31 अक्टूबर 11
संपादकीय
दुनिया का 7 अरबवां बच्चा पैदा होने के साथ ही अब चारों तरफ आबादी को लेकर चर्चा चल रही है। यह बच्चा पहले उत्तरप्रदेश में होने की खबरें थीं लेकिन अच्छा ही हुआ जो यह मनीला में पैदा हुआ। हाथियों के बुतों तले पैदा बच्चा जी भी सकता था और एक दलित महिला के राज में पैदा होते ही मर भी सकता था। यह भी हो सकता था कि किसी सरकारी अस्पताल में जगह न पाकर उसकी मां उसे लखनऊ के किसी फुटपाथ पर कारों की ओट में पैदा करती और वह वहीं चल बसता। ऐसे में दुनिया का ऐसा ऐतिहासिक बच्चा उत्तरप्रदेश में या कोलकाता के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पैदा न होना ही ठीक रहा। उत्तरप्रदेश के सीने पर चट्टानों में तराशे गए हाथी सवार हैं और एक-एक हाथी की लागत ने हजारों नवजात इंसानी हाथों के जिंदा रहने का हक छीन लिया है। इसी भारत के बारे में आज सुबह बच्चों के बारे में एक दूसरी खबर यह आई है कि राज्यों की सरकारें गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के इलाज के आंकड़ों में हेराफेरी करके उन्हें केंद्र के सामने पेश कर रही हैं। एक दूसरी खबर यह बताती है कि 2010 में भारत में करीब साढ़े पांच हजार बच्चों पर सेक्स हमले दर्ज हुए और करीब डेढ़ हजार बच्चे अलग-अलग जगहों पर मार डाले गए। उत्तरप्रदेश जहां की यह सात अरबवां बच्चा पैदा होने वाला था वहां पर पिछले बरस में तीन सौ पन्द्रह बच्चों की हत्या कर दी गई और करीब बारह सौ बच्चों पर सेक्स हमले हुए।
सबसे गरीब, भूखे और बीमार, बेसहारा या अनाथ कहे जाने वाले बच्चों की फिक्र हिंदुस्तान की सोच में नहीं है। यहां फुटपाथों पर और रेलवे प्लेटफार्मों पर घूमने वाले बच्चों को नशे का शिकार होते देखकर भी समाज और सरकार अपनी मस्ती में हैं। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही देखते हैं कि बच्चों की भलाई के लिए बनीं संवैधानिक और सरकारी संस्थाएं लालबत्तियों से सजे लोगों को सहूलियतेंं देती हैं लेकिन इनकी नुमाइशी तस्वीरों से परे बच्चे सड़कों पर और फुटपाथों पर ही हैं। ऐसे बच्चों के बीच काम करने वाले जानकार सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह अनुभव है कि वे ऐसी जिंदगी जीते हुए भी कमाना सीख लेते हैं और उस कमाई से ठीक-ठाक खाने का ख्याल भी रख लेते हैं। वे शायद ही कोई नया सामान इस्तेमाल करते हों और आमतौर पर वे दूसरों के फेंके हुए सामानों पर अपनी जिंदगी चला लेते हैं, घूरों का बोझ कम भी करते चलते हैं।
आज इस चर्चा को हम इसलिए छेड़ रहे हैं कि भारत की बढ़ती हुई आबादी को लेकर लोगों में बड़ी फिक्र है। बहुत से लोगों का यह मानना है कि यह आबादी सरकार पर बोझ है और धरती पर भी। लेकिन हमारी सोच इससे काफी अलग है। अधिक आबादी का लगभग पूरा हिस्सा बहुत गरीब है और उसकी जरूरतें इतनी कम हैं कि वे धरती और पर्यावरण पर बहुत कम बोझ हैं। दरअसल सबसे गरीब इंसान बहुत कम खाकर, बहुत खपत पर जिंदा रहकर दुनिया को चलाने में बहुत मदद करते हैं। लोग अगर खून-पसीने की मेहनत न करते होते तो उस काम के लिए मशीनें लगतीं और ऐसी मशीनों को बनाना और चलाना धरती पर अधिक बड़ा बोझ होता, पर्यावरण का उससे अधिक बड़ा नुकसान होता। दरअसल अधिक आबादी को एक बड़ा बोझ और एक बड़ा खतरा मानने के पीछे गैरगरीब ताकतवर तबके की यह सोच है कि कल को किसी दिन अगर ये गरीब कुछ अधिक सहूलियतें मांगने लगे तो क्या होगा? फिर सत्ता चला रहे लोगों को सबसे गरीब लोगों की बहुत बड़ी आबादी के लिए गांव-गांव तक बिखरी रोजगार की योजनाओं को चलाने के बजाय राष्ट्रमंडल और टूजी के बड़े-बड़े कारोबार से एकमुश्त कमा लेना अधिक आसान लगता है। इसलिए एक गरीब से धरती पर पडऩे वाले बोझ को बढ़ाकर आंका जाता है और उसकी उत्पादकता को कम। हमारा यह मानना है कि आज भी गरीब लोग अपनी रोज की जिंदगी की बहुत ही सीमित जरूरतों के चलते पर्यावरण पर सबसे कम बोझ हैं और इंसानी मेहनत की उत्पादकता उन बहुत सी जगहों पर बिना किसी विकल्प की है, जहां पर मशीनें उन कामों को नहीं कर सकतीं। लेकिन ऐसी योजनाओं को बनाने और चलाने की जहमत आज सत्ता चला रहे लोग उठाना नहीं चाहते इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था से लेकर स्वरोजगार की योजनाओं तक भ्रष्टाचार और निकम्मापन गरीब के हक को छीन रहे हैं।
आबादी के बढऩे से खतरे बढऩे के हौव्वे का भांडाफोड़ करने की जरूरत है, जिस देश में खादी और हैंडलूम से लोगों को स्थानीय रोजगार भी मिलता था और बहुत बड़ा निर्यात का कारोबार भी मिलता था, उन्हें कारखानेदारों और सरकारों ने सोची-समझी साजिश के तहत देश भर में बंद करवाने का काम किया। यह हमला मशीनों के हित में, बड़े कारोबारों के हित में हाथ के रोजगार के बहुत से दूसरे हुनरों पर भी किया गया और यही वजह है कि आज सरकारी आंकड़े आबादी को बोझ साबित करने की कोशिश करते हैं। भारत में सबसे कम खाकर सबसे अधिक उगाने वाले तबके को बोझ बताने का मतलब सत्ता चला रहे लोगों की नाकामयाबी से परे कुछ नहीं है। हमारा मानना है कि आबादी को दहशत फैलाने का सामान बनाने के बजाय गांधी के इस देश में हाथ के काम का सम्मान बढ़ाना चाहिए और आज सरकार की सारी मोटी रियायतें जिस तरह बड़े कारखानेदारों के हवाले की जा रही हैं, उसके बजाय गरीब आबादी को उसका हक दिया जाना चाहिए। हाथियों और इंसानों की हाथीनुमा प्रतिमाएं लगवाने में लगी सरकारें जिस तरह गरीब बच्चों की मौतों को फिक्र नहीं मानतीं, वह लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ी फिक्र है, आबादी कोई असल खतरा नहीं है।
संपादकीय
दुनिया का 7 अरबवां बच्चा पैदा होने के साथ ही अब चारों तरफ आबादी को लेकर चर्चा चल रही है। यह बच्चा पहले उत्तरप्रदेश में होने की खबरें थीं लेकिन अच्छा ही हुआ जो यह मनीला में पैदा हुआ। हाथियों के बुतों तले पैदा बच्चा जी भी सकता था और एक दलित महिला के राज में पैदा होते ही मर भी सकता था। यह भी हो सकता था कि किसी सरकारी अस्पताल में जगह न पाकर उसकी मां उसे लखनऊ के किसी फुटपाथ पर कारों की ओट में पैदा करती और वह वहीं चल बसता। ऐसे में दुनिया का ऐसा ऐतिहासिक बच्चा उत्तरप्रदेश में या कोलकाता के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पैदा न होना ही ठीक रहा। उत्तरप्रदेश के सीने पर चट्टानों में तराशे गए हाथी सवार हैं और एक-एक हाथी की लागत ने हजारों नवजात इंसानी हाथों के जिंदा रहने का हक छीन लिया है। इसी भारत के बारे में आज सुबह बच्चों के बारे में एक दूसरी खबर यह आई है कि राज्यों की सरकारें गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के इलाज के आंकड़ों में हेराफेरी करके उन्हें केंद्र के सामने पेश कर रही हैं। एक दूसरी खबर यह बताती है कि 2010 में भारत में करीब साढ़े पांच हजार बच्चों पर सेक्स हमले दर्ज हुए और करीब डेढ़ हजार बच्चे अलग-अलग जगहों पर मार डाले गए। उत्तरप्रदेश जहां की यह सात अरबवां बच्चा पैदा होने वाला था वहां पर पिछले बरस में तीन सौ पन्द्रह बच्चों की हत्या कर दी गई और करीब बारह सौ बच्चों पर सेक्स हमले हुए।
सबसे गरीब, भूखे और बीमार, बेसहारा या अनाथ कहे जाने वाले बच्चों की फिक्र हिंदुस्तान की सोच में नहीं है। यहां फुटपाथों पर और रेलवे प्लेटफार्मों पर घूमने वाले बच्चों को नशे का शिकार होते देखकर भी समाज और सरकार अपनी मस्ती में हैं। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही देखते हैं कि बच्चों की भलाई के लिए बनीं संवैधानिक और सरकारी संस्थाएं लालबत्तियों से सजे लोगों को सहूलियतेंं देती हैं लेकिन इनकी नुमाइशी तस्वीरों से परे बच्चे सड़कों पर और फुटपाथों पर ही हैं। ऐसे बच्चों के बीच काम करने वाले जानकार सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह अनुभव है कि वे ऐसी जिंदगी जीते हुए भी कमाना सीख लेते हैं और उस कमाई से ठीक-ठाक खाने का ख्याल भी रख लेते हैं। वे शायद ही कोई नया सामान इस्तेमाल करते हों और आमतौर पर वे दूसरों के फेंके हुए सामानों पर अपनी जिंदगी चला लेते हैं, घूरों का बोझ कम भी करते चलते हैं।
आज इस चर्चा को हम इसलिए छेड़ रहे हैं कि भारत की बढ़ती हुई आबादी को लेकर लोगों में बड़ी फिक्र है। बहुत से लोगों का यह मानना है कि यह आबादी सरकार पर बोझ है और धरती पर भी। लेकिन हमारी सोच इससे काफी अलग है। अधिक आबादी का लगभग पूरा हिस्सा बहुत गरीब है और उसकी जरूरतें इतनी कम हैं कि वे धरती और पर्यावरण पर बहुत कम बोझ हैं। दरअसल सबसे गरीब इंसान बहुत कम खाकर, बहुत खपत पर जिंदा रहकर दुनिया को चलाने में बहुत मदद करते हैं। लोग अगर खून-पसीने की मेहनत न करते होते तो उस काम के लिए मशीनें लगतीं और ऐसी मशीनों को बनाना और चलाना धरती पर अधिक बड़ा बोझ होता, पर्यावरण का उससे अधिक बड़ा नुकसान होता। दरअसल अधिक आबादी को एक बड़ा बोझ और एक बड़ा खतरा मानने के पीछे गैरगरीब ताकतवर तबके की यह सोच है कि कल को किसी दिन अगर ये गरीब कुछ अधिक सहूलियतें मांगने लगे तो क्या होगा? फिर सत्ता चला रहे लोगों को सबसे गरीब लोगों की बहुत बड़ी आबादी के लिए गांव-गांव तक बिखरी रोजगार की योजनाओं को चलाने के बजाय राष्ट्रमंडल और टूजी के बड़े-बड़े कारोबार से एकमुश्त कमा लेना अधिक आसान लगता है। इसलिए एक गरीब से धरती पर पडऩे वाले बोझ को बढ़ाकर आंका जाता है और उसकी उत्पादकता को कम। हमारा यह मानना है कि आज भी गरीब लोग अपनी रोज की जिंदगी की बहुत ही सीमित जरूरतों के चलते पर्यावरण पर सबसे कम बोझ हैं और इंसानी मेहनत की उत्पादकता उन बहुत सी जगहों पर बिना किसी विकल्प की है, जहां पर मशीनें उन कामों को नहीं कर सकतीं। लेकिन ऐसी योजनाओं को बनाने और चलाने की जहमत आज सत्ता चला रहे लोग उठाना नहीं चाहते इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था से लेकर स्वरोजगार की योजनाओं तक भ्रष्टाचार और निकम्मापन गरीब के हक को छीन रहे हैं।
आबादी के बढऩे से खतरे बढऩे के हौव्वे का भांडाफोड़ करने की जरूरत है, जिस देश में खादी और हैंडलूम से लोगों को स्थानीय रोजगार भी मिलता था और बहुत बड़ा निर्यात का कारोबार भी मिलता था, उन्हें कारखानेदारों और सरकारों ने सोची-समझी साजिश के तहत देश भर में बंद करवाने का काम किया। यह हमला मशीनों के हित में, बड़े कारोबारों के हित में हाथ के रोजगार के बहुत से दूसरे हुनरों पर भी किया गया और यही वजह है कि आज सरकारी आंकड़े आबादी को बोझ साबित करने की कोशिश करते हैं। भारत में सबसे कम खाकर सबसे अधिक उगाने वाले तबके को बोझ बताने का मतलब सत्ता चला रहे लोगों की नाकामयाबी से परे कुछ नहीं है। हमारा मानना है कि आबादी को दहशत फैलाने का सामान बनाने के बजाय गांधी के इस देश में हाथ के काम का सम्मान बढ़ाना चाहिए और आज सरकार की सारी मोटी रियायतें जिस तरह बड़े कारखानेदारों के हवाले की जा रही हैं, उसके बजाय गरीब आबादी को उसका हक दिया जाना चाहिए। हाथियों और इंसानों की हाथीनुमा प्रतिमाएं लगवाने में लगी सरकारें जिस तरह गरीब बच्चों की मौतों को फिक्र नहीं मानतीं, वह लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ी फिक्र है, आबादी कोई असल खतरा नहीं है।
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