छोटी सी बात

22 मार्च 2013
तलवार चलाएं, लेकिन तौलकर
संसद और विधानसभाओं में लोगों की कही बातों पर कई बार यह सुनने मिलता है कि उनके कहे शब्दों को असंसदीय मानकर सदन की कार्रवाई से मिटा दिया जाता है। ऐसा होने पर उन शब्दों को सदन की कार्रवाई के साथ खबरों में लिखा भी नहीं जा सकता। लेकिन ऐसे शब्द गाली ही हों, यह भी जरूरी नहीं है। बहुत से ऐसे शब्द जो कि एक सच को बयां करते हैं, उनको भी असंसदीय मान लिया जाता है।
 अब जैसे कामचोर शब्द है, जो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी के काम को नहीं करते, उन्हें कामचोर कहते हैं, लेकिन यह शब्द असंसदीय मानकर कार्रवाई से निकाल दिया जाता है। इसी तरह बेईमान, नमकहराम जैसे शब्द हैं, जो असल जिंदगी में कई लोगों के ऊपर सही साबित होते होंगे, लेकिन संसद और विधानसभा इन्हें बर्दाश्त नहीं करते। इसलिए बहुत से शब्द असंसदीय हो सकते हैं, अनुचित नहीं। इनका इस्तेमाल अगर सावधानी से तौलकर किया जाए, तो वे कहीं से भी गाली में नहीं आते। अब जैसे जनता के पैसों से रियायती खाना खाने वाले सांसद अगर अपनी जिम्मेदारी का काम न करें, तो भी उनके लिए एकदम सही शब्द संसद में इस्तेमाल नहीं हो सकते, बाहर तो हो ही सकते हैं। 
लेकिन इसकी यहां पर चर्चा का एक मकसद है। बहुत तीखे शब्द बहुत तेज धार की तलवार सरीखे होते हैं, उनके चौकन्ने और संतुलित इस्तेमाल के बिना वे जिसके हाथ होते हैं, उसी को काटकर रख सकते हैं। इसलिए जब तक शब्दों को तौलने की काबिलीयत न हो, तब तक तीखे शब्दों से बचना चाहिए। अगर किसी समझदार और संवेदनशील के खिलाफ बेजा इस्तेमाल किया जाए, तो आपके शब्द आपको ही घायल कर सकते हैं। इसलिए अपनी समझ से आगे बढ़कर तलवार चलाना ठीक नहीं है। पुराने लोग कहते थे कि जितनी चादर हो, पैर उतने ही फैलाने चाहिए। उसी तरह समझ जितनी हो, उसी के मुताबिक हमलावर लफ्जों का इस्तेमाल करना चाहिए।
-सुनील कुमार

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