आर्थिक मोर्चे पर अविश्वसनीय कामयाबी वाला राज्य छत्तीसगढ़
7 फरवरी 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के आर्थिक सर्वेक्षण में राज्य की जो विकास दर बताई गई है, वह राष्ट्रीय विकास दर से खासी अधिक है, दो गुना से कुछ कम। कृषि विकास दर राष्ट्रीय कृषि विकास दर से चार-पांच गुना अधिक है। औद्योगिक विकास दर राष्ट्रीय औसत से छह गुना अधिक है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने वित्त मंत्री की हैसियत से 2013-14 का आर्थिक सर्वेक्षण आज विधानसभा में पेश किया और इसमें प्रदेश की औसत आय 2011-12 के मुकाबले 44 हजार 505 से बढ़कर 2012-13 में 50 हजार 691 हो गई है और 2013-14 में इसके करीब 57 हजार तक पहुंचने का अनुमान सामने रखा गया है। पिछले करीब 8 बरस से मुख्यमंत्री ही प्रदेश के वित्त मंत्री भी हैं, और इसलिए किसी भी तरह की आर्थिक उपलब्धि, उसके लिए सम्मान और पुरस्कार, केन्द्र सरकार या योजना आयोग से तारीफ के लिए वे अपनी सरकार के साथ-साथ व्यक्तिगत रूप से भी तारीफ के हकदार हैं। इन बरसों में लगातार रिजर्व बैंक ने भी छत्तीसगढ़ को वित्तीय अनुशासन वाला राज्य पाया है, और यूपीए सरकार के पिछले दस बरसों में छत्तीसगढ़ को अनगिनत मोर्चों पर तारीफ मिली है।
प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय अपने आप में बहुत बड़ा पैमाना नहीं होती। क्योंकि प्रदेश की कमाई का बंटवारा अगर गैरबराबर होता है, तो उससे गरीबों का कुछ भला नहीं होता। लेकिन इस राज्य की हालत कुछ अलग है। यहां पर राज्य सरकार ने रियायती अनाज से लेकर, रियायती बिजली तक, और दर्जनों किस्म की दूसरी ऐसी रियायतें पिछले बरसों में लागू की हैं, जिनका सीधा फायदा गरीबों को पहुंचा है। आमतौर पर जनकल्याणकारी और लोकलुभावनी, रियायतों की योजनाएं देश या प्रदेश की अर्थव्यवस्था को चौपट करने वाली रहती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में इसका एक बहुत ही कामयाब संतुलन देखने मिला है जिसके तहत राज्य का ढांचा भी विकसित हुआ है, शहरी विकास भी हुआ है, और जनकल्याणकारी योजनाओं पर बजट का खासा बड़ा हिस्सा खर्च भी हुआ है। और यह तब हुआ है जबकि देश में कोयला घोटाले के बाद कोयला खदानों से लेकर बिजली और फौलाद के कारखानों की हालत खराब है, दुनिया और देश मंदी की अर्थव्यवस्था से गुजर रहे हैं, और औद्योगिक उत्पादन, पूंजी निवेश, सब कुछ मंदा है। ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसा राज्य, जो कि मोटे तौर पर खनिजों की अर्थव्यवस्था पर टिका हुआ है, उस पर भारी उल्टा असर पडऩा तय था, और इस राज्य में ही कारखानों का लगना इसलिए रूक सा गया है, क्योंकि कोयले को लेकर देश में एक अनिश्चितता बनी हुई है।
ऐसे में छत्तीसगढ़ में आर्थिक मोर्चे पर एक अभूतपूर्व और अविश्वसनीय सी कामयाबी दिखाई है। अगर बिना रियायतों को दिए यह राज्य सिर्फ कमाई करके दिखा देता, तो वह अधिक बड़ी बात नहीं होती। इसी तरह अगर वह भारी घाटा झेलकर, प्रदेश की अर्थव्यवस्था चौपट करके, सिर्फ लोकलुभावनी रियायतें बांट देता, तो भी वह गैरजिम्मेदारी होती। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कई बड़े विभागों के मंत्री रहने के साथ-साथ वित्त मंत्री की हैसियत से आज जो आर्थिक सर्वेक्षण सामने रखा है, वह प्रभावशाली है। राज्य में सत्ता की इस तीसरी पारी में उन्होंने जनकल्याण की रियायती योजनाओं को आगे ही बढ़ाया है, और देश के दूसरे राज्यों में इतने लंबे समय तक मंदी के बीच ऐसी कामयाबी आमतौर पर देखने नहीं मिलती है।
अर्थशास्त्रियों के दो अलग-अलग सोच वाले खेमे होते हैं। एक खेमा पूंजीवादी विकास का हिमायती होता है, जो कि रियायतों की लुभावनी अर्थव्यवस्था को तबाही मानता है। दूसरा खेमा जनकल्याणकारी रियायतों का, गरीबों का हिमायती होता है, जो कि सामाजिक पैमानों पर इंसानों के विकास के लिए रियायतों को जरूरी मानता है। छत्तीसगढ़ में इन दोनों खेमों को शिकायत का कोई मौका न मिलना एक बड़ा अविश्वसनीय संतुलन है। इसका एक सुबूत यह है कि सुप्रीम कोर्ट तक में छत्तीसगढ़ की खाद्यान्न नीति, और उस पर अमल की तारीफ बरसों से चली आ रही है। और दूसरी तरफ इस राज्य में अधिक फसल के राष्ट्रीय पुरस्कार मिल रहे हैं, फसल की रिकॉर्ड खरीदी दर्ज हो रही है। अब अगर देश में औद्योगिक माहौल बदलता है, कोयले की खदानों पर मंडराता कानूनी खतरा टलता है, तो यह राज्य कारखानों से भी और अधिक कमाई कर सकेगा।
सोच की जगह जाकर, रियायती खाकर, बिना कोई काम किए, महज शौच करके वापिस...
6 फरवरी 2014
संपादकीय
लोकसभा का यह आखिरी सत्र शुरू हुआ है, और शायद अपनी जिम्मेदारी पूरी किए बिना खत्म भी हो जाएगा। दरअसल कई मुद्दों को लेकर संसद में जैसा हंगामा चल रहा है, वैसा हंगामा भारत जितने बड़े लोकतंत्र में साल के हर दिन चल सकता है। कभी तेलंगाना पर, तो कभी किसी आतंकी हमले पर, तो कभी सरहद पर किसी फौजी की शहादत को लेकर, किसी न किसी मुद्दे को लेकर संसद को रोका जा सकता है। लेकिन ऐसे हंगामों के बीच अगर देखें कि सचमुच में रूक क्या रहा है, तो यह संसद नहीं रूक रही है, क्योंकि ये पन्द्रहवीं संसद तो चलाचली की बेला में है ही, उसका कार्यकाल खत्म हो ही रहा है। रूक रहा है तो महिला आरक्षण रूक रहा है, भ्रष्टाचार के खिलाफ कहीं कोई प्रस्तावित कानून रूक रहा है, और कई किस्म के दूसरे जरूरी काम रूक रहे हैं। हम यह देखकर हक्का-बक्का हैं कि संसद में जो प्रमुख विपक्षी दल भाजपा है, और उसके साथ एनडीए के उसके दूसरे साथी दल हैं, वे भी संसद के भीतर के हंगामों में शामिल होकर ऐसे कानूनों को रोक रहे हैं जो कि बरसों से संसद में खिंचते चले आ रहे हैं। महिला आरक्षण तो तब से चले आ रहा है जब एनडीए की सरकार थी, और लोकसभा में आज विपक्ष की नेता एक महिला है, फिर भी इसे हकीकत बनाने में सुषमा स्वराज का हाथ नहीं दिख रहा।
लोकतंत्र लोगों को इतनी आजादी देता है कि वे कोई भी काम अमूमन कहीं भी कर सकते हैं। लोग दफ्तरों में काम करने के बजाय सो सकते हैं, बगीचों में घूमने के बजाय वहां सिगरेट पी सकते हैं, साफ जगहों को थूककर गंदा कर सकते हैं, हर कोने पर पेशाब कर सकते हैं, और हर खुली जगह पर पखाना कर सकते हैं। लोकतंत्र में लोग स्टेडियम में जाकर कानून बना सकते हैं, सरकार चलाने के बजाय आंदोलन कर सकते हैं, जेल में रहते हुए राजनीतिक दल के मुखिया रह सकते हैं, बड़े-बड़े जुर्म के दाग लगने के बाद भी विधानसभा और संसद में जा सकते हैं। ऐसे में संसद के भीतर कानून बनाने के जिम्मेदार लोग, बहुत थोड़े से बचे वक्त में भी अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय हंगामा कर सकते हैं। इस देश में लोकतंत्र इतनी आजादी देता है कि सांसद सोच की जगह पर जाकर, रियायती खाकर, बिना कोई काम किए, महज शौच करके वापिस आ सकते हैं, और मोटा भत्ता ले सकते हैं, विशेषाधिकारों की जिंदगी जी सकते हैं। हमको यह भी हैरानी होती है कि अपनी बुनियादी जिम्मेदारी को पूरा करने के बजाय, बाकी हर किस्म के गैरजरूरी हंगामे खड़े करने के बाद लोग लौटकर चैन से किस तरह सो जाते हैं? शायद मुफ्त के बंगले, मुफ्त के गद्दे, मुफ्त का ऐशोआराम उनको ऐसे सोने में मदद करता होगा, और उनके सीने पर कोई बोझ भी नहीं आने देता होगा।
आज दिक्कत यह है कि संसद के भीतर ऐसी गैरजिम्मेदारी की तोहमत किस पर लगाई जाए, और किस पर नहीं, यह तय कर पाना कुछ मुश्किल लगता है। लेकिन हम चूंकि सत्ता की बेंचों, और विपक्ष की बेंचों, दोनों से परे बैठे हैं, इसलिए हमको इन दोनों पर मिला-जुलाकर इस तोहमत को डालने में कोई दिक्कत नहीं है। संसद हो या विधानसभाएं, ये न सत्ता की जागीर होतीं, न ही विपक्ष की। और हम इस बात को भी नहीं मानते कि किसी प्रस्तावित विधेयक को कानून बनवाना अकेले सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है। यह जिम्मा ऐसे सदनों में बैठे हुए हर किसी का होता है, और यह संसद विपक्ष को भी यह हक देती है कि वे भी वहां कोई प्रस्ताव रख सकते हैं, जिस पर चर्चा हो सकती है, मतदान हो सकता है। ऐसा अधिकार सिर्फ इसलिए नहीं मिलता कि विपक्ष वहां हंगामा करते रहे, और जरूरी काम रूका रह जाए। आज अगर लोकसभा के इस आखिरी सत्र में भी महिला आरक्षण जैसे विधेयक कानून और हकीकत नहीं बन सकते, तो हम देश की इस आधी आबादी की तरफ से ही नहीं, देश में इंसाफपसंद हर किसी की तरफ से ऐसी संसद के भीतर के लोगों को धिक्कारते हैं। अपना जिम्मा पूरा किए बिना इस गरीब देश की गरीब जनता के पैसों से खाना, इसके लिए हिन्दी, ऊर्दू, और बाकी जुबानों में भी एक गाली है। सांसद खुद ही डिक्शनरी में अपने लिए इस शब्द को ढूंढ लें।
जातिगत आरक्षण खत्म करने की जनार्दन द्विवेदी की मांग पर...
5 फरवरी 2014
संपादकीय
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता, प्रवक्ता, और सोनिया परिवार के करीबी समझे जाने वाले, सवर्ण समाज से आए जनार्दन द्विवेदी ने चुनावों के कुछ महीने पहले ही जाति के आधार पर आरक्षण को खत्म करने की मांग की है। और उन्होंने राहुल गांधी से अनुरोध किया है कि सभी समुदायों के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आरक्षण का फायदा दिया जाए। दिलचस्प बात यह है कि इन्हीं दिनों कांग्रेस आरक्षण का विस्तार अल्पसंख्यकों और जाटों जैसे कुछ पिछड़ों तक बढ़ाने की बात करते दिख रही है। ऐसे में जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि जाति के आधार पर आरक्षण समाप्त हो जाना चाहिए था। दलितों और पिछड़ों में सभी को आरक्षण का लाभ मिलता नहीं मिलता। यह सब उपर वालों को मिलता है। समाजिक न्याय की अवधारणा अब जातिवाद में बदल गई है और मैं मानता हूं कि तोड़ा जाना चाहिए।
हम इसके पीछे की कांग्रेस की कोई सोची-समझी राजनीति, या जनार्दन द्विवेदी की एक चूक की बात नहीं सोचना चाहते, और हम पहले कई बार अपनी लिखी जा चुकी सोच को यहां पर दुहराना चाहते हैं। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम आरक्षित तबकों के भीतर मलाईदार तबकों को आरक्षण के फायदों से बाहर करने के बारे में लगातार लिखते आए हैं। आरक्षित जातियों के भीतर जो लोग किसी तरह ताकतवर हो चुके हैं, उन्हीं की अगली पीढिय़ां भी आरक्षण का फायदा पाने की दहलीज तक पहुंच पाती हैं, और आरक्षित जातियों के भीतर के कमजोर लोग, दलितों के भीतर अतिदलित, आदिवासियों के भीतर अतिआदिवासी बनकर नीचे ही पड़े रह जाते हैं।
आरक्षण हो, या रसोईगैस रियायत की बात हो, जिस मलाईदार तबके को नौकरी के आरक्षण के फायदे से, रियायती गैस सिलेंडर के हक से बाहर करना चाहिए, वही तबका तो संसद और विधानसभाओं पर काबिज है, नौकरीशाही और सरकार पर काबिज है, पार्टी संगठनों और पार्टी के चंदादाता तबके पर काबिज है। इसलिए जाति की हो, या गैस की, गरीब के हक को अलग करने का आत्मघाती काम, फैसले का हक रखने वाला मलाईदार सत्तारूढ़ तबका कभी नहीं लेता। और गरीब को रियायत देने के नाम पर यह तबका खुद उस पंगत में बैठकर खाने और डकारने लगता है।
आरक्षित तबके में वास्तव में जिनको गरीबों के लिए सरकार की योजनाओं का फायदा मिलना चाहिए, वह आजादी के 60 साल बाद अपने पिछड़ेपन से उबरे नहीं। अब ऐसे लोगों की सही पहचान करने के लिए सरकारों को महादलित, अति पिछड़े जैसे अल्फाज इस्तेमाल करने पड़ते हैं। जनार्दन द्विवेदी की बात से सहमत हुए बिना भी हम दो बातों पर आते हैं। एक तो यह कि आरक्षित तबके के भीतर मलाईदार तबके को एक झटके से फायदे से दूर कर देना चाहिए। और दूसरी तरफ आरक्षित तबके से बाहर की जातियों के लोगों को उनकी गरीबी को देखते हुए किसी आर्थिक कार्यक्रम का फायदा देना चाहिए, और यह फायदा देश के हर नागरिक को उसकी गरीबी के आधार पर मिलना चाहिए। आरक्षण की व्यवस्था लागू करते समय उसके पीछे किसी जाति को उसका फायदा देने की मंशा नहीं थी। जातियों को इसलिए छांटा गया था कि देश के भीतर सबसे कमजोर, सबसे गरीब, और सामाजिक अन्याय के सबसे बुरे शिकार लोगों की शिनाख्त जातियों के आधार पर आसानी से, और तुरंत हो सकती थी। इसलिए संविधान में दलितों और आदिवासियों को बिना किसी अतिरिक्त पैमाने के, सिर्फ जाति के आधार पर आरक्षण का फायदा दिया गया था, और आज उसके एक बड़े हिस्से पर जिस तरह क्रीमीलेयर काबिज है, उस तस्वीर को बदलने की जरूरत है। राहुल गांधी अगर अपनी पार्टी के जनार्दन द्विवेदी के सार्वजनिक रूप से उछाले गए इस मुद्दे पर कुछ करना चाहते हैं, तो तमाम आरक्षित तबकों के भीतर क्रीमीलेयर को फायदे से बाहर करना सबसे पहला काम होना चाहिए। और जैसा कि हमने ऊपर लिखा है, नेता और अफसर, सांसद और विधायक, चूंकि इसी क्रीमीलेयर से आते हैं, या ओहदों पर आते ही क्रीमीलेयर बन जाते हैं, इसलिए वे मलाईदार तबके को बाहर करने का आत्मघाती फैसला संसद या सरकार में नहीं ले सकते। इसके लिए आरक्षित तबकों के भीतर से एक आंदोलन उठने की जरूरत है।
गंगोत्री में आया एक खालीपन जिससे राष्ट्रीयता की गंगा सूखी
4 फरवरी 2014
संपादकीय
अमरीका में अभी कोका-कोला ने एक इश्तहार बनाया है जिसमें वहां पर बसे हुए अलग-अलग बहुत सी नस्लों और जुबानों वाले लोग एक लाईन, अमरीका खूबसूरत है, अपनी-अपनी जुबान में कहते हैं। इसके खिलाफ वहां के दकियानूसी और कट्टरपंथी लोग उबल पड़े हैं कि अमेरिका इज ब्यूटीफुल, यह लाईन वे दूसरी जुबानों में सुनने का कभी बुरा सपना भी नहीं देखते थे। जिन गोरों को अमरीका पर अपने हक की खुशफहमी है, उनके खिलाफ वहीं के मूल निवासी, आदिवासी, रेड इंडियंस, और दूसरी नस्लों के लोग यह राजनीतिक मुद्दा बनाए रहते हैं कि अमरीका के असली निवासी तो वे ही हैं, और आज वहां राज का सपना देखने वाले गोरे तो बाहर से आए हुए हैं जिन्होंने कि रेड इंडियंस के देश पर कब्जा कर लिया है। वहां के मूल निवासियों और बाद में आए हुए लोगों के बीच एक राजनीतिक टकराव बहुत जाहिर तौर पर चलते ही रहता है।
अमरीका के नस्लभेद पर लिखने का कोई इरादा नहीं है, क्योंकि हिंदुस्तान में अपना खुद का नस्लभेद आज खबरों में है। दिल्ली में दो दिनों में उत्तर-पूर्वी लोगों के साथ बदसलूकी के दो जुर्म सामने आए, एक नौजवान को मार दिया गया, और दो महिलाओं के साथ नस्लभेदी बदसलूकी हुई। अभी हम इन दो घटनाओं को विचार-विमर्श से अधिक महत्व नहीं दे रहे हैं, क्योंकि वहां लाखों या दसियों लाख उत्तर-पूर्वी बसे हुए हैं, और इक्का-दुक्का हादसे तो कहीं भी, किसी के साथ भी होते हैं। लेकिन एक दूसरी बात जो सोचने लायक है, वह यह कि नस्लभेद इतना पुराना इतिहास भी नहीं है कि भारत में एक सदी से भी कम का लोकतंत्र उसे पूरी तरह खत्म कर सके। ब्रिटेन के सैकड़ों बरस पुराने लोकतंत्र, और उसके तहत वहां के भारी लोकतांत्रिक अधिकारों की परिपक्वता के चलते हुए भी वहां नस्लभेदी मामले होते ही रहते हैं।
दरअसल जाति और धर्म, रंग और जुबान के फर्क हजारों बरस से चले आ रहे हैं। इनके बीच का टकराव इतना हल्का और छोटा भी नहीं रहता कि लोकतांत्रिक कानूनों से छपे हुए पन्ने इन टकरावों को खत्म कर सकें। हिंदुस्तान ही नहीं, पश्चिम के सबसे विकसित, सबसे परिपक्व, और सबसे मजबूत कानूनों पर सबसे मजबूत अमल वाले देशों में भी नस्लभेद की न सिर्फ वारदातें होती हैं बल्कि लोगों की सोच में भी धर्म, जाति या राष्ट्रीयता को लेकर पूर्वाग्रह बैठे रहता है। भारत तो अधिक विविधताओं से भरा हुआ देश है, और यहां पर पिछले सैकड़ों बरस अलग-अलग धर्मों के हमलावरों के आने, और देश के ताने-बाने को अपने मुताबिक बांधने के इतिहास के रहे हैं। इसलिए आज एक सदी से कम का लोकतंत्र समाज की बुनियाद में दफन ऐसी ऐतिहासिक हकीकतों से आजाद आसानी से तो नहीं हो सकता। एक मस्जिद के पीछे का मंदिर, और उसके पीछे की मस्जिद, जैसी ऐतिहासिक बातें इस समाज में लोकतांत्रिक चुनावी राजनीति का मुद्दा बनती हैं, और हजारों जानें ले लेती हैं।
अभी कुछ ही वक्त पहले तक हिंदी फिल्मों में दक्षिण भारत के तमाम लोगों को मद्रासी मान लिया जाता था, इस देश की कहावतों में भूखा बंगाली जैसी बातें आम हैं, मराठियों की किफायत को कंजूसी करार दिया जाता है, मेहनतकश और बहादुर सिखों को इन खूबियों के बजाय सिर्फ लतीफों के लायक मान लिया जाता है, जहां मुस्लिमों की देश के लिए वफादारी की चर्चा के वक्त पड़ोस के मुस्लिम देश पाकिस्तान को भुलाया नहीं जाता, जहां कश्मीर को देश का हिस्सा मानने से खासे लोग इंकार कर देते हैं, और यह सोचते हैं कि इसे पाकिस्तान के साथ चले जाने देना चाहिए, जहां मेहनतकश और ईमानदार लोगों की जाति को जूते बनाने की वजह से गाली मान लिया जाता हो, जहां पर दलित और आदिवासियों को आरक्षण की वजह से सरकारी दामाद कहकर गाली दी जाती हो, वहां पर देश में भेदभाव सिर्फ संविधान की ताकत से खत्म किया जा सके, ऐसा नहीं हो सकता।
एक वक्त था जब गांधी और नेहरू जैसे लोग न सिर्फ धर्म और जाति, क्षेत्र और बोली से ऊपर थे, बल्कि वे खुद अपनी निजी जिंदगी में भी इन बातों से ऊपर हो चुके थे, और उनकी बात का हिंदुस्तानी जिंदगी में इतना वजन होता था, कि वे हक के साथ लोगों को भेदभाव खत्म करने के लिए कह सकते थे। आज बड़े-बड़े ओहदों पर, सरकारी और राजनीतिक ताकत की जगहों पर अपने छोटे-छोटे, और इतने हल्के लोग काबिज हैं, कि उनकी कही खोखली बातों की गूंज लतीफों की तरह लगती है। इसलिए आज जब दिल्ली में उत्तर-पूर्वी लोगों पर हमले के खिलाफ प्रदर्शन होने जा रहा है, तो हम सोच रहे हैं कि दिल्ली में आज किसी भी पार्टी के, किसी भी सरकारी या संवैधानिक ओहदों पर बैठे हुए, कौन ऐसे लोग हैं जिनकी आवाज का असर लोगों पर हो सकता हो? यह गंगोत्री में आया एक खालीपन है जिससे राष्ट्रीयता की गंगा सूखी दिख रही है।
केजरीवाल के बहाने, बाकी देश की संभावनाओं से कुछ बातें...
3 फरवरी 2014
संपादकीय
दिल्ली में आम आदमी पार्टी को लेकर जो कुछ चल रहा है उस पर आज यहां लिखना, खुद हमारे पैमाने से इस छोटी सी पार्टी पर बहुत जल्दी-जल्दी, बहुत बड़ी-बड़ी जगह खराब करना है, लेकिन हम इसे दिल्ली का एक स्थानीय मुद्दा न मानते हुए इसे पूरे देश के लिए एक संभावना की तरह देखते हुए इस पर अनुपात से कुछ अधिक लिख रहे हैं। यह जरूरी नहीं है कि आम आदमी पार्टी दिल्ली के बाहर भी इसी नाम या इसी निशान के साथ चुनाव में रहे, हो सकता है कि दूसरी जगहों पर कुछ दूसरे लोग इसी तरह का या इससे बेहतर विकल्प बनकर सामने आएं, और स्थापित राजनीतिक दलों की यथास्थिति को चुनौती दें। हम ऐसी ही संभावना की उम्मीद में आज यहां पर एक बार फिर आम आदमी पार्टी की मिसाल पर कुछ लिख रहे हैं।
इस पार्टी के भीतर आज इसके महिला विरोधी रूख को लेकर इस्तीफे शुरू हुए हैं, और सवाल शुरू हुए हैं। इस पार्टी के मुखिया को अपने अलावा बाकी अधिकतर नेताओं को भ्रष्ट मानने, समझने और कहने को लेकर बहुत से कानूनी नोटिस मिलने लगे हैं, और अदालती कार्रवाई से परे भी लोगों को यह लगने लगा है कि यह पार्टी एक तानाशाह अंदाज में लोगों के अच्छे और बुरे होने पर फैसले कर रही है। इसके अलावा इस पार्टी ने जनजीवन को ध्वस्त करके लोगों का ध्यान खींचने के अराजक तौर-तरीके को स्थापित करने की कोशिश की है, उसे जायज करार दिया है, और इससे भी लोग थके हुए हैं। इस पार्टी ने देश के नियम-कायदों, और दूसरे देशों के साथ भारत के संबंधों के प्रति एक भारी हिकारत दिखाते हुए सड़क और फुटपाथ पर अपनी मर्जी के अदालती फैसले सुनाने का काम किया है, और उसने भी इसकी संभावनाओं को घटाया है।
आम आदमी पार्टी या इस किस्म के दूसरे विकल्प, ऐसी दूसरी संभावनाओं की बात करें, तो इनका अस्तित्व किसी राज्य या देश में स्थापित राजनीतिक दलों के कुकर्मों से बने एक बड़े शून्य की वजह से पैदा होता है। दिल्ली में केजरीवाल का आना इसी तरह का था, और दूसरे भी कुछ राज्यों में समय-समय पर नए राजनीतिक दल, नए नेता, स्थापित राजनीतिक दलों के गलत कामों की वजह से आते रहे हैं, और फिर जनता के बीच की एक तात्कालिक लोकप्रियता को सम्हाल न पाने की वजह से जाते भी रहे हैं, या फिर वे अपने चाल-चलन को बदलकर एक और स्थापित दल बनकर गलत कामों में जुट जाते रहे हैं।
आम आदमी पार्टी के साथ एक दिक्कत यह है कि उसका कोई इतिहास नहीं है, उसका कोई अनुभव नहीं है, उसका कोई राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय अस्तित्व नहीं है, और इन्हीं वजहों से उसकी कोई राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय सोच नहीं है। कुछ हफ्तों पहले हमने इसी जगह लिखा था कि वह दिल्ली की एक म्युनिसिपल की तरह काम कर रही है जिसके जिम्मे पानी और बिजली जैसी स्थानीय जरूरतें हैं, और इस स्थानीय मिजाज के चलते आम आदमी पार्टी न किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर अपनी समझ देश के सामने रखती, और अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर उसकी सोच की तो अभी कल्पना भी नहीं की जा सकती। जिस तरह वायुमंडल में बन गए एक शून्य में समुद्री हवा तेजी से पहुंचकर मौसम को बदल देती है, कहीं बारिश ले आती है, तो कहीं कुछ और, ठीक वैसे ही भ्रष्ट पार्टियों, भ्रष्ट सरकारों के पैदा किए हुए शून्य में आम आदमी पार्टी पहुंच गई। इस पहुंचने में इसकी खुद की कोई ताकत इस्तेमाल नहीं हुई, क्योंकि शून्य बाहर से हवाओं को खींचता है, दिल्ली के चुनावों में इस पार्टी को खींच लिया।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े मानवाधिकारवादी वकील प्रशांत भूषण जैसे लोगों के इस पार्टी के प्रमुख नेता रहते हुए, इस पार्टी के मन में भारत में रह रहे विदेशियों के प्रति, महिलाओं के प्रति, एक भारी हिकारत है, और इसकी सोच महिला विरोधी है, अलोकतांत्रिक है, नक्सलियों की तरह मौके पर खड़े होकर मनमर्जी का फैसला सुनाने की है। इस तरह यह पार्टी अपनी तस्वीर और अपने कामों के बीच एक भारी विरोधाभास का शिकार है। बहुत जल्दी बहुत कुछ कर गुजरने की हड़बड़ी इसे सोचने-विचारने का वक्त भी नहीं दे रही है। हम आज यहां पर इस पार्टी के बारे में नहीं लिख रहे, हम इसे एक मिसाल मानकर लिख रहे हैं, और इसलिए लिख रहे हैं कि ऐसा विकल्प बनना सिर्फ केजरीवाल का एकाधिकार नहीं है, आगे-पीछे देश में जगह-जगह ऐसे स्थानीय विकल्प बन सकते हैं, और ऐसी संभावना आने पर उनको यह समझना होगा कि वे सिर्फ नाली, बिजली, पानी की सोच से एक राजनीतिक दल खड़ा नहीं कर सकते, और न ही वे फुटपाथ पर अदालती इंसाफ का ढोंग कर सकते।
जाते-जाते भी जनता की दौलत लूटना जारी
2 फरवरी 2014
संपादकीय
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की पार्टी द्वारा बर्खास्तगी की खबरें कुछ दिनों से आ ही रही थी, कि जाते-जाते उन्होंने अपने-आपको राजधानी देहरादून में एक बड़ा सा बंगला अलॉट कर लिया। सरकारी माल को अपने हाथ से अपनी जेब में रखने की यह बेशर्मी तब और अधिक हिंसक और अश्लील लगती है जब यह खबर आती है कि इसी शहर में एक आलीशान कॉलोनी में उनका एक बड़ा सा निजी बंगला है। कुल मिलाकर बात यह है कि जनता के पैसों का जितना बेजा इस्तेमाल निजी काम के लिए किया जा सके, उसमें सत्ता पर बैठे अधिकतर लोगों को कोई शर्म नहीं आती है।
आमतौर पर यह देखने में आता है कि अपनी ताकत के नाजायज इस्तेमाल से लोग दूसरों से अपने लिए बंगले अलॉट करवा लेते हैं, जैसे कि लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अपने पिता की स्मृति के नाम पर अगले पचीस बरसों के लिए दिल्ली में बड़ा सा बंगला अपने कार्यकाल के खत्म होते-होते हासिल कर लिया है। यह सिलसिला नया नहीं है। सत्ताधारी लोग लंबे-लंबे समय तक अपना हक खत्म हो जाने के बाद भी बंगलों पर काबिज रहते हैं, और जब उनका किराया-बकाया करोड़ों हो जाता है, तो फिर सरकारें उनको माफ कर देती हैं। अभी बहुगुणा के इस ताजा मामले के बाद देहरादून के एक बहुत पुराने और साख वाले सामाजिक संगठन ने अदालत में एक जनहित याचिका लगाई है।
जनता के पैसों का बेजा इस्तेमाल आज भी जिन लोगों को सत्ता का हक लग रहा है, उनके चेहरों पर कब किस पार्टी और आम नेता के हाथों झाड़ू फिरेगी, उसका पता भी नहीं लगेगा। जब मतगणना के नतीजे सामने आएंगे, तो लोगों को समझ आएगा कि ऐशो-आराम की उनकी हवस उनको कितनी भारी पड़ी। लेकिन जनता के पैसों की फिजूलखर्ची को चुनावी नतीजों से जोडऩा लोकतंत्र नहीं है। ऐसे नतीजे तो पांच-पांच बरस बाद आते हैं, और कई बार तो किसी बुरे के मुकाबले अधिक बुरे के चुनावी मैदान में होने से, ऐसे फिजूलखर्च लोग जीत भी सकते हैं। भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के ऐसे बेजा इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए अदालतों को हक दिए गए हैं, और हमारा यह मानना है कि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के बहुत से जज इसलिए ऐसे मामलों को खुद होकर सुनने से कतराते हैं, क्योंकि वे खुद सत्ता की ताकत से हासिल होने वाली सहूलियतों के आदी रहते हैं। वरना कोई वजह नहीं है कि जनता के पैसों का, जनता की जमीन-जायदाद का ऐसा हिंसक और अश्लील, सामंती और नाजायज इस्तेमाल खबरों में आता रहे, और अदालतें उसे अनदेखा करें। ये वही हिंदुस्तानी अदालतें हैं, जो कि अपने जजों के टै्रफिक जाम में फंस जाने से मिनटों के भीतर पुलिस को अदालत में पेश होने के हुक्म दे देती हैं। हमारा मानना है कि भारतीय लोकतंत्र के तीनों स्तंभों के बीच हक और जिम्मेदारी का जो संतुलन बनाया गया है, उसके तहत अदालतें ऐसे मामलों पर खुद होकर पहल कर सकती हैं, और सत्ता को देश के प्रति जवाबदेह बना सकती हैं।
हम अब आम आदमी पार्टी के प्रशंसक नहीं रह गए हैं, लेकिन इस पार्टी ने भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर सत्ता की सामंती फिजूलखर्ची के खिलाफ देश में जो एक हवा खड़ी की है, उस हवा के रूख को, उसके हमलावर झोंकों को अगर कोई नहीं समझ रहे हैं, तो उनको चुनावों में समझाने की जरूरत है। देहरादून का जो जनसंगठन विजय बहुगुणा की बेशर्मी के खिलाफ अदालत गया हुआ है, उससे देश के बाकी हिस्सों में भी जनसंगठनों को एक संभावना देखनी चाहिए, और अपने-अपने इलाकों में अलोकतांत्रिक और सामंती लूट के खिलाफ जनहित याचिका लेकर अदालत जाना चाहिए। हम यह मानते हैं कि लोकतंत्र में सत्ता का ऐसा कोई भी इस्तेमाल असंवैधानिक है जो कि इस गरीब और भूखे देश की जनता के मुंह का कौर छीनकर सरकारी खजाने से हासिल किया जाता हो। हमारा यह भी मानना है कि पूरे देश में सरकारी बंगलों का इंतजाम खत्म होना चाहिए, और हर कुर्सी पर बैठे लोगों को तनख्वाह के अनुपात में रिहायशी भत्ता मिलना चाहिए, जिससे वे किराए पर घर लेकर या मकान खरीदकर किस्त चुकाकर रहें। अब भी जो लोग समझ और संभल नहीं रहे हैं, उनको समझाने का जिम्मा अदालत का है, और जनता का है।
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