राज्यों के चुनाव, नोटबंदी पर जनमतसंग्रह होने नहीं जा रहे

संपादकीय
06 जनवरी 2017


लोग जिंदगी की तमाम बातों का अतिसरलीकरण करना चाहते हैं। मशहूर लोगों की किसी एक खूबी या खामी को लेकर उनके नाम के साथ किसी विशेषण को जोड़ दिया जाता है, और फिर एक एंग्रीमैन क्या हो गया, कि अमिताभ के बाद आने वाले किसी और गुस्सैल किरदार वाले के लिए यह तमगा बचता नहीं। फिर मीडिया के लिए भी ऐसे तमगे काम को आसान कर देते हैं, और इसके बिना किसी का मूल्यांकन होना खत्म सा हो जाता है। दूसरी तरफ जब स्थितियों को देखें, तो लोग नौबतों से लेकर नतीजों तक के विश्लेषण का अतिसरलीकरण करने पर आमादा दिखते हैं।
अब जैसे नोटबंदी का एक ऐतिहासिक काम हुआ, और लोग कई राज्यों में म्युनिसिपल से लेकर पंचायत के कुछ गिने-चुने चुनावों के नतीजों को देखकर यह नतीजा निकालने लगे कि यह देश की जनता का नोटबंदी को समर्थन है। अब कोई यह समझाए कि देश के अकेले पूरी तरह से बसाए गए शहरी चंडीगढ़ की कुछ लाख आधुनिक, शिक्षित, और शहरी मतदाताओं की भाजपा को मंजूरी क्या पूरे देश की गरीब जनता की तकलीफों का प्रतिनिधित्व भी करती है? लेकिन जब सोचने का सिलसिला बड़ा जटिल हो, और पैमाने बहुत से हों, तो जब तक समझदारी जूतों के फीते भी नहीं बांध पाती, बेवकूफी दौड़ पूरी करके नतीजे तक पहुंच चुकी रहती है।
अब उत्तरप्रदेश के चुनावी नतीजों को लेकर यह अटकल शुरू हो गई है कि क्या यह मोदी की नोटबंदी को जनता की मंजूरी का एक पैमाना होगा? यह सोचते हुए लोग इस बात का भी ध्यान नहीं रख रहे हैं कि उत्तरप्रदेश के चुनाव में चार अलग-अलग पार्टियां मैदान में दिख रही हैं। सपा और बसपा के अलावा भाजपा और कांग्रेस मैदान में हैं, और हो सकता है कि बात न बने तो सपा की दो टीमें भी मैदान में हो सकती हैं। ऐसे में चुनावी नतीजों के आंकड़े तीन, चार, या पांच कोनों में बंटे हुए हो सकते हैं, और ऐसे में किसी एक पार्टी को बहुमत किसी दूसरी पार्टी को खारिज करने जैसा मानना गलत होगा, या उसी एक पार्टी को जिताना मानना गलत होगा। मतदाताओं का रूझान अगर दो उम्मीदवारों या दो पार्टियों के बीच सीधा बंटा हुआ हो, तब तो नतीजे निकालना आसान होता है, लेकिन तीन-चार कोनों के मुकाबले में महज एक तर्कहीन अतिसरलीकरण ही विश्लेषण को आसान बना सकता है।
फिर एक बात यह भी याद रखने की जरूरत है कि राज्यों के चुनावों पर केन्द्र सरकार के कामकाज, और पार्टियों के राष्ट्रीय नेताओं की लोकप्रियता का असर राज्य के स्तर के मुद्दों के साथ मिलकर ही हो पाता है। बहुत सी जगहों पर इसका मिलाजुला असर होता है। और कुछ जगहों पर नौबत यह भी रहती है कि केन्द्र या राज्य के किसी नेता की लोकप्रियता की वजह से कोई पार्टी जीत सकती है, उसके प्रत्याशी जीत सकते हैं, या फिर वैसे किसी नेता की अलोकप्रियता के बावजूद कोई पार्टी जीत सकती है। किसी वजह से, या किसी वजह के बावजूद, यह एक ऐसा जटिल प्रभाव होता है जो कि नतीजों के आंकड़ों से सीधे-सीधे नहीं समझा जा सकता। मिसाल के लिए उत्तरप्रदेश के चुनाव में अगर सपा को बहुमत मिलता है, तो इसे नोटबंदी के खिलाफ फैसला मान लेना भी चूक होगा, हो सकता है कि यह अखिलेश के अच्छे काम का नतीजा भी हो। ठीक उसी तरह जिस तरह कि पिछले आम चुनाव मेें नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा को मिला ऐतिहासिक, अभूतपूर्व, और अप्रत्याशित बहुमत उनकी लोकप्रियता को कितना जनसमर्थन था, और यूपीए के कुकर्मों के खिलाफ वह जनता की नाराजगी कितनी थी, इसका अंदाज लगाना आज भी आसान नहीं है। इसलिए जब तक किसी चुनाव के मुद्दे बंटे हुए न हों, भारत जैसे किसी देश में आम चुनाव अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव सरीखे नहीं रहते, और खासकर राज्यों के चुनाव तो केन्द्रीय नेताओं के असर वाले चुनाव बिल्कुल नहीं रहते, वे मिलेजुले मुद्दों और मिलेजुले असर वाले चुनाव रहते हैं। जो लोग उत्तरप्रदेश के चुनाव को, या कि इस बार के पांच राज्यों के चुनाव को नोटबंदी पर जनमतसंग्रह मानकर चल रहे हैं, वे मुद्दों का अतिसरलीकरण ही कर रहे हैं। मेंढक एक जगह से दूसरी जगह तेजी से छलांग लगाकर पहुंचते हैं, और मूर्ख इसी रफ्तार से नतीजों पर छलांग लगाते हैं। हालांकि यह बात मेंढकों के लिए अपमानजनक है, क्योंकि वे इंसानों के हाथ कट जरूर जाते हैं, लेकिन इंसानों जितने मूर्ख होते नहीं हैं।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - हमारे बीच नहीं रहे बेहतरीन अभिनेता ~ ओम पुरी में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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