नानक जयंती और भारत-पाक

10 नवंबर 11
 संपादकीय
नानक जयंती और भारत-पाक
सार्क सम्मेलन के आज पहले ही दिन मालदीव में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों ने सम्मेलन से अलग आपसी बातचीत में दरियादिली से बहुत सी बातें कहीं। पिछले कुछ समय से भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों के बीच भी बेहतर माहौल में बातचीत चल रही है या एक-दूसरे के देशों के बारे में कुछ खुले दिल से बातें हो रही हैं। इस बातचीत के पूरे नतीजे तो सार्क सम्मेलन के खत्म होते-होते धीरे-धीरे सामने आएंगे, लेकिन इस बातचीत का आज हम एक अलग महत्व इसलिए देख रहे हैं कि इन दोनों देशों को जोडऩे वाली कुछ बातों में से एक का आज एक बड़ा त्यौहार है। गुरूनानक देव की जयंती के इस मौके पर भारत सहित दुनिया के बहुत से देशों से हजारों सिख तीर्थयात्री पाकिस्तान पहुंचे हैं जो कि वहां इस जयंती समारोह में शामिल होंगे। गुरूनानक देव का जन्म स्थान ननकाना साहिब इस तीर्थयात्रा का केन्द्र है और इसके लिए भारत से भी तीन हजार सिख विशेष रेलगाडिय़ों से सरहद पार करके वहां पहुंचे हैं।
भारत और पाकिस्तान के आज के रिश्ते दुनिया की दूसरी बड़ी ताकतों, पाकिस्तान की फौज, वहां की पार्टियों, पाक-अफगान सरहद के दोनों ओर लहू बिखेरने वाले आतंकियों जैसी बहुत सी बातों पर टिके हुए हैं। इसलिए इन संबंधों को लेकर केवल भावनात्मक बात का कोई अधिक मतलब नहीं है और आज की दुनिया की बहुत ही कठोर राजनीति और व्यापार व्यवस्था से ऐसे तमाम रिश्ते प्रभावित होते हैं। लेकिन गुरूनानक जयंती का यह मौका न सिर्फ भारत-पाक संबंधों के बारे में, बल्कि किसी भी किस्म के इंसानी रिश्तों के बारे में बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है और यह बात इस सरहद के दोनों ओर चल रहे तनाव पर भी लागू होती है। गुरूनानक देव की सोच और उनके काम को अगर देखें, तो लोकतंत्र शब्द की उपज के भी सदियों पहले उन्होंने अपने महान ग्रंथ गुरूग्रंथ साहब में जिस उदारता से अलग-अलग बहुत से धर्मों के संतों की लिखी सुधारवादी और उदारवादी बातों को उनके नाम सहित शामिल किया था, वह उदारता न सिर्फ हमेशा देखने लायक बनी रहेगी, बल्कि वह आज उदारता की एक बहुत बड़ी नसीहत लोगों को देती है। इस बात की चर्चा हम किसी धर्म की सोच से परे, इंसानी उदारता के रूप में इसलिए कर रहे हैं क्योंकि धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, क्षेत्रीय और लैंगिक उदारता न रहने से आज दुनिया के अलग-अलग तबकों के बीच तनाव बढ़ते चल रहे हैं। हम गुरूग्रंथ साहब की सोच को किसी तंग नजरिए से किसी धार्मिक संदर्भ में ही देखना नहीं चाहते। उसके तहत सिख पंथ की व्यवस्था में आर्थिक भेदभाव से परे का सामाजिक व्यवहार भी देखने और सीखने लायक है। फिर जिस तरह गुरूनानक देव ने दूसरे धर्मों के संतों की वाणी अपनी धार्मिक किताब में शामिल की, उसी तरह की सोच आज भी सिख गुरुद्वारों में पहुंचने वाले दूसरे धर्मों के लोगों के साथ लंगर से लेकर उपासना तक देखने मिलती है। जहां कुछ दूसरे धर्म अपनी सरहदों को सिर्फ अपने मानने वालों तक सीमित कर लेते हैं, वहीं सिख पंथ दरवाजों को सभी लोगों के लिए चारों तरफ खोलकर रखता है।
यह मौका हम सिख पंथ के भीतर कुछ और अच्छी बातों को बढ़ाने की चर्चा अनिवार्य रूप से करने का नहीं देखते और हम भारत और पाकिस्तान के बीच आज अधिक उदारता की जरूरत की तरफ अपनी बात को मोडऩा चाहेंगे। दोनों देशों के बीच हिन्दू-मुस्लिम और सिख, तीनों धर्मों के लोगों की रिश्तेदारियां और आवाजाही बहुत है। आवाजाही पर दोनों तरफ से एक बड़ी तंगदिली के साथ रोक-टोक चलती है और आज सुबह भी मालदीव की खबर यह है कि वीजा नियमों को आसान बनाने पर दोनों तरफ एक राय बन रही है। ऐसा इसलिए जरूरी है कि कलाकार, लेखक, पत्रकार, खिलाड़ी और सामाजिक कार्यकर्ता इस सरहद के दोनों तरफ ऐसे हैं जो कि आतंक के खिलाफ हैं, धर्मान्धता के खिलाफ हैं, साम्प्रदायिकता के खिलाफ हैं और किसी भी किस्म की फौजी कार्रवाई के खिलाफ हैं। दिक्कत यह है कि चुनावों के रास्ते सरकार तक पहुंचने वाले लोगों से न तो जनता के बीच कोई मुकाबला अमन पसंद ऐसे लोग कर पाते हैं और न ही सत्ता तक पहुंचे बिना उनकी आवाज का कोई वजन हुकूमतें मानती हैं। दोनों तरफ राजनीतिक ताकतें आपसी संबंधों को तय करने के मामले में मानो लगभग एकाधिकार कायम रखती हैं और चुनावी राजनीति से परे रहने वाले तबके अपनी इंसानी सोच के साथ मीडिया और इंटरनेट, सम्मेलनों और बैठकों तक सीमित रह जाते हैं, वे राजकाज के करीब भी नहीं पहुंच पाते।
कहने को लोकतंत्र में गैरचुनावी लोगों की भी एक जगह होनी चाहिए, लेकिन हम इन दोनों देशों में से अधिक परिपक्व लोकतंत्र, भारत, में भी यह देखते हैं कि राज्यसभा जैसे गैरचुनावी उच्च सदन में घूम-फिरकर वे ही घिसे-पिटे राजनेता पहुंचते हैं, और कई बार तो ऐसे लोग पहुंचते हैं जो कि चुनावों में भी परास्त हो चुके हैं। हमारा यह मानना है कि गैरचुनावी लोग समाज के अलग-अलग तबकों में अपनी लीडरशिप, अपने हुनर और अपने होनहार होने की वजह से देश की नीतियां बनाने में हिस्सेदार होते तो आज सरहद के दोनों तरफ ऐसा तनाव नहीं रहता। आज गुरूनानक जयंती के दिन सार्क सम्मेलन के किनारे भारत और पाकिस्तान के बीच जो बातचीत चल रही है उसे हम गुरूनानक देव की उदारता से जोड़कर ही देखना चाहते हैं, वैसी उदारता के अलावा इन दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्तों का और कोई रास्ता नहीं है।

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