पेट्रोल पर रियायत गलत थी...

07 नवंबर 11
 संपादकीय
भारतीय राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोग दिल्ली की तरफ देख रहे हैं कि आजकल में ममता बैनर्जी की तृणमूल कांगे्रस यूपीए गठबंधन की सत्ता में बनी रहती है या फिर पेट्रोलियम महंगाई का विरोध करते हुए सरकार छोड़ देती है। यूपीए के खिलाफ एनडीए की पार्टियों के अलावा वामपंथी दल भी हैं और वे भी पेट्रोलियम महंगाई के सख्त खिलाफ हैं। लेकिन दूसरी तरफ सोनिया गांधी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने पेट्रोलियम-मूल्यवृद्धि, खासकर पेट्रोल के इस बार बढ़े हुए दामों, का समर्थन किया है और देश के कुछ अर्थशास्त्रियों ने भी इसे जरूरी माना है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने भी पिछले कुछ महीने पेट्रोलियम, खासकर पेट्रोल के दाम बढ़ाने को सही ठहराया है और इसके पीछे हमारे अपने तर्क हैं।
पेट्रोलियम रियायत को धीरे-धीरे खत्म करने के अलावा और कोई बेहतर उपाय नहीं था इसलिए कुछ महीने पहले केंद्र सरकार ने पेट्रोल के दामों को सरकारी नियंत्रण से बाहर कर दिया था। सबसिडी का बड़ा हिस्सा अगर सबसे गरीब तबके तक सीधा नहीं जा रहा था तो उसे खत्म करना जरूरी था। इस नियंत्रित रियायत के हट जाने के  बाद अब दाम बढऩे से जिस कमजोर तबके पर इसका बोझ अधिक पड़ेगा उसके इस्तेमाल के दूसरे सामानों पर से या सुविधाओं पर से बोझ को कुछ कम करके उसे राहत दी जा सकती है। जैसे छोटी मोपेड गाडिय़ों पर टैक्स कम हो सकता है। साइकिलों पर इस देश में टैक्स पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए क्योंकि गरीब उसे आने-जाने के लिए इस्तेमाल करते हैं और संपन्न तबका उसे कसरत की तरह काम लाता है। इन दोनों ही तरह के इस्तेमाल में अगर साधारण दाम की साइकल काम लाई जाती है तो उस पर कोई टैक्स सरकार को नहीं लेना चाहिए। इसी तरह रिक्शों को पूरी तरह टैक्स-फ्री करना चाहिए। हमारी बात उन तमाम लोगों को कुछ कड़वी लग सकती है जिनसे हमदर्दी दिखाते हुए आज देश के तमाम विपक्षी दल इसके खिलाफ खड़े हुए हैं। लेकिन हमें थोड़ी सी हैरानी इस बात पर है कि वामपंथी दलों से जुड़े बहुत से अर्थशास्त्री इस पार्टी को यह क्यों नहीं समझा पा रहे कि देश की सबसे बड़ी सबसिडी में से एक को खत्म करके गरीब और मध्यम वर्ग को कुछ दूसरे तरह की ऐसी रियायत देना चाहिए जो सिर्फ उसी के इस्तेमाल की हो।
यह जाहिर है कि निम्न-मध्यम आयवर्ग और मध्यम आयवर्ग पर अपने दुपहियों का बोझ बढ़ेगा और बस, साझा-टैक्सी, ऑटोरिक्शा के भाड़े बढऩे से उनके साधारण आय के मुसाफिरों को भी अधिक खर्च करना पड़ेगा। लेकिन रियायत के दौर को खत्म करके अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव के मुताबिक भारत में भी पेट्रोलियम को सरकारी काबू से बाहर करना इसलिए ठीक है कि बहुत संपन्न लोग बहुत बड़ी गाडिय़ों में ढेर सा पेट्रोल-डीजल फूंकते हैं और रियायत का फायदा भी उठाते हैं। यह सिलसिला खत्म होना जरूरी है। पिछले बजट में बड़ी गाडिय़ों पर टैक्स बढ़ाया गया है। हमारा यह मानना है कि राज्यों में भी बड़ी गाडिय़ों पर रजिस्ट्रेशन टैक्स से लेकर दूसरे किस्म के टैक्सों का बोझ उन गाडिय़ों के आकार के मुताबिक ही बढ़ा देना चाहिए। इसके अलावा जिन पार्टियों का विरोध पेट्रोलियम-महंगाई से है उन्हें अपनी सरकारों से कहना चाहिए कि वे राज्यों में इस बढ़े हुए दाम पर अपनी टैक्स वसूली और न बढ़ाएं। छत्तीसगढ़ में शायद दो बरस पहले ऐसा हुआ भी था क्योंकि केंद्र सरकार ने उस समय सभी राज्यों से यह अनुरोध किया था। हमने उसके पहले ही  इसी जगह संपादकीय में यह बात लिखी हुई थी कि केंद्र सरकार तो अपने महंगे खरीदे हुए पेट्रोलियम पर रियायत को कम करने के लिए, घाटे को कम करने के लिए दाम बढ़ा रही है लेकिन उस बढ़े हुए दाम पर राज्यों को बैठे-ठाले अधिक टैक्स क्यों लेना चाहिए? खासकर तब जब राज्यों में राज कर रही पार्टियों राजनीतिक मोर्चे पर पेट्रोल महंगा होने का कड़ा विरोध कर रही हैं और दूसरी तरफ राज्य पर कोई भी दबाव पड़े बिना वे बढ़े हुए दामों पर अपनी जनता से अधिक टैक्स भी ले रही हैं।
पेट्रोल के दामों में सड़कों की राजनीति का बैनर बनाने के बजाय केंद्र और राज्य सरकारों को, स्थानीय संस्थाओं को सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना चाहिए ताकि लोगों के पास निजी वाहनों का एक अधिक किफायती विकल्प मौजूद रहे। एक बड़ा बजट देश भर के शहरों में सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाने में लगाना चाहिए। इसके लिए जरूरत हो तो ऐसी बसों पर टैक्स में छूट दी जाए जो साधारण जनता को रात-दिन शहरों के आरपार लानेे ले जाने में लगती हैं। इससे शहरों में टै्रफिक की दिक्कत भी कम होगी और प्रदूषण भी कम होगा। आज रायपुर जैसे कस्बाई शहर में न गाडिय़ों को रखने की जगह बची है और न ही सड़कें कारों के सैलाब को झेल पा रही हैं। इस विशाल देश की नीतियां सिर्फ गाडिय़ों पर टैक्स, पेट्रोलियम पर रियायत या सड़क निर्माण के बजट जैसे टुकड़ा-टुकड़ा पहलुओं पर बनाने के बजाय आने वाले पचीस-पचास बरस ही शहरी और गैरशहरी दोनों किस्म की अलग-अलग जरूरतों के मुताबिक सार्वजनिक हितों को ध्यान में रखकर बनानी चाहिए। आज ऐसा दिखाई नहीं पड़ता। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में चालीस बरस पहले सिटी बसें चलती थीं लेकिन उन्हें कई बरसों तक चलने के बाद बंद कर दिया गया। इसके बाद बीस-पचीस बरस कोई सिटी बसें नहीं रहीं तो लोग अपनी-अपनी गाडिय़ों पर अधिक आश्रित होते चले गए। अभी दो बरस पहले जब बसें फिर से शुरू हुईं तो पहले ही दिन से वे लबालब हो गईं। अब इनको चलाने में अगर कोई मामूली घाटा होता है तो सरकार को उसे लेकर परेशान नहीं होना चाहिए क्योंकि बसों से जनता को एक सुरक्षित सुविधा मिलती है और पार्किंग की दिक्कत कम होती है, ईंधन कम जलता है, प्रदूषण कम होता है।
जब तक कोई रियायत सीधे गरीब तक न जाए या उस तबके तक न जाए जिसके लिए उसे रखा गया है तब तक उसे धीरे-धीरे खत्म कर देना चाहिए। निजी ग्राहकों में छोटी-बड़ी कारों वाले लोग संख्या में कम हैं लेकिन उनकी खपत काफी अधिक है। इसके बाद ऐसे छोटे ग्राहक रह जाते हैं जो तरह-तरह की दुपहिया गाडिय़ां चलाते हैं और जिनकी खपत कम होती है लेकिन वह रकम उनके लिए बहुत मायने रखती है क्योंकि उनकी कमाई ही कम रहती है। जब पूरे के पूरे डीजल-पेट्रोल को रियायती रेट पर बेचा जाता था तो सरकार सहित सारे बड़े ग्राहक इसे रियायती रेट पर ही पाते थे और यह रियायत सिर्फ गरीब तबके तक सीमित नहीं रह पातीं थी। ऐसे में राशन दुकान के सस्ते चावल या सस्ती शक्कर की तरह का काम पेट्रोल-डीजल के बारे में नहीं हो पाता। नतीजा यह होता है कि सरकारी खजाने से निकली रियायत का एक बहुत बड़ा हिस्सा देश के गरीबों तक नहीं पहुंच पाता। हम अपने ही राज्य में लगातार देखते हैं कि किस तरह घरों की रसोई के लिए केंद्र सरकार द्वारा भारी रियायत पर दिए जाने वाले गैस सिलेंडरों का बहुत बड़ा हिस्सा होटलों से लेकर कारखानों तक और गाडिय़ों तक में बेजा इस्तेमाल हो रहा है और राज्य सरकार की मशीनरी इस पर कोई कार्रवाई नहीं करती। इसके पीछे लापरवाही की एक बड़ी वजह यह भी है कि यह अनुदान केंद्र सरकार की जेब से निकलकर आ रहा है इसलिए राज्य सरकार पर इसका सीधा बोझ नहीं है। लेकिन अगर कल को केंद्र सरकार राज्यों से कहे कि गैस या मिट्टीतेल की रियायत में वे भी हाथ बंटाएं तो उस दिन चोरी और भ्रष्टाचार का यह पूरा ढांचा रातों-रात कमजोर नहीं किया जा सकेगा।

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