राजनीतिक दल अपने मुजरिमों को बचाने के बजाय काबू करें

संपादकीय
04 जनवरी 2017


पश्चिम बंगाल में चिटफंड घोटाले को लेकर भाजपा के एक सांसद की गिरफ्तारी के बाद तृणमूल कार्यकर्ताओं ने भाजपा कार्यालय पर हमला भी किया और हमेशा ही हमलावर तेवरों में रहने वाली मुख्यमंत्री और तृणमूल मुखिया ममता बैनर्जी ने इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा की गई बदले की कार्रवाई करार दिया है। सीबीआई जिन चिटफंड घोटालों की जांच कर रही है, उनमें तृणमूल कांग्रेस के सांसद शुरू से फंसे हुए दिख रहे थे, और यह मामला रातोंरात केन्द्र सरकार द्वारा खड़ा किया हुआ नहीं दिख रहा है। बंगाल में चिटफंड घोटालों में लाखों लोग लुट चुके हैं, और वे सड़कों पर हैं, ऐसे में इसके लिए जिम्मेदार लोग चाहे वे किसी भी पार्टी के हों, उनका जेल जाना एक सही काम है, और अगर ऐसे लोग सांसद हैं, तो उन्हें उस जुर्म में अधिकतम संभव सजा मिलनी चाहिए।
सीबीआई को केन्द्र सरकार का तोता कहते हुए उस पर सौ तरह के आरोप लगते हैं। यह मुमकिन है कि सीबीआई केन्द्र के दबाव में कुछ मामलों में तेजी दिखाती हो, और कुछ मामलों में नर्मी या अनदेखी भी। कुछ मामलों में सीबीआई रियायत भी बरतती हो सकती है, लेकिन जो मामले एकदम साफ-साफ धोखाधड़ी या जुर्म के हैं, उनमें तो जब सीबीआई किसी को गिरफ्तार करके अदालत तक ले जाती है, तब यह उम्मीद की जाती है कि वह अदालत की तसल्ली जितना सामान जुटा चुकी है। और ऐसा न होने पर वह अदालती फटकार का खतरा भी झेलती है, और कभी-कभी हर जांच एजेंसी को ऐसी फटकार लगती भी है।
हम किसी जुर्म में शामिल नेताओं को महज इसलिए बख्श दिए जाने के खिलाफ हैं कि ऐसा करने पर सत्तारूढ़ पार्टी पर बदले की भावना से कार्रवाई का आरोप लगेगा।  ऐसे में तो किसी भी पार्टी की सत्ता अपने विरोधी दलों के नेताओं पर कोई कार्रवाई ही न करे, और जनता जुर्म का शिकार होती रहे। इसलिए हम राजनीतिक बदले की बात को अधिक वजन देना नहीं चाहते, और हमारा यह भी मानना है कि सौ फीसदी ईमानदार रहने पर किसी भी विपक्षी के खिलाफ कार्रवाई आसान नहीं हो सकती, मुमकिन भी नहीं हो सकती। भारतीय न्यायपालिका की भावना सौ गुनहगारों को जाने देने की है, और एक भी बेकसूर को सजा न देने की है। ऐसे में इसी बंगाल में भाजपा से इतना ही राजनीतिक बैर रखने वाले वामपंथी नेता भी हैं जो कि दशकों तक बंगाल पर सत्तारूढ़ रहे, लेकिन ऐसा याद नहीं पड़ता कि उनमें से कोई सांसद या कोई बड़े नेता ऐसी जालसाजी या धोखाधड़ी के किसी जुर्म में फंसे हों।
हमारा यह मानना है कि राजनीतिक दलों को अपने-अपने मुजरिमों पर काबू रखना चाहिए, और उन्हें अगर मुजरिम पालने का शौक ही है, तो फिर उनकी हिफाजत के लिए जांच एजेंसियों पर आरोप लगाना बंद करना चाहिए। आपातकाल से लेकर अभी तक बहुत से ऐसे दौर रहे हैं जब सत्ता ने ताकत का बेजा इस्तेमाल करके जुर्म किए, और सत्तारूढ़ दलों के नेता तो ऐसे जुर्म करते ही हैं। इसलिए देश के कानून में एक फेरबदल करके किसी जुर्म के लिए साधारण नागरिक को जितनी सजा होती है, उसी जुर्म के लिए किसी विधायक को उससे दुगुनी, किसी सांसद को उससे चार गुना, और किसी मंत्री को उससे आठ गुना सजा का इंतजाम करना चाहिए। तृणमूल कांग्रेस का बाकी बातों के लिए मोदी विरोध जायज हो सकता है, लेकिन अपने मुजरमों को बचाकर वह अपनी राजनीतिक साख खोने के अलावा कुछ नहीं कर रही। 

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