बेची जाती बालदेह पर भी होगी चर्चा?

14 सितंबर 2011
संपादकीय

नेहरू के जन्मदिन पर मनाए जाने वाले बालदिवस पर आज नेहरू की पार्टी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार की ओर से बड़े-बड़े इश्तहार जारी किए गए जिनमें नेहरू की कही बातें छपी हैं। ये बातें और बच्चों के साथ नेहरू की तस्वीरें देश को एक बार और बुरी तरह यह याद दिलाती हैं कि बच्चों की क्या दुर्गति है। हम आज यहां किसी और मुद्दे पर लिखने का सोचते कि उसके पहले हमारे छायाकार की आज सुबह की खींची एक तस्वीर सामने आई जिसमें छोटे-छोटे बच्चे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शराब की खाली बोतलों को इक_ा करके उनके बदले आईसक्रीम पा रहे हैं। इस तस्वीर को देखकर याद आया कि पहले भी हम इसी शहर में ऐसी तस्वीरें छाप चुके हैं जिनमें सड़क के किनारे शराब पीते बैठे लोगों के आसपास ही बच्चे बैठकर बोतल की आखिरी बूंद खाली हो जाने की राह देख रहे हैं ताकि उन बोतलों को उठाकर ले जाकर वे बेच सकें और अपने लिए या अपने घर के लिए रोटी जुटा सकें। आज ही के अखबार में हम एक रिपोर्ट छाप रहे हैं कि किस तरह मजदूर बच्चों के लिए सरकार द्वारा चलाई जाने वाली श्रमिक स्कूलों में बच्चे पढ़ रहे हैं या कुछ काम सीख रहे हैं। आजादी की पौन सदी करीब है और इस देश में सरकारें मजदूर बच्चों के लिए स्कूलें चला रही हैं! इससे नेहरू के इस देश में बच्चों की हालत का पता लगता है।
बच्चों के साथ ज्यादती के बारे में कई बार हम अपने विचार लिखते हैं और कई बार देश भर से उनके बदहाल पर आई खबरें छापते हैं। लेकिन बच्चों की हालत को सुधारने के लिए सरकारों या संवैधानिक संस्थाओं में बैठे हुए लोग अपनी जिम्मेदारियों समारोहों से शुरू करते हैं और समारोहों पर खत्म कर देते हैं। असली खतरों से देश के जो करोड़ों बच्चे गुजर रहे हैं, वे ऐसे समारोहों के अहातों के भी बाहर हैं, और जैसा कि हमने यहां पर लिखना शुरू किया है, वे शराब ठेकों के अहातों के इर्दगिर्द हैं। वे सर्द रातों के फुटपाथों पर हैं, रेलवे स्टेशनों पर, रेल गाडिय़ों में, अपनी नौकरी की होटलों और चाय ठेलों की भट्ठियों के आसपास सोए हैं, कहीं झाडू लगा रहे हैं, कहीं कारखानों और बस-टैक्सियों में काम कर रहे हैं और अनगिनत बड़े-बड़े घरों में छोटे-छोटे बच्चों को थामने से लेकर बड़े-बड़े बर्तनों को मांजने तक का काम कर रहे हैं। जिन लोगों का दिल इतना पढ़कर ही हिल गया हो, उन्हें यह बताना थोड़ा सा राक्षसी होगा कि किस तरह हर बरस दसियों हजार बच्चे, नाबालिग-कमउम्र बच्चे, इस देश के चकलाघरों में अपनी देह बेचने के लिए बेच दिए जाते हैं। नेहरू का यह देश, धर्म और ईश्वरों से लदा हुआ यह देश, आध्यात्म और संस्कृति के पाखंडी घमंड से सिर तानकर चलता हुआ यह देश ऐसे बच्चों की बात भी करना नहीं चाहता। नतीजा यह है कि खून-पसीना या अपनी देह के कुछ अंगों को बेचकर जो बच्चे बड़े होते हैं, वे इस लोकतंत्र, इस समाज और इन दोनों की हैवानियत के बारे में अपनी सोच पुख्ता करके ही बड़े होते हैं।
बाल दिवस पर क्या आज इस पूरे देश में होने वाले किसी भी समारोह में बच्चों के ऐसे हालात पर खुलकर चर्चा होगी? या फिर नेहरू से शुरू होकर यह चर्चा राहुल पर आकर खत्म हो जाएगी? यह एक अजीब बात है कि आधी सदी से अधिक जिस कांगे्रस ने इस देश पर राज किया है, इस देश के हिंदू और भारतीय मूल्यों की बात करते हुए जिस भाजपा ने देश और प्रदेश पर राज किया है, इन दोनों ही पार्टियों के पास, उनकी सरकारों और उनके नेताओं के पास आज इतना हौसला नहीं है कि फुटपाथ, प्लेटफार्म और चकलाघरों में नोंचे जाते बच्चों के बारे में वे चर्चा भी कर सकें। कांगे्रस के एक बच्चे राहुल के जवाब में भाजपा के पास गांधी नाम और लहू वाला एक दूसरा बच्चा वरूण है। लेकिन इन दोनों से परे देश में दम तोड़ते बचपन पर असल चर्चा, ईमानदार चर्चा इन दोनों पार्टियों ने, या किसी और पार्टी ने भी, किसी बाबा ने, किसी अन्ना ने, किसी श्रीश्री ने की हो तो जरा याद करके देखें? कुछ सामाजिक संगठनों और मीडिया के एक गैरबाजारू हिस्से के समय-समय पर उठाए गए मुद्दों को अगर छोड़ दें तो नेहरू की गोद से उतरे हुए बच्चे बिल्कुल अकेले हैं और उनकी देह को खरीदने वाला यह वयस्क देश बेरोक-टोक नेहरू की पार्टी में है, उस पार्टी का विरोध करने वाली पार्टी में है, बाजार और सरकार पर राज करने में है, और बड़े-बड़े घरों के मकानमालिक की शक्ल में बिजली के बिलों पर उसका नाम दर्ज है। यह एक भयानक हालत है और अब यह चर्चा के भी बाहर है। यह नौबत इस देश को और बाकी दुनिया को एक ऐसी घायल पीढ़ी दे रही है जो कि इस देश के लिए, समाज के लिए किसी तरह से भी जवाबदेह नहीं होगी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें