30 मार्च
शब्दों का आतंक
कहावत-मुहावरे, तरह-तरह के शेर, महान या प्रमुख लोगों की कही हुई सूक्तियां, इन सबका कोई न कोई संदर्भ रहता है। वे किसी खास मौके पर, किसी खास सोच के साथ कही गईं, या गढ़ी गईं बातें होती हैं। इनका इस्तेमाल भाषा की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए तो ठीक होता है, किसी बात का बखान करने के लिए भी ठीक होता है, लेकिन तर्क के रूप में इनका इस्तेमाल ठीक नहीं होता। यह कुछ उसी तरह का है, कि मिठाई बहुत अच्छी होती है, लेकिन पैरों पर पहनने के लिए नहीं होती, और जूते बहुत अच्छे हो सकते हैं, लेकिन खाने के लिए नहीं होते (तब तक जब तक कि जूते खाने लायक कोई हरकत न की जाए)।
किसी एक मौके पर, या किसी एक बात के लिए, सही ठहराते हुए कहावत-मुहावरा, शेर या सूक्ति, इनको कहीं से निकालकर, कहीं और फिट कर देना, शब्दों का मायाजाल तो हो सकता है, इनसे अखबारों में अच्छी सुर्खियां भी बन जाती हैं, लेकिन इनसे कोई तर्क नहीं बन सकता। इसलिए भाषा की खूबसूरती की खूबी को भाषा के लिए ही इस्तेमाल करना चाहिए। यह जरूर हो सकता है कि आपसे बात करने वाले, आपसे कम पढ़े हों, और वे आपकी कही ऐसी पैनी बातों के जवाब में कुछ कहने लायक न रहें, आपके पढ़े-लिखे होने का आतंक उन पर चल जाए, लेकिन जब ऊंट पहाड़ के नीचे आते हैं, तो उनका कद नप जाता है। इसलिए शब्दजाल के बजाय वजनदार तर्कों की आदत रखें, जिंदगी के लंबे सफर में पहाड़ के पास से कभी न कभी गुजरना पड़ता ही है।
- सुनील कुमार
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