ईंटों की जगह बोतलें

09 नवंबर 11
 संपादकीय
नाईजीरिया की एक खबर है कि वहां प्लास्टिक की खाली बोतलों से कचरे के ढेर को बढ़ाने के बजाय उनमें रेत भरकर उनसे दीवारें बनाई जा रही हैं और ईंटों की जगह इनके इस्तेमाल से ऐसा एक मकान भी अभी तैयार हुआ है। धरती पर लगातार बढ़ते चल रहे प्लास्टिक के कचरे से निपटने का यह एक जरिया हो सकता है और प्लास्टिक का जिस किस्म का भी कचरा आधुनिक, संपन्न, शहरी जीवनशैली के चलते बढ़ते चले जाना है उसके इस तरह के कल्पनाशील उपयोग की बात सोचनी ही होगी। नाईजीरिया में अब तक ऐसे पचीस मकान बनाकर उन्हें किराए पर देने का इरादा है और एक कमरा बैठक, नहानी, शौचालय और रसोई वाला ऐसा एक मकान 78 सौ प्लास्टिक बोतलों से बन जाता है। यह तकनीक नौ बरस पहले भारत, दक्षिण और मध्य अमरीका में विकसित हुई थी और अब कई जगहों पर इसके प्रयोग चल रहे हैं।
आज विकसित देशों में संपन्नता की वजह से और कम विकसित देशों में साफ पानी न होने की वजह से बोतलबंद पानी का इस्तेमाल बढ़ते चल रहा है। दूसरी तरफ छोटे-छोटे निर्माण कार्यों में भी ईंटों का इस्तेमाल होता है, जिनको बनाने के लिए अधिकतर जगहों पर अभी भी जमीन खोदकर मिट्टी निकाली जाती है और वहां पर बड़ी-बड़ी खाई बच जाती है। बिजलीघरों की राख से ईंट बनना शुरू तो हुआ है लेकिन उन्हें बिजलीघरों से दूर ले जाना किफायती न होने से उनका चलन बहुत बढ़ नहीं पा रहा है। बिजलीघरों की राख पर्यावरण के लिए एक बहुत बड़ा सरदर्द है और दूसरी तरफ इनकी राख से परे जो र्इंटें बनती हैं, वे धरती को खाई में तब्दील करते भी चलती हैं। इसलिए बोतलों के इस प्रयोग से परे भी कई तरह के प्रयोगों की जरूरत है ताकि धरती को बचाया जा सके। लेकिन यहां की तमाम बातें बोतलों के पहाड़ से शुरू हुई है। बोतलों के चलन को कैसे रोका जाए, जब यह सोचते हैं तो लगता है कि ऐसी योजना बनाने और उनको लागू करने की जिम्मेदारी सरकार के जिन लोगों पर है, वे तमाम बहुत आसानी से बोतलबंद पानी पा जाते हैं और इसलिए बिना बोतलों के समाज के बाकी लोगों का गुजारा कैसे हो यह सोचना उनकी कम से कम कोई बेबसी तो बिल्कुल भी नहीं होती है। यह नौबत बदलनी चाहिए। यह सिलसिला गलत है कि जिम्मेदार और जवाबदेह लोग खुद चूंकि गंदे पानी के खतरों और उसकी दिक्कतों से परे हैं, इसलिए वे बोतलों के फैशन की तरफ से बेफिक्र रहें।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने पिछले बरसों में एक से अधिक बार बहुत खुलासे से लिखते हुए यह सलाह दी थी कि देश में डिब्बों और बोतलों की तमाम पैकिंग को ऐसा करवाने की जरूरत है कि उससे खाली डिब्बा-बोतल रोज के काम आ सकें। रंग-पेंट, तेल-ग्रीस, छपाई की स्याही के डिब्बे अब बाल्टियों में आने लगे हैं और खाली होने के बाद इनका इस्तेमाल लंबे समय तक घरेलू कामकाज में होता है। इसी तरह मग्गे (टम्बलर) जैसे आकार में कुछ चीजों की पैकिंग हो सकती है। केंद्र सरकार को इसके लिए उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनियों के साथ मिलकर डिजाइन की ऐसी शर्तें लागू करवानी होंगी। इसके साथ-साथ हमने एक कचरा-टैक्स की सलाह भी दी थी। इसे केंद्र सरकार उत्पादन की जगह पर और राज्य सरकारें या स्थानीय संस्थाएं उपयोग की जगह पर लागू कर सकती हैं। आज बाजार के कड़े मुकाबले के चलते पैकिंग को इतना आकर्षक बना दिया जाता है कि लोग उसकी वजह से भी सामान खरीदने लगते हैं। ऐसे में इस्तेमाल होने वाली उपभोक्ता सामग्री के वजन को छोड़कर, बाकी तमाम पैकिंग पर कागज, प्लास्टिक, कांच या धातु के प्रदूषण-खतरे के हिसाब से वजन पर टैक्स लगाना चाहिए ताकि कंपनियां पैकिंग को कम और हल्का करने पर भी सोच सकें।
आज का वक्त इंजीनियरिंग और इससे जुड़ी हुई दूसरी पढ़ाई के लोगों के लिए एक चुनौती का भी है कि वे किस तरह कम से कम सामान से निर्माण कर सकते हैं, कैसे बर्बादी को कम कर सकते हैं और कैसे बेकार हो गए, बोतलों सरीखे, सामानों का इस्तेमाल करके काम चलाना सीख सकते हैं, सिखा सकते हैं। धरती उसके बेजा इस्तेमाल पर रोज-रोज तो कोई शिकायत नहीं करती है लेकिन उसकी मार कई तरह से पड़ती है। मौसम में बदलाव से लेकर तरह-तरह की प्राकृतिक विपदाओं को धरती झेल रही है, और इस खतरे को बढऩे से रोकने के लिए चारों तरफ से कोशिश करनी पड़ेगी।

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