खुदरा कारोबार और विदेशी पूंजी के मुद्दों पर चर्चा की जरूरत

28 नवंबर 2011
संपादकीय
भारत के खुदरा कारोबार में विदेशी पूंजी की इजाजत देने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ संसद ठप हो चुकी है। देश के 28 राज्यों में से एक दर्जन इसके खिलाफ खुलकर सामने आ चुके हैं जिनमें यूपीए सरकार का भागीदार राज्य पश्चिम बंगाल तो है ही, खुद कांगे्रस सरकार वाला केरल भी चिल्हर कारोबार में एफडीआई के खिलाफ बोल चुका है। वहां के कांगे्रस अध्यक्ष ने सार्वजनिक बयान में अपनी राज्य सरकार से कहा है कि वह केंद्र के इस फैसले को न माने। देश में दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों के लिए विदेशी चिल्हर कारोबार की छूट वाला यह बेमौसम का फैसला 53 शहरों के लिए है लेकिन इसमें से 28 शहर रिटेल में एफडीआई के खिलाफ लामबंद 11 राज्यों के हैं। इनमें से सबसे ज्यादा सात शहर उप्र से हैं। मध्यप्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु के चार-चार शहर हैं। झारखण्ड के तीन, पश्चिम बंगाल के दो-दो और छत्तीसगढ़, कर्नाटक, बिहार के एक-एक शहर हैं जहां राज्य सरकार की घोषणा के मुताबिक विदेशी दुकानें नहीं खुल सकती। राजस्थान में विरोध में भाजपा और प्रदेश भर के खुदरा व्यापार संगठन सड़कों पर उतर आए हैं। बीजेपी कार्यकर्ताओं ने फ्रांसीसी रिटेल स्टोर कॉरफुर में तोड़-फोड़ भी की। अभी जयपुर में फिलहाल कॉरफूर का ही रिटेल स्टोर खुला है और इसने आते ही बाजार से थोक में खरीददारी शुरू कर दी है। इसका नतीजा यह रहा है कि बाजार से अंडे और सीएफएल बल्ब नदारद हो चुके हैं।
देशी हो या विदेशी, जब देश के परंपरागत बाजार के छोटे-छोटे दुकानदारों के पेट पर लात मारकर सरकार बड़े कारोबारियों को यह मौका दे रही है कि वे आर्थिक एकाधिकार से दसियों लाख छोटी दुकानों का कत्ल करके बाजार पर कब्जा कर लें, तो यह बात भारत जैसे देश में विरोध के लायक है ही। यहां के लोगों को याद होगा कि किस तरह कुछ अरसा पहले जब निजी कंपनियों के पेट्रोल-डीजल पंप खुले थे तो रिलायंस ने अपने पंपों के बगल में अपना ढाबा भी खोल दिया था। हमारे जैसे लोग मजाक में यह कहने लगे थे कि अब अंबानी किनारे बैठकर पंक्चर भी बनाएगा और कई लोगों की रोजी खा जाएगा। नतीजा कुछ ऐसा हुआ कि ढाबों को खा जाने वाले रिलायंस पेट्रोलियम पंपों का ही दीवाला निकल गया और वे सब अपने डीलरों को डुबाते हुए बंद हो गए। लोगों को यह भी याद होगा कि बाजार में रिलायंस कंपनी ने ही रिलायंस फे्रश नाम से फल-सब्जी की दुकानदारी भी शुरू की जिसका कई राज्यों में जमकर विरोध हुआ। भारत में आज विदेशी पूंजी से वालमार्ट जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां आकर छोटे बाजार को तबाह करें, ऐसा इसलिए नहीं है कि देशी बड़ी कंपनियों ने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर जैसे शहर में खुदरा कारोबार के लिए बहुत बड़ी-बड़ी दुकानें यहां के मॉल्स में खोली हुई हैं। लेकिन इनसे एकाएक छोटा व्यापार खत्म हो गया हो, मोहल्ले की दुकानें बंद हो गई हों ऐसा भी नहीं है। और उन्हीं शहरों में अब अगर बिग बाजार जैसे सुपर मार्केट किसी विदेशी कंपनी के खुलेंगे तो उससे बाजार पर, छोटे व्यापारियों पर बड़ी मार और अधिक पड़ जाएगी ऐसा भी हमें नहीं लगता। एक गोरा आकर जितना कारोबारी जुल्म कर सकता है, उतना ही देसी कारोबारी आज कर ही रहा है।
हम अभी देश के रिटेल सेक्टर में विदेशी पूंजी के पक्ष या विपक्ष में बात करने के बजाय अभी कुछ बातों पर चर्चा भर छेडऩा चाहते हैं कि लोग, और हम खुद भी, किन पैमानों पर केंद्र सरकार के इस फैसले को नापें। वालमार्ट किस तरह अंबानी या टाटा के बाजारों के मुकाबले अधिक बुरा होगा यह सोचना हमारे लिए कुछ मुश्किल है। हालांकि वालमार्ट एक बदनाम नाम है और दुनिया के कई जागरूक शहरों में इस कुख्यात खुदरा कारोबारी को अपना साम्राज्य फैलाने की इजाजत नहीं मिली है लेकिन उससे भारत जैसे देश के लोगों पर क्या नया फर्क पड़ेगा यह सोचना होगा। आज भी भारत में छोटे-छोटे सामानों के लिए मोहल्ला-दुकानों के एक बड़े आलीशन और बड़े विकल्प के रूप में देश के शायद सौ-पचास शहरों में मॉल में सुपर बाजार खुल ही चुके हैं। अब इस कमाई को अंबानी अपनी जेब में ले जाए या वालमार्ट ले जाए, इसके बीच के फर्क को हम अभी सोच रहे हैं, और लोग भी सोचें।
हम चिल्हर कारोबार में विदेशी पूंजी की वकालत में दिए गए इस तर्क को भी अनदेखा करना नहीं चाहते कि इससे किसान और उत्पादक को अपने सामान को एक बेहतर दाम मिलने लगेगा जो कि आज बाजार के बिचौलिए कहे जाने वाले लोग खा रहे हैं। यह बात कुछ हद तक तर्कसंगत इसलिए है कि खेत से दो रूपए किलो में निकलने वाली सब्जी बाजार में तीस-चालीस रूपए किलो तक ग्राहक को मिलती है। इस चेन की कड़ी का सबसे मुनाफेदार हिस्सा दलाल और थोक व्यापारी रहते हैं। हम यह तो नहीं मानते कि भारतीय या विदेशी सुपर बाजार मालिक इनके मुकाबले कमाई में कम दिलचस्पी वाले होंगे, लेकिन अगर किसान को फल और उपज का अधिक दाम किसी तरह से मिल सकता है, तो वह आज की जरूरत भी है। दूसरी बात यह कि भारत के बाजार के बारे में हमारा अनुभव यह कहता है कि यहां धंधा बहुत मोटे मुनाफे के साथ करने की आदत लोगों को है। अखबार में इश्तहारों के रेट से लेकर  किसी भी सामान तक, बाजार बहुत मोटी कमाई पर जीने का आरामतलब हो चुका है और दुनिया के आज के कारोबारी तौर-तरीके इससे बहुत अलग हैं। जब कभी भारत को दुनिया में खुला मुकाबला करना होगा, उसे कम मार्जिन पर अधिक बिक्री की तरफ बढऩा ही होगा। अगर भारत में विदेशी कंपनी आकर दूसरी विदेशी कंपनियों या आज के कारोबार में लगी हुई देशी कंपनियों के साथ मुकाबला करके, उपज को अधिक दाम पर खरीदकर ग्राहक को आज के मुकाबले कम दाम पर देने का काम कर सकती हैं तो इससे भारतीय खुदरा कारोबार में एक नई चुस्ती भी आ सकती है जैसी कि बीमा और बैंक में निजी कपंनियों के आने से आई है।
खुदरा कारोबार से परे, मीडिया जैसे कुछ दूसरे कारोबार में पहले ही विदेशी कंपनियां करीब एक चौथाई पूंजीनिवेश के साथ आ ही चुकी हैं और उनकी वजह से राष्ट्रीय हितों पर कोई खतरा आया हो ऐसा अभी तक तो सामने नहीं आया है। हम विदेशी पूंजी या विदेशी कारोबारी का सीधा विरोध करने के बजाय यह देखना चाहते हैं कि जिन कारोबारों में पिछले बरसों में विदेशी पूंजी और कारोबारी आए हैं, वहां का अनुभव क्या रहा है, क्या ग्राहक का फायदा हुआ है? क्या किसान या दूसरे उत्पादक को बेहतर दाम मिला है? क्या सामानों की उपलब्धता बढ़ी है? दरअसल नए कारोबार से पुराने कारोबार पर पडऩे वाली चोट को देखें तो आटोरिक्शा के आने से पैडल रिक्शा और तांगों का धंधा कम हुआ था, मुंबई जैसे शहर में कई हिस्सों में आटोरिक्शा पर रोक लगाकर सिर्फ टैक्सी की इजाजत देने से आटो का धंधा कुछ कम हुआ था और दिल्ली में मेट्रो शुरू होने से बाकी सभी किस्म की गाडिय़ों का धंधा कुछ कम हुआ है। लेकिन थोड़े वक्त के भीतर ही इन सब जगहों पर लोग अपने काम-धंधे को संभाल चुके थे और आज तो रोजाना बीस लाख मुसाफिर ढोने वाली दिल्ली मेट्रो वाले शहर में कोर्ट ने एक लाख नए आटोरिक्शा शुरू करने की इजाजत सरकार को दी है।
विदेशी कारोबारी से दहशत में आ जाने के बजाय यह सोचने की जरूरत है कि आज भारत कितने दायरों में, कितने कारोबार और उद्योगों में दुनिया की कंपनियों से वैसे भी मुकाबला कर रहा है। आज भारत में देशी कार कंपनियां तो एम्बेसडर और फियेट ही थीं, लेकिन उनका कुल उत्पादन जितना था उससे अधिक गाडिय़ों का निर्यात तो आज भारत से यहां पर कार बनाने वाली विदेशी कंपनियां कर रही हैं। इसलिए हम वालमार्ट की दहशत पर भेडिय़ा आया-भेडिय़ा आया की तर्ज पर भागना नहीं चाहते, यह समझने की जरूरत है कि इससे क्या नफा होगा और क्या नुकसान होगा। केंद्र सरकार ने तो आज सौ किस्म की दूसरी परेशानियों के बीच मधुमक्खी के इस छत्ते में बिना किसी तात्कालिक जरूरत के अपना हाथ घुसा दिया है, उसकी इस आत्मघाती कार्रवाई पर हम अधिक कुछ कहना नहीं चाहते क्योंकि वह चारों तरफ से लातघूंसे खा ही रही है। लेकिन देश के लोगों को यह समझने की जरूरत है कि यह हर राज्य का अपना फैसला रहेगा कि वह विदेशी दूकान को इजाजत दे या न दे। इसलिए जनता या व्यापारियों के संगठन अपने-अपने राज्य में राज्य सरकारों या राजनीतिक दलों से ऐसी रोक लगवा सकते हैं। हो सकता है कि यह चुनाव के समय घोषणापत्र का एक मुद्दा बने, लेकिन फिलहाल हमें देश के लोगों के डरने की कोई जरूरत नहीं दिख रही है, भारत में बड़े बाजार चलाने वाली भारतीय कंपनियां यहां की कमाई से दुनिया के दूसरे देशों में भी व्यापार शुरू कर रही हैं और ऐसे में विदेशी कंपनियों की कमाई विदेश चले जाने से आम हिन्दुस्तानी पर क्या फर्क पड़ेगा?

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