14 नवंबर 2011
आजकलसुनील कुमार
हमारी एक साथी संवाददाता एक गांव में गई तो थी एक दूसरी रिपोर्ट बनाने, लेकिन वह अलग-अलग कई तस्वीरें लेकर लौटी और उनमें से एक दीवार पर लिखे एक नारे की थी-
अस्पताल मा जचकी करवाऔ।
लइका के संग पैसा पावऔ।।
सरकार की ओर से अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में जचकी करवाने को बढ़ावा देने के लिए यह नारा लिखा गया है। लेकिन छत्तीसगढ़ी बोली की अपनी साधारण जानकारी से पहली नजर में मुझे यह लगता है कि इस नारे में लइका शब्द का इस्तेमाल लड़के की तरफ इशारा करता है। लेकिन छत्तीसगढ़ी के व्याकरण की अधिक जानकारी न होने से इस बारे में रविशंकर विश्वविद्यालय में भाषा शास्त्र के प्राध्यापक रह चुके डॉ. चित्तरंजन कर से पूछा तो उनकी पहली प्रतिक्रिया थी कि यह पुल्लिंग शब्द है। लेकिन बाद में उन्होंने छत्तीसगढ़ी में प्रचलित बोलचाल के आधार पर यह भी कहा कि लइका में लड़का-लड़की सभी शामिल हो जाते हैं। जब मैंने बाल की खाल निकालने के अंदाज में उन्हें कुछ और घेरा तो उन्होंने यह माना कि एक अकेली लड़की के लिए लइका शब्द का इस्तेमाल शायद खटके, और उन्होंने यह वायदा किया कि वे इस बारे में और सोचकर लिखकर देंगे। अभी इस कॉलम को लिखते हुए भी मेरी कोशिश है कि उनका लिखा हुआ हमें मिल जाए तो उसे भी साथ-साथ छापा जा सके।
इसके बाद मैंने छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख संस्कृतिकर्मी लाल राम कुमार सिंह से पूछा तो उनकी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि सभी बच्चों के लिए एक साथ लइका शब्द का इस्तेमाल हो सकता है लेकिन उन्होंने भी मेरे खोद-खोदकर पूछने पर यह माना कि किसी एक लड़की का जिक्र करने के लिए लइका शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, जबकि एक लड़के का जिक्र करने के लिए लइका लिखा या बोला जाएगा।
आज जब देश कन्या भू्रण हत्या से जूझ रहा है और आबादी में लड़कियों का अनुपात गिरते चले जा रहा है तब सरकार के एक नारे की भाषा बहुत सोची-समझी होनी चाहिए और वह सिर्फ लड़के को बढ़ावा देने वाली नहीं होनी चाहिए। इस नारे के बारे में छत्तीसगढ़ी को कम समझने वाले कुछ और लोगों से जब मैंने बात की तो वे लइका को लड़का से ही जोड़कर देख पा रहे थे।
इस देश में हिन्दी और अंगे्रजी के अलावा जिस उर्दू जुबान को मैं बोलचाल के नाते कुछ हद तक जानता हूं उन सबमें भाषा इस कदर पुरूषप्रधान और मर्दाना है कि उसमें औरत को या तो आदमी में ही शामिल मान लिया गया है या फिर उसे बहुत ही नीचे दर्जे का महत्वहीन, बेमायने माना गया है। इस बारे में पहले भी कई बार अपने अखबार के संपादकीय में और इस कॉलम में लिखकर भाषा के पुरूषप्रधान अन्याय का विरोध किया गया है, लेकिन जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक-एक नेता के बयान कई-कई बार छापे जा सकते हैं तो समाज के भीतर समानता के साथ किए जा रहे इस भ्रष्टाचार के खिलाफ भी एक से अधिक बार लिखने में हमें जगह की बर्बादी नहीं लगती।
हिन्दी भाषा की लोकोक्तियां देखें तो उसमें औरत का अपमान करने वाली बातें भरी पड़ी हैं। और हिन्दी का कोई भी शब्दकोश देखें तो उसमें लइका की बराबरी करते हुए ऐसे तमाम शब्द नर के साथ ही बनाए गए हैं जो कि नर और नारी दोनों के लिए होने चाहिए थे। इनमें नरभक्षी, नरकंकाल जैसे अनगिनत शब्द हैं जिनसे यह लगता है कि हिंसक जानवर भी नारी को खाने लायक नहीं मानता और नारी का तो कोई कंकाल भी इसलिए नहीं गिना जाता कि जीते-जी भी उसे मर्द बिना रीढ़ की हड्डी का ही देखना पसंद करते हैं। यह सिलसिला आदमखोर, आदमीयत, आदमकद से होते हुए अंगे्रजी में मैनईटर, मैनपॉवर, वर्कमैन जैसी तमाम बातों पर हावी है। जहां तक मर्दों का बस चला उन्होंने ताकत का पैमाना भी हॉर्सपॉवर बनाया, मानो घोड़ी की ताकत का कहीं इस्तेमाल ही नहीं होता है। और महिला को जगह मिली कुतिया, बिच, सन ऑफ बिच जैसी गालियों में। वहां पर मर्दानगी को गालियों से परे, ताकत और वीरता के लिए पुरूषार्थ जैसा शब्द दिया गया है और औरत को कमजोर बताने के लिए चूडिय़ां पहनने को गाली की तरह मान लिया गया है। एक चुड़ैल से लेकर रंडी और रांड तक की हजार किस्म की गालियां औरत पर ही टिकी हुई हैं और अंगे्रजी, उर्दू में भी मां और बहन पर केंद्रित गालियां लबालब हैं।
हजारों बरस से औरत को पांव तले की धूल मानने वाली भाषाओं और उन भाषाओं के कहावत-मुहावरे बहुत हिंसक हैं, समानता के खिलाफ हैं लेकिन हमारी रग-रग में वे इतने आसानी से भर चुके हैं कि अब राजनीतिक चेतना से परे की महिलाएं भी इस भाषा में कोई अन्याय नहीं देखतीं। छत्तीसगढ़ की विधानसभा की दीवार पर किसी वेद से लेकर पुरूषार्थ के बारे में कुछ लिखा गया है और उसमें किसी को कुछ अटपटा नहीं लगता। इसी तरह इस देश का प्रधानमंत्री लालकिले से आजादी की सालगिरह के अपने भाषण में एक दर्जन बार जब आम आदमी कहता है, तो भी किसी को इसमें कुछ बुरा नहीं लगता। बार-बार लिखते हुए हम यह सोचते हैं कि इन तमाम बातों को लेकर कोई महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग या अदालत तक जाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ होते नहीं दिखता क्योंकि अधिकतर लोग इस असमानता के आदी हो चुके हैं।
हमें भाषा के इस अन्याय में सुप्रीम कोर्ट तक एक जनहित याचिका लेकर जाने का पूरा सामान दिखता है। भाषा की ऐसी तरह-तरह की मिसालें लेकर किसी को सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी चाहिए कि अदालत, सरकार, संसद और मीडिया को ऐसी अन्यायपूर्ण भाषा के इस्तेमाल से रोकना चाहिए। भारत के संविधान में आदमी और औरत को न सिर्फ बराबरी दी गई है बल्कि औरत को हजारों बरस के शोषण और अत्याचार से आजादी दिलाने के लिए कई किस्म के खास अधिकार भी दिए गए हैं और संविधान भारत में महिलाओं के लिए एक अलग नरमी रखता है और जिस अन्याय का जिक्र हम कर रहे हैं उसकी कोई जगह इस संविधान में नहीं है।
लेकिन जिस व्यक्ति को भारत के हिंदू समाज की सोच में मर्यादा पुरूषोत्तम माना जाता है, उस राम ने भी एक सामाजिक मर्यादा को निभाने के लिए अपनी पत्नी सीता के साथ जैसा अन्याय किया था, वैसा ही अन्याय आज भी भारत की महिलाओं के साथ जारी है। दूसरी तरफ राम के बाद आए कृष्ण के युग में सोलह सौ सुंदरियों के साथ एक अकेले कृष्ण की रासलीला पर भी न तो किसी 'धोबीÓ (अयोध्या की तरह) ने कोई सवाल उठाया और न ही बाद के अभी पिछली सदी के दौर में समाज ने महिलाओं को सती बनाने में कोई दिक्कत महसूस की। अब इस सिलसिले का उसी तरह विरोध करने का वक्त आ गया है जिस तरह का विरोध दुनिया के कुछ देशों में वहां के शासकों के खिलाफ हो रहा है, भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर है।

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