सुप्रीम कोर्ट की महिला जज ने वादाखिलाफी पर रेप की रिपोर्ट लिखाने को गलत कहा

 17 फरवरी 2026 

 

देश भर की अदालतों में ऐसे दसियों हजार मामले चल रहे हैं जिनमें किसी लडक़ी या महिला ने यह रिपोर्ट लिखाई है कि किसी युवक या आदमी ने उससे शादी का वायदा करके देह-संबंध बनाए, और बाद में शादी से मुकर गया। ऐसी शिकायत के साथ बलात्कार की रिपोर्ट लिखा देना बहुत आम बात है, और शायद हर राज्य की पुलिस ऐसी शिकायत पर आनन-फानन गिरफ्तारी भी कर लेती है। अभी कुछ बरसों में एक-एक करके देश के कई हाईकोर्ट ने अलग-अलग मामलों में इस बात पर फिक्र भी जाहिर की है कि लंबे वक्त तक देह-संबंध जारी रखने के बाद उसे बलात्कार कहना जायज है या नहीं? हमारे पाठकों में से जो महिलाओं के हक के अधिक हिमायती हैं, वे हमारे रूख से कुछ हैरान-परेशान होते आए हैं क्योंकि हमने बरसों से यह लिखना जारी रखा है कि शादी का वायदा करके किसी से देह-संबंध बनाना, और फिर मर्जी से, या किसी मजबूरी में शादी न करना बलात्कार नहीं होता। उसे अधिक से अधिक वायदाखिलाफी कहा जा सकता है, धोखा कहा जा सकता है, लेकिन वह बलात्कार नहीं होता। यह बात कई लोगों को बड़ी नागवार गुजरती है जो कि महिलाओं के हक के इस हद तक हिमायती हैं कि वायदा तोडऩे पर भी उन्हें बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने का हक होना चाहिए। 

आज सुबह की खबर से हमें कुछ राहत मिली। सुप्रीम कोर्ट में वहां की एक प्रगतिशील महिला जज, जस्टिस बी.वी.नागरत्ना, और उनके साथी जज जस्टिस उज्जवल भुइयां की बेंच ने ऐसे एक मामले में यह कहा कि शादी के पहले लडक़ा और लडक़ी अजनबी होते हैं, इसलिए विवाहपूर्व शारीरिक संबंधों के मामले में सावधानी बरतनी चाहिए। जिस मामले की सुनवाई के दौरान यह बात कही गई, उसमें आरोपी ने जिस लडक़ी से शादी की बात की थी, उसे कथित रूप से शादी का वायदा करके कई बार देह-संबंध बनाए, दुबई बुलाया, और वहां भी संबंध बनाए। जस्टिस नागरत्ना अपने सुलझे हुए, और प्रगतिशील विचारों के लिए जानी जाती हैं, वे सरकार के खिलाफ भी कड़ी टिप्पणी करने से हिचकती नहीं हैं। इस मामले में उन्होंने कहा कि अगर शिकायतकर्ता शादी को लेकर इतनी गंभीर थी तो विवाह से पहले विदेश क्यों गई? उन्होंने यह भी कहा कि बिना औपचारिक वैवाहिक प्रतिबद्धता के, पूर्ण विश्वास खतरनाक हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई लडक़ी या महिला विवाह को लेकर एकदम पक्की सोच रखती है, तो उसे पहले ही सीमाएं तय करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जहां संबंध सहमति से बने हों, हर मामला आपराधिक मुकदमे और सजा तक पहुंचना जरूरी नहीं है, कुछ विवाद व्यक्तिगत संबंधों के टूटने से जुड़े होते हैं, जिन्हें हर बार आपराधिक न्यायप्रक्रिया में नहीं ढाला जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक रिश्तों की जटिलता को समझना जरूरी है, लेकिन जोखिमों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। 

हम सुप्रीम कोर्ट की कई बातों से सहमत रहते हैं, और कई बातों से असहमत भी रहते हैं। इस मामले में अदालत की टिप्पणियों को महिलाविरोधी सोच मानने की कोई वजह नहीं है, क्योंकि एक सुलझी हुई महिला जज इन पहलुओं को उठा रही हैं। हमने पहले भी इस बात की सामाजिक व्याख्या करते हुए लिखा था कि जिंदगी में कई तरह के वायदे टूटते हैं। शादियों के मामले में तो सगाई हो जाने के बाद भी कई शादियां नहीं हो पातीं, और कई किस्म के मतभेद या विवाद की वजह से रिश्ते टूट जाते हैं। फिर इसके बाद शादीशुदा जोड़ों के बीच तलाक तो सामाजिक और अदालती दोनों तरह से मान्यता प्राप्त है। जोड़े पूरी जिंदगी के हिसाब से शादी करते हैं, और न निभने पर वे अलग भी हो जाते हैं। तलाक को देखें तो एक हिसाब से वह शादी के रिश्ते के भीतर भी धोखे सरीखा रहता है, लेकिन इसे बलात्कार का दर्जा नहीं दिया जा सकता। हमने बार-बार यह बात लिखी है कि लोगों को रिश्ते बनाते हुए यह बात सोच लेना चाहिए कि हर वायदा पूरा होने की कोई गारंटी नहीं रहती। लोगों को देह-संबंध बनाते हुए यह पूरी तरह समझ लेना चाहिए कि मामला शादी तक पहुंच भी सकता है, और नहीं भी पहुंच सकता। 

हमने बीते बरसों में ऐसे कई मामले देखे हैं जिनमें किसी लडक़ी या महिला ने किसी आदमी के शादीशुदा होने की बात को पूरी तरह जानते हुए भी उसके साथ प्रेम-संबंध और देह-संबंध बनाए, और बाद में संबंध टूटने पर बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई कि उसने वायदा किया था कि वह अपनी पत्नी से तलाक लेकर उससे शादी कर लेगा। दूसरी तरफ एक शादीशुदा महिला ने एक नौजवान के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई कि उसने शादी का वायदा करके उस महिला से बलात्कार किया। अब यह नौजवान अविवाहित था, वह तो कानूनी रूप से किसी से शादी करने का हकदार भी था, लेकिन यह शादीशुदा महिला तो खुद ही कानूनी रूप से किसी और से शादी नहीं कर सकती थी, इसके बावजूद उसने ऐसी रिपोर्ट लिखाने का हौसला किया था। अब शादी का वायदा करके देह-संबंध बनाने, और फिर वायदा पूरा न करने के दर्ज मामलों की गिनती हिन्दुस्तान में शायद लाखों तक पहुंची हुई है। हर दिन किसी न किसी अखबार में ऐसी खबर रहती है। इसके बावजूद अगर कोई लोग, खासकर बालिग लोग देह-संबंध बनाते हैं, तो हमारा मानना है कि उन्हें यह बात अच्छी तरह मालूम रहती है, और रहना चाहिए, कि शादी हो भी सकती है, और नहीं भी हो सकती। अगर देह-संबंध बनाने हैं, तो किसी वायदे के आधार पर नहीं बनाने चाहिए, शादी की औपचारिकता पूरी हो जाने के बाद बनाने चाहिए, या फिर एक आधुनिक सोच के साथ ऐसे किसी वायदे के बिना बनाने चाहिए, जिसे बाद में बलात्कार करार देने की जरूरत न पड़े। 

हमारा यह भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट को इस तरह के मामलों को लेकर एक व्यापक आदेश जारी करना चाहिए कि दो बालिग लोगों के बीच शादी के वायदे को लेकर अगर देह-संबंध बनते हैं, तो कम से कम इस आधार पर उसे जुर्म करार नहीं दिया जा सकता कि वायदा तोडऩा बलात्कार है। यह सिलसिला बहुत सी लड़कियों, और महिलाओं को एक नाजायज हक देते आया है कि एक रिपोर्ट लिखाकर वे किसी को गिरफ्तार करवा सकती हैं, जेल भेज सकती हैं। ऐसे गलत मामलों की वजह से महिलाओं को खास हिफाजत देने वाले बने हुए कानूनों की साख भी कम होती है, और तमाम महिलाओं की साख पर भी आंच आती है कि वे कानूनों का बेजा इस्तेमाल करती हैं। इस प्रसंग में दहेज प्रताडऩा कानून की चर्चा भी जरूरी है, जिसका व्यापक बेजा इस्तेमाल किया गया है, और अब अदालतों ने यह पाया है कि हर शिकायत असल प्रताडऩा नहीं होती, और ऐसे मामलों में पूरे के पूरे ससुराल की गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। वादाखिलाफी को लेकर अगर किसी तरह की सजा का प्रावधान है, तो वैसे किसी कानून के तहत लडक़ी या महिला शिकायत दर्ज करवाए। अधिक सही बात यह होगी कि जस्टिस नागरत्ना की सलाह पर गौर करके अपनी जिम्मेदारी से ही देह-संबंध बनाए, किसी शादी की उम्मीद से ऐसा करना, और फिर बरसों बाद यह कहना कि बरसों से बलात्कार हो रहा है, यह सिलसिला खत्म होना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)     

वैभव सूर्यवंशी देश को खुश करे, या दसवीं पास करे?

16 फरवरी 2026 

 

भारतीय अंडर-19 वर्ल्ड कप में शानदार बल्लेबाजी से रिकॉर्ड बनाने वाले नए खिलाड़ी वैभव सूर्यवंशी को अब दसवीं का इम्तिहान देना है। जिन लोगों ने उसके मैच देखे हैं, उन्हें कुछ हैरानी होगी कि क्या इतनी कामयाबी के बाद दसवीं का इम्तिहान देना और उसे पास करना जरूरी होना चाहिए, या कि खेल में ऐसी उत्कृष्टता को ही पढ़ाई भी मान लेना चाहिए? वैभव सूर्यवंशी के बारे में मामूली सी सर्च बताती है कि बिहार के समस्तीपुर जिले के ताजपुर/मोतीपुर गांव के एक साधारण किसान परिवार के इस बेटे के पिता खुद भी एक क्रिकेटर बनना चाहते थे लेकिन साधन-सुविधा न होने से नहीं बन पाए। अपने बेटे के सपने पूरे करने के लिए उन्होंने अपने खेत बेच दिए, मां सुबह चार बजे उठकर खाना बनाती थीं, ताकि वे क्रिकेट-प्रैक्टिस के लिए समय पर निकल सकें। अभी की खबर है कि वैभव की क्रिकेट-व्यस्तताओं के चलते उसने तय किया है कि वह इस साल परीक्षा नहीं देगा, और अगले बरस इसमें शामिल होगा।

चीन के बारे में कई बार ऐसी खबरें आती हैं कि वहां खेल संघों के चयन अधिकारी शहर-कस्बों की गलियों में खेलते हुए छोटे-छोटे बच्चों में से ही प्रतिभाओं को पहचानते हैं, और उन्हें परिवार की इजाजत से ले जाकर खेल छात्रावासों में रखकर बरसों तक सिर्फ खेल की तैयारी करवाई जाती है, नतीजा यह निकलता है कि वे किशोरावस्था में ही गोल्ड मैडल लाने लगते हैं। देश के लिए मैडल तो ठीक है, लेकिन ऐसी तैयारी इन बच्चों के विकास के लिए कितनी अच्छी या कितनी बुरी होती है, अभी हम उस पर नहीं जा रहे हैं। अभी हम वैभव सूर्यवंशी जैसे होनहार खिलाडिय़ों पर पढ़ाई और परीक्षा के दबाव को लेकर चर्चा करना चाहते हैं, और दुनिया के कई विकसित देशों में ऐसी खेल प्रतिभाओं के लिए क्या रियायतें रहती हैं, उसे देख रहे हैं।

ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, और अमरीका जैसे विकसित देशों में ऐसे खिलाडिय़ों की ट्रेनिंग की जरूरतें पूरी हो जाने के बाद उनके बचे हुए समय के लिए फ्लैक्सिबल स्कूलिंग का इंतजाम रहता है, जो बाकी समय में पढ़ाई और परीक्षा करवाते हैं। अमरीका जैसे देशों में ऐसे खिलाडिय़ों के लिए ऑनलाइ स्कूलें हैं, जहां की पढ़ाई वे दुनिया के किसी भी कोने में बैठे हुए, खेल की तैयारी करते हुए, या मुकाबलों में शामिल होते हुए कर सकते हैं, इम्तिहान दे सकते हैं। इन देशों में बड़े खेल-क्लब, खेल अकादमियां, और खेल-संघ अपने युवा खिलाडिय़ों के लिए खेल प्रशिक्षकों के अलावा व्यक्तिगत ट्यूशन पढ़ाने वाले शिक्षकों का इंतजाम भी करते हैं, ताकि दोनों में से कोई न पिछड़े। कुछ देश गैप-ईयर, और क्रेडिट-सिस्टम रखते हैं जिसमें ऐसे छात्र-छात्राओं को पढ़ाई कुछ समय के लिए रोक देने, टुकड़ों में पूरा करने जैसी छूट रहती हैं, जिससे वे मानसिक तनाव से मुक्त रहते हैं। बड़े स्कूलों में यह नियम रहता है कि जब खिलाडिय़ों की टीम कहीं बाहर सफर करती है, तो उनके साथ पढ़ाने वाले कोई शिक्षक भी जाते हैं ताकि खाली समय में वे पढ़ा सकें। कहीं-कहीं पर बच्चों को स्कूल न आने की छूट मिलती है, और स्कूल उनके लिए अलग से होमवर्क देता है। जर्मनी में खेल से थके हुए बच्चों को क्लासरूम से छुट्टी मिल जाती है, और बाद में एक्स्ट्रा क्लास लगाकर उसकी भरपाई करवाई जाती है।

भारत में अभी होनहार खिलाडिय़ों के लिए कोई लचीला इंतजाम नहीं किया गया है, और उन्हें खेल या पढ़ाई में से किसी एक को छांटना पड़ता है, या दोनों से समझौता करना पड़ता है। सीबीएसई जैसे कुछ बोर्ड कुछ विशेष अनुमति, अतिरिक्त समय, या वैकल्पिक मूल्यांकन जैसी रियायत की तरफ बढ़ रहे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने वाले खिलाडिय़ों की पूरी प्रतिभा को प्रोत्साहन देने की अभी कोई ठोस योजना नहीं है।

अब अगर हम खिलाडिय़ों को पढ़ाई से पूरी छूट दे देने, और उसे पढ़ाई के बराबर मान लेने की सिफारिश करें, तो उसके साथ एक खतरा यह लगता है कि सरकार के पास ऐसे खिलाडिय़ों को आगे जाकर कोई रोजगार देने की ठोस योजना तो है नहीं। अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में मैडल लेकर आने वाले खिलाडिय़ों को जरूर कुछ राज्यों में नौकरियां मिल जाती हैं, लेकिन अभी तो बात उन तमाम होनहार खिलाडिय़ों की हो रही है जो मैडल की राह पर हैं, मंजिल तक पहुंचे नहीं हैं। हो सकता है कि इनमें से अधिकतर मैडल की मंजिल तक न पहुंचे, और गिने-चुने ही वहां जा पाएं। लेकिन तैयारी के लिए अगर पढ़ाई छोडक़र ये खिलाड़ी केवल खेलते हैं, तो उससे तो उन्हें सरकारी या कोई और नौकरी नहीं मिलती। यह तो तभी हो सकता है, जब उनके लिए बहुत रियायती पढ़ाई वाले कोर्स लागू किए जाएं, उन्हें न्यूनतम योग्यता के आधार पर पास किया जाए, और खेल की उनकी सफलता, और संभावना को देखते हुए उसमें उन्हें नंबर दिए जाएं। इतना लचीलापन अभी भारत की सोच में दिखता नहीं है। अफसोस इसलिए भी होता है कि शिक्षा व्यवस्था का आज जो फौलादी ढांचा है, वह लोगों को न तो नौकरियां दिला पाता है, और न ही किसी निजी रोजगार के लायक तैयार कर पाता है।

वैभव सूर्यवंशी का खेल देखकर जो लोग फिदा हैं, उन्हें सोचना चाहिए कि दसवीं के इम्तिहान में बैठते-बैठते वह इस साल नहीं बैठ रहा, क्योंकि खेलना बाकी है, और अपने चाहने वालों को और खुश करना भी बाकी है। लेकिन ऐसी खुशी पाने वाला देश अपने इस खिलाड़ी के लिए, ऐसे और बहुत से संभावित-होनहार लोगों के लिए कोई रियायत करने तैयार नहीं है।

सच तो यह है कि इस देश में आम खिलाडिय़ों को न मैदान मिलते, न खेल किट मिलती, और न ही प्रशिक्षक मिलते। आए दिन खबरें छपती हैं कि खिलाड़ी किसी टूर्नामेंट में जा रहे थे, और रिजर्वेशन न होने की वजह से वे ट्रेन के डिब्बे में शौचालय के पास फर्श पर बैठे हुए सफर कर रहे थे, जहां ठहरे थे वहां ठंडी फर्श पर दरी पर सो रहे थे। अभी हम खेल-संघों की राजनीति, खेल-प्रशिक्षकों के हाथों शोषण जैसे और जटिल मुद्दों को यहां पर नहीं जोड़ रहे हैं, क्योंकि रायता उतना फैलाने से आज के इस कॉलम के अंत तक इसे समेटना संभव नहीं होगा। फिर भी इतनी बात तो जरूरी है कि अगर अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के इस माहौल में भारत के प्रतिभाशाली खिलाडिय़ों को आगे बढ़ाना है, तो उनके लिए क्या-क्या करना होगा, पढ़ाई में, नौकरी में, या किसी रोजगार में उन्हें कैसी रियायत देनी होगी?

(Daily Chhattisgarh)          

दीवारों पर लिक्खा है, 16 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

शिवरात्रि मनाते लोग सोचें कि शिव की सोच क्या थी

15 फरवरी 2026 

 

आज हिन्दुस्तान के काफी बड़े हिस्से में शिवरात्रि, या महाशिवरात्रि मनाई जा रही है। उत्तर भारत में सडक़ों के किनारे भंडारे लगे हैं, और आते-जाते राहगीरों को हर आधे-एक किलोमीटर पर अलग-अलग जगह प्रसाद के रूप में पेट भर खाना मिलता रहेगा। जिस शंकर के लिए यह महाशिवरात्रि मनाई जाती है, उनके वर्णन को देखें, तो यह लगता है कि उन्हें पूजने वाले, उनके नाम पर आज पर्व और समारोह मनाने वाले लोग उन्हें किस हद तक मानते भी हैं। भगवान शंकर को लेकर जितने किस्म के ब्यौरे बिना किसी विवाद के उन्हीं की अनगिनत कहानियों में, अनगिनत लोकगीतों में दर्ज हैं, उन्हें देखना चाहिए। 

शिव अपने गले में नागों को लिपटाए रहते हैं। जो सांप समाज में डर का प्रतीक माने जाते हैं, जिन्हें देखते ही लोग लाठी ढूंढने लगते हैं कि उन्हें कैसे जल्द से जल्द मारा जाए, जिन्हें लेकर हजार किस्म के कहावत-मुहावरे बने हुए हैं कि फलां धोखेबाज आस्तीन का सांप साबित हुआ, वैसे मासूम सांपों को शंकर गले में पहने रहते हैं। उनकी तस्वीर याद करें तो किस तरह उन्होंने गंगा को सिर पर धारण किया हुआ है। सिर पर अगर रखा है, तो जाहिर है कि प्रकृति की इस सबसे बड़ी देन का उन्होंने सम्मान किया है, और इसका अलिखित संदेश यही है कि गंगा को साफ रखना है, ताकि उसे सिर पर सजाया जा सके। उन्होंने न सिर्फ नंदी को अपना वाहन बनाया, बल्कि शंकरजी की बारात का वर्णन पढ़ें, तो उसमें कुछ सांप बारात के आगे-पीछे चल रहे थे, कुछ शिव के गले में लिपटे हुए थे, शिव नंदी पर सवार थे, कई किस्म के जंगली जानवर बाराती बने चल रहे थे, शुभ-अशुभ माने जाने वाले कई पक्षी और कीड़े-मकोड़े भी शिव की बारात में नाचते हुए चल रहे थे, फिर प्राणियों से परे देखें तो भूत-पिशाच भी बारात में बराबरी से चल रहे थे। कोई एक लोकगीत या कहानी यह भी बताते हैं कि किस तरह जब बारात पार्वती के घर पहुंची, तो वहां के अधिकतर लोग यह सब देखकर हक्का-बक्का रह गए कि उनकी बेटी किस तरह के दूल्हे के साथ ब्याही जाने वाली है। शंकरजी की बारात में चंडाल, और श्मशानवासी भी थे, देवता और असुर सभी बराबरी से चल रहे थे, शंकर ने अपने शरीर पर चिता की राख मल रखी थी, चिता की राख ही उड़ाई जा रही थी, भूतों के नाचने की आवाज आ रही थी, ऐसी थी शंकर की बारात। 

शंकर के चरित्र को देखें, तो उनमें न मौत का कोई डर था, न जहर का। पौराणिक कहानी बताती है कि किस तरह समुद्र मंथन में जहर निकला, तो शंकर ने उसे पी लिया, और गले में थमे हुए इस जहर की वजह से उनका चेहरा नीला बनाया जाता है, और उन्हें शायद नीलकंठ भी कहा जाता है। शिव को अपने आसपास नशा करने वाले लोगों से कोई परहेज नहीं था, और पुराणों के मुताबिक शिव को भांग, धतुरा, और शराब चढ़ाने की परंपरा है। शिव का चरित्र इस तरह का कोई छद्म पवित्रतावादी नहीं था कि वहां नशे की कोई जगह न हो। आज भी किसी पेड़ के नीचे धार्मिक या सामाजिक चबूतरे पर गांजा पीते हुए लोगों को बम-बम भोले, या शंकर के दूसरे कई किस्म के संबोधनों को लेते देखा जाता है। उत्तर भारत, और हिन्दी भारत के कई प्रदेशों में एक लोकगीत खूब गाया जाता है जिसे पंडित छन्नूलाल मिश्र ने पूरी दुनिया में अपने शास्त्रीय गायन से भी पहुंचाया। इस गाने के बोल देखें, तो वे बताते हैं कि किस तरह श्मशान में दिगंबर शिव होली खेल रहे हैं, किस तरह भूत-पिशाच को साथ लेकर वे चिता की राख से खेल रहे हैं। शंकर का अर्धनारीश्वर का रूप देखें, तो वे शायद अकेले ऐसे भगवान हैं जो यह साबित करते हैं कि स्त्री और पुरूष किस हद तक बराबर हैं। बदन को ही आधे-आधे हिस्से में जिस तरह दिखाया गया है, वह शायद ही किसी दूसरे देवी-देवता की छवि में हो। जिसका एक प्रचलित नाम ही अर्धनारीश्वर हो, उससे बड़ा बराबरी का और संदेश क्या हो सकता है? 

अब इन तमाम बातों को देखें, और आज उनके नामलेवा में से कुछ को देखें, तो कुछ विरोधाभास दिखते हैं। उन्हें मानने वाले लोगों को इन विरोधाभासों पर सोचना चाहिए। एक तरफ शिव न सिर्फ इंसान, बल्कि प्रकृति, पशु-पक्षी, भूतप्रेत, अछूत माने जाने वाले लोग, अपवित्र मानी जाने वाली जगहें, चिताओं की राख, नशा करने वाले लोग, सभी को समाहित करके चलने वाले रहे। उनके आसपास देवताओं और राक्षसों या भूतप्रेत-पिशाचों में कोई फर्क नहीं रहा, सभी बराबरी के बाराती रहे। जिस सांप को देखते ही मारने की सोच लोगों में रहती है, उसे वे गले में सजाए रहते हैं। जिस जहर को उन्होंने पीकर अपने गले में रोक रखा, आज उनके नाम लेने वाले बहुत से लोग बिना जहर पिए भी रात-दिन मुंह से जहरीली बातें निकालते रहते हैं। बाहर के जहर को खुद के बदन में रख लिया जाए ताकि बाकी लोगों को वह जहर न झेलना पड़े, उसे अनदेखा करके उनके कई नामलेवा आज जहर उफनते घूमते हैं। शिव जिस तरह एक पूरी तरह लोकतांत्रिक, अराजकता की हद तक लोकतांत्रिक जीवनशैली को जीते रहे, आज उसके ठीक खिलाफ लोग अपने किसी धर्म, या अपनी किसी जीवन-संस्कृति को दूसरों पर थोपने की हिंसा में लगे रहते हैं। और यह पूरा सिलसिला शिव के सबको समाहित करके चलने के दर्शन के ठीक खिलाफ है। शिव की कथाओं में उनका किसी से भी परहेज नहीं दिखाया गया, लेकिन आज उनके नामलेवा कुछ लोग पहले तो दूसरे धर्म के लोगों को दूर करते हैं, फिर अपने ही धर्म की दूसरी जातियों के लोगों को दूर करते हैं, फिर खानपान के आधार पर लोगों का बहिष्कार करते हैं, पोशाक के आधार पर लोगों को गैर करार देते हैं। शिव की जो बुनियादी खूबियां हैं, उनसे बिल्कुल उलटे जाकर लोग खामियों से भरी जिंदगी जीते हैं, और अपने को शिवभक्त भी कहते हैं। आज अगर लोग अर्धनारीश्वर शिव-पार्वती को पूजनीय समझते हैं, तो असल जिंदगी में पार्वती को कोई जगह नहीं देते, महिलाओं के प्रति कोई सम्मान नहीं रखते। शिवभक्तों में से कितने हैं जो पशु-पक्षियों का भी बराबरी से सम्मान करते हों, गंगा को सिर पर चढ़ाने जितना साफ रखते हों, और बारात जैसे अपने खुशी के मौके पर जो हर तबके के मेहमान लेकर चलते हों? 

आज शिवरात्रि है, पूजा के साथ-साथ इस सोच-विचार के लिए भी यह एक बड़ा सही मौका है। शिव के लोकतांत्रिक, समाजवादी, बहुलतावादी, समावेशी रूपों को माने बिना, इस सोच का सम्मान किए बिना पूजा और भंडारे का भला क्या महत्व है? और अगर ऐसी सोच पर लोग अमल करें, तो फिर हर दिन पूजा जैसा समारोह रहेगा, हर दिन हर किसी जरूरतमंद के लिए भंडारा रहेगा। धार्मिक प्रतीकों को बहुत कट्टरतावादी, और संकुचित नजरिए से देखने के बजाय उन्हें उनकी व्यापकता में देखकर अधिक सीखा जा सकता है। शिव से बड़ा समानतावादी और बहुलतावादी और भला कौन है? 

(Daily Chhattisgarh)          

रिश्तों को तौलें कि हनीमून की तरफ बढ़ रहे हैं, या नीले ड्रम की तरफ!

15 फरवरी 2026

अभी मेरी एक परिचित लडक़ी ने अपनी निजी जिंदगी के मामलात पर बात करते हुए कहा कि जिस लडक़े से उसका प्रेम था, वह दूसरे देश में बस गया है, वह हिंदुस्तान लौटना नहीं चाहता, और मेरी यह परिचित इस देश को छोडक़र बसना नहीं चाहती। बात वहीं खत्म हो गई। प्रेम बरसों का था, लेकिन मतभेद ताजा थे, मतभेद को मनभेद में बदलने नहीं दिया, और हंसी-खुशी अपनी-अपनी राह लग लिए। दोनों परिपच् थे, वरना आखिरी मुलाकात के वक्त रस्सी, चाकू, और बाकी किस्म के औजार दोनों के ही पास थे। अब बिल्कुल ठंडे दिल से यह लडक़ी कुछ महीनों के भीतर एक नया रिश्ता शुरू कर चुकी है।

आज दुनिया में लंबी दूरी के रिश्तों की वजह से बहुत से ऐसे मामले होते हैं जिनमें आगे की संभावनाएं नहीं दिखतीं, तो जोड़ीदार अपनी-अपनी राह लग लेते हैं। लेकिन बहुत से मामलों में यह भी होता है कि एक-दूसरे की लंबी राह को तकने के बजाय लोग अपने आसपास की दुनिया में तब तक किसी और को भी तक लेते हैं, और लंबे इंतजार के बीच एक छोटे बुलबुले की दुनिया जी लेते हैं।

हिंदुस्तान के परंपरागत समाज में यह सोचना थोड़ा सा मुश्किल होता है कि लोग स्थायी दुनिया बनाने और बसाने का इंतजार करते हुए एक अस्थायी दुनिया में भी जीने लगते हैं। पश्चिम के देशों में कुछ शादीशुदा जोड़े ऐसे रहते हैं जो आपसी सहमति से अलग-अलग भी रिश्ते बना लेते हैं। ओपन रिलेशनशिप्स, या ओपन मैरिज की यह धारणा भारत में अधिक चर्चा में नहीं है, इसलिए यह माना जा सकता है कि यहां इसका चलन कम है। लेकिन दुनिया के बहुत से विकसित और उन्मुक्त समाज कई तरह के खुले रिश्तों में भरोसा रखते हैं। वहां न शादी जरूरी होती, न बच्चे पैदा करने के लिए पिता का नाम जरूरी होता। कई मामलों में पति-पत्नी दोनों अलग-अलग देह-साथी भी बना लेते हैं, जो कई बार एक-दूसरे की जानकारी में रहते हैं, और कई बार वे यह तय कर लेते हैं कि वे इसकी चर्चा एक-दूसरे से नहीं करेंगे। कुछ एक मामले ऐसे भी रहते हैं जहां ओपन मैरिज के ऐसे बाहरी साथी कभी-कभार सब एक साथ मिल भी लेते हैं। इंद्रधनुष में जितने रंग होते हैं, या किसी जंगल में पत्तों के जितने किस्म के आकार, उतने ही किस्म के रिश्ते भी होते हैं।

बहुत से देश और समाज ऐसे हैं जो सोच और रिश्तों की विविधता के साथ अहिंसक तरीके से जीना सीख लेते हैं वहां वह एक जीवनशैली ही बन जाती है। इधर हिंदुस्तान में हर दिन शादीशुदा जिंदगी, या कि प्रेम-संबंधों में शक पैदा होने की वजह से दर्जनों हत्याएं हो रही हैं, और कई आत्महत्याएं भी। किसी-किसी मामले में तो शक के आधार पर पति अपनी पत्नी के साथ-साथ अपने बच्चों को भी मार डाल रहे हैं। हर किस्म के विवाह, प्रेम, और देह-संबंधों में हिंसा इतनी आम हो चली है कि यह हैरानी होती है कि लोगों को साथ रहना मुमकिन न लगे, तो क्या वे अलग-अलग राह पर चलना नहीं जानते?

अब शहरीकरण बढऩे के साथ-साथ पूरी दुनिया में कई ऐसे प्रेमी या शादीशुदा जोड़े होते हैं जिनको अपनी पढ़ाई के लिए, नौकरी या कारोबार के लिए, या कुछ पारिवारिक मजबूरियों के चलते एक-दूसरे से बरसों अलग रहना पड़ता है। हर किसी की तन-मन, और धन की जरूरतें ऐसी नहीं रहती हैं कि वे अकेले पूरी हो जाएं। ऐसे में एक-दूसरे से दूर रहने को मजबूर लोगों के बीच में कभी-कभी कोई नीला ड्रम भी आ जाता है। और ऐसे नीले ड्रम के साथ-साथ पार्टनर-इन-क्राइम कहे जाने वाले कोई नए प्रेमी-प्रेमिका, या साथी भी आ जाते हैं, जो कि ठिकाने लगाने में भागीदार बनने को तैयार रहते हैं।

लोगों को याद होगा कि 1974 में भारत में आई एक फिल्म ‘रजनीगंधा’ एक नए किस्म की जटिलता पर अपने वक्त से पहले बनी हुई फिल्म थी। इसमें नायिका को अपने शहर में एक नौजवान से प्यार रहता है, लेकिन जब वह एक इंटरव्यू देने एक दूसरे शहर जाती है तो वहां उसे अपना पिछला और पहला प्रेमी मिल जाता है। इन दो शहरों में बसे दो प्रेमियों के बीच यह नायिका एक दुविधा में उलझी रहती है कि जाए तो जाए कहां। शायद मन्नू भंडारी की कहानी पर बनी यह फिल्म पूरी की पूरी इसी दुविधा के साथ आगे बढ़ती है। अब यह हिंदुस्तान में बनी एक बिना सेक्स-संबंधों वाली महज भावनाओं में गूंथी गई फिल्म थी, इसलिए यह देह-संबंधों के चित्रण के बिना पूरी भी हो गई। लेकिन आज की असल जिंदगी में लोग जिंदगी को देह सुख के साथ भी कतरा-कतरा जीना सीख लेते हैं।

दुनिया के दो अलग-अलग देशों में एक प्रेमी-जोड़ा तीन-तीन बरस के लिए पीएचडी रिसर्च कर रहा था। उनमें से एक, अपने दोस्त से मैंने पूछा कि इतनी लंबी दूरी, और इतने लंबे फासले के बीच अगर दूसरे के किसी तीसरे से देह-संबंध हो जाएं, तो उसे दूर-दूर रिसर्च करने वाले ये लोग किस तरह लेते हैं? ऐसे खतरे को किस तरह टालते हैं? तो उसका कहना था कि ऐसे खतरे टाले नहीं टलते हैं, इतना लंबा अकेले रहते जो होना है वो हो ही जाता है। हमारे सामाजिक अध्ययन के शोधकर्ता जोड़ों के बीच आम चलन यह रहता है कि जहां जो हुआ उसे वहीं छोडक़र, और वहीं भूलकर लौटें। और एक अघोषित सहमति इस पर रहती है, डोंट आस्क, डोंट टेल।

यह मेरे लिए रिश्तों में खुलेपन का एक नया आयाम था। और दुनिया में जितने किस्म के अलग-अलग समाजों के लोगों से मिलना होता है, उनसे किसी न किसी, तब तक अनजाने पहलू की जानकारी मिलती है।

अभी पश्चिम के किसी देश की एक महिला का लंबा इंटरव्यू आ रहा था कि जब उसने कृत्रिम गर्भाधान से मां बनना तय किया तो इसके लिए उसने अपने सबसे करीबी दोस्त के शुक्राणु नहीं लिए, बल्कि उसे सबसे अधिक पसंद एक दूसरे समलैंगिक पुरूष के शुक्राणु लिए। अब उस लंबे इंटरव्यू के सारे तर्कों को मैं यहां लिख नहीं सकता लेकिन यह सुनकर आपका दिमाग घूम रहा है या नहीं? मैंने कुछ ऐसे लोगों को भी देखा है जिनकी शादी तो किसी और से हुई रहती है, लेकिन हो बच्चे किसी और से चाहते हैं।

खुले रिश्तों की बात पर लौटें, तो आज आसपास बहुत से ऐसे रिश्ते दिखते हैं जिन्हें लोग समानांतर चलाते रहते हैं। इनमें से किसी को वे फुल टाइम मानते हैं, किसी को पार्टटाइम मानते हैं, किसी को सिर्फ मन के लिए और किसी को सिर्फ तन के लिए। कुछ रिश्ते ऐसे भी रहते हैं जिन्हें फ्रेंड्स विद बेनिफिट कहा जाता है। ऐसे रिश्ते कई बार सिर्फ धन के लिए रहते हैं, और कभी-कभी अपने स्थायी रिश्ते में तन और मन की संतुष्टि की कमी की वजह से भी।

आपको भी लग रहा होगा कि मैं एक बड़े बुरे जाल में आपको उलझा रहा हूं, लेकिन इंसानी सोच मकडज़ाल जैसी ही रहती है, कब वह दूसरे इंसानों को अपने में कीड़े-मकोड़े की तरह उलझा लेती है, यह पता भी नहीं चलता। मैं तो इनमें से हर उस तरह के रिश्ते के पक्ष में हूं जो लोग बिना किसी हिंसा के, बिना नफरत किए, और बिना बदला निकाले दूसरे से रख सकते हैं, छोड़ सकते हैं, या जोड़ सकते हैं। इन तमाम किस्मों के रिश्तों की चर्चा इसलिए भी जरूरी है कि हम सब अपनी-अपनी जिंदगी में भी झांक सकें कि जिनसे हमारे जैसे रिश्ते हैं उनमें क्या ऐसी कोई कमी है कि जिसकी वजह से साथी या जोड़ीदार को दाएं-बाएं झांकने, पटरी से उतरने, और बहकने, या प्रचलित शब्दों में बेवफा होने की जरूरत पड़ती हो? अगर बेवफाई मायने नहीं रखती तब तो बहुत सारी समस्याएं हल हो जाती हैं। अगर बेवफाई मायने रखती है, तो उसकी नौबत न आने देना दोनों ही भागीदारों की जिम्मेदारी रहती है।

अभी इतना लिखना हुआ ही था कि मध्यप्रदेश की एक खबर आई कि वहां के 2014 बैच के एक आईएएस ने अभी एक तीसरी आईएएस महिला से शादी की है। पहली पत्नी 2014 बैच की थीं, जो अभी भी एमपी में एक जिले की कलेक्टर हैं। दूसरी पत्नी 2016 बैच की हैं, और वे अभी एक दूसरे जिले में कलेक्टर हैं। तीसरी पत्नी 2017 बैच की आईएएस हैं, और मंत्रालय में पदस्थ हैं। इस तीसरी पत्नी से अभी चार दिन पहले 11 फरवरी को ही शादी हुई है। अब ये रिश्ते क्या कहलाते हैं? एक ही प्रदेश के काडर में रिश्तों की ऐसी जटिलता सरकारी कामकाज में भी पता नहीं कब कैसे झलके!

अगर आपके देश या समाज में ओपन रिश्तों का चलन नहीं है, अगर कई साथियों के साथ समानांतर रिश्ते रखना बर्दाश्त नहीं है, तो लोगों को अपने साथियों को तन, मन, और कुछ मायनों में, धन से भी संतुष्ट रखना दोनों ही भागीदारों की जिम्मेदारी होती है। ओपन मैरिज, या ओपन रिलेशनशिप बहुत खुले समाजों में तो चल जाती हैं, लेकिन हिंदुस्तान के अधिकतर लोगों के बीच ये कड़वाहट, नफरती-दुश्मनी, और हिंसा तक पहुंच जाती है।

अपनी जिंदगी के रिश्तों को तौलें, और देखें कि आपके रिश्ते हनीमून की तरफ बढ़ रहे हैं, या नीले ड्रम की तरफ!  

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 15 फरवरी 2026



 

एपस्टीन-फाइल्स से लेकर अफगानिस्तान में अमरीकी सैनिकों के सेक्स-जुर्म तक

14 फरवरी 2026 

 

अंतरराष्ट्रीय मीडिया, और सोशल मीडिया के एक हिस्से को देखें तो लगता है कि किसी बजबजाती हुई नाली के पानी पर तैरती गंदगी को देख रहे हैं। वह गंदगी भी इस किस्म की कि जैसी बदबू किसी ने कभी झेली न हो। बच्चों से सेक्स, बलात्कार करने और करवाने वाला एक अमरीकी अरबपति जेफ्री एपस्टीन जैसी तस्वीरों और जानकारियों के साथ, दुनिया भर के ताकतवर लोगों के साथ अपने रिश्तों, और बच्चियां सप्लाई करने के न्यौतों वाली लाखों ईमेल के साथ, जिस तरह खबरों में आ रहा है, वह देखना भी भयानक है। दुनिया के कम से कम दस देशों में इन ईमेल में नाम आए हुए लोगों के सरकारी जगहों से इस्तीफे हो रहे हैं, और ब्रिटिश संसद में ऐसे इस्तीफे के बाद किसी तरह अपनी खाल बचाए हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री सौ-सौ बार सदन, और देश की जनता से माफी मांग रहे हैं। अमरीकी संसद की जांच कमेटी अभी इसी बात पर हैरान-परेशान है कि जांच एजेंसियों और वहां के कानून मंत्रालय ने किस तरह बहुत सारे लोगों के नाम बिना किसी जायज वजह को बताए मिटाने के बाद कागजात सार्वजनिक किए हैं। दुनिया भर के प्रमुख लोगों, सरकार और कारोबार के ताकतवरों के लिए नाबालिग लड़कियां जुटाने का यह दुनिया के इतिहास का अपने किस्म का सबसे बड़ा मामला है, और इस भड़वे को भारत की मीडिया में कुछ लोग अब तक कारोबारी-बिचौलिया करार दे रहे हैं!

इस बीच अमरीका की एक स्वतंत्र मीडिया संस्था ने एक बहुत ही लंबी खोजी जांच रिपोर्ट में यह साबित किया है कि अफगानिस्तान में दशकों तक तैनात अमरीकी सैनिकों ने वहां के नाबालिगों के साथ बड़े पैमाने पर बलात्कार किए थे। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान में किशोर लडक़ों को सेक्स-गुलाम बनाने की एक प्रथा, बच्चाबाजी है, और अमरीकी सैनिकों ने वहां तैनात रहते हुए अपने सेक्स के लिए ऐसे बच्चों को जुटाकर बंदी रखा हुआ था।

अफगानिस्तान में अमरीकी फौजों की बड़ी लंबी तैनाती चली, और कई सैनिक वहां बहुत लंबे समय तक रहे, और उन्होंने इस तरह के बहुत से काम किए। इस रिपोर्ट में अफगानिस्तान की इस जमीनी हकीकत के बारे में भी कहा गया है कि तालिबान अमरीकी सैनिकों की इन हरकतों के खिलाफ थे, और इसलिए वहां की जनता तालिबानों के प्रति हमदर्दी भी रखती थी। एक तरफ वहां राज कर रहे अमरीका के सैनिक नाबालिग बच्चों को सेक्स-गुलाम बनाकर उनसे बलात्कार करते थे, और अमरीकी फौजी हुकूमत से परे वहां कोई आवाज नहीं थी। लेकिन अफगानिस्तान की इस पुरानी बात पर आज नई चर्चा इसलिए छिड़ी है कि अमरीका के भीतर नॉर्थ कैलोलाइना में एक बहुत बड़ा फौजी अड्डा है, जहां करीब 50 हजार सैनिक रहते हैं, और वहां बच्चों के यौन शोषण के कई मामले सामने आ रहे हैं। कई मामलों में बलात्कारों के बाद सैनिकों को बड़ी लंबी कैद की सजा भी हो रही है। इस फौजी कैम्प के सैनिकों के मामले बताते हैं कि महिलाओं से बलात्कार के मुकाबले बच्चों से यौन-अपराध के मामले अधिक हो रहे हैं। और इसके पीछे सरकारी तथ्य ही यह बताते हैं कि इस कैम्प के अधिकांश दोषी अमरीकी सैनिक अफगानिस्तान में लंबी तैनाती कर चुके थे। अफगानिस्तान से 2021 में अमरीकी फौजों की वापिसी के बाद से फौजियों द्वारा बच्चों से यौन-अपराधों में करीब दस गुना बढ़ोत्तरी हुई है, और इसे एक महामारी जैसी नौबत बताया जा रहा है। इस खोजी रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि फौज के आला अफसरों को ऐसे बहुत से मामलों की जानकारी रहती है, लेकिन उन पर कार्रवाई के बजाय वे उन्हें दबाने का काम अधिक करते हैं, ताकि फौज की बदनामी न हो, और ऐसे बलात्कारियों और यौन-मुजरिमों को इस्तीफा दे देने का विकल्प देते हैं।
 
हम एपस्टीन-फाइल्स के साथ-साथ अमरीकी रिपोर्ट में एम्पायर-फाइल्स कही जा रही इन घटनाओं का जिक्र इसलिए कर रहे हैं कि जब लोग दूसरे देशों में बच्चों से बलात्कार करके लौटते हैं, तो वे अपने देश में भी इस तरह का काम करते हैं। किसी भी देश के पर्यटक जब दुनिया के सेक्स-पर्यटन केन्द्रों में जाते हैं, और वहां नाबालिग बच्चों से सेक्स-बलात्कार करके आते हैं, तो लौटने के बाद भी वे अपने देश में बच्चों पर एक बहुत बड़ा खतरा रहते हैं, जैसे कि आज अफगानिस्तान में किशोर सेक्स-गुलाम रखने वाले लौटे हुए सैनिकों से अमरीका में खड़ा हुआ खतरा है। दुनिया के जिन देशों के भी जिन लोगों के नाम एपस्टीन-फाइल्स में बच्चों से बलात्कार के मामले में सामने आए हैं, उनके बारे में कभी भी भरोसे से यह नहीं कहा जा सकता कि वे अपने देश में भी इसी तरह के बच्चे जुटाने, फंसाने, या कब्जाने की कोशिश नहीं करेंगे। बच्चों से सेक्स के शौकीन या आदी मुजरिम अपना मिजाज नहीं बदलते, और अमरीका में संसद के हुक्म से जांच एजेंसियों, और कानून मंत्रालय के कब्जे वाले दसियों लाख दस्तावेज जारी हुए हैं, और उनमें जिन-जिन लोगों के नाम बच्चों से सेक्स के सिलसिले में सामने आए हैं, उन सारे देशों को ऐसे लोगों पर कार्रवाई करना चाहिए, और कम से कम एक देश ने ऐसे एक यौन-अपराध के आरोपी को गिरफ्तार भी किया है।
 
ये दो मामले एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, लेकिन इन दोनों के पीछे हम एक ताकत का खेल भी देखते हैं। अफगानिस्तान में जिस तरह अमरीका का कब्जा था, और अमरीकी फौजें हीं वहां पर शासक थीं, एक किस्म से तानाशाह थीं, तो वैसी तानाशाही कई किस्म के जुल्म और जुर्म करती ही है। दूसरी तरफ एपस्टीन नाम का दुनिया का यह सबसे बड़ा भड़वा दुनिया के दर्जनों देशों के सबसे ताकतवर सरकारी और कारोबारी मुखियाओं के बीच बच्चों से सेक्स, दलाली, और ब्लैकमेलिंग का दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा रैकेट चला रहा था, उस पर अमरीकी राष्ट्रपतियों की भी पूरी मेहरबानी थी। जब सत्ता का इतना निर्बाध संरक्षण किसी को हासिल होता है, तो वे कोई भी जुर्म करने से नहीं हिचकते। यह बात सिर्फ सेक्स-अपराधों के संदर्भ में लागू नहीं होती, यह बात सत्ता की मेहरबानी से होने वाले हर किस्म के अपराधों पर लागू होती है कि सत्ता का संरक्षण लोगों से असाधारण जुर्म करवाता है। इससे एक बात और भी साबित होती है कि दुनिया की सबसे ताकतवर कुर्सियों पर बैठे हुए लोग भी इस दलाल के टापू पर नाबालिग लड़कियों, और बच्चियों की देह पर जिस तरह जीभ लपलपाते चारों हाथ-पैर पर किसी जानवर की तरह दिखते थे, उससे भी यह समझ पड़ता है कि कोई ओहदा, कोई ताकत लोगों को सेक्स-हिंसानियत से नहीं रोकती, बल्कि उसके लिए बढ़ावा ही देती है। हमारे पाठकों को इन दो घटनाओं को एक साथ रखकर देखना चाहिए, और सरकार, कारोबार, या फौजी हुकूमत से परे भी धर्म, या आध्यात्म की हुकूमत के प्रति भी सावधान रहना चाहिए, जहां कहीं ताकत बेहिसाब हो जाती है, वह बेकाबू भी हो जाती है। 

(Daily Chhattisgarh)          

दीवारों पर लिक्खा है, 14 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

रेरा को खत्म करने की सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी की गंभीरता समझी जाए

13 फरवरी 2026 

 

देश में निर्माण कारोबार और जमीन-जायदाद के बाजार को नियमों के तहत लाने के लिए हर प्रदेश में रेरा नाम की एक नियामक संस्था बनाई गई जो कि ग्राहकों के हितों को बचाने के मकसद से लिया गया फैसला था, लेकिन आज हालत यह है कि वह बिल्डर-माफिया के हाथों का एक और हथियार बनकर रह गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कल इससे जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि राज्यों को यह सोचना चाहिए कि रेरा का गठन क्यों किया गया था? जिन लोगों के लिए रेरा बनाया गया था वे पूरी तरह निराश और हताश हैं। इस संस्था को खत्म कर दिया जाए तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी। अदालत की इन कड़ी टिप्पणियों को देखते हुए जानकर विशेषज्ञ तबकों को अपने-अपने राज्य के रेरा के कामकाज, और उसके असर का विश्लेषण करना चाहिए कि रेरा में भारी अधिकार देकर बैठाए गए लोग रीयल इस्टेट ग्राहकों के हित में काम करते हैं, या फिर वे बिल्डर-माफिया की मदद करते हैं, और अपने लिए प्लाट और मकान की रिश्वत जुटाते हैं?

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि जिन सरकारी विभागों को रेरा के दिए गए फैसलों पर अमल करवाना है, वे भी इसमें दिलचस्पी नहीं लेते, क्योंकि बिल्डर और कॉलोनाइजर माफिया उनकी जेब गर्म करते रहता है। जमीन, मकान, बिल्डिंग, और कॉलोनी से जुड़े कारोबार सरकारी विभागों के साथ तालमेल से ही काम करते हैं। ऐसे में इस संगठित, ताकतवर, और भ्रष्ट कारोबार के खिलाफ अगर रेरा कभी कोई आदेश दे भी देता है, तो भी उस पर अमल नहीं हो पाता। कहने के लिए तो रेरा को इतने अधिकार दिए गए हैं कि वे चाहें तो गलत कारोबार करने वाले लोगों के बैंक खाते भी बंद करवा सकते हैं, लेकिन जमीन-बिल्डिंग का कारोबार भ्रष्टाचार और गैरकानूनी तौरतरीकों में डूबा हुआ भी रहता है, और धड़ल्ले से चलता भी है। मतलब यह कि रेरा की कोई घोषित या अघोषित पकड़ उस पर नहीं रहती। अब यह रेरा और इस कारोबार के बीच का गैरकानूनी और अघोषित गठजोड़ है, या फिर रेरा के आदेशों पर अमल न होना है, जो भी हो, रेरा नाम के सफेद हाथी को खत्म करने का सवाल सुप्रीम कोर्ट ने उठाया है, और लोकतंत्र में इससे बड़ा कोई सवाल हो नहीं सकता।

अब हम राज्यों में बिल्डर और कॉलोनाइजर कारोबार को देखें, तो वे सरकार के कई विभागों के दर्जनों नियम-कानूनों के बीच काम करते हैं, और इनमें से हर किसी की पकड़ से बचे भी रहते हैं। इस कारोबार के इश्तहारों से मीडिया पटे रहता है, और वहां ऐसे माफिया की छानबीन आमतौर पर तब तक नहीं होती, जब तक उससे विज्ञापन मिलने की उम्मीद पूरी तरह टूट न जाए। मीडिया के अधिकतर हिस्से में तो यह होता है कि बिल्डर-माफिया के कारोबारी हितों को लेकर किसी इलाके के सुनहरे भविष्य की झूठी रिपोर्ट छापी या दिखाई जाती हैं ताकि विज्ञापनदाता को उससे सीधा फायदा हो सके। इसी तरह विज्ञापनदाता कारोबारियों के खिलाफ रेरा से कोई आदेश होने पर उसको खबरों में कोई जगह नहीं मिलती। ग्राहक और निवासी कितनी भी शिकायत करें, विज्ञापन पाने वाले मीडिया में उसकी सुनवाई नहीं होती। अगर मीडिया ही ईमानदार रहता, सरकार के विभाग अपनी जिम्मेदारी पूरी करते रहते, तो रेरा के नाम पर एक और सफेद हाथी खड़ा करने की जरूरत नहीं रहती। आज तो हालत यह है कि बिल्डर-माफिया ही अधिकरत प्रदेशों में यह तय करते हैं कि रेरा का मुखिया किसे बनाया जाए। 

लेकिन अब हम रेरा से जरा ऊपर उठें और देखें कि देश और प्रदेशों में कौन-कौन से नियामक आयोग, या दूसरी संवैधानिक संस्थाएं अपने घोषित मकसद को छूती भी नहीं हैं, तो ऐसी बहुत सी संस्थाएं दिखेंगी। महिलाओं, बच्चों, एसटीएस, पर्यावरण और मानवाधिकार से जुड़ी जितनी संवैधानिक संस्थाएं बनाई जाती हैं, और जिन पर सरकार की राजनीतिक पसंद से लोगों को बिठाया जाता है, वे अपनी जिम्मेदारी के ठीक उल्टा काम करती हैं। वे कानून तोडऩे वाले लोगों, जुल्म करने वाले लोगों को बचाने का काम करती हैं। अपने को बिठाने वाली सरकारों के राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए ऐसी संवैधानिक संस्थाओं पर बैठे हुए लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं। नतीजा यह होता है कि संसद के बनाए कानूनों के तहत राज्यों में जिन संस्थाओं को बनाया जाता है, वे राजनीतिक चारागाह बनकर रह जाती हैं, और देश की बड़ी अदालतें यह मानकर चलती हैं कि जनता के पास एक संवैधानिक विकल्प है।

सुप्रीम कोर्ट ने रेरा के बारे में जो कड़ी टिप्पणी की है, उसे देखते हुए हर प्रदेश के जागरूक और जानकार लोगों को अपने-अपने प्रदेश की ऐसी दूसरी संस्थाओं की अप्रासंगिकता पर बात करनी चाहिए। सफेद हाथियों के लिए हर प्रदेश की राजधानियों में ऐसी हाथी-शालाएं बनी हुई हैं, ऐसे अस्तबल जनता पर बोझ हैं, और इन्हें खत्म करने के लिए क्या किया जाना चाहिए इस पर चर्चा होनी चाहिए। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम कई बार यह मुद्दा उठा चुके हैं कि किसी भी राज्य में काम कर चुके जज या अफसर, या वहां के स्थानीय नेताओं को संवैधानिक और नियामक संस्थाओं में नियुक्त नहीं करना चाहिए। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक टेलेंट-पूल बनाना चाहिए, और उसमें से इन कुर्सियों के लिए लोगों को छांटने का काम एक गैरसत्तारूढ़, गैराजनीतिक कमेटी को देना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)          

दीवारों पर लिक्खा है, 13 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)