3 अप्रैल 2013
सुपात्र को ही दान दें
दान-धर्म के नाम पर, या समाजसेवा के नाम पर बहुत से लोग लापरवाही से कुछ संस्थाओं, धार्मिक स्थानों, या सामाजिक नेताओं की मदद करते हैं। ऐसा दिया हुआ दान हर बार समाज का फायदा करता हो यह जरूरी नहीं है। दान देने के पहले यह देख लें कि पाने वाली संस्था का अब तक का रिकॉर्ड क्या है? उसकी साख क्या है? और उससे जुड़े हुए लोग अपना खुद का पैसा भी उसके काम में लगाते हैं? या फिर उस ट्रस्ट या संस्था के पैसों पर खुद पलते हैं? भारत में बहुत पहले से यह बात कही जाती है कि दान भी सुपात्र को देना चाहिए। इसका मतलब है ऐसे व्यक्ति को जो कि सच में जरूरतमंद हों, या सच्चे जरूरतमंद लोगों की मदद में उसका इस्तेमाल करने वाले लोग हों।
दरियादिली और लापरवाही से दान देने वाले लोग बेईमानों को बढ़ावा देते हैं, और भ्रष्ट लोगों को परजीवी बना देते हैं। एक बार जिस संपन्न, गैरजरूरतमंद के मुंह दान का खाना लग जाता है, वैसे लोग बाद में कोई काम नहीं करते और दान जुटाने में लगे रहते हैं। ऐसे में उन संस्थाओं को देने के लिए लोगों के पास दान की क्षमता नहीं बचती, जो कि सचमुच अच्छा काम करते हैं। समाज ऐसे चोरों से भरा हुआ है जो दान इक_ा करते हैं, सिर्फ घपला करने के लिए।
बहुत सी संस्थाएं ऐसी हैं जो ईमानदारी से हिसाब-किताब रखती हैं, पाई-पाई को सोच-समझकर खर्च करती हैं, लेकिन ऐसी संस्थाओं का हिसाब भी अगर देखें तो उनमें चंदा इक_ा करने पर एक तिहाई से अधिक खर्च कर दिया जाता है, संस्था अपने आप पर तनख्वाह और भत्तों-खर्चों पर आधा बजट खर्च कर देती है, और जरूरतमंदों तक एक चौथाई से कम पैसा पहुंच पाता है। इसलिए किसी भी संस्था को दान देने के पहले सावधानी से उसके कामकाज, हिसाब-किताब, और उसकी साख को तौल लें। अपनी अच्छी नीयत से किसी बेईमान को मजबूत बनने में मदद न करें।
- सुनील कुमार
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