ऐसी धर्मान्धता के बीच पन्द्रह बरसों में हिन्दुस्तान कैसे अव्वल देश बनेगा?

संपादकीय
03 जनवरी 2017


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन का उद्घाटन करते हुए कहा कि भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में 2030 में दुनिया के तीन सबसे कामयाब देशों में से एक होगा। उन्होंने कहा कि- हम तकनीक पर हमेशा ध्यान रखेंगे, और विकास के लिए उनका लाभ उठाने को हमेशा तैयार रहेंगे। उन्होंने कहा कि सरकार सभी तरह के विज्ञान को समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के वैज्ञानिकों ने देश के नीतिगत दृष्टिकोण में दृढ़ता से योगदान दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी की कही बात अच्छी जरूर है, लेकिन क्या भारत में सचमुच ऐसा माहौल है जिसके जारी रहते हुए आज से पन्द्रह बरस बाद यह देश दुनिया के तीन अव्वल देशों में से एक हो सकता है? यह कहते हुए हम इस बात पर जोर देना चाहते हैं कि किसी देश का वैज्ञानिक विकास महज प्रयोगशालाओं में नहीं हो सकता। वैज्ञानिक विकास के लिए देश के लोगों में वैज्ञानिक सोच को भी विकसित करना पड़ता है। यह नहीं हो सकता कि विश्वविद्यालय में विज्ञान पढ़ाने वाले प्रोफेसर मुरली मनोहर जोशी बाबरी मस्जिद को गिराने के लिए मंच पर कूदते भी रहें, और विश्वविद्यालय में विज्ञान को बढ़ावा भी देते रहें। जिस देश में लगातार भावनाओं को भड़काकर जनता का मिजाज हांककर वैज्ञानिक सोच से दूर ले जाया जा रहा है, वहां पर विज्ञान की बुनियादी मान्यताओं की इज्जत भी खत्म हो जाती है। विज्ञान एक टापू की तरह विकसित नहीं किया जा सकता, कि गाय को मां मानकर मरी हुई गाय की खाल उतारने वाले इंसानों को भी मार डाला जाए, और डेयरी टेक्नालॉजी की तकनीकों का भी सम्मान हो जाए। आज भारत ऐसे ही आंतरिक विरोधाभासों का शिकार है, और ये विरोधाभास बड़ी कोशिशों और साजिशों के साथ बढ़ाए जा रहे हैं। इससे विचलित वोटरों की उन्मादी भीड़ को तो मतदान केन्द्रों के सामने जुटाया जा सकता है, लेकिन देश की आबादी के बड़े हिस्से में विज्ञान का सम्मान इससे नहीं बढ़ सकता।
भारत में इतिहास से लेकर विज्ञान तक एक ऐसी पाखंडी संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है जो कभी अस्तित्व में न रहे इतिहास को लेकर गौरव के उन्माद को खड़ा कर रही है। जो बातें गौरवशाली नहीं लग रही हैं, या बहुसंख्यक जनता की धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक नहीं हैं, उन बातों को इतिहास से मिटाया जा रहा है, और उसे इतिहास को जलाया जा रहा है, इतिहासकारों को पीटा जा रहा है, और किताबों को प्रतिबंधित किया जा रहा है। जब इतिहास-लेखन के वैज्ञानिक तौर-तरीकों के साथ ऐसा घोर हिंसक और साम्प्रदायिक बर्ताव बेरोकटोक चल रहा है, तो विज्ञान उससे अछूता नहीं रह सकता। उद्घाटन भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जो चाहें वह कहें, लेकिन हकीकत यह है कि उनका कार्यकाल शुरू होने के बाद से उनके समर्थक और सहयोगी संगठनों ने लगातार इस देश में वैज्ञानिक सोच को कुचलने का काम किया है, और हमारा मानना है कि इसरो जैसे गिने-चुने कामयाब वैज्ञानिक संगठनों के भरोसे इस देश को पन्द्रह बरस बाद दुनिया के टॉप-3 में गिनना एक हसरत हो सकती है, वह हकीकत पर टिका हुआ अंदाज नहीं हो सकता।
हिन्दुस्तान दुनिया के तीन सबसे ऊंचे वैज्ञानिक और तकनीक वाले देशों में से बने, इसकी संभावना हो सकती है, लेकिन वह संभावना सड़कों पर पिटती हुई वैज्ञानिक सोच से न उपज सकती है, न पनप सकती है। देश में धर्मान्धता और असहिष्णुता से परे की एक वैज्ञानिक सोच को विकसित करना होगा, तभी हिन्दुस्तान विज्ञान-तकनीक या प्रौद्योगिकी में संभावनाओं के अपने हक तक पहुंच पाएगा। आज की वैज्ञानिक कामयाबी को देश की धर्मान्धता की वजह से मिली कामयाबी कहना गलत होगा, यह देश की धर्मान्धता के बावजूद पाई गई वैज्ञानिक कामयाबी है, जो कि और बहुत अधिक हो सकती थी, अगर हिन्दुस्तानी बच्चों को बचपन से ही धर्म और पाखंड की नफरत पिला-पिलाकर बड़ा न किया जाए। 

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