एक और फिल्म बन जाएगी, अब तक सत्तावन

संपादकीय
17 फरवरी 2018


उत्तरप्रदेश में पुलिस ने घोषित और संदिग्ध मुजरिमों पर हमला बोला है, और पिछले महीने-दो महीने में 40 लोगों को मुठभेड़ में मार डाला। अब वहां हालत यह है कि जिन लोगों के खिलाफ कुछ मुकदमे चल रहे हैं, वे लोग तख्तियां लेकर घूम रहे हैं कि वे सुधर जाएंगे, उन्हें न मारा जाए। यह पूरा नजारा महाराष्ट्र में कई साल पहले के एक दौर की याद दिलाता है जब वहां माफिया किस्म के संगठित अपराध करने वाले मुजरिमों को पुलिस एनकाऊंटर में मारती थी और ऐसा करने वाले अफसरों के किरदार पर फिल्में भी बनी थीं। अब तक 56 जैसे नाम वाली फिल्म में जिस असली पुलिस अफसर पर किरदार बनाया गया था, उसे बाद में जमीन के धंधे में माफिया अंदाज में शामिल हो जाने के जुर्म में पकड़ा भी गया था, और सरकार को उसे हटाना पड़ा था। वह बात तो पुरानी हो गई लेकिन अभी हाल ही में फिलीपींस में वहां के राष्ट्रपति ने नशे का कारोबार करने के शक से घिरे हुए लोगों को मारने का हुक्म दिया, और सड़कों पर पुलिस ने इस कदर खूनखराबा किया कि वहां सरकार के मुताबिक 4 हजार और विदेशी जांच समूहों के मुताबिक 14 हजार से अधिक लोगों को पिछले एक बरस से कम समय में सड़कों पर ही मार दिया गया। 
जैसा कि हमने मुंबई की फिल्म का जिक्र किया है, सड़क और फुटपाथ पर तेज रफ्तार इंसाफ का यह सिलसिला किसी फिल्म की तरह ही दिलचस्प लगता है, और लोग इसे देखकर वाहवाही भी करते हैं, तालियां भी बजाते हैं। लेकिन दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि एक वक्त उत्तर-पूर्व में मिजोरम रहा हो, या कि बाद के बरसों में आतंक के दिनों का पंजाब रहा हो, या छत्तीसगढ़ का बस्तर रहा हो, जहां कहीं भी वर्दीधारी फौज या पुलिस को ऐसी खुली छूट मिलती है, वह ज्यादती पर उतर ही आती है। और धीरे-धीरे खुद इंसाफ करने और खुद ही सजा दे देने की बददिमागी उसी तरह वर्दी के सिर पर चढ़कर बोलने लगती है जिस तरह की आज बस्तर में नक्सली जनसुनवाई में किसी को भी पुलिस का मुखबिर करार देते हैं, और मौके पर ही उसका गला रेत देते हैं। सड़क पर इंसाफ का यह सिलसिला बहुत से लोगों को इसलिए भी सुहाता है कि भारत जैसे लोकतंत्र में अदालतों में फैसला होने में जिंदगी गुजर जाती है, और फिर भी दस में से नौ मामलों में गुनहगार छूट भी जाते हैं। इसीलिए एक वक्त था कि मुंबई का एक माफिया डॉन, हाजी मस्तान अपने घर पर सुनवाई करता था, और लोग वहां पर रहम और इंसाफ की भीख मांगते पहुंचते थे, और माफिया की बंदूकों से इंसाफ तय कर दिया जाता था। 
उत्तरप्रदेश में जो हो रहा है, वह लोकतंत्र के ठीक खिलाफ है। लोकतंत्र एक लचीली और खर्चीली, और खासी धीमी प्रक्रिया है जिसमें कोई शॉर्टकट नहीं रहते। लोकतंत्र में हर मुजरिम को सजा भी नहीं मिल पाती क्योंकि अदालतों में उनके गुनाह साबित नहीं हो पाते। ऐसे में सड़क पर इंसाफ और मुठभेड़-हत्या एक बड़ा लुभावना विकल्प लग सकता है, लेकिन तभी तक जब तक कि ऐसी पुलिस की बंदूकों का निशाना दूसरों की तरफ हो। जिस दिन ऐसी बंदूकें किसी बेकसूर की तरफ तन जाएं, उस दिन उस बेकसूर और उसके कुनबे को ताली बजाना भूल जाएगा। हैरानी की बात यह है कि उत्तरप्रदेश की योगी सरकार का यह बहुप्रचारित और स्वघोषित कारनामा न तो वहां के मानवाधिकार आयोग का ध्यान खींच रहा है, न ही उत्तरप्रदेश की लंबी-चौड़ी हाईकोर्ट इसका नोटिस ले रही है, और न ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस पर कुछ बोल रहा है। और तो और, उत्तर भारत के इस भयानक खूनी सिलसिले को लेकर दिल्ली में बसा राष्ट्रीय कहलाने वाला मीडिया भी कुछ नहीं कर रहा है। ऐसा लगता है कि यह लोकतंत्र थका हुआ है, इसके पैरों में अब इंसाफ के लंबे सफर की ताकत बची नहीं है, या फिर जो छोटे-छोटे मुजरिम मारे जा रहे हैं, उनका कोई महत्व नहीं है। हमारा ऐसा ख्याल है कि मारे गए इन 40 मुजरिमों ने कुल मिलाकर कुछ करोड़ रूपए का ही कोई अपराध किया होगा जिससे 11 हजार करोड़ अधिक का अपराध करके एक हीरा कारोबारी देश छोड़कर जा चुका है। इस लोकतंत्र में जिंदा रहने के लिए, और जेल से बचने, देश छोडऩे के लिए बड़ा मुजरिम होना जरूरी है, छोटे मुजरिम को इसी तरह सड़क पर मार दिया जाएगा, और उसकी गिनती को जोड़कर एक और फिल्म बन जाएगी, अब तक सत्तावन। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 फरवरी

स्कूल-कॉलेज में गीता पढ़ाने की मांग में जनहित क्या है?

संपादकीय
16 फरवरी 2018


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका पर सुनवाई चल रही है जिसमें एक संगठन ने अदालत से ऐसा आदेश जारी करने की मांग की है कि स्कूल-कॉलेज के कोर्स में गीता पढ़ाई जाए। यह कहा गया कि जब अदालत तीन तलाक के मामले में सरकार को नीति और कानून बनाने का आदेश दे सकती है, तो फिर इस मामले में क्यों नहीं? बहस के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि ऐसा करने पर हो सकता है कि कुरान और बाइबिल को भी कोर्स में शामिल करने की मांग उठे, और तब क्या होगा? इसके जवाब में वकील ने गीता को कुरान और बाइबिल से अलग किस्म का ग्रंथ बताते हुए उसके कुछ हिस्से पढ़कर बताए। 
आज देश में जैसा धार्मिक उन्माद छाया हुआ है, उसके चलते इस बात में कुछ अटपटा नहीं लग रहा कि लोग किसी एक धर्म को स्कूल-कॉलेज के बच्चों पर लादने के लिए ऐसी कानूनी कोशिश करें, क्योंकि इस मकसद से देश के कई लोग तो तरह-तरह की गैरकानूनी कोशिश भी कर रहे, यह कम से कम कानून के रास्ते तो है। लेकिन सवाल उठता है कि स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई में धर्म का क्या काम है? हिन्दुस्तानी बच्चों को वैसे भी क्लासरूम की पढ़ाई, और होमवर्क से इस कदर लादा गया है कि उनकी सीखने और सोचने-समझने की क्षमता पूरी तरह कुचलकर रख दी जाती है। आज ही सुबह सोशल मीडिया पर एक अमरीकी डॉक्यूमेंट्री मेकर की फिनलैंड की पढ़ाई पर बनाई गई एक छोटी फिल्म दिख रही थी जिसमें उस देश को दुनिया का सबसे उम्दा पढ़ाई वाला देश बताया जा रहा था, और अमरीका का नंबर 29वां था। फिनलैंड में स्कूल-कॉलेज के बच्चों को घर पर कुछ नहीं करना होता, और हफ्ते में बीस घंटे से अधिक की कोई पढ़ाई नहीं होती। हिन्दुस्तान में किताबों के बोझ को बढ़ाकर ज्ञान और समझ दोनों को बढ़ाने की खुशफहमी पाल ली जाती है, लेकिन इस बोझ से होता इसका ठीक उल्टा है। 
लेकिन यहां का मुद्दा स्कूल-कॉलेज के कोर्स में धर्म के कुछ पाठ से बढऩे वाले बोझ का मुद्दा नहीं है, इस चर्चा का मुद्दा यह है कि पढ़ाई में धर्म की कोई दखल क्यों होनी चाहिए? और आज अगर इस धर्मनिरपेक्ष देश में गीता को शामिल किया गया, तो जैसा कि जजों ने सवाल किया है, कुरान और बाइबिल को कैसे मना किया जा सकेगा? और फिर बुद्ध की नसीहत, जैन दर्शन, गुरूग्रंथ साहब जैसी और बहुत सी अलग-अलग धर्मों की बातों को किताबों से बाहर कैसे रखा जा सकेगा? धर्म को लेकर एक बहुत ही कट्टर और दकियानूसी जिद हिन्दुस्तानी सोच पर लादी जा रही है, और ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि आबादी के बहुमत का धर्म ही राजकीय और राष्ट्रीय धर्म है। इस तरह की बातें करते हुए, और कानूनी पहल करते हुए इस बात को पूरी तरह अनदेखा किया जा रहा है कि गीता को मानने वाले लोगों के पांवों तले कुचलकर दलित और आदिवासी दूसरे धर्मों की तरफ जाने पर मजबूर हुए थे, और आज भी हैं। आदिवासियों का मूल धर्म एक अलग तरह का प्रकृति-पूजक धर्म है, न कि हिन्दू या सनातनी धर्म। दूसरी तरफ सनातनी जिद और ज्यादती के चलते हुए ही दलितों का एक बड़ा तबका कहीं पर बौद्ध बना, कहीं पर मुस्लिम हुआ, और कहीं ईसाई भी हुआ। कोर्स की किताबों में धर्म को घुसाने की यह कोशिश इस बात को पूरी तरह अनदेखा करती है कि दुनिया के बाकी देशों की तरह हिन्दुस्तान में भी बहुत से लोग नास्तिक हैं, और उन पर कोई भी धर्म पढऩे की मजबूरी क्यों लादी जाए? 
यह देश में धार्मिक उन्माद को बढ़ाने वाली एक जनहित याचिका है, और हमें थोड़ी सी हैरानी इस बात को लेकर है कि किसी एक धर्म को स्कूल-कॉलेज की किताबों में शामिल करने की मांग को अदालत ने जनहित याचिका माना, और उस पर सुनवाई करते हुए देश के शैक्षणिक संस्थानों से जवाब भी मांगा है। यह बात हैरान करती है कि अदालतों के पास ऐसी बात की सुनवाई के लिए वक्त दिख रहा है, और किसी एक धर्म की जिद को, दूसरे धर्मों के समानता के अधिकार के ऊपर रखने को जनहित याचिका माना गया। खैर, अदालत की अपनी सोच हो सकती है, लेकिन यह एक बड़ा खतरनाक खेल है, देश में धार्मिक समानता के खिलाफ तो यह है ही, स्कूल-कॉलेज के बच्चों के पूरे भविष्य को भी खतरे में डालने की यह पहल है। हमारा ख्याल है कि देश की अदालतों ने कई मामलों में जनहित याचिका लगाने वाले लोगों या संगठनों पर समय-समय पर जुर्माना भी लगाया है कि उन्होंने अदालत का समय खराब किया। देखना है कि इस याचिका का निपटारा करते हुए अदालत क्या तय करता है। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 16 फरवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 16 फरवरी

राज्य की संपन्नता तो ठीक है, लेकिन बर्बादी भी रोकी जाए

संपादकीय
15 फरवरी 2018


छत्तीसगढ़ सरकार ने अभी अपना इस कार्यकाल का आखिरी बजट पेश किया है और उसने शहरों के विकास और लोक निर्माण विभाग के काम के लिए हजारों करोड़ रूपए रखे हैं। इसके अधिक आंकड़ों में जाना आज का मकसद नहीं है, और यह समझने की जरूरत है कि ऐसे हजारों करोड़ रूपए के खर्च में कहां-कहां किफायत की गुंजाइश है। यह बात इसलिए जरूरी है कि सरकार के पास चाहे शहरों को सुविधापूर्ण और सुंदर बनाने के लिए हजारों करोड़ रूपए हों, और बाकी निर्माण कार्यों के लिए और हजारों करोड़ रूपए हों, इनके साथ-साथ यह हकीकत भी जुड़ी हुई है कि प्रदेश की करीब आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और एक-दो रूपए किलो चावल मिलने पर वह तीन वक्त पेट भर पाती है। इसलिए ऐसे गरीब राज्य, या कि ऐसे गरीबों वाले राज्य के खर्च को बहुत चौकन्नेपन के साथ करने की जरूरत है। 
हम एक छोटी सी मिसाल को लेकर बात करना चाहते हैं, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की। चूंकि यह पूरे प्रदेश का केन्द्र है, इसलिए स्थानीय म्युनिसिपल के अलावा राज्य सरकार भी यहां पर म्युनिसिपल-सीमा में सैकड़ों करोड़ रूपए खर्च करती है। ऐसे में जाहिर है कि राजधानी के कई तरह के कामकाज अतिसंपन्नता के शिकार हैं। बहुत से काम यहां इसलिए हो रहे हैं कि यहां पर शहर को स्मार्ट सिटी बनाने का काम भी चल रहा है, जिस पर और सैकड़ों करोड़ रूपए खर्च हो रहे हैं। यहां आए दिन दिखता है कि सड़कों के किनारे करोड़ों रूपए खर्च करके बनाए जाते हैं, सड़कों के बीच कांक्रीट के डिवाइडर बनाए जाते हैं, और फिर कुछ महीनों के भीतर ही इनमें से कई हिस्से तोड़कर या तो केबल बिछाई जाती है, या फिर कोई पाईप लाईन डाली जाती है, या डामर की सड़क को हटाकर कांक्रीट की सड़क बनाई जाती है, और उसके ऊपर फिर दुबारा डामर की सड़क बन जाती है। 
यह राज्य चूंकि आर्थिक रूप से संपन्न राज्य है, इसलिए इस बात का अहसास नहीं हो पाता कि फिजूलखर्ची और बर्बादी कितनी अधिक हो रही है। चूंकि इस राज्य में बरसों से सूखा नहीं पड़ा, चूंकि सरकार के ऊपर किसी और किस्म की कुदरती मुसीबत नहीं आई, इसलिए सरकार के पास हर काम के लिए बहुत सा पैसा दिखता है। लेकिन शहर पर खर्च करने के लिए अगर सरकार के पास बहुत पैसा है भी, तो भी उसे किफायत के साथ खर्च करना चाहिए, क्योंकि एक बार खर्च में लापरवाही की आदत अगर पड़ जाती है, तो पैसा चले जाता है, वह आदत रह जाती है। राज्य सरकार अगर अपने रायपुर जैसे शहर का एक ऑडिट करवाए कि किस खर्च के बाद कितने दिनों में उसे बर्बाद करके, उसे मिटाकर, तोड़कर दुबारा उस जगह पर खर्च किया गया तो इन 14 बरसों में अकेले रायपुर शहर में ऐसी सैकड़ों करोड़ की फिजूलखर्ची और बर्बादी निकल जाएगी। हम अपने आसपास चारों तरफ आए दिन सरकारी कांक्रीट की तोडफ़ोड़, फिर उसके ढेर, और फिर वहां पर दुबारा काम देख-देखकर थक गए हैं। राज्य सरकार को चाहिए कि वह सरकार के बाहर की किसी ऐसी निगरानी एजेंसी की मदद ले जो कि इस बात की शिनाख्त कर सके कि कौन-कौन सी बर्बादी टाली जा सकती थी, टाली जानी चाहिए थी, लेकिन वैसा हो नहीं पाया। अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल न होने से, या कि किसी एक विभाग के भीतर भी तालमेल न होने से ऐसी बर्बादी हो रही है। इस सरकार का कार्यकाल अब अधिक लंबा नहीं बचा है, लेकिन अच्छी परंपराएं शुरू करने के लिए कोई भी वक्त बुरा नहीं होता, और कोई भी काम लेट नहीं होता। 
छत्तीसगढ़ सरकार को अपने कामकाज में बेहतर समन्वय की, एक चौकन्नी ऑडिट की जरूरत है, और इससे प्रदेश भर में हजारों करोड़ रूपए बचेंगे, जिससे कि अधिक जरूरत के कई काम हो सकेंगे। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 फरवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 14 फरवरी

मातृ-पितृ दिवस का यह पाखंड खत्म किया जाए

संपादकीय
14 फरवरी 2018


सभ्य दुनिया में आज प्रेम का पर्व वेलेंटाइन डे मनाया जा रहा है, और इसके लिए प्रेमी दिलों ने फूलों और तोहफों की तैयारी कर रखी थीं। दूसरी तरफ प्रेम से नफरत करने वालों ने प्रेमियों को मारने के लिए लाठियों को तेल पिला रखा था। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में प्रशासन और पुलिस गुंडों को रोकने और जेल भेजने के बजाय बाग-बगीचों से लड़के-लड़कियों को, दोस्तों और प्रेमी जोड़ों को बाहर रखने के लिए हथियार लेकर जवान तैनात कर रखे हैं। नतीजा यह है कि गुंडागर्दी रोकने के बजाय, नफरत और हिंसा रोकने के बजाय, सरकार की पूरी ताकत प्रेम को रोकने में झोंक दी गई है। 
इस राज्य में कुछ बरस पहले, उस वक्त बापू कहलाने वाले, और अब आसाराम रह गए एक आदमी ने सरकार को सलाह दी थी कि वेलेंटाइन डे को मनाना बंद करके 14 फरवरी के इस अंग्रेजी तारीख वाले त्यौहार के दिन मातृ-पितृ दिवस मनाया जाए। चूंकि उस वक्त आसाराम, बापू भी कहलाता था इसलिए सरकार ने उसके पांव छूते हुए वह राय मान ली थी, और सरकारी स्तर पर, सरकारी खर्च पर, स्कूलों में यह नए मुखौटे वाला त्यौहार शुरू हो गया था। यह फेरबदल करते हुए सरकार ने किसी भी समाजशास्त्री या मनोवैज्ञानिक से यह सलाह नहीं ली थी कि नौजवान पीढ़ी को, लड़के-लड़कियों को अगर स्वाभाविक प्रेम से रोका जाएगा, तो उनके मानसिक विकास पर क्या फर्क पड़ेगा। यह देश इसी तरह के धर्मान्ध पाखंडियों की राय पर अपनी रीति-नीति बदलते रहता है, और यही वजह है कि नौजवान पीढ़ी से लेकर बच्चों तक को अंतहीन बलात्कारों का शिकार होना पड़ता है, कुंठाओं में जीना पड़ता है, और अपनी स्वाभाविक संभावनाओं से कोसों पीछे रहकर मन मारकर दूसरे सभ्य देशों को हसरत से देखना पड़ता है। 
इस देश के इतिहास में इतनी बड़ी मूर्खता कभी नहीं थी कि नौजवान लड़के-लड़कियों को प्रेम से रोका जाए। सैकड़ों बरस पहले का संस्कृत साहित्य प्रेम की कहानियों से, प्रेम की बातों से ऐसा लबालब है कि उसमें से मादक रस टपकते ही रहता है। एक तरफ तो अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति, और अपनी संस्कृत भाषा की रक्षा के लिए भारतीय संस्कृति के ठेकेदार लाठियां लेकर चौबीसों घंटे तैनात रहते हैं, और दूसरी तरफ अपने ही देश के सांस्कृतिक इतिहास में प्रेम की जो लंबी परंपरा रही है, कृष्ण के गोपियों के साथ रास की जो कविताएं, जो तस्वीरें सैकड़ों बरस से चली आ रही हैं, उन सबको अनदेखा करके प्रेम को कुचलना भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म साबित किया जा रहा है। 
नौजवान दिलों की भावनाओं को कुचलकर उससे उनके मां-बाप के लिए सम्मान का प्रतीक चिन्ह नहीं गढ़ा जा सकता। इंसान की जिंदगी में मां-बाप की जरूरत भी होती है, बच्चों की जरूरत भी होती है, और प्रेम या/ और सेक्स की जरूरत भी होती है। इनमें से कोई भी जरूरत एक-दूसरे का विकल्प नहीं होती, जिस तरह जिंदगी मौत का विकल्प नहीं होती, मौत जिंदगी का विकल्प नहीं होती, भजन भोजन का विकल्प नहीं होता, और भोजन भजन का विकल्प नहीं होता, जिंदगी में हर बात की अलग-अलग जगह और जरूरत होती हैं। इनको एक-दूसरे से गड्डमड्ड करके कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। जिस आसाराम ने वेलेंटाइन डे के खिलाफ, नौजवानों के प्रेम के खिलाफ बकवास की थी, वही आसाराम मन में कैसी हिंसक भावनाएं रखता था, यह उसके बलात्कार की शिकार नाबालिग बच्ची के बयान में खुलकर सामने आया है। 
उत्तर भारत में जगह-जगह साम्प्रदायिक और हिंसक संगठन आज लड़के-लड़कियों पर जगह-जगह हमले कर रहे हैं, और लखनऊ विश्वविद्यालय ने पहले से नोटिस जारी करके आज के दिन लड़के-लड़कियों को विश्वविद्यालय-परिसर में घुसने से भी मना कर दिया है। ऐसे पाखंडी देश में अब समझदार प्रदेशों को बिना देर किए हुए भारतीय संस्कृति को कुचलने वाले ऐसे मातृ-पितृ दिवस की इस ताजा-ताजा परंपरा को तुरंत खत्म करना चाहिए। और इसके साथ ही प्रेम के ऐसे दिनों पर होने वाली गुंडागर्दी को भी खत्म करना चाहिए जो कि हिन्दू धर्म, हिन्दुत्व, और भारतीय संस्कृति, इन सबको बदनाम करती है। नौजवान अगर प्रेम नहीं कर पाएंगे, तो कुंठा और भड़ास में वे हिंसा की तरफ बढ़ेंगे। सरकार को अपने ऐसे अवैज्ञानिक फैसले को बिना अधिक देर किए हुए वापिस लेना चाहिए। मां-बाप की इज्जत करने के लिए प्रेमी दिलों की इज्जत का कत्ल जरूरी नहीं है।(Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार 

भारतीय विदेश नीति का पाक-मोर्चा नाकामयाब

संपादकीय
13 फरवरी 2018


जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर भारतीय फौज पर सरहद पार से आए हुए आतंकियों ने हमला किया, और पिछले दो-तीन दिनों से लगातार यह मोर्चा जारी है। इस बार सैनिकों पर हमला नहीं हुआ है, बल्कि फौजी छावनी के रिहायशी हिस्सों पर हमला हुआ है, और वहां से सैनिकों के परिवारों को किसी तरह बाहर निकाला गया है। बहुत से लोग जख्मी हैं, और कई हिन्दुस्तानी सैनिक शहीद हुए हैं। भारतीय सेना का कहना है कि हमलावरों के पास जो सामान मिले हैं उनसे यह जाहिर है कि हमलावर पाकिस्तान से आए हुए थे। इसे लेकर भारतीय रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन ने कहा है कि पाकिस्तान को इसके सुबूत दिए जाएंगे और जवाब भी दिया जाएगा। 
जैसा कि बार-बार जाहिर हो चुका है, पाकिस्तान का लोकतंत्र बेकाबू है और वहां एक तरफ तो फौज कई किस्म के फैसले सरकार से परे लेती है, जिसमें भारत की सरहद पर कई किस्म की हरकतें शामिल हैं। दूसरी तरफ कई आतंकी संगठन पाकिस्तान में लगातार हिंसा करते हैं, और उनमें से कुछ लोग कश्मीर की आजादी के फतवे के साथ भारत पर भी हमले करते हैं। ऐसे में जब मुंबई पर हमला हुआ, और हमलावर पाकिस्तान के निकले, तो पूरी दुनिया की नजरों में पाकिस्तान आतंकियों की पनाहगाह की तरह साबित हुआ। लेकिन सत्ता में आने के पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान के खिलाफ जितने किस्म के बड़े-बड़े दावे करते थे, आज उनमें से कोई भी पूरा होते हुए नहीं दिख रहा है जबकि हिन्दुस्तानी इलाकों पर, हिन्दुस्तानी फौज पर आए दिन हमले हो रहे हैं। हम हमले का जवाब हमले से ही देने को जरूरी नहीं समझते, और एक लोकतांत्रिक सरकार को फौज से परे के विकल्पों को कामयाब बनाने पर भी सोचना चाहिए। काम सम्हालने के बाद से अब तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी पाकिस्तान-नीति में बड़े झटके वाले कई फैसले लिए, लेकिन उनका असर दिख नहीं रहा है। उन्होंने सारी परंपराओं को तोड़कर पाकिस्तान के तब के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के घर की शादी और उनकी सालगिरह पर बिना बुलाए वहां पहुंच जाने का काम भी किया, लेकिन भारत के खिलाफ पाकिस्तानी जमीन से आतंकी हमले थमे नहीं, और हिन्दुस्तान बहुत जिंदगियों को खो चुका है, बहुत सैनिक शहीद हो चुके हैं। 
हम सरहद पर किसी फौजी टकराव की वकालत नहीं कर रहे, लेकिन ऐसी नौबत को टालने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को जो कामयाबी हासिल करनी थी, वह दूर-दूर तक दिख नहीं रही है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले तक पाकिस्तान के साथ रिश्ते जैसे थे, आज उससे अधिक खराब ही दिख रहे हैं। एक तरफ तो अमरीका जैसा देश अपने नए राष्ट्रपति की अगुवाई में पाकिस्तान को एक आतंकी देश जैसा करार दे रहा है, लेकिन इसके बावजूद भारत दूसरे देशों के बीच या संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान को अलग-थलग नहीं कर पा रहा है। जैसे-जैसे कूटनीतिक मोर्चे पर नाकामयाबी होती है, वैसे-वैसे सरहद पर फौजी टकराव का खतरा बढ़ते चलता है। यह नौबत खतरनाक है क्योंकि मोदी सरकार की आंतरिक चुनावी-प्राथमिकताओं को अगर देखें, तो अगले आम चुनाव के पहले पाकिस्तान के साथ ऐसा कोई टकराव एक लुभावना चुनावी मुद्दा हो सकता है। लेकिन ऐसी जंग किसी के लिए भी ठीक नहीं होगी। भारत लगातार हमलों को झेलते हुए चुप भी नहीं बैठ सकता, और पाकिस्तान के साथ किसी बातचीत के हालात बचे नहीं हैं। ऐसे में मोदी सरकार को अपनी पूरी पाकिस्तान नीति के बारे में एक बार फिर से सोचना चाहिए। जब अमरीका जैसा पाकिस्तान का बड़ा मददगार आज उसे आतंक का साथ देने वाला मान रहा है, तो ऐसे में भारत के लिए राह जितनी आसान होनी थी, वैसी दिख नहीं रही है। भारत की विदेश नीति में पाकिस्तान का मुद्दा सबसे हावी रहता है, और इस मोर्चे पर नाकामयाबी सरकार की बाकी कामयाबी को भी ढांककर रख देगी। (Daily Chhattisgarh)