23 नवंबर 2011
संपादकीय
एक टीवी इंटरव्यू में दुहराई गई अपनी एक बात के लिए अन्ना हजारे कल-परसों से मीडिया की आलोचना झेल रहे हैं और भाजपा भी अपने इस चहेते आंदोलनकारी की इस बात पर उसके खिलाफ बयान देने को मजबूर भी है। अन्ना हजारे का कहना है कि शराब पीने वाले को तीन बार चेतावनी देनी चाहिए, उसके बाद मंदिर ले जाकर कसम दिलवानी चाहिए कि वह शराब नहीं पीएगा, और उसके बाद भी अगर वह शराब पिए तो उसे मंदिर के सामने खंभे से बांधकर कोड़ों से पीटना चाहिए। उन्होंने यह माना भी कि वे पहले से अपने गांव रालेगानसिद्धि में ऐसा करते भी आए हैं। इसी तरह का काम भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मिजोरम में वहां ईसाई नौजवानों का संगठन वाईएमए करते आया है। चर्च से जुड़े इस संगठन की ऐसी बहुत सी गैरकानूनी कार्रवाई को समाज के हित में मानते हुए वहां की सरकार ने उसे इसकी खुली छूट दी हुई है और मुख्यमंत्री खुलकर ऐसी कार्रवाई की हिमायत करते हैं। मिजोरम लगभग सौ फीसदी ईसाई राज्य है और वहां पर धर्म आधारित संगठन और सरकार के बीच अधिक फर्क नहीं है। लेकिन महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्य में ऐसे किसी धार्मिक एकाधिकार और सरकार इजाजत के बिना अन्ना हजारे लंबे समय से वहां एक धर्म के आधार पर, अपनी कार्रवाई करते आ रहे हैं जिसमें गांव के टीवी पर सिर्फ धार्मिक फिल्म देखने की छूट शामिल है। अन्ना अपने साम्राज्य के तानाशाह की तरह वहां अपने अंदाज का समाज सुधार लागू करते हैं और सार्वजनिक जीवन में उनका कद इतना बड़ा हो गया है कि वे अपनी मनमानी लोगों पर थोप सकते हैं, थोपते आए हैं।
लेकिन लोकतंत्र किसी को सामाजिक भलाई को बाहुबल से थोपने की इजाजत नहीं देता। ऐसा काम तो तरह-तरह के आतंकी संगठन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में करते हैं जहां वे अच्छी बातों को लागू करवाने के नाम पर हिंसा और मनमानी लादते हैं। इसे कुछ बड़े पैमाने पर अगर देखेें तो एक तानाशाह को हटाने के नाम पर और एक देश में लोकतंत्र लागू करवाने के नाम पर अमरीका का गुंडा राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश लाखों मौतों को दुनिया पर लादकर इराक और दूसरे देशों पर हमले करते आया है। दूसरों की आजादी को कुचलने वाले चाहे अन्ना हों, चाहे नक्सली हों, चाहे तालिबान हों और चाहे अमरीका हो, इसे कभी भी बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। लोगों की जिंदगी में कई किस्म की कमजोरियां, खामियां हो सकती हैं, लेकिन कोई आदमी अगर अपनी बीवी को पीटता है, तो उस महिला को बचाने के लिए दुनिया का कोई अन्ना अगर उस आदमी की हत्या करवा दे तो उसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है?
दरअसल अन्ना हजारे के सारे तौर-तरीके गांधीवादी खादी की खाल ओढ़े हुए, पूरी तानाशाही के हैं। भारत की राजनीतिक ताकतों में से जिन लोगों को पिछले एक बरस में अन्ना हजारे का आंदोलन अपनी चुनावी मतलबपरस्ती के माकूल बैठा, उन्होंने अन्ना को गांधी सा बना दिया। लेकिन एक तानाशाह की तोप जिस दिन ऐसी ताकतों की ओर अपना निशाना मोड़ लेगी, क्या उस दिन भी ये लोग इस तानाशाही की स्तुति करते रहेंगे? आज अगर अन्ना हजारे में जरा भी ईमानदारी होती, और बेंगलुरू में अपने ही साथी जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट को मानने की हिम्मत उनकी होती और वे कर्नाटक के भाजपा सरकार के विकराल भ्रष्टाचार के खिलाफ भी मुंह खोलते, और वहां के रेड्डियों और येद्दियुरप्पाओं को हटाने की बात साल-छह महीने पहले से करते तो क्या उस पर भी वे भाजपा के वैसे ही चहेते बने रहते? यह तो भाजपा और कुछ और विपक्षी दलों के लिए सहूलियत की बात है कि अन्ना हजारे अपनी राजनीति में पूरी तरह से बेईमान और पक्षपाती इंसान साबित हुए हैं, इसलिए कांगे्रस और यूपीए के खिलाफ जो राजनीतिक दल हैं, उन सबको इस तानाशाह ने एक क्रांतिकारी दिख रहा है। दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि कोई भी ईमानदार क्रांतिकारी इस तरह का राजनीतिक पक्षपाती और बेईमान नहीं होता। क्रांति के सिद्धांत होते हैं और क्रांतिकारी चाहे हिंसक हो या अहिंसक, वे चेहरे देखकर, पार्टियों के निशान देखकर उन सिद्धांतों को थोपने और उनसे रियायत देने का काम नहीं करते।
बात निकली थी अन्ना हजारे की तानाशाही की। इस देश के जिन लोगों ने कुछ घंटों से लेकर कुछ महीनों तक के लिए अन्ना हजारे को हीरो माना, वे यह सोच लें कि कल के दिन जब यह तानाशाह खादी न पहनने वालों को कोड़े लगवाएगा, सिगरेट पीने या पान खाने वालों को हंटर लगवाएगा, टीवी पर गैरधार्मिक कार्यक्रम के अलावा कुछ भी देखने वालों को पिटवाएगा, जब किसी भी धर्म के व्यक्ति को ले जाकर मंदिर में कसम खिलवाएगा, तब इन समर्थकों या प्रशंसकों को कैसा लगेगा? यह तो सही है कि अन्ना हजारे ने लोकपाल मसौदा कमेटी में उन्हें एक मूर्ख यूपीए सरकार द्वारा दे दी गई सभी पांचों कुर्सियों पर गैरमहिला, गैरदलित, गैरआदिवासी, गैरअल्पसंख्यक, और सिर्फ अपनी ही टोली के लोगों को भारतीय समाज के प्रतिनिधियों के रूप में बिठा दिया था और अपने भ्रष्टाचार के बोझ से दबी हुई, अपराधबोध में डूबी हुई, दहशतजदा सरकार ने उसे मान भी लिया था, लेकिन हम पहले दिन से अन्ना के ऐसे तानाशाह रूख के खिलाफ लिखते आ रहे हैं। लोग याद रखें कि लोकतंत्र के लिए जिसके मन में हेठी है, वह इंसान कभी भी हिंसक हो सकता है, और अन्ना तो खुलकर कैमरे के सामने अपनी हिंसा की वकालत कर रहे हैं। गांधी ने ऐसे लोगों के लिए खादी को बढ़ावा नहीं दिया था।
संपादकीय
एक टीवी इंटरव्यू में दुहराई गई अपनी एक बात के लिए अन्ना हजारे कल-परसों से मीडिया की आलोचना झेल रहे हैं और भाजपा भी अपने इस चहेते आंदोलनकारी की इस बात पर उसके खिलाफ बयान देने को मजबूर भी है। अन्ना हजारे का कहना है कि शराब पीने वाले को तीन बार चेतावनी देनी चाहिए, उसके बाद मंदिर ले जाकर कसम दिलवानी चाहिए कि वह शराब नहीं पीएगा, और उसके बाद भी अगर वह शराब पिए तो उसे मंदिर के सामने खंभे से बांधकर कोड़ों से पीटना चाहिए। उन्होंने यह माना भी कि वे पहले से अपने गांव रालेगानसिद्धि में ऐसा करते भी आए हैं। इसी तरह का काम भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मिजोरम में वहां ईसाई नौजवानों का संगठन वाईएमए करते आया है। चर्च से जुड़े इस संगठन की ऐसी बहुत सी गैरकानूनी कार्रवाई को समाज के हित में मानते हुए वहां की सरकार ने उसे इसकी खुली छूट दी हुई है और मुख्यमंत्री खुलकर ऐसी कार्रवाई की हिमायत करते हैं। मिजोरम लगभग सौ फीसदी ईसाई राज्य है और वहां पर धर्म आधारित संगठन और सरकार के बीच अधिक फर्क नहीं है। लेकिन महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्य में ऐसे किसी धार्मिक एकाधिकार और सरकार इजाजत के बिना अन्ना हजारे लंबे समय से वहां एक धर्म के आधार पर, अपनी कार्रवाई करते आ रहे हैं जिसमें गांव के टीवी पर सिर्फ धार्मिक फिल्म देखने की छूट शामिल है। अन्ना अपने साम्राज्य के तानाशाह की तरह वहां अपने अंदाज का समाज सुधार लागू करते हैं और सार्वजनिक जीवन में उनका कद इतना बड़ा हो गया है कि वे अपनी मनमानी लोगों पर थोप सकते हैं, थोपते आए हैं।
लेकिन लोकतंत्र किसी को सामाजिक भलाई को बाहुबल से थोपने की इजाजत नहीं देता। ऐसा काम तो तरह-तरह के आतंकी संगठन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में करते हैं जहां वे अच्छी बातों को लागू करवाने के नाम पर हिंसा और मनमानी लादते हैं। इसे कुछ बड़े पैमाने पर अगर देखेें तो एक तानाशाह को हटाने के नाम पर और एक देश में लोकतंत्र लागू करवाने के नाम पर अमरीका का गुंडा राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश लाखों मौतों को दुनिया पर लादकर इराक और दूसरे देशों पर हमले करते आया है। दूसरों की आजादी को कुचलने वाले चाहे अन्ना हों, चाहे नक्सली हों, चाहे तालिबान हों और चाहे अमरीका हो, इसे कभी भी बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। लोगों की जिंदगी में कई किस्म की कमजोरियां, खामियां हो सकती हैं, लेकिन कोई आदमी अगर अपनी बीवी को पीटता है, तो उस महिला को बचाने के लिए दुनिया का कोई अन्ना अगर उस आदमी की हत्या करवा दे तो उसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है?
दरअसल अन्ना हजारे के सारे तौर-तरीके गांधीवादी खादी की खाल ओढ़े हुए, पूरी तानाशाही के हैं। भारत की राजनीतिक ताकतों में से जिन लोगों को पिछले एक बरस में अन्ना हजारे का आंदोलन अपनी चुनावी मतलबपरस्ती के माकूल बैठा, उन्होंने अन्ना को गांधी सा बना दिया। लेकिन एक तानाशाह की तोप जिस दिन ऐसी ताकतों की ओर अपना निशाना मोड़ लेगी, क्या उस दिन भी ये लोग इस तानाशाही की स्तुति करते रहेंगे? आज अगर अन्ना हजारे में जरा भी ईमानदारी होती, और बेंगलुरू में अपने ही साथी जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट को मानने की हिम्मत उनकी होती और वे कर्नाटक के भाजपा सरकार के विकराल भ्रष्टाचार के खिलाफ भी मुंह खोलते, और वहां के रेड्डियों और येद्दियुरप्पाओं को हटाने की बात साल-छह महीने पहले से करते तो क्या उस पर भी वे भाजपा के वैसे ही चहेते बने रहते? यह तो भाजपा और कुछ और विपक्षी दलों के लिए सहूलियत की बात है कि अन्ना हजारे अपनी राजनीति में पूरी तरह से बेईमान और पक्षपाती इंसान साबित हुए हैं, इसलिए कांगे्रस और यूपीए के खिलाफ जो राजनीतिक दल हैं, उन सबको इस तानाशाह ने एक क्रांतिकारी दिख रहा है। दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि कोई भी ईमानदार क्रांतिकारी इस तरह का राजनीतिक पक्षपाती और बेईमान नहीं होता। क्रांति के सिद्धांत होते हैं और क्रांतिकारी चाहे हिंसक हो या अहिंसक, वे चेहरे देखकर, पार्टियों के निशान देखकर उन सिद्धांतों को थोपने और उनसे रियायत देने का काम नहीं करते।
बात निकली थी अन्ना हजारे की तानाशाही की। इस देश के जिन लोगों ने कुछ घंटों से लेकर कुछ महीनों तक के लिए अन्ना हजारे को हीरो माना, वे यह सोच लें कि कल के दिन जब यह तानाशाह खादी न पहनने वालों को कोड़े लगवाएगा, सिगरेट पीने या पान खाने वालों को हंटर लगवाएगा, टीवी पर गैरधार्मिक कार्यक्रम के अलावा कुछ भी देखने वालों को पिटवाएगा, जब किसी भी धर्म के व्यक्ति को ले जाकर मंदिर में कसम खिलवाएगा, तब इन समर्थकों या प्रशंसकों को कैसा लगेगा? यह तो सही है कि अन्ना हजारे ने लोकपाल मसौदा कमेटी में उन्हें एक मूर्ख यूपीए सरकार द्वारा दे दी गई सभी पांचों कुर्सियों पर गैरमहिला, गैरदलित, गैरआदिवासी, गैरअल्पसंख्यक, और सिर्फ अपनी ही टोली के लोगों को भारतीय समाज के प्रतिनिधियों के रूप में बिठा दिया था और अपने भ्रष्टाचार के बोझ से दबी हुई, अपराधबोध में डूबी हुई, दहशतजदा सरकार ने उसे मान भी लिया था, लेकिन हम पहले दिन से अन्ना के ऐसे तानाशाह रूख के खिलाफ लिखते आ रहे हैं। लोग याद रखें कि लोकतंत्र के लिए जिसके मन में हेठी है, वह इंसान कभी भी हिंसक हो सकता है, और अन्ना तो खुलकर कैमरे के सामने अपनी हिंसा की वकालत कर रहे हैं। गांधी ने ऐसे लोगों के लिए खादी को बढ़ावा नहीं दिया था।
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