अपनी खामी देखने के बजाय तोहमत हर बार पश्चिम पर

संपादकीय
05 जनवरी 2017


एक बार फिर कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में नए साल के जश्न में सड़कों पर लड़कियों और महिलाओं के साथ सामूहिक छेडख़ानी हुई है, और उसके वीडियो सामने आए हैं। इस पर कर्नाटक के बेशर्म कांग्रेसी गृहमंत्री का कहना है कि इसके लिए लड़कियों के कपड़े जिम्मेदार हैं और पाश्चात्य संस्कृति जिम्मेदार हैं। दरअसल सत्ता पर बैठे हुए मर्दों में से अधिकतर, चाहे वे मंत्री रहें, या कि अफसर, उनकी सोच बहुत ही हमलावर और हिंसक हो जाती है, और उनको अपनी कुर्सी की जिम्मेदारी का भी ख्याल नहीं रह जाता। मर्द तो मर्द, ताकत की कुर्सियों पर बैठी हुई महिलाएं भी मर्दानी हिंसा की शिकार महिलाओं के खिलाफ हमलावर तेवर दिखाती हैं, जैसा कि हम इसी जगह ममता बैनर्जी की कई मिसालों को गिना चुके हैं कि किस तरह वे कोलकाता के एक बलात्कार की शिकार महिला की शिकायत को अपनी सरकार को बदनाम करने की साजिश करार दे चुकी हैं, यह अलग बात है कि उसी शिकायत पर ममता की पुलिस ने ही बलात्कारी को अदालत से सजा भी दिलवा दी है।
हिन्दुस्तानियों की यह संस्कृति हो चुकी है कि अपने भीतर की तमाम मौलिक खामियों को वे पाश्चात्य संस्कृति पर थोपकर अपने आपको हर किस्म की तोहमत से अलग कर लेते हैं। जब अपनी खामियों को मानने से ही कोई समाज मुंह चुराने लगता है, तो उन खामियों से छुटकारा पाना नामुमकिन हो जाता है। सोशल मीडिया में ऐसी सोच की खूब धुनाई हो रही है कि बलात्कार कोई आयातित बुराई है। एक बड़ा तीखा पोस्टर भी आया है कि बिकिनी और बुर्के में बात हो रही है, और बिकिनी पूछ रही है कि उसके छोटे होने की वजह से उसे पहनी महिला से बलात्कार होता है क्या? और इसके जवाब में बुर्का कहता है कि उसके साथ भी बलात्कार होता ही है। इसी कर्नाटक की राजधानी में अनगिनत ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जिनमें स्कूलों में बहुत छोटी-छोटी बच्चियों से बलात्कार हुए हैं, और क्या स्कूल की पोशाक पहनी हुई चार बरस की बच्ची किसी पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित रहती है या कि भड़काऊ कपड़ों में रहती है?
उधर उत्तरप्रदेश और हरियाणा के गांवों सहित देश के बहुत से राज्यों में गांव की गरीब और दलित महिलाओं से बलात्कार होते हैं जो कि आमतौर पर अपने मुंह ढंके हुए चलती हैं, और ताकतवर समाज से दूर-दूर रहती हैं। अब क्या इन महिलाओं पर भी पश्चिमी सभ्यता और छोटे भड़काऊ कपड़ों की तोहमत लग सकती है? और फिर खजुराहों से लेकर देश के अनगिनत मंदिरों को जाकर देखें तो सदियों पहले के हिन्दुस्तान की सुंदरियों की जो मूर्तियां मंदिरों की दीवारों पर लगी हैं, या कि देवियों की जो प्रतिमाएं बनी हुई हैं, उनके बदन पर कपड़े देखें, तो वे आज शहरों में सबसे अधिक खुले हुए कपड़ों से कहीं अधिक खुले हुए दिखते हैं। तो क्या पाश्चात्य लोगों ने हिन्दुस्तान में पहला कदम रखने के सैकड़ों बरस पहले भी यहां आकर अपनी संस्कृति के मुताबिक यहां की प्रतिमाओं को बनाकर मंदिरों में स्थापित कर दिया था?
दरअसल भारत में सेक्स पर चर्चा से परहेज, समाज में सेक्स को एक हकीकत मानने से परहेज, और प्रेमी जोड़ों से लेकर वयस्क जोड़ों की जिंदगी पर सौ किस्म के सामाजिक और कानूनी प्रतिबंध लगाकर भारतीय समाज को एक ऐसा कुंठित और पाखंडी समाज बना दिया गया है, जो कि सेक्स को लेकर अपनी भड़ास निकालने के लिए मौका मिलने पर बलात्कार तक पर उतर आता है। अपने खुद की इस खामी को छुपाने के लिए लोग पश्चिम की तरफ उंगली इस अंदाज में उठाते हैं मानो पश्चिम मुहल्ले का वह बदनाम बच्चा हो जिसका नाम हर शरारत के साथ, हर बदमाशी के साथ जोड़ देने के लिए मौजूद और उपलब्ध रहता है। हकीकत से मुंह मोडऩे का यह रवैया इस देश में सेक्स-अपराध बढ़ाते ही चलेगा। अभी-अभी उत्तरप्रदेश के एक मर्द मंत्री आजम खां को बलात्कार पर अपने गैरजिम्मेदाराना बयान के लिए सुप्रीम कोर्ट में बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी है। हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने ऐसे नोटिस की कुछ हजार प्रतियां बनाकर रखनी चाहिए, और हर रात का टीवी, और सुबह के अखबार देखकर दस-बीस नेताओं-अफसरों को भेजकर कटघरे में बुलाना चाहिए, तब जाकर शायद हमलावर और हिंसक बयान कुछ घट सकें।

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