16 अप्रैल
छोटी सी बात
कुछ ऐसे लतीफे लंबे समय से चल रहे हैं जिनमें मां-बाप बच्चों को सवाल पूछने को कहते हैं, और फिर किसी बात का जवाब उनके पास नहीं रहता। और आखिर में जब बच्चे थक जाते हैं, तो मां-बाप कहते हैं कि पूछो-पूछो, अगर पूछोगे नहीं, तो सीखोगे कैसे।
दरअसल बच्चों से बात करने का एक मतलब यह भी होता है कि उनके सवालों के जवाब सोचते हुए, आपको अपनी नासमझी या अपने अज्ञान का अंदाज लग जाता है। बच्चे कद-काठी और उम्र में छोटे होते हैं, लेकिन उनके छोटे-छोटे सवाल ऊंट जैसे बड़े-बड़े लोगों के लिए पहाड़ बनकर आते हैं, और अपनी अक्ल और अपने ज्ञान पर फिदा खुशफहम लोगों को उनका कद बता जाते हैं।
सवालों का सामना करना अपना खुद का ज्ञान बढ़ाना होता है। सवाल पूछने वालों का ज्ञान तो तभी बढ़ सकता है जब आपके पास जवाब हों, लेकिन आपका ज्ञान तो सवाल सुन-सुनकर ही बढऩे लगता है, अगर आप उनके जवाब अपने खुद के लिए भी आगे-पीछे ढूंढ लें।
इसके लिए दो बातें सबसे जरूरी होती हैं, बच्चों से मिलना, जो कि आमतौर पर जिज्ञासु होते हैं, और ऐसे नए लोगों से मिलना जो कि आपसे कुछ पूछ सकते हैं। लेकिन होता यह है कि लोग इन दोनों तबकों से बचते हुए अपने उन्हीं करीबी लोगों से बार-बार मिलते हैं जो दिमागी कसरत करने को मजबूर न करें। हौसला कुछ बढ़ाएं, और सवालों का सामना करें।
- सुनील कुमार
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