कूलों में तैनात किए जाएं, और जनकल्याणकारी सरकार तो यह भी कर सकती है कि ऐसे शिक्षकों को एक भत्ता देकर स्कूल से परे के लोगों के परामर्श का भी जिम्मा दे सकती है। जिस तरह कुछ शिक्षकों को योग का, कुछ शिक्षकों का किसी और गतिविधि का जिम्मा दिया जाता है, उसी तरह प्रशिक्षित शिक्षकों को परामर्श का जिम्मा देकर सरकार न सिर्फ हर बरस दर्जनों जिंदगियों को बचा सकती है, बल्कि आत्मविश्वास पैदा करके हर बरस दसियों हजार बच्चों को एक बेहतर मानसिक स्थिति भी दे सकती है। 

यह पूरा सिलसिला समाज के भीतर से निराशा को दूर करने का है। एक जवान लडक़ा भाई के गुजर जाने से सदमे और दहशत में इस तरह खुदकुशी कर ले, ऐसी नौबत नहीं आनी चाहिए। स्कूली जिंदगी से ही बच्चों में अगर आत्मविश्वास बढ़ाया जाएगा, तो आगे चलकर वे जिंदगी के बहुत सारे हादसों को पार करने के लिए बेहतर तैयार रहेंगे। समाज के लोगों को भी सरकार पर यह दबाव बनाना चाहिए कि वह इस तरह की तैयारी करे। 

(Daily Chhattisgarh)          

दीवारों पर लिक्खा है, 03 मार्च 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

अपना अस्तित्व ही अधर में हो तो कौन से देश दुनिया के दादा को आईना दिखाएं?

02 मार्च 2026 

 

यूक्रेन पर रूसी हमले को जंग में तब्दील हुए पांच बरस पूरे हो गए, रूस यह मानकर चल रहा था कि यूक्रेन को जीतना गुपचुप खाने की तरह होगा, बस उठाया और मुंह में रख लिया। लेकिन एक मामूली टी-शर्ट और जींस पहने हुए यूक्रेनी राष्ट्रपति जिस अंदाज में गैरबराबरी की इस जंग में डटा हुआ है, वह देखना गजब का है। दुनिया के कई देश भारत से यह उम्मीद कर रहे थे कि वह इन दोनों देशों के बीच बीच-बचाव करने की कोशिश करेगा, लेकिन भारत के रूस के साथ हर किस्म के हित इतने जुड़े हुए हैं कि भारत इस विवाद में पंच परमेश्वर नहीं बन सकता था। और ऐसी दिक्कत महज भारत के साथ नहीं है, आज बहुत से अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर दुनिया के अधिकतर देशों के सामने नैतिकता का तकाजा कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि देशों की सरकारें और वहां की लीडरशिप अगले चार या पांच बरस के अस्तित्व की मोहताज रहती हैं, और उससे अधिक दूर का देखना, महानता हासिल करने की कोशिश करना आत्मघाती हो सकता है। आज जब अमरीका और इजराइल एकजुट होकर ईरान पर टूट पड़े हैं, और ईरान ने हाल के बरसों का अपना सबसे बड़ा नुकसान फौजी हमलों में झेला है, तो दुनिया के देशों के सामने यह चुनौती भी है कि वे किसका कितना साथ दें। अमरीका के दो सबसे बड़े दुश्मनों, और अलग-अलग वजहों से प्रतिद्वंद्वियों, रूस और चीन ने भी आज इस लड़ाई में ईरान के साथ जुबानी एकजुटता से अधिक कुछ नहीं दिया है। 

आज दुनिया के देशों की नौबतों को समझना होगा। कई दशक पहले दुनिया एक से अधिक ध्रुवों में बंटी हुई थी, अमरीका और पश्चिम के नाटो-देश अलग थे, लेकिन गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शक्ल में अमरीका से परे भी एक बड़ा गठबंधन था, या एकजुटता थी। धीरे-धीरे सोवियत संघ के विघटन के बाद यह खेमा कमजोर होते चले गया, और पूरी दुनिया अमरीका के इर्द-गिर्द घूमने वाली एकध्रुवीय व्यवस्था हो गई। इसके साथ-साथ अमरीका ने फौजी गठबंधनों से लेकर दुनिया भर में अमरीकी मदद, और कूटनीतिक कोशिशों का एक ऐसा जाल बिछाया जिससे कि वह अपनी आर्थिक और फौजी ताकततले सबको ढांककर चल रहा था। यह तो दुनिया के लिए काले बादलों में भी रौशनी की एक किरण सरीखी है कि ट्रम्प की बददिमागी और बेदिमागी की वजह से योरप अपने पैरों पर खड़ा हो रहा है, भारत अब योरप और चीन के साथ नए किस्म के समीकरण बना रहा है, और बाकी की दुनिया भी ट्रम्प के अमरीका के बिना अपने दम पर जीने की कोशिश कर रही है, इस मुश्किल काम को सीख रही है। ऐसे में ट्रम्प की टैरिफ-सनक को झेल चुके देश अब अमरीकाविहीन विश्वव्यवस्था की संभावनाओं को भी कुछ हद तक तो देख ही रहे हैं। 

लेकिन आज जब ईरान के साथ परमाणु हथियार रोकने की बातचीत अंतरराष्ट्रीय निगाहों के सामने ही एक किनारे पहुंच रही थी, जब अमरीका पूरी तरह ऐसे किसी संभावित समझौते को लेकर ईरान के साथ बात कर रहा था, कुछ मध्यस्थ देश भी इसकी कोशिश कर रहे थे, तब अचानक ही अमरीका और इजराइल ने जिस तरह ईरान पर हमला किया है, वह परले दर्जे की घटिया दगाबाजी है कि एक तरफ बातचीत का नाटक जारी रखो, और दूसरी तरफ जाकर बमबारी कर दो। हम इस बारे में कल ही काफी कुछ लिख चुके हैं, और उन बातों को यहां दोहराने के बजाय आज की विश्वव्यवस्था के बारे में ईरान के खास संदर्भ में बात आगे बढ़ाना चाहते हैं। 

भारत में नेहरू और इंदिरा से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक तमाम सरकारें फिलीस्तीनियों के हक के लिए डटकर खड़ी रहने वाली रहीं। पिछली यूपीए सरकार के दौरान उदार अर्थव्यवस्था के हिमायती प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमरीकी असर में, और एक होशियार ग्राहक की तरह इजराइल की तरफ झुकते चले गए, और भारत की आजादी के पहले से चली आ रही विदेश नीति, और अंतरराष्ट्रीय नीति को उन्होंने किनारे बिठा दिया था। भारत इजराइल के कुल निर्यात के शायद 50 फीसदी से अधिक का ग्राहक है, ऐसे में इजराइल के लिए भारत का बहुत अहमियत रखना तो समझ आता है, लेकिन भारत के लिए इजराइल के मोहताज होने की कोई बात नहीं है। अमरीका पर भी भारत के इतने मोहताज होने की कोई बात ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के पहले तक नहीं थी, इसलिए भारत को, मनमोहन सिंह और नरेन्द्र मोदी को अंतरराष्ट्रीय इंसाफ की वजह से, और भारत की ऐतिहासिक नीतियों की वजह से भी फिलीस्तीनियों के जायज हक का जो साथ देना था, वह भारत ने नहीं दिया, और वे दुनिया के एक सबसे बड़े गुंडे और मुजरिम इजराइल के बगलगीर होते रहे। अब जब गुंडे से यारी हो ही गई है, तो आज तो ट्रम्प के टैरिफ, और दूसरे कई किस्म के दबावों के चलते भारत ने अपने दशकों पुराने दोस्त ईरान के हक में एक बयान तक नहीं दिया है। 

हम इस पर हैरान इसलिए नहीं हैं कि आज दुनिया के अधिकतर देशों में सरकारों की विदेश नीति, उनकी घरेलू चुनौतियों से तय होती हैं। यह बात योरप के देशों में शरणार्थियों, और प्रवासियों को लेकर देखने में आती है, और दूसरे कई मुद्दों को लेकर भी। आज दुनिया के किसी भी देश में कोई पार्टी ऐसी नहीं है जो कि अंतरराष्ट्रीय इंसाफ की बात करते हुए कोई ऐसा फैसला ले, या ऐसी कार्रवाई करे, जो कि उनके अपने देश में उनके परंपरागत मतदाताओं, या बहुसंख्यक तबके को पसंद न आए। आज हर पार्टी को अपने देश-प्रदेश के माहौल को देखते हुए ही दरियादिली, या महानता दिखाने का फैसला लेना पड़ता है। आज राजनीतिक और चुनावी दबावतले सरकारों की नैतिकता दम तोड़ देती है। वैसे भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों में, विदेश नीति में नैतिकता का कोई काम नहीं होता है। जब देशों को कोई नैतिकता का तकाजा देते हैं, तो वे, मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है, के अंदाज में जवाब देने लगते हैं। आज हर देश के सामने राजनीतिक दलों के अस्तित्व का सवाल भी रहता है, और देशों की अपनी अर्थव्यवस्था, उनकी रणनीतिक जरूरतें, और दुनिया के चुनिंदा देशों के साथ अपनी निजी फायदे के रिश्ते जैसे कई पहलू जुड़े रहते हैं। भारत न उनसे अछूता है, न किसी भी किस्म से अनूठा है। आज दुनिया में नेताओं के महान बनने का चलन खत्म हो चुका है। आज ट्रम्प जैसे गुंडे-मवाली फौजी और कारोबारी ताकत से दुनिया के डॉन बनने की कोशिश में लगे दिखते हैं, इनके बीच में अब विश्व स्तर के महान नेताओं की इतिहास की महान परंपरा की कोई जगह नहीं है। लोग अपना घर बचाने, अपने आपको बचाने में कामयाबी को ही आखिरी मकसद मानकर चलते हैं। ऐसे में सबसे बड़े गुंडे के हमले के निशाने पर जो है, उसके अलग-थलग रह जाने का खतरा बहुत बड़ा है। अब लोगों को यह परवाह भी नहीं है कि दुनिया का दादा एक-एक करके देशों को कुचलते हुए जिस दिन उनकी दहलीज पर आकर खड़ा हो जाएगा, तब क्या होगा। उतने वक्त बाद की भी फिक्र करने का चलन अब खत्म हो गया है, और लोग अपने बकाया कार्यकाल से परे का कुछ नहीं सोचते। इसलिए आज की दुनिया में, और उससे, इंसाफ की अधिक उम्मीद करना कुछ अधिक ही मासूमियत की बात होगी। लोग मवाली के गिरोह में शामिल होकर किसी बेकसूर पर हमला करने से इंकार कर सकें, वह भी आज के पैमानों से कोई छोटी बात नहीं होगी। दुनिया में आज हर किसी को इस जंगलराज के नियम समझ आ गए हैं कि सबसे ताकतवर को ही सबसे आखिर तक जिंदा रहने का हक है। 

(Daily Chhattisgarh)          

दीवारों पर लिक्खा है, 02 मार्च 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

बेकसूर देशों पर हमले का अमरीकी इतिहास, लेकिन इस बार एपस्टीन...

1 मार्च 2026

आज जिस वक्त मैं यह लिखने बैठा हूं, ईरान पर अमरीकी और इजराइली हमले चल रहे हैं। मुस्लिमों के लिए रमजान का महीना चल रहा है, जो उनके लिए साल का सबसे पवित्र त्यौहार रहता है, और ऐसे में जगह-जगह लाशें बिखरी हुई हैं। ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता, और सरकार के नीति निर्धारक आयतुल्लाह अली खामेनेई की अमरीकी बमबारी में मौत हो चुकी है, और अपने करीब आधा लाख सैनिकों की खाड़ी के देशों में मौजूदगी को भी खतरे में डालकर अमरीकी इस जंग को आगे बढ़ाते चल रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में अपने पिछले एक राष्ट्रपति बराक ओबामा की ईरान के साथ की गई परमाणु संधि को तोड़ दिया था, और इसके साथ ही  अब ईरान पर हमला करने के लिए उसने एक बहाना ढूंढ लिया था। जबकि अमरीकी खुफिया मामलों की मुखिया, ट्रम्प की करीबी, तुलसी गेबार्ड का ताजा बयान है कि ईरान परमाणु बम बनाने के करीब पहुंचा हुआ हो, ऐसे कोई संकेत या खुफिया जानकारी नहीं है। 

अमरीका के इतिहास को देखें, तो आज सुबह वहां के एक डेमोक्रेटिक सांसद बर्नी सैंडर्स का ताजा बयान देखने की जरूरत है जिन्होंने ईरान पर किए गए अमरीकी हमले का खुला विरोध करते हुए कहा है कि ट्रम्प को एक और बेदिमाग जंग अमरीकी जनता पर थोपने का मौका नहीं देना चाहिए। उन्होंने अमरीकी हमले को लेकर कहा है- अमरीकी जनता को वियतनाम के बारे में झूठ कहा गया, उसे इराक के बारे में झूठ कहा गया, और उसे आज फिर ईरान के बारे में झूठ कहा जा रहा है। इन सबके दाम आम अमरीकी नागरिक चुकाएंगे। उन्होंने इस अमरीकी हमले को एक पूरी तरह से गैरकानूनी, और असंवैधानिक ठहराया है, और कहा है कि अमरीकी संविधान इस बारे में एकदम साफ है कि कोई राष्ट्रपति अपनी मनमानी से जंग शुरू नहीं कर सकता, यह हक अमरीकी संसद के पास है। उन्होंने सांसदों से अपील की कि तुरंत ही संसद का सत्र बुलाया जाए, और जंग के अधिकार के लंबित प्रस्ताव पर वोट करवाया जाए। उन्होंने कहा कि यह हमला अंतरराष्ट्रीय कानूनों के एकदम खिलाफ है, और सर्वशक्तिमान की मनमानी कोई जायज हक नहीं रहती। उन्होंने साफ-साफ कहा कि ट्रम्प को अमरीका को ऐसे बेदिमाग जंग में घसीटने की इजाजत नहीं देना चाहिए। 

मैं अभी ईरान के ताजा तनावों तक इस बात को सीमित रखना नहीं चाहता। अमरीका के हमलावर इतिहास पर एक नजर डालने पर साफ दिखता है कि दुनिया के किसी देश में साम्यवाद पनप न सके, जम न सके, या बढ़ न सके, इसलिए अमरीका ने जाने कितने ही फौजी हमले किए। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के शीत युद्ध के दौरान अमरीका ने वियतनाम पर हमला किया, और उस पर द्वितीय विश्वयुद्ध से भी ज्यादा बम बरसाए। एक अंदाज यह है कि 25-30 लाख वियतनामी लोग मारे गए, और अमरीका ने नापाम बम से लेकर एजेंट ऑरेंज तक रासायनिक हथियार इस्तेमाल किए, जिससे आज भी वहां पैदा होने वाली पीढ़ी बहुत बुरी तरह शारीरिक दिक्कतों के साथ पैदा हो रही है। दस बरस से ज्यादा की इस जंग में अमरीका आधा लाख से अधिक सैनिकों को खोकर, हारकर पीछे हटा। कम्युनिज्म रोकने के बहाने से अमरीका ने वियतनाम पर हमला किया था, जो कि इसलिए नाजायज था कि वियतनाम ने कभी अमरीका पर हमला नहीं किया था। 

इस दौरान अमरीका ने अड़ोस-पड़ोस के देशों पर खूब बमबारी की, लाओस पर अमरीका ने 20 लाख टन बम बरसाए, जिसमें वहां के दो लाख से अधिक नागरिक मारे गए। कम्बोडिया पर अमरीका ने पांच लाख टन बन बरसाए, और वहां भी दो-तीन लाख लोग मारे गए। ये देश अमरीका के लिए कोई खतरा नहीं थे, इन पर हमला पूरी तरह नाजायज और गैरजरूरी दोनों ही था। इसी तरह उत्तर और दक्षिण कोरिया के आपसी संघर्ष में अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र के बैनरतले फौजी कार्रवाई की, जिसमें 20-30 लाख कोरियाई नागरिक मारे गए। 

ईरान में अमरीकी दखल का एक पुराना इतिहास भी है। 1953 में सीआईए ने वहां के प्रधानमंत्री को उखाड़ फेंका, क्योंकि उसने एक ब्रिटिश ऑयल कंपनी का राष्ट्रीयकरण किया था जिससे अमरीकी कारोबारी हितों को नुकसान पहुंचा था। इसके बाद अमरीका ने अपने पिट्ठू शाह मोहम्मद रजा पहलवी को वहां सत्ता पर स्थापित किया, लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति में वहां से शाह और अमरीका दोनों को उखाड़ फेंका। लोगों को 2003 में अमरीका के इराक पर हमले को याद रखना चाहिए जिसमें अमरीका ने यह झूठा दावा किया था कि सद्दाम हुसैन के पास जनसंहार के हथियार हैं। बाद में जब अमरीका ने इराक पर कब्जा किया, सद्दाम हुसैन को एक फर्जी अदालती सुनवाई का नाटक करते हुए मार डाला, तब जाकर यह पता लगा कि इराक के पास एक मुर्गी मारने जितना भी जनसंहार का हथियार नहीं था। यह पूरा हमला इस इलाके को अस्थिर करने के लिए, और तेल के कारोबार पर कब्जा करने के लिए किया गया था। 

न्यूयॉर्क पर ओसामा-बिन-लादेन के हवाई हमले के बाद अमरीका ने अफगानिस्तान में तालिबानों पर हमला किया, 2001 से 2021 तक वहां अपना फौजी कब्जा रखा, लेकिन ढाई हजार अमरीकी सैनिकों, और ढाई लाख अफगानी लोगों की मौत के बाद अमरीका अफगानिस्तान को छोडक़र जान बचाकर भाग निकला। न्यूयॉर्क पर हमला अल-कायदा ने किया था, न कि अफगानिस्तान ने, और अब यह पूरा देश तबाह करके अमरीका तो भाग गया, लेकिन वहां की महिलाओं की जिंदगी 20 बरस पहले के मुकाबले भी नर्क हो गई है। 

अमरीका के हमलों, और सरकार पलटने की लिस्ट बहुत लंबी है। वह लीबिया, सीरिया, यमन, ग्वाटेमाला, चीली, निकरागुआ, सोमालिया, ग्रेनाडा,  पनामा, और अब वेनेजुएला तक बिखरी हुई है। इनमें से किसी भी जगह अमरीकी हमलों ने उस देश का भला नहीं किया, वहां की जनता को कोई बेहतर सरकार नहीं दी, सिर्फ अपनी गुंडागर्दी दिखाई, उस देश के वामपंथ को खत्म करने की कोशिश की, या वहां के प्राकृतिक साधनों पर कब्जा करने की। लोग अब याद कर रहे हैं कि अमरीका ने किस तरह दुनिया पर ऐसे बम बरसाए, जो कि इतिहास में सिर्फ उसी ने बरसाए हैं। लोगों को हिरोशिमा-नागासाकी कैसे भूल सकता है? 

दुनिया का यह सबसे बड़ा गुंडा अब फिर चारों तरफ कारोबारी, और फौजी मोर्चे पर परले दर्जे की गंडागर्दी कर रहा है, और बदअमनी से दुनिया में लाखों जिंदगियां छीन रहा है। मध्य-पूर्व और खाड़ी के देशों में वह अपने गिरोह के उस इलाके के रंगदार, इजराइल को बढ़ावा देने के लिए ईरान पर यह ताजा हमला कर रहा है, और जिस मौके पर मुस्लिम देशों में धार्मिक भावनाएं उभार पर रहती हैं, ट्रम्प बम बरसा रहा है। 

अभी कुछ महीने पहले ही ईरान के परमाणु ठिकानों पर बरसाए गए बमों की तबाही से ईरान अभी उबरा भी नहीं था, कि यह ताजा हमला ट्रम्प ने कर दिया। इस बारे में यह समझने की जरूरत है कि एपस्टीन फाइल्स में नाबालिग लड़कियों के साथ सेक्स को लेकर ट्रम्प का नाम जितने खुलासे से हजारों बार सामने आ रहा है, उस तरफ से ध्यान बंटाने के लिए ट्रम्प के इस पास इस बमबारी के अलावा और कोई दूसरा जरिया भी नहीं था। पहले ही दिन की बमबारी में ईरान में बच्चियों के एक स्कूल पर बम बरसाए गए हैं, जिनमें सौ-पचास छोटी-छोटी बच्चियों की मौत हो चुकी है। इस सिलसिले को इसी तरह समझने की जरूरत है कि एक बलात्कारी खबरों से अपने नाम को हटाने के लिए सैकड़ों और हजारों मौतों की मदद ले रहा है कि वे खबरें तो उसके अपने सेक्सकांड की खबरों को दबा ही देंगी।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 01 मार्च 2026


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दीवारों पर लिक्खा है, 28 फरवरी 2026


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नौजवान हसरतों को कुचलने बनते कानूनों के लंबे वक्त के नुकसान

01 मार्च 2026 

 

गुजरात सरकार ने अभी राज्य के विवाह पंजीयन कानून-2006 में एक संशोधन का प्रस्ताव किया है जिसमें बालिगों की शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए मां-बाप को सूचना, और उनकी सहमति को अनिवार्य बनाया जा रहा है। उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने विधानसभा में कहा कि यह बदलाव लव-जिहाद जैसे मामलों को रोकने के लिए है जिनमें राज्य की बेटियों को फंसाया जाता है। प्रस्तावित नियमों में मैरिज-रजिस्ट्रेशन के लिए जोड़े को आवेदन में मां-बाप के नाम-पते, आधार कार्ड और संपर्क की जानकारी के साथ-साथ यह हलफनामा भी देना होगा कि मां-बाप को शादी की जानकारी दी गई है या नहीं। इसके बाद विवाह-पंजीयक मां-बाप को नोटिस भेजेगा, और 30 दिनों की जांच अवधि रहेगी। यह याद रखने की बात है कि दो धर्म के लोगों के बीच शादी के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 में पहले से 30 दिनों के पब्लिक नोटिस का नियम है, लेकिन उसमें भी मां-बाप की सहमति जरूरी नहीं थी। अब नए नियमों के तहत तो बालिग लोगों के किसी भी धर्म या जाति के पंजीयन के लिए उनके मां-बाप को नोटिस भेजा जाएगा। पहली नजर में ही यह दिखता है कि यह संशोधन अगर सिर्फ विधर्मियों के बीच शादी पर लागू करना रहता, तो वह स्पेशल मैरिज एक्ट पर लागू किया जाता, लेकिन यह तो किसी भी तरह के विवाह के पंजीयन के 2006 के कानून में किया जा रहा संशोधन है जिसका मतलब है कि एक धर्म के भीतर के विवाह भी तभी हो सकेंगे, जब बालिगों के मां-बाप को खबर होगी। जाहिर है कि मां-बाप असहमत रहने पर अगले 30 दिन में जो कर सकते हैं, वह देश भर में जगह-जगह होने वाली ऑनर-किलिंग से अधिक और कैसे साबित हो सकता है? 

आज देश के कई प्रदेशों में ऐसे कानून बनाए जा रहे हैं जो कि संसद द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय कानूनों को धकेलकर बन रहे हैं। इसके बाद इनकी संवैधानिकता को चुनौती देने की लंबी पहाड़ी चढ़ाई लोगों को चढऩी पड़ती है, और राज्यों के कई कानूनों को खारिज करने में अदालत को बरसों लग जाते हैं। गुजरात के संदर्भ में यह बात भी देखने की जरूरत है कि सरकार विधानसभा में जिसे लव-जिहाद कह रही है, उसे रोकने के लिए 2021 में वहां धार्मिक स्वतंत्रता कानून में संशोधन करके ‘लव-जिहाद’ को दंडनीय बनाया है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती के बाद भी लागू रखा है। अब ऐसा अंदाज है कि यह ताजा संशोधन उसी कानूनी अभियान का अगला कदम है जो कि धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के लिए है, और उसके साथ-साथ सभी तरह की अंतरजातीय शादियों को रोकने के लिए भी। गुजरात में आज भी अंतरजातीय शादियां बहुत कम हैं, विवाह-पंजीयन के नए कानून जब मां-बाप को पहले से खबर करने का हलफनामा भरवाएंगे, तो जाहिर है कि प्रेम विवाह और कम हो जाएंगे। जबकि पूरे देश के अलावा गुजरात में भी 1990 से ही अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन योजना चल रही है जिसके तहत अंतरजातीय, और अंतर-धर्म शादियों पर 50 हजार रूपए नगद प्रोत्साहन का प्रावधान है। अब वैसा प्रावधान तो किनारे धरा रह गया, अब मां-बाप की अनुमति अनिवार्य होने से सरकार का यह खर्च होना बंद सा हो जाएगा। 

दो अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच शादी को लेकर बड़ा साम्प्रदायिक तनाव देश के कई राज्यों में आम बात हो गई है। ऐसे में जब बालिग जोड़े पर कई और तरह के नियम लादे जा रहे हैं, तो उससे यह बात साफ है कि यह बालिग नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों को कुचलने के अलावा कुछ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के कई तरह के फैसले यह बार-बार स्थापित कर चुके हैं कि बालिग जोड़े अपनी मर्जी से किसी भी धर्म या जाति में शादी कर सकते हैं, या बिना शादी किए भी साथ रह सकते हैं। आज देश में, खासकर उत्तर भारत और हिन्दीभाषी प्रदेशों में यह तनाव सामने आ रहा है कि साथ रहते हुए दो अलग-अलग जातियों के जोड़ों पर कुछ धार्मिक और साम्प्रदायिक संगठन हमले करते हैं। कुछ ताजा हमले तो इसी सार्वजनिक रेस्त्रां में चल रही ऐसी जन्मदिन की दावत पर हुए हैं जिनमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के बालिग सहकर्मी शामिल थे। ऐसे में किसी राज्य में अगर मां-बाप को 30 दिन पहले खबर देकर उनकी अनुमति या सहमति लेने को अनिवार्य कर दिया जाएगा, तो इतना मौका साम्प्रदायिक संगठनों को लाठियों में लगे हुए तेल को बालिग बदनों पर उतारने के लिए काफी होगा। 

देश में बात अब सिर्फ साम्प्रदायिकता की नहीं रह गई है, हिन्दुत्व के सनातनी संस्करण को लागू करने की जिद ने हिन्दू धर्म के भीतर की जातियों में भी बड़ा भेदभाव खड़ा कर दिया है। फिर यह भी है कि किसी देश में लव-जिहाद एक नारे के लिए तो ठीक है, लेकिन उसकी गिनती का हिन्दुओं के भीतर अंतरजातीय शादियों से कोई मुकाबला नहीं है। गुजरात का यह नया कानून, या बाकी प्रदेशों में इस तरह बने हुए, या बनने जा रहे कानून सिर्फ एक धर्म को दूसरे धर्म से नहीं बचाएंगे, वे एक जाति को दूसरी जाति से भी ‘बचाएंगे’। यह रक्तशुद्धता की सोच भारत में पहरावे, खानपान, भाषा, संस्कृतियों, उपासना पद्धतियों जैसी कई बातों पर हावी होती जा रही है। देश की तीन चौथाई से अधिक की आबादी मांसाहारी है। इसमें हिन्दुओं की भी आधी या पौनी आबादी मांसाहारी है। दलित और आदिवासी तकरीबन सौ फीसदी मांसाहारी हैं। इसके बावजूद एक छोटे तबके की शाकाहार की सोच को दूसरे तबकों पर हिंसा के दम पर थोपा जा रहा है। यह सिलसिला जब देश और प्रदेशों में तरह-तरह के कानून बनाकर धार्मिक स्वतंत्रता, अंतरजातीय स्वतंत्रता, खानपान जैसी सांस्कृतिक और सामाजिक स्वतंत्रता तक पहुंच जाता है, तो देश को एक रखने के अनगिनत नारों के बावजूद उनसे देश बंटने लगता है। लोगों को दूसरों की आजादी को कुचलने के अपने हक की अपनी आजादी की सीमाओं को समझना होगा। इतना शुद्धतावादी नजरिया समाज को टुकड़े-टुकड़े में बांट दे रहा है। यह सिलसिला शुरू तो साम्प्रदायिक या जातीय तनाव से होता है, लेकिन इससे जो सामाजिक समरसता खत्म होती है, उससे देश का विकास, पूरी पीढ़ी का व्यक्तित्व विकास, और देश की आर्थिक उत्पादकता जैसे बहुत से पहलू प्रभावित होते हैं। अपनी पसंद से शादी की हसरत रखने वाले नौजवान जोड़ों को नए-नए विवाह-कानूनों में जकडऩे का मतलब उनकी हसरतों को कुचलने के अलावा और कुछ नहीं है। ऐसी कुचली हुई भावनाओं वाली पीढ़ी किसी भी समाज को उसकी संभावनाओं को छूने से रोकेगी ही रोकेगी।

(Daily Chhattisgarh)