4 अप्रैल 2013
बेमौके की, बेतुकी बात
कुछ लोग खाने के वक्त हत्या, बलात्कार या हिंसा की बातें छेड़ देते हैं। कुछ लोग खाने के बीच बीमारी या किसी गंदगी की चर्चा करने लगते हैं। ऐसे लोग यह ध्यान नहीं रखते कि पास के दूसरे लोगों को खाते हुए ऐसी चर्चा सुनने से भी अरूचि हो सकती है। इसी तरह किसी गम के मौके पर हंसी-मजाक की बात करना, या किसी खुशी के मौके पर किसी हादसे या गम की चर्चा छेडऩा यही बताता है कि आपको मौके की समझ नहीं है।
समझदारी इसमें हैं कि आप जिस माहौल में हैं, उसे खराब करने से बचें। अगर आप ऐसा नहीं करते, तो धीरे-धीरे लोग आपसे ही बचने लगते हैं। बहुत से लोग आपकी बेमौके की बात पर आपको रूबरू नहीं टोकेंगे। लेकिन आपके पीठ-पीछे आपके बारे में इसको लेकर कोई अच्छी चर्चा नहीं होगी। अपने अलावा दूसरों की पसंद नापसंद का ख्याल भी रखना चाहिए।
- सुनील कुमार
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