भूखों का पेट भरना, या महज आस्था-प्रदर्शन ?

संपादकीय
09 जनवरी 2017


शहरों में आए दिन सड़क किनारे धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यक्रमों का प्रसाद बंटते दिखता है। अपनी आस्था दिखाने के लिए लोग राह चलते लोगों को खिलाते-पिलाते हैं, और लोग हैं कि कुछ आस्था की वजह से, और कुछ मुफ्त मिलने की वजह से ऐसे स्टॉल पर टूट पड़ते हैं। जगह-जगह ट्रैफिक जाम तो होता ही है, यह खाना-पीना खत्म होने के बाद आसपास दूर-दूर तक जूठन बिखरी दिखती है, खाली पत्तल-दोना, प्लास्टिक की गिलासें और तरह-तरह की गंदगी अगली सुबह तक पड़ी रहती है। आयोजकों को लगता है कि वे ईश्वर को खुश करने में कामयाब हो रहे हैं, गरीबों को खाना खिला रहे हैं, भूखों को पेट भर रहे हैं, और ऐसी सोच के चलते गंदगी फैलाने में उन्हें कोई आत्मग्लानि नहीं होती।
अब सवाल यह है कि आस्था का ऐसा प्रदर्शन किस काम का जो किसी ईश्वर और गुरू के नाम पर ऐसी गंदगी छोड़ जाए, कि आस्थाहीन लोग, या भरे पेट वाले लोग वहां से गंदगी को गालियां देते हुए गुजरें? दूसरी बात यह है कि ऐसे जो आयोजक यह समझते हैं कि वे भूखों को खाना खिला रहे हैं, तो वे शहरी गरीबों को तो खाना खिला रहे हैं, लेकिन वे भूखे नहीं होते। शहरों में तो सड़क से गुजरते हुए भिखारी भी भूखे नहीं होते, और शहर में कमाई की जो संभावना रहती है, उसकेचलते हुए ही भिखारी भी किसी वृद्धाश्रम में जाने के बजाय सड़कों पर ही रहना पसंद करते हैं। ऐसे शहरों में जब राह चलते लोगों को भूखा मानकर उन्हें खिलाया जाता है, तो वे मुफ्त का तो जरूर खा लेते हैं, लेकिन वे बेबस भूखे नहीं होते, शहरों में हर किसी को इतनी मजदूरी तो मिल ही जाती है कि उनका पेट भर जाता है।
ऐसे में आस्था का प्रदर्शन करने वालों को अपने ईश्वर या अपने गुरू के सम्मान के लिए कुछ बुनियादी बातों को तय करना चाहिए। पहली बात तो यह कि वे कोई गंदगी छोड़कर न जाएं, दूसरी बात यह कि वे रास्ता जाम न करें, और तीसरी बात यह कि वे इस बारे में भी सोचें कि क्या वे सचमुच गरीबों को खिला रहे हैं, या आम हिन्दुस्तानी अपनी आदत के मुताबिक राह चलते वहां पर कतारों में लग रहे हैं, या भीड़ बढ़ा रहे हैं? अगर सचमुच ही सबसे जरूरतमंद गरीब की मदद करनी है, तो इसके लिए लोगों को शहरों से दूर जाना पड़ेगा, और गांवों में जाकर बुजुर्गों को देखना पड़ेगा। हो सकता है कि शहरों में भी जरूरतमंद बुजुर्ग मिल जाएं, लेकिन हमारी सलाह में एक खतरा भी रहेगा कि ऐसे में आस्था का प्रदर्शन नहीं हो सकेगा।

भगत सिंह की सोच पर हमला, और नाम पर एक करोड़ ईनाम

संपादकीय
08 जनवरी 2017


एक खालिस हिंदुस्तानी खेल, कुश्ती पर इतिहास का सबसे बड़ा ईनाम हरियाणा की सरकार ने घोषित किया है। फ्री स्टाइल कुश्ती पर विजेता को एक करोड़ रुपये नगद दिए जाएंगे। एक करोड़ के अलावा पचास लाख और पच्चीस लाख के दूसरे और तीसरे ईनाम भी हैं। और ये पुरस्कार भगत सिंह, राजगुरु, और सुखदेव, इन तीन महान शहीदों की याद में रखे गए हैं।
भगत सिंह का ऐसा सम्मान बहुत अच्छा लगता, अगर इसी हरियाणा से लगे हुए पंजाब में, और भाजपा की ही भागीदारी वाली अकाली सरकार के तहत लुधियाना में अभी तीन दिन पहले किताब की दुकानों से भगत सिंह की किताबें हटाने के लिए हिंदू संगठनों ने उग्र प्रदर्शन न किया होता, और तोडफ़ोड़ न की होती। इनकी शिकायत थी कि भगत सिंह की वह किताब बेची जा रही है जो उनके नास्तिक होने के बारे में है। उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट भी लिखाई कि यह दुकान और यह किताब नास्तिकता फैलाने का काम कर रही है। इसी पंजाब में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम भगत सिंह के नाम पर करने के लिए एक आंदोलन चल रहा है, और उसके खिलाफ भी भाजपा सरकार ने संघ के एक नाम को बढ़ाया है।
यह अकेला मौका नहीं है जब किसी शहीद या किसी महान के नाम का इस्तेमाल अपने राजनीतिक फायदे के लिए तो सरकारें या संगठन करते हैं, और जब उनकी विचारधारा की बात आती है, तो उसके ठीक उल्टे काम करते हैं। भगत सिंह की तस्वीरों को आज इस देश में ऐसी मंच पर टंगे देखा जाता है जहां से धर्मांधता और साम्प्रदायिकता को बढ़ाने के अलावा कोई काम नहीं होता। मतलब यह कि भगत सिंह के नाम को, उसकी शहादत को, भगत सिंह के ही सिद्धांतों के खिलाफ पूरी तरह दुह लिया जाए। ऐसा ही जगह-जगह कबीर के नाम के साथ होता है। भारत सरकार ने कबीर के नाम पर एक सम्मान घोषित किया हुआ है, बुनकर सम्मान। अब कबीर का योगदान इस दुनिया को महज उनकी बुनकरी का रह गया हो यह बात सरकारों और राजनीतिक दलों को इसलिए भी माकूल बैठती है कि कबीर के बुने हुए कपड़े इस देश के नेताओं पर किसी पाखंड के खिलाफ राजनीतिक और सामाजिक चेतना नहीं थोपते। कपड़ा तो नर्म होता है, और कबीर की बानी तो धर्मांधता के खिलाफ कड़ा वार करने वाली थी।
विवेकानंद को इस देश का एक महानतम व्यक्तित्व साबित करने वाले अनगिनत हिंदू संगठन उनकी पोशाक से भगवा रंग तो पेश कर देते हैं, लेकिन विवेकानंद ने धर्मांधता और पाखंड के खिलाफ जो कुछ लिखा था, उसे बहुत सोच-समझकर दफन कर देते हैं। ऐसा ही सावरकर की सोच के साथ किया जाता है। सावरकर तो एक वीर स्वतंत्रता सेनानी की तरह तो पेश किया जाता है, लेकिन गाय को काटने और गोमांस खाने के पक्ष में सावरकर के लंबे-चौड़े अनगिनत लिखित तर्कों को दबा दिया जाता है, अनसुना कर दिया जाता है।
यह देश बड़ा अजीब है, गांधी को समाज और सोच में जगह नहीं देता, नोटों पर जगह देता है, और गांधी के नाम पर नोट चलाए जाते हैं, और गोडसे की सोच के नाम पर वोट मांगे जाते हैं। भगत सिंह को जानने वाले यह समझ सकते हैं कि उनकी सोच का कत्ल करने वाले लोग अगर उनके नाम पर दंगल में एक करोड़ रुपये का ईनाम रख रहे हैं, तो यह पंजाब में होने जा रहे चुनाव में उस समाज के वोटों को प्रभावित करने का तरीका है, जिस समाज में भगत सिंह पैदा हुए थे, और आगे चलकर जो नास्तिक हो गए थे।

पतझड़ की पत्तियों से रवानगी सीखने की जरूरत इंसानों को

संपादकीय
07 जनवरी 2017


भारतीय क्रिकेट के सबसे कामयाब कप्तान रहे महेन्द्र सिंह धोनी ने एक-एक करके हर तरह की क्रिकेट की कप्तानी से सन्यास ले लिया है, और अब वे महज एक खिलाड़ी की हैसियत से खेलना जारी रखेंगे, तब तक जब तक कि चयनकर्ता उन्हें चुनते रहेंगे। कुछ लोगों को यह बात अटपटी लग सकती है कि इतने कामयाब लोग भी धक्का देकर हटाने के बजाय खुद होकर महत्व की किसी जगह को कैसे छोड़ पाते हैं। लेकिन लोगों को याद होगा कि अभी कुछ दिन पहले ही न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री ने अपने परिवार को अधिक समय देने के लिए इस्तीफा देने की घोषणा की है, और कहा है कि उनके बच्चे उनके पीएम रहने से एक अनावश्यक तनाव में काम करते हैं, और वे उन्हें एक सुकून देने के लिए वे इस्तीफा दे रहे हैं। दुनिया के कई ऐसे अच्छे विश्वविद्यालय हैं जहां पर किसी विभाग का प्रमुख बनने के बावजूद वहां के प्राध्यापक विश्वविद्यालय के सामने यह शर्त रख देते हैं कि वे लगातार विभाग-प्रमुख का काम नहीं देखेंगे, क्योंकि उनका पढ़ाना और शोधकार्य प्रभावित होते हैं। ऐसे में वहां पर सबसे वरिष्ठ दो-तीन प्राध्यापक बारी-बारी से विभाग-प्रमुख का जिम्मा उठाते हैं।
खेलों में कभी-कभी ऐसा देखने में आता है कि खिलाड़ी या कप्तान अपने करियर की ऊंचाई पर रहते हुए या तो मुकाबलों से सन्यास ले लेते हैं, या फिर कप्तानी से, और हो सकता है कि किसी ने इन दोनों से भी एक साथ सन्यास लिया हो। हमारा यह मानना है कि जहां टीम में रहना या कि कप्तान बनना दूसरे लोगों पर निर्भर करता हो, वहां पर अपनी ऊंचाई पर रहते हुए ही लोगों को खुद होकर बाहर हो जाना चाहिए। लेकिन जहां निजी प्रदर्शन की बात हो, वहां पर लोगों को खेलना तब तक जारी रखना चाहिए जब तक वे अच्छा रिकॉर्ड कायम रख सकें, और जहां उनकी रफ्तार घटने लगे, उनके धीमेपन से टीम पर असर होने लगे, तब उन्हें खुद होकर बाहर हो जाना चाहिए। भारतीय क्रिकेट टीम ने ऐसे भी खिलाडिय़ों को देखा है जो कि किसी रिकॉर्ड पर पहुंचने के लिए खेलते चले जाते हैं, उनका खेल धीमा हो चुका रहता है, वे खुद डरे-सहमे खेलते हैं, लेकिन सन्यास नहीं ले पाते। ऐसे लोगों में कुछ महान खिलाड़ी भी रहे हैं, जिनकी महानता को याद करते हुए कोई उन्हें यह याद भी नहीं दिला पाते कि अब उनका जाने का वक्त आ गया है।
यह बात जिंदगी के हर दायरे में लागू होती है कि लोगों को वक्त रहते अपनी जगह दूसरों के लिए खाली कर देनी चाहिए। ऐसा कारोबार में बाप-बेटे के बीच भी हो सकता है, या कि राजनीति में दो पीढिय़ों के बीच हो सकता है, और कुनबों से परे भी ऐसी बात अलग-अलग लोगों के बीच हो सकती है। अब जैसे कल की ही बात है भाजपा में मार्गदर्शक मंडल नाम के वृद्धाश्रम में भेज दिए गए लालकृष्ण अडवानी भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में तो पहुंचे, लेकिन अनमने ढंग से कुछ देर में ही वहां से निकल गए, और कार्यक्रम में रूके ही नहीं। आज की भाजपा की राजनीति में उनकी कोई जगह बची नहीं है। ऐसे में यह अनमनापन छोड़कर उन्हें वनागमन की सोचना चाहिए, और अपने आपको पार्टी की राजनीति से अलग करके देश के हित में लिखना-पढऩा चाहिए, और समकालीन भारतीय राजनीतिक इतिहास के खुलासे करने चाहिए। इंसानी जिंदगी में तो यह हो नहीं पाता कि घर-परिवार में कोई इस्तेमाल न बचने पर लोग खुद होकर चल बसें, लेकिन लोगों को सार्वजनिक जगहों से रवानगी सीखनी चाहिए।
धोनी ने कामयाबी को छूकर, वहां पर कायम रहकर, और कप्तानी छोड़कर खेल जारी रखने की जो एक नई और ताजा मिसाल सामने रखी है, उससे बहुत से लोगों को सबक लेना चाहिए, राजनीति में भी, कारोबार में भी, समाजसेवी संस्थाओं में भी, और धर्म या आध्यात्म के संगठनों में भी। आज तो भारत में समाजसेवी संस्थाओं और दूसरे ट्रस्ट-समितियों से भी लोग मरने के बाद भी रिटायर नहीं हो पाते, और अपने आल-औलाद को वहां पर काबिज करवाकर ही आखिरी सांस लेते हैं। कुदरत से कुछ सीखने की जरूरत है, नए मौसम की पहली पत्तियों को जगह देने के लिए हर पेड़-पौधे की पुरानी पत्तियां पतझड़ में खुद होकर रवानगी डाल देती हैं।

राज्यों के चुनाव, नोटबंदी पर जनमतसंग्रह होने नहीं जा रहे

संपादकीय
06 जनवरी 2017


लोग जिंदगी की तमाम बातों का अतिसरलीकरण करना चाहते हैं। मशहूर लोगों की किसी एक खूबी या खामी को लेकर उनके नाम के साथ किसी विशेषण को जोड़ दिया जाता है, और फिर एक एंग्रीमैन क्या हो गया, कि अमिताभ के बाद आने वाले किसी और गुस्सैल किरदार वाले के लिए यह तमगा बचता नहीं। फिर मीडिया के लिए भी ऐसे तमगे काम को आसान कर देते हैं, और इसके बिना किसी का मूल्यांकन होना खत्म सा हो जाता है। दूसरी तरफ जब स्थितियों को देखें, तो लोग नौबतों से लेकर नतीजों तक के विश्लेषण का अतिसरलीकरण करने पर आमादा दिखते हैं।
अब जैसे नोटबंदी का एक ऐतिहासिक काम हुआ, और लोग कई राज्यों में म्युनिसिपल से लेकर पंचायत के कुछ गिने-चुने चुनावों के नतीजों को देखकर यह नतीजा निकालने लगे कि यह देश की जनता का नोटबंदी को समर्थन है। अब कोई यह समझाए कि देश के अकेले पूरी तरह से बसाए गए शहरी चंडीगढ़ की कुछ लाख आधुनिक, शिक्षित, और शहरी मतदाताओं की भाजपा को मंजूरी क्या पूरे देश की गरीब जनता की तकलीफों का प्रतिनिधित्व भी करती है? लेकिन जब सोचने का सिलसिला बड़ा जटिल हो, और पैमाने बहुत से हों, तो जब तक समझदारी जूतों के फीते भी नहीं बांध पाती, बेवकूफी दौड़ पूरी करके नतीजे तक पहुंच चुकी रहती है।
अब उत्तरप्रदेश के चुनावी नतीजों को लेकर यह अटकल शुरू हो गई है कि क्या यह मोदी की नोटबंदी को जनता की मंजूरी का एक पैमाना होगा? यह सोचते हुए लोग इस बात का भी ध्यान नहीं रख रहे हैं कि उत्तरप्रदेश के चुनाव में चार अलग-अलग पार्टियां मैदान में दिख रही हैं। सपा और बसपा के अलावा भाजपा और कांग्रेस मैदान में हैं, और हो सकता है कि बात न बने तो सपा की दो टीमें भी मैदान में हो सकती हैं। ऐसे में चुनावी नतीजों के आंकड़े तीन, चार, या पांच कोनों में बंटे हुए हो सकते हैं, और ऐसे में किसी एक पार्टी को बहुमत किसी दूसरी पार्टी को खारिज करने जैसा मानना गलत होगा, या उसी एक पार्टी को जिताना मानना गलत होगा। मतदाताओं का रूझान अगर दो उम्मीदवारों या दो पार्टियों के बीच सीधा बंटा हुआ हो, तब तो नतीजे निकालना आसान होता है, लेकिन तीन-चार कोनों के मुकाबले में महज एक तर्कहीन अतिसरलीकरण ही विश्लेषण को आसान बना सकता है।
फिर एक बात यह भी याद रखने की जरूरत है कि राज्यों के चुनावों पर केन्द्र सरकार के कामकाज, और पार्टियों के राष्ट्रीय नेताओं की लोकप्रियता का असर राज्य के स्तर के मुद्दों के साथ मिलकर ही हो पाता है। बहुत सी जगहों पर इसका मिलाजुला असर होता है। और कुछ जगहों पर नौबत यह भी रहती है कि केन्द्र या राज्य के किसी नेता की लोकप्रियता की वजह से कोई पार्टी जीत सकती है, उसके प्रत्याशी जीत सकते हैं, या फिर वैसे किसी नेता की अलोकप्रियता के बावजूद कोई पार्टी जीत सकती है। किसी वजह से, या किसी वजह के बावजूद, यह एक ऐसा जटिल प्रभाव होता है जो कि नतीजों के आंकड़ों से सीधे-सीधे नहीं समझा जा सकता। मिसाल के लिए उत्तरप्रदेश के चुनाव में अगर सपा को बहुमत मिलता है, तो इसे नोटबंदी के खिलाफ फैसला मान लेना भी चूक होगा, हो सकता है कि यह अखिलेश के अच्छे काम का नतीजा भी हो। ठीक उसी तरह जिस तरह कि पिछले आम चुनाव मेें नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा को मिला ऐतिहासिक, अभूतपूर्व, और अप्रत्याशित बहुमत उनकी लोकप्रियता को कितना जनसमर्थन था, और यूपीए के कुकर्मों के खिलाफ वह जनता की नाराजगी कितनी थी, इसका अंदाज लगाना आज भी आसान नहीं है। इसलिए जब तक किसी चुनाव के मुद्दे बंटे हुए न हों, भारत जैसे किसी देश में आम चुनाव अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव सरीखे नहीं रहते, और खासकर राज्यों के चुनाव तो केन्द्रीय नेताओं के असर वाले चुनाव बिल्कुल नहीं रहते, वे मिलेजुले मुद्दों और मिलेजुले असर वाले चुनाव रहते हैं। जो लोग उत्तरप्रदेश के चुनाव को, या कि इस बार के पांच राज्यों के चुनाव को नोटबंदी पर जनमतसंग्रह मानकर चल रहे हैं, वे मुद्दों का अतिसरलीकरण ही कर रहे हैं। मेंढक एक जगह से दूसरी जगह तेजी से छलांग लगाकर पहुंचते हैं, और मूर्ख इसी रफ्तार से नतीजों पर छलांग लगाते हैं। हालांकि यह बात मेंढकों के लिए अपमानजनक है, क्योंकि वे इंसानों के हाथ कट जरूर जाते हैं, लेकिन इंसानों जितने मूर्ख होते नहीं हैं।

अपनी खामी देखने के बजाय तोहमत हर बार पश्चिम पर

संपादकीय
05 जनवरी 2017


एक बार फिर कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में नए साल के जश्न में सड़कों पर लड़कियों और महिलाओं के साथ सामूहिक छेडख़ानी हुई है, और उसके वीडियो सामने आए हैं। इस पर कर्नाटक के बेशर्म कांग्रेसी गृहमंत्री का कहना है कि इसके लिए लड़कियों के कपड़े जिम्मेदार हैं और पाश्चात्य संस्कृति जिम्मेदार हैं। दरअसल सत्ता पर बैठे हुए मर्दों में से अधिकतर, चाहे वे मंत्री रहें, या कि अफसर, उनकी सोच बहुत ही हमलावर और हिंसक हो जाती है, और उनको अपनी कुर्सी की जिम्मेदारी का भी ख्याल नहीं रह जाता। मर्द तो मर्द, ताकत की कुर्सियों पर बैठी हुई महिलाएं भी मर्दानी हिंसा की शिकार महिलाओं के खिलाफ हमलावर तेवर दिखाती हैं, जैसा कि हम इसी जगह ममता बैनर्जी की कई मिसालों को गिना चुके हैं कि किस तरह वे कोलकाता के एक बलात्कार की शिकार महिला की शिकायत को अपनी सरकार को बदनाम करने की साजिश करार दे चुकी हैं, यह अलग बात है कि उसी शिकायत पर ममता की पुलिस ने ही बलात्कारी को अदालत से सजा भी दिलवा दी है।
हिन्दुस्तानियों की यह संस्कृति हो चुकी है कि अपने भीतर की तमाम मौलिक खामियों को वे पाश्चात्य संस्कृति पर थोपकर अपने आपको हर किस्म की तोहमत से अलग कर लेते हैं। जब अपनी खामियों को मानने से ही कोई समाज मुंह चुराने लगता है, तो उन खामियों से छुटकारा पाना नामुमकिन हो जाता है। सोशल मीडिया में ऐसी सोच की खूब धुनाई हो रही है कि बलात्कार कोई आयातित बुराई है। एक बड़ा तीखा पोस्टर भी आया है कि बिकिनी और बुर्के में बात हो रही है, और बिकिनी पूछ रही है कि उसके छोटे होने की वजह से उसे पहनी महिला से बलात्कार होता है क्या? और इसके जवाब में बुर्का कहता है कि उसके साथ भी बलात्कार होता ही है। इसी कर्नाटक की राजधानी में अनगिनत ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जिनमें स्कूलों में बहुत छोटी-छोटी बच्चियों से बलात्कार हुए हैं, और क्या स्कूल की पोशाक पहनी हुई चार बरस की बच्ची किसी पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित रहती है या कि भड़काऊ कपड़ों में रहती है?
उधर उत्तरप्रदेश और हरियाणा के गांवों सहित देश के बहुत से राज्यों में गांव की गरीब और दलित महिलाओं से बलात्कार होते हैं जो कि आमतौर पर अपने मुंह ढंके हुए चलती हैं, और ताकतवर समाज से दूर-दूर रहती हैं। अब क्या इन महिलाओं पर भी पश्चिमी सभ्यता और छोटे भड़काऊ कपड़ों की तोहमत लग सकती है? और फिर खजुराहों से लेकर देश के अनगिनत मंदिरों को जाकर देखें तो सदियों पहले के हिन्दुस्तान की सुंदरियों की जो मूर्तियां मंदिरों की दीवारों पर लगी हैं, या कि देवियों की जो प्रतिमाएं बनी हुई हैं, उनके बदन पर कपड़े देखें, तो वे आज शहरों में सबसे अधिक खुले हुए कपड़ों से कहीं अधिक खुले हुए दिखते हैं। तो क्या पाश्चात्य लोगों ने हिन्दुस्तान में पहला कदम रखने के सैकड़ों बरस पहले भी यहां आकर अपनी संस्कृति के मुताबिक यहां की प्रतिमाओं को बनाकर मंदिरों में स्थापित कर दिया था?
दरअसल भारत में सेक्स पर चर्चा से परहेज, समाज में सेक्स को एक हकीकत मानने से परहेज, और प्रेमी जोड़ों से लेकर वयस्क जोड़ों की जिंदगी पर सौ किस्म के सामाजिक और कानूनी प्रतिबंध लगाकर भारतीय समाज को एक ऐसा कुंठित और पाखंडी समाज बना दिया गया है, जो कि सेक्स को लेकर अपनी भड़ास निकालने के लिए मौका मिलने पर बलात्कार तक पर उतर आता है। अपने खुद की इस खामी को छुपाने के लिए लोग पश्चिम की तरफ उंगली इस अंदाज में उठाते हैं मानो पश्चिम मुहल्ले का वह बदनाम बच्चा हो जिसका नाम हर शरारत के साथ, हर बदमाशी के साथ जोड़ देने के लिए मौजूद और उपलब्ध रहता है। हकीकत से मुंह मोडऩे का यह रवैया इस देश में सेक्स-अपराध बढ़ाते ही चलेगा। अभी-अभी उत्तरप्रदेश के एक मर्द मंत्री आजम खां को बलात्कार पर अपने गैरजिम्मेदाराना बयान के लिए सुप्रीम कोर्ट में बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी है। हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने ऐसे नोटिस की कुछ हजार प्रतियां बनाकर रखनी चाहिए, और हर रात का टीवी, और सुबह के अखबार देखकर दस-बीस नेताओं-अफसरों को भेजकर कटघरे में बुलाना चाहिए, तब जाकर शायद हमलावर और हिंसक बयान कुछ घट सकें।

राजनीतिक दल अपने मुजरिमों को बचाने के बजाय काबू करें

संपादकीय
04 जनवरी 2017


पश्चिम बंगाल में चिटफंड घोटाले को लेकर भाजपा के एक सांसद की गिरफ्तारी के बाद तृणमूल कार्यकर्ताओं ने भाजपा कार्यालय पर हमला भी किया और हमेशा ही हमलावर तेवरों में रहने वाली मुख्यमंत्री और तृणमूल मुखिया ममता बैनर्जी ने इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा की गई बदले की कार्रवाई करार दिया है। सीबीआई जिन चिटफंड घोटालों की जांच कर रही है, उनमें तृणमूल कांग्रेस के सांसद शुरू से फंसे हुए दिख रहे थे, और यह मामला रातोंरात केन्द्र सरकार द्वारा खड़ा किया हुआ नहीं दिख रहा है। बंगाल में चिटफंड घोटालों में लाखों लोग लुट चुके हैं, और वे सड़कों पर हैं, ऐसे में इसके लिए जिम्मेदार लोग चाहे वे किसी भी पार्टी के हों, उनका जेल जाना एक सही काम है, और अगर ऐसे लोग सांसद हैं, तो उन्हें उस जुर्म में अधिकतम संभव सजा मिलनी चाहिए।
सीबीआई को केन्द्र सरकार का तोता कहते हुए उस पर सौ तरह के आरोप लगते हैं। यह मुमकिन है कि सीबीआई केन्द्र के दबाव में कुछ मामलों में तेजी दिखाती हो, और कुछ मामलों में नर्मी या अनदेखी भी। कुछ मामलों में सीबीआई रियायत भी बरतती हो सकती है, लेकिन जो मामले एकदम साफ-साफ धोखाधड़ी या जुर्म के हैं, उनमें तो जब सीबीआई किसी को गिरफ्तार करके अदालत तक ले जाती है, तब यह उम्मीद की जाती है कि वह अदालत की तसल्ली जितना सामान जुटा चुकी है। और ऐसा न होने पर वह अदालती फटकार का खतरा भी झेलती है, और कभी-कभी हर जांच एजेंसी को ऐसी फटकार लगती भी है।
हम किसी जुर्म में शामिल नेताओं को महज इसलिए बख्श दिए जाने के खिलाफ हैं कि ऐसा करने पर सत्तारूढ़ पार्टी पर बदले की भावना से कार्रवाई का आरोप लगेगा।  ऐसे में तो किसी भी पार्टी की सत्ता अपने विरोधी दलों के नेताओं पर कोई कार्रवाई ही न करे, और जनता जुर्म का शिकार होती रहे। इसलिए हम राजनीतिक बदले की बात को अधिक वजन देना नहीं चाहते, और हमारा यह भी मानना है कि सौ फीसदी ईमानदार रहने पर किसी भी विपक्षी के खिलाफ कार्रवाई आसान नहीं हो सकती, मुमकिन भी नहीं हो सकती। भारतीय न्यायपालिका की भावना सौ गुनहगारों को जाने देने की है, और एक भी बेकसूर को सजा न देने की है। ऐसे में इसी बंगाल में भाजपा से इतना ही राजनीतिक बैर रखने वाले वामपंथी नेता भी हैं जो कि दशकों तक बंगाल पर सत्तारूढ़ रहे, लेकिन ऐसा याद नहीं पड़ता कि उनमें से कोई सांसद या कोई बड़े नेता ऐसी जालसाजी या धोखाधड़ी के किसी जुर्म में फंसे हों।
हमारा यह मानना है कि राजनीतिक दलों को अपने-अपने मुजरिमों पर काबू रखना चाहिए, और उन्हें अगर मुजरिम पालने का शौक ही है, तो फिर उनकी हिफाजत के लिए जांच एजेंसियों पर आरोप लगाना बंद करना चाहिए। आपातकाल से लेकर अभी तक बहुत से ऐसे दौर रहे हैं जब सत्ता ने ताकत का बेजा इस्तेमाल करके जुर्म किए, और सत्तारूढ़ दलों के नेता तो ऐसे जुर्म करते ही हैं। इसलिए देश के कानून में एक फेरबदल करके किसी जुर्म के लिए साधारण नागरिक को जितनी सजा होती है, उसी जुर्म के लिए किसी विधायक को उससे दुगुनी, किसी सांसद को उससे चार गुना, और किसी मंत्री को उससे आठ गुना सजा का इंतजाम करना चाहिए। तृणमूल कांग्रेस का बाकी बातों के लिए मोदी विरोध जायज हो सकता है, लेकिन अपने मुजरमों को बचाकर वह अपनी राजनीतिक साख खोने के अलावा कुछ नहीं कर रही। 

ऐसी धर्मान्धता के बीच पन्द्रह बरसों में हिन्दुस्तान कैसे अव्वल देश बनेगा?

संपादकीय
03 जनवरी 2017


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन का उद्घाटन करते हुए कहा कि भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में 2030 में दुनिया के तीन सबसे कामयाब देशों में से एक होगा। उन्होंने कहा कि- हम तकनीक पर हमेशा ध्यान रखेंगे, और विकास के लिए उनका लाभ उठाने को हमेशा तैयार रहेंगे। उन्होंने कहा कि सरकार सभी तरह के विज्ञान को समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के वैज्ञानिकों ने देश के नीतिगत दृष्टिकोण में दृढ़ता से योगदान दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी की कही बात अच्छी जरूर है, लेकिन क्या भारत में सचमुच ऐसा माहौल है जिसके जारी रहते हुए आज से पन्द्रह बरस बाद यह देश दुनिया के तीन अव्वल देशों में से एक हो सकता है? यह कहते हुए हम इस बात पर जोर देना चाहते हैं कि किसी देश का वैज्ञानिक विकास महज प्रयोगशालाओं में नहीं हो सकता। वैज्ञानिक विकास के लिए देश के लोगों में वैज्ञानिक सोच को भी विकसित करना पड़ता है। यह नहीं हो सकता कि विश्वविद्यालय में विज्ञान पढ़ाने वाले प्रोफेसर मुरली मनोहर जोशी बाबरी मस्जिद को गिराने के लिए मंच पर कूदते भी रहें, और विश्वविद्यालय में विज्ञान को बढ़ावा भी देते रहें। जिस देश में लगातार भावनाओं को भड़काकर जनता का मिजाज हांककर वैज्ञानिक सोच से दूर ले जाया जा रहा है, वहां पर विज्ञान की बुनियादी मान्यताओं की इज्जत भी खत्म हो जाती है। विज्ञान एक टापू की तरह विकसित नहीं किया जा सकता, कि गाय को मां मानकर मरी हुई गाय की खाल उतारने वाले इंसानों को भी मार डाला जाए, और डेयरी टेक्नालॉजी की तकनीकों का भी सम्मान हो जाए। आज भारत ऐसे ही आंतरिक विरोधाभासों का शिकार है, और ये विरोधाभास बड़ी कोशिशों और साजिशों के साथ बढ़ाए जा रहे हैं। इससे विचलित वोटरों की उन्मादी भीड़ को तो मतदान केन्द्रों के सामने जुटाया जा सकता है, लेकिन देश की आबादी के बड़े हिस्से में विज्ञान का सम्मान इससे नहीं बढ़ सकता।
भारत में इतिहास से लेकर विज्ञान तक एक ऐसी पाखंडी संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है जो कभी अस्तित्व में न रहे इतिहास को लेकर गौरव के उन्माद को खड़ा कर रही है। जो बातें गौरवशाली नहीं लग रही हैं, या बहुसंख्यक जनता की धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक नहीं हैं, उन बातों को इतिहास से मिटाया जा रहा है, और उसे इतिहास को जलाया जा रहा है, इतिहासकारों को पीटा जा रहा है, और किताबों को प्रतिबंधित किया जा रहा है। जब इतिहास-लेखन के वैज्ञानिक तौर-तरीकों के साथ ऐसा घोर हिंसक और साम्प्रदायिक बर्ताव बेरोकटोक चल रहा है, तो विज्ञान उससे अछूता नहीं रह सकता। उद्घाटन भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जो चाहें वह कहें, लेकिन हकीकत यह है कि उनका कार्यकाल शुरू होने के बाद से उनके समर्थक और सहयोगी संगठनों ने लगातार इस देश में वैज्ञानिक सोच को कुचलने का काम किया है, और हमारा मानना है कि इसरो जैसे गिने-चुने कामयाब वैज्ञानिक संगठनों के भरोसे इस देश को पन्द्रह बरस बाद दुनिया के टॉप-3 में गिनना एक हसरत हो सकती है, वह हकीकत पर टिका हुआ अंदाज नहीं हो सकता।
हिन्दुस्तान दुनिया के तीन सबसे ऊंचे वैज्ञानिक और तकनीक वाले देशों में से बने, इसकी संभावना हो सकती है, लेकिन वह संभावना सड़कों पर पिटती हुई वैज्ञानिक सोच से न उपज सकती है, न पनप सकती है। देश में धर्मान्धता और असहिष्णुता से परे की एक वैज्ञानिक सोच को विकसित करना होगा, तभी हिन्दुस्तान विज्ञान-तकनीक या प्रौद्योगिकी में संभावनाओं के अपने हक तक पहुंच पाएगा। आज की वैज्ञानिक कामयाबी को देश की धर्मान्धता की वजह से मिली कामयाबी कहना गलत होगा, यह देश की धर्मान्धता के बावजूद पाई गई वैज्ञानिक कामयाबी है, जो कि और बहुत अधिक हो सकती थी, अगर हिन्दुस्तानी बच्चों को बचपन से ही धर्म और पाखंड की नफरत पिला-पिलाकर बड़ा न किया जाए। 

हमको मालूम है तकलीफ की हकीकत लेकिन, धर्म ने सबको ऐसा बना रखा है

आजकल
2 जनवरी 2017
नोटबंदी के पचास दिन भी निकल गए, और अकेले नोटबंदी के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन की बात लोगों ने दो बार पौन-पौन घंटे सुन ली। एक बार जब नोटबंदी लागू हुई, और दूसरी बार जब नोटबंदी के पचास दिन पूरे हुए, और हिन्दुस्तान धड़कते दिल के साथ नए साल की शाम देख रहा था कि प्रधानमंत्री और क्या कहते हैं। प्रधानमंत्री के कहे और किए हुए पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, और हिन्दुस्तान में शायद पिछले दस-बीस बरस में पचास दिनों के भीतर इससे अधिक शायद ही किसी और मुद्दे पर लिखा गया हो, दिखाया गया हो। इसलिए इस मुद्दे के उन्हीं पहलुओं पर आज फिर पचास दिनों में पच्चीसवीं बार लिखने का मेरा इरादा नहीं है, और कुछ और पहलू इस मुद्दे से जुड़े हुए, हिन्दुस्तान से जुड़े हुए, ऐसे हैं जिन पर लिखना दिलचस्प है।
अगर हिन्दुस्तान का पूरा का पूरा मीडिया एकमुश्त मोदी का दुश्मन न हो गया हो, और उसमें गिरोहबंदी करके जनता की नोटबंदी की दिक्कतों को झूठा गढ़कर झूठा दिखाया न हो, तो यह देश सचमुच इन पचास दिनों में बड़ी तकलीफ और बड़ी बर्बादी से गुजरा है। प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम इन दो संदेशों में, उनकी मन की बात में, और उनके आमसभाओं या सम्मेलनों के भाषणों में कुल मिलाकर भी यह साफ नहीं हो पाया कि आतंक पर काबू के लिए, नशे के धंधे पर रोक के लिए, नकली नोटों को रोकने के लिए, या कि कालेधन को निकलवाने के लिए इस नोटबंदी की क्या जरूरत थी, और इससे क्या मदद मिली? सरकार का पिछले पचास दिनों का सारा बयान मिलाकर भी यह साफ नहीं कर पा रहा है कि नोटबंदी की घोषणा के बाद अगले कई दिनों तक सरकार उसका जो मकसद अलग-अलग निकालती रही, और बताती रही, उस मकसद के नारों से परे उस मकसद को हासिल करने के लिए नोटबंदी की ये दिक्कतें क्यों जरूरी थीं। लेकिन हम फिर नोटबंदी के बजाय नोटबंदी से जनता को हुई दिक्कतों और जनता के बर्दाश्त की चर्चा करना चाहते हैं।
हिन्दुस्तान की जनता को देखें तो उसने रात-रात बैंक और एटीएम के बाहर कतार में गुजार लीं, लेकिन एक भी एटीएम पर एक भी पत्थर नहीं चला। लोगों ने बेकाबू कतार पर चलती हुई पुलिस की लाठियां खा लीं, लेकिन किसी बैंक कर्मचारी पर हाथ नहीं उठाया, एक-दूसरे को लूटा नहीं। और जो मामूली इक्का-दुक्का मारपीट कतार के लोगों में हुई, उतनी तो मुहल्लों में नल पर लगी भीड़ में भी हो जाती है। अब लोगों के इस बर्दाश्त को मोदी कालेधन के खिलाफ अभियान को जनसमर्थन कहते हैं, और इसकी तारीफ करते हैं। इसकी तारीफ तो जायज है, क्योंकि दुनिया के बहुत से और ऐसे देश हो सकते थे जहां जनता अपने ही पैसे को न निकाल पाने पर, अपने बीमार का इलाज न करा पाने पर बगावत कर सकती थी, हिंसा तो कर ही सकती थी, लूटपाट तो करती ही करती। लेकिन सवा सौ करोड़ आबादी के इस देश में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बल्कि आम दिनों में जितने जुर्म होते थे, उससे कम ही हुए होंगे क्योंकि पेशेवर या शौकिया मुजरिम भी या तो कतारों में लगे होंगे, या फिर राह देख रहे होंगे कि लोगों के पास रकम आए, तब तो उसे लूटें। चोर भी सोच रहे होंगे कि घरों में नोट बचे नहीं हैं, ऐसे घरों में चोरी करें भी तो क्यों करें?
हिन्दुस्तानी जनता मोटे तौर पर आस्तिक और आस्थावान जनता है, उसे धर्म पर बड़ा भरोसा है, और बहुत से लोगों को धर्म के साथ-साथ संतों, साधुओं, और पीर-फकीर पर भी बड़ा भरोसा है। इस देश में लोग राह चलते किनारे के सिंदूर-पुते पत्थर पर भी सिर झुकाते चलते हैं, और धार्मिक प्रवचनकर्ताओं की मेहरबानी से यह मानकर चलते हैं कि इस जन्म में झेले हुए दुख-तकलीफ से अगले जन्म में स्वर्ग जैसे सुख की गारंटी रहती है, और अगला जन्म होने के पहले भी स्वर्ग तो मिलता ही मिलता है। लोगों को यह लगता है कि तकलीफ उठाना एक अच्छी बात है, और इसीलिए हिन्दुस्तान में किसी धर्म में लोग हठयोग को मानते हैं, गालों के आरपार भाले या त्रिशूल निकाल लेते हैं, सड़कों पर अपने आपको जंजीरों से हथियारों से जख्मी कर लेते हैं, और लहूलुहान करके वे अपने को मजहब के करीब पाते हैं। बहुत से धर्मों में लोग भूखे रहते हैं, लंबे उपवास करते हैं, और ऐसी तकलीफ से गुजरते हुए भी वे अपने को ईश्वर के करीब पहुंचता हुआ मानते हैं। यह वह देश है जहां पर नवरात्रि में कई लोग अपने बदन पर जवारा उगाकर नौ दिन लेटे रहते हैं, और मानते हैं कि इससे ही ईश्वर खुश होंगे। कुछ लोग आग पर चलते हैं, और कुछ लोग तो अपनी जीभ काटकर शंकर को समर्पित कर देते हैं कि इससे खुश होकर ईश्वर वरदान देंगे।
धर्म लोगों को तकलीफ पाकर खुश रहने के एक ऐसे झांसे में बनाए रखता है जिसमें बिना मतलब की तकलीफ से भी ईश्वर की उपासना कामयाब मान ली जाती है। कार्ल माक्र्स ने धर्म को अफीम कहा था। हिन्दुस्तान के पिछले पचास दिनों से अधिक बड़ी मिसाल दिखना मुश्किल है कि किस तरह लोगों के जेहन में समाया हुआ धर्म, और धार्मिक मान्यताएं उसे तकलीफ को बर्दाश्त करने के लायक तैयार करते हैं, और धर्मालु होने की वजह से लोगों को यह लगने लगता है कि जिस बात में तकलीफ मिल रही है, उससे आखिर में कुछ न कुछ तो अच्छा मिलेगा ही मिलेगा। ऐसे देश में कई तरह की कहावतें और मुहावरे मिलकर लोगों को इस बात के लिए तैयार करते हैं कि मेहनत का फल मीठा होगा, आग में तपकर ही सोना खरा होता है, वगैरह-वगैरह।
यह देश धर्म के साथ-साथ कुछ और बातों की वजह से भी तकलीफ को फायदेमंद मानने के एक झांसे में जीता है। भारत की प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति बहुत सी कड़वी चीजों को खाने और पीने के फायदे गिनाती है। नीम से लेकर करेले तक बहुत सी कड़वी चीजों से सेहत को अनगिनत फायदे बताए जाते हैं। ये बातें कुछ या अधिक हद तक वैज्ञानिक रूप से सच हो भी सकती हैं, लेकिन इनकी वजह से लोगों की सोच में एक ऐसा बर्दाश्त पैदा और कायम हो जाता है कि कड़वी चीजें अच्छी होती ही हैं।
बहुत बरस हुए जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, और वे छत्तीसगढ़ के दौरे पर उस वक्त के अविभाजित रायपुर जिले के दुगली और कुल्हाड़ीघाट गांवों में आए थे। उस वक्त मुझे इन दोनों गांवों में कैमरा लेकर पहले से जाने की सूझी थी, और एक नाला पार करके पहाड़ी पर बसे हुए कुल्हाड़ीघाट पहुंचने पर एक आदिवासी से मुलाकात हुई थी जो कि पत्तों की एक छत के नीचे शायद कुछ पालतू जानवरों के साथ पड़ा हुआ था, और न उसका कोई घर था, और न कोई सामान। बदन पर महज लंगोटी थी ऐसा याद पड़ता है। मेरे कंधे से टंगे कैमरे के बैग को देखकर उसे शायद यह धोखा हो गया था कि मैं सरकार का कोई स्वास्थ्य कर्मचारी हूं। उसने मुझसे कहा कि बुखार की दवाई दो। उस वक्त मेरे बैग में सिरदर्द-बुखार की कुछ गोलियां अपने लिए रखी हुई थीं क्योंकि रात-दिन की दौड़-भाग में कभी-कभी मुझे भी उनकी जरूरत पड़ती थी।
इसमें से दो गोलियां निकालकर मैंने उसे दीं, तो उसने उन्हें चबाना शुरू कर दिया,  बजाय पानी के साथ निगलने के। और जब ये गोलियां उसे खासी कड़वी लगीं, तो उसे एक तसल्ली मिली, और उसने शायद तारीफ में दो-चार शब्द कहे भी थे कि दवा अच्छी है, या ऐसी ही कोई और बात। मतलब यह कि कड़वाहट झेलना लोगों को एक किस्म की दिमागी राहत देती है कि इससे कुछ अच्छा ही होगा।
एक किसी धर्म में ऐसा भी सुना है कि गुरू की सीख मानते हुए कुछ लोग पीठ पर पत्थर की एक भारी सिल्ली बांधकर चलते हैं। गुरू का कहना शायद यह था कि लोगों को इतना सेहतमंद या फिट रहना चाहिए कि वे एक मन का बोझ उठाकर चल सकें, लेकिन कुछ लोग इन शब्दों को शाब्दिक अर्थ में लेकर इतना बोझ उठाकर चलने लगते हैं। तकलीफ हमारा धार्मिक मिजाज हो चुका है, और नोटबंदी के दौरान देश की जनता को जितनी तकलीफ हुई, उसे बर्दाश्त करने के पीछे भी लोगों की यह सोच मददगार साबित हुई कि जिस बात में तकलीफ हो रही है, उससे नतीजा अच्छा ही निकलेगा। कई लोग मिसाल के तौर पर गर्भवती महिला की तकलीफ की बात करते हैं कि प्रसव-पीड़ा के बाद ही नवजात शिशु के दर्शन होते हैं।
हिन्दुओं के किसी बड़े मेले में देखें, तो भभूत लगाए हुए कई लोग कांटों पर लेटे दिखेंगे, या कीलों के आसन पर बैठे रहेंगे, कुछ लोग एक पैर पर खड़े होंगे, तो कुछ लोग मचान से उल्टे लटके हुए दिखेंगे। जो जितनी अधिक तकलीफ पाते दिखेंगे, वे उतना ही अधिक सम्मान पाएंगे, और उतना ही अधिक चढ़ावा भी उन्हें मिलेगा। और यह बात दूसरे कई धर्मों के लोगों के साथ भी दिखेगी, और हिन्दुस्तान में इस जन्म की तकलीफ को अगले नामालूम जन्म में, या मौत के बाद के नामालूम स्वर्ग में सुख की गारंटी की पॉलिसी खरीदने जैसा भी माना जाता है।
धर्म लोगों को जिस तरह के बर्दाश्त के लिए तैयार करता है, और उसकी बेचैनी को खत्म करता है, और संघर्ष के उसके माद्दे को भी खत्म करता है, उसकी एक मिसाल इन पचास दिनों में देखने मिली है। कल ही सोशल मीडिया पर गुजरात में एक एटीएम की कतार का वीडियो देखने मिला जिसमें एक महिला दिन भर कतार में बैठकर हजार या दो हजार रूपए निकाल पा रही है, और अगले दिन फिर दिन भर कतार में बैठी है। बैठे-बैठे वह घर से सब्जियां ले आती हैं, और उन्हें छीलने-काटने का काम भी करते रहती है। लेकिन एक वीडियो कैमरे पर पैसों की इस तंगी का जिक्र करते हुए भी वह हॅंसती दिखती है, और उसे यह उम्मीद है कि इसका नतीजा कुछ अच्छा ही निकलेगा।
इसी तरह कतार में खड़े लोगों की हौसला अफजाई के लिए कई लोग सोशल मीडिया पर यह नारा लगाते दिखते हैं कि जब देश के जवान सरहद पर चौबीसों घंटे खड़े रहते हैं तो क्या जनता कुछ दिन भी कतार में खड़े नहीं रह सकती? यहां पर तकलीफ को धर्म से और अलग ले जाकर देशभक्ति से जोड़ दिया गया है कि जो देशभक्त हैं, वे तो तकलीफ की शिकायत कभी कर नहीं सकते।
यह सिलसिला देश के आर्थिक नुकसान, गरीबों के निजी नुकसान, और देश के कारोबार की तबाही का सही अंदाज सामने नहीं आने दे रहा है। अफीम का नशा कई किस्म की तकलीफों का दर्द दबा देता है। 

फल-सब्जियों के कोल्ड स्टोरेज नहीं, प्रोसेसिंग यूनिट लगाएं...

संपादकीय
02 जनवरी 2017


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज आसपास के इलाकों के किसान अपनी फसल लेकर पहुंचे और हजारों लोगों में उसे मुफ्त बांटा। यह एक प्रतीकात्मक विरोध था कि उनको सब्जियों के इतने दाम भी नहीं मिल रहे कि वे उसे ढोकर शहर तक ला सकें। महीने भर से प्रदेश में जगह-जगह से ये खबरें आ रही थीं कि लोग ट्रक भर-भर के टमाटर सड़कों पर बिखरा रहे थे कि उनकी उपज का कोई बाजार नहीं रह गया। अब सरकार के स्तर पर यह खबर आ रही है कि राज्य में कई कोल्ड स्टोरेज बढ़ाए जाएंगे, ताकि सब्जियों को वहां रखकर बचाया जा सके, और बाजार में दाम ठीक मिलने पर उन्हें बेचा जा सके।
यह एक ऐसा मोड़ है कि सरकार को बाजार के साथ मिलकर यह भी सोचना चाहिए कि इसे खर्चीले कोल्ड स्टोरेज बनाने हैं, या कि फल-सब्जियों और वनोपज की प्रोसेसिंग करने वाले छोटे-बड़े कारखाने? कोल्ड स्टोरेज में किसी सामान को रखना दो हिसाब से खर्चीला होता है, एक तो किसान को तुरंत दाम नहीं मिल पाते और उसके बैंक-कर्ज का ब्याज बढ़ते रहता है, और दूसरी बात यह कि उसे कोल्ड स्टोरेज में उपज रखने का भाड़ा देते रहना पड़ता है। नतीजा यह होता है कि एक वक्त के बाद इस भाड़े को मिलाकर लागत इतनी बढ़ जाती है कि किसान कहीं के नहीं रहते। अभी पिछले हफ्ते ही उत्तरप्रदेश में कुछ जगहों से खबरें आई हैं कि किराए से थके हुए किसानों या व्यापारियों ने कोल्ड स्टोरेज से आलू निकालकर सड़कों पर फेंक दिए और उनके सडऩे से भयानक बदबू फैली और बीमारी फैलने का खतरा खड़ा हो गया है। छत्तीसगढ़ में भी हो सकता है कि सब्जी का यही हाल होने लगे, और किसान आज तो सड़कों पर सब्जी फेंक रहे हैं, या कि मुफ्त में बांट रहे हैं, कल वे कोल्ड स्टोरेज के भी कर्जदार हो जाएंगे।
हमारी सीमित समझ यह कहती है कि दूध, फल-सब्जी, या वनोपज सरीखे सामानों की प्रोसेसिंग के छोटे-बड़े कारखाने अगर राज्य में लगाए जाते हैं, तो उससे स्थानीय रोजगार तुरंत खड़े होंगे, और उपज में इतना वेल्यूएडिशन हो जाएगा कि उससे किसान को दाम ठीक मिलेंगे, और कुछ कारोबारी भी उससे कमा सकेंगे। ऐसी औद्योगिक इकाईयों में लागत भी कम आएगी, और उससे आसपास के इलाकों में फल-सब्जी उगाने का काम एक कमाऊ कारोबार भी हो सकेगा। यह बात समझ लेने की जरूरत है कि ऐसी प्रोसेसिंग इकाईयों का मतलब यह नहीं होता है कि राज्य के भीतर बड़े ब्रांड विकसित हों, और उसके बिना ये इकाईयां किसी काम की न हों। होता यह है कि ऐसी इकाईयां एक कच्चा माल तैयार करती हैं, और इसे बाहर की बड़ी कंपनियां ले जाकर ग्राहक के लायक प्रोडक्ट बनाकर बेचती हैं।
राज्य के भीतर से कोयला निकालकर अगर दूसरे राज्य में ले जाकर बिजली बनाई जाती, तो छत्तीसगढ़ को अधिक कमाई नहीं होती। इस राज्य से लौह अयस्क बाहर ले जाकर बेचा जाता है, तो उससे राज्य को बहुत कम पैसा मिलता है। लेकिन जब कारखाने यहां लग जाते हैं, तो ऐसे वेल्यूएडिशन से कमाई एकदम से बढ़ जाती है। छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि राज्य के भीतर अलग-अलग इलाकों की पहचान करके ऐसे केन्द्र तैयार करें जहां पर आसानी से फल-सब्जी पहुंचाए जा सकें, और वहां से कच्चा माल भी आसानी से बाहर निकल सके। हमारा ख्याल है कि ऐसी योजनाओं के लिए केन्द्र सरकार का भी भरपूर अनुदान है, और इसे बिना देर किए करना जरूरी है ताकि प्रदेश के फल-सब्जी किसान इस काम को बंद करने की न सोचने लगें। कोल्ड स्टोरेज की सोच उन उपजों के लिए ठीक हो सकती है जिनका बाजार भाव इतना अधिक रहता है कि उन्हें किराया देकर भी रखना फायदे का साबित हो। हमको यह नहीं लगता कि टमाटर-गोभी जैसी सब्जियों को कोल्ड स्टोरेज में रखना मुनासिब होगा, यह किसान को एक और कर्ज में धकेलने का काम हो सकता है, इसके बजाय सरकार को कारखाने लगाना चाहिए। 

अपनी मंजिल, इरादे, और कसमें कुदरत देख तय करें...

संपादकीय
01 जनवरी 2017


नए साल का मौका बहुत सी नई बातों को तय करने का भी रहता है। हम पिछले बरसों में साल बीतने के कुछ दिन पहले पाठकों को उकसाते आए हैं कि वे तय करें कि कौन-कौन सी बुरी बातें या खामियां नए बरस में छोड़ देंगे, और कौन-कौन सी अच्छी बातें या खूबियां अपना लेंगे। सोशल मीडिया पर यह मजाक भी बरसों से चले आ रहा है कि गुजरते हुए साल का आखिरी हफ्ता लोग जिम जाना तय करते हैं, कसरत की कसम खाते हैं, दारू या दूसरे नशे से तौबा कर लेते हैं, और नए साल में एकदम नए इरादों के साथ वे दुनिया को बदल देने की नीयत से सोकर उठते हैं। ये इरादे कुछ दिन तो जरूर चलते हैं, लेकिन फिर दारू-मुर्गा खाना-पीना शुरू हो जाता है, सिगरेट और तम्बाकू लौट आते हैं, और कसरत के लिए सुबह उठना धरे रह जाता है।
अब आज साल के पहले दिन थोड़ी सी चर्चा दुनिया की हिंसा से परे, समाजवाद के नाम पर एक-दूसरे को साइकिल से धकेलकर गिराते हुए बाप-बेटों से परे, और हिन्दुस्तान को कुचल देने वाली नोटबंदी से परे भी कर ली जाए। दुनिया में नए संकल्पों, नई कसमों, और नए इरादों के साथ आखिर क्या गड़बड़ा जाता है कि वे पूरे नहीं हो पाते? इसके पीछे की एक बड़ी वजह तो यह रहती है कि कसम इतनी बड़ी खा ली जाती है कि वह गले की हड्डी बनकर फंस जाती है, और न निगलते बनती, न उगलते बनती। मंजिल इतनी दूर की तय कर ली जाती है कि उसकी उतनी दूरी तय कर पाने के पहले दम टूटने लगता है। कसमों का बोझ इतना बड़ा उठा लिया जाता है कि आधा कोस तो उसे उठाकर चलना मुमकिन रहता है, लेकिन उसके बाद कंधे, पीठ, और कमर पांव सहित जवाब देने लगते हैं। इसलिए हमारा तजुर्बा यह कहता है कि नए साल के संकल्प, और नए साल के लिए अपने तय किए हुए इरादे ऐसे रहने चाहिए जिन्हें कम से कम आधा पूरा करना मुमकिन लगता हो। दो किलोमीटर चलने की ताकत दिखती हो, और बीस किलोमीटर की मंजिल छांट ली जाए, तो सफर बीच में टूटना ही टूटना है।
इसलिए लक्ष्य हमेशा वास्तविक और हासिल करने लायक तय करना चाहिए। लेकिन ऐसा लक्ष्य बहुत नाटकीय नहीं रहता, और आसपास के लोगों से उसकी अधिक चर्चा करके उनका ध्यान खींचना भी मुमकिन नहीं रहता, इसलिए लोग हमेशा ऐसी बातें तय करते हैं जिन्हें आसपास के लोगों को सुनाया जा सके, और उनसे वाहवाही पाई जा सके। लेकिन पल भर की वाहवाही मिलने के बाद जब कसम टूट जाती है, और अपने आपके भीतर एक निराशा होने लगती है, तो वह एक बड़ी कसम खाने के बाद फायदे से अधिक नुकसान जैसी रहती है। छोटे-छोटे वक्त के लिए छोटी-छोटी कसमें अधिक बड़े फायदे देती हैं। इसलिए नए बरस पर लोगों को चाहिए कि वजन घटाने से लेकर, खर्च घटाने तक, बुरे ऐब छोडऩे से लेकर, अच्छी बातें अपनाने तक की कसमों को साल भर के बजाय महीने भर के लिए तय करें, टोकरा भर तय करने के बजाय लोटा भर तय करें, और फिर जब इसमें कामयाबी मिल जाए, तब अगली कसम का आकार और वजन थोड़ा-थोड़ा बढ़ाते चलें। कोई भी लंबी और बड़ी मंजिल एक साथ छांटना खतरनाक होता है। कोई भी पेड़ बीज से बरगद बनने तक एक लंबा वक्त लेता है, और कुदरत की रफ्तार और तौर-तरीकों को देखकर अगर लोग अपने इरादे तय करें, तो उनमें कामयाबी की गुंजाइश अधिक रहेगी।